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हुर्रियत-पाकिस्तान कठपुतलियों का खेल

हुर्रियत-पाकिस्तान  कठपुतलियों का खेल

 

कश्मीर के अलगाववादी संगठन आल पार्टी हुर्रियत कॉफ्रेंस के साथ बात करने की पाकिस्तान की जिद के चलते भारत-पाक के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत शुरू होने से पहले ही टूट गई। यूं तो हुर्रियत और पाक राजदूत के बीच पहले भी बातचीत होती रही है, लेकिन मोदी सरकार ने कश्मीर के मामले में कड़ा रूख अपनाया है, कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है इसलिए पाकिस्तान को कश्मीर के अलगाववादी संगठन हुर्रियत से बातचीत नहीं करनी चाहिए। पिछली बार भी मोदी सरकार ने यही रवैया अपनाया और इस बार भी, नतीजतन बातचीत टूट गई। आखिर भारत-पाक बातचीत में इतना महत्वपूर्ण बन जाने वाली हुर्रियत क्या बला है? वह पाकिस्तान से बातचीत पर रोक लगाकर मोदी सरकार को क्या संदेश देना चाहती है।

‘कश्मीर कभी भारत का हिस्सा रहा ही नहीं’ ‘हमें मुकम्मल आजादी चाहिए’ ‘जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान का भाग है’ ‘जम्मू-कश्मीर का भारत में हुआ विलय धोखा है’ ‘हमें स्वशासन दो’। ‘हमें स्वायत्तता चाहिए।’ ‘आत्मनिर्णय वाले सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अमल हो’ ‘कश्मीर मसले पर वार्ता में पाकिस्तान को भी शामिल करो’ ‘बंदूक के जोर पर लेकर रहेंगे निजाम-ए-मुस्तफा।’ इस सारी अलगावादी और पाकिस्तान समर्थक नारेबाजी के साथ कश्मीर में अक्सर धरना- प्रदर्शन, रैली, बंद और हिंसा होती रहती हैं। यह काम करते है कश्मीर घाटी में सक्रिय अलगाववादी संगठन, आतंकी गुट, कट्टरपंथी मजहबी जमातें, कश्मीर के क्षेत्रीय राजनीतिक दल, जो हुर्रियत के नाम से पहचाने जाते हैं। इनके पीछे संगीनों वाले जिहादी आतंकियों की ताकत होती है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि पाकिस्तान द्वारा निर्मित हुर्रियत खूंखार आतंकवादी संगठनों का अहिंसक चेहरा हैं।

दरअसल ऑल पार्टी हुर्रियत कॉफ्रेंस जम्मू-कश्मीर के 23 अलगाववादी संगठनों का गठबंधन है। जो कश्मीर के भारत से अलगाव की वकालत करता है। इसकी स्थापना 9 मार्च 1993 को की गई थी। यह बात किसी से छुपी नहीं है, कि हुर्रियत कॉफ्रेंस जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है। इसे बनाने की जरूरत इसलिए महसूस हुई, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंसक गतिविधियों को मान्यता नहीं दी जाती। इसलिए हुर्रियत कॉफ्रेंस के जरिये कश्मीर समस्या के अंतर्राष्ट्रीयकरण और राजनीतिक समाधान के रास्ते ढूंढे जाएं।

यह काम करने के हुर्रियत कॉफ्रेंस के अपने तरीके हैं। वह मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी संगठनों से संघर्ष कर रही भारतीय सेना की भूमिका पर सवाल उठाने के अलावा मानव अधिकारों की बात करती है। हुर्रियत कॉफ्रेंस भारतीय सेना की कार्रवाई को सरकारी आतंकवाद का नाम देती है और कश्मीर पर भारत के शासन के खिलाफ़ हड़ताल और प्रदर्शन करती है। हुर्रियत कॉफ्रेंस 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता और 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों का बायकॉट भी करती आई है। हुर्रियत कॉफ्रेंस ने अभी तक एक भी विधान सभा या लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है, मगर वह ख़ुद को कश्मीरी जनता का असली प्रतिनिधि बताती है।

नवंबर 2000 में भारत सरकार के एक तरफा युद्धविराम और शांति प्रक्रिया शुरु करने के ऐलान के बाद हुर्रियत कॉफ्रेंस ने पाकिस्तान को भी बातचीत में शामिल करने की मांग की, लेकिन भारत सरकार ने इसे ठुकरा दिया। लेकिन, केंद्र सरकार ने के.सी. पंत को कश्मीरी चरमपंथियों से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। कई दिनों के विचार-विमर्श के बाद हुर्रियत कॉफ्रेंस ने बातचीत की पेशकश को ठुकरा दिया। कारण यह है हुर्रियत कॉफ्रेंस की कार्यकारिणी में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद है। सैयद अली शाह गिलानी जैसे नेता आतंकवादी संगठनों की वकालत करते हैं। कश्मीर के अलगाव के मुद्दे पर भी हुर्रियत के नेताओं में आम राय नहीं है। कुछ नेता कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की मांग करते हैं, वहीं कुछ संगठन कश्मीर की स्वतंत्रता की बात करते है।

कश्मीरी अलगाववाद का पिछले बीस पच्चीस साल का इतिहास गवाह है कि पाकिस्तानियों ने वहां के जन असंतोष को ‘हाईजैक’ कर लिया है। कश्मीरी अलगाववादी ‘आंदोलन’ पर मूल रूप से जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) का दबदबा था। उसका मकसद राज्य को भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग स्वतंत्र राष्ट्र बनाना था। बाद में पाकिस्तान ने विभिन्न दबावों के जरिए इस आंदोलन की दिशा बदल दी और वहां हुर्रियत को खड़ा किया जिसका रुझान जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय कराने की ओर है। राज्य में जेकेएलएफ कमजोर हो गया और पाकिस्तान समर्थक तत्व मजबूत होते चले गए। आज कश्मीरी आंदोलन की प्रधान प्रवृत्ति पाकिस्तान समर्थक है। यह यात्रा बहुत आसान नहीं रही। हालात को अपने पक्ष में मोडऩे के लिए कई चोटी के नेता, दर्जनों मझले दर्जे के नेता और हजारों नागरिक मारे गए। आज वहां ‘अलगाववादी’ शब्द का अर्थ ‘पाकिस्तान समर्थक’ बन चुका है। उसके सभी नेता चाहे वे सैयद अली शाह गिलानी के उग्रपंथी गुट से जुड़े हों, मीरवाइज उमर फारूक के गुट से, जेकेएलएफ चीफ यासीन मलिक के धड़े से या फिर सैयद सलाहुद्दीन और हाफिज सईद जैसे आतंकवादी, कमोबेश सभी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के प्रभाव में हैं और उनके हवाला से मिलते पैसे पर पलते हैं। इस पैसे के जरिये वे कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए आंदोलन या उसकी तथाकथित ज्यादतियों के खिलाफ असंतोष फैलाने का काम करते हैं।

दिलचस्प और चौंकाने वाली बात यह है कि 50 के करीब कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के निर्देश पर सरकारी सुरक्षा मुहैया करवा रखी है। सबसे मजेदार बात उनके प्रति यह कही जा सकती है कि वे भारतीय सरकार की सुरक्षा के बीच रहते हुए भी भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार करते हैं और उन्हें कोई नुकसान भी इसलिए नहीं पहुंच सकता, क्योंकि वे भारतीय सुरक्षाबलों की सुरक्षा में हैं। अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा, जिनमें मीरवायज मौलवी उमर फारूक, सईद अली शाह गिलानी, मौलवी अब्बास अंसारी, शब्बीर अहमद शाह, जावेद मीर, अब्दुल गनी बट्ट, सज्जाद लोन, बिलाल लोन तथा यासिन मलिक जैसे नेता भी शामिल हैं, पर प्रतिवर्ष पचास करोड़ रुपया खर्च हो रहा है, पर गैर-सरकारी अनुमान इससे दोगुना है।

अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा में बढ़ोतरी इसलिए की गई है, क्योंकि अब उन्हें पाक समर्थक आतंकियों से ही जान का खतरा पैदा हो गया है। राष्ट्रवादी लोगों का कहना है कि अलगाववादियों को सुरक्षा मुहैया करवाकर भारत सरकार भारतीय सुरक्षा बलों के मनोबल को कम कर रही है। ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जिन सुरक्षाकर्मियों की बदौलत आज ये अलगाववादी नेता जीवित हैं, वे उन्हीं पर आए दिन झूठे मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगाते रहते हैं। जम्मू-कश्मीर से संचालित हो रहे विभिन्न आतंकी संगठनों को खाड़ी व अन्य देशों से हवाला के जरिए फंड मिल रहा है। जिनसे ये संगठन आतंकी गतिविधियां फैला रहे हैं।

12-09-2015

हुर्रियत अलगाववादी ही नहीं घोर सांप्रदायिक भी है। ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस ने अपने घोषणा पत्र में साफ शब्दों में लिखा गया है, कि उसका लक्ष्य ‘इस्लामी मूल्यों पर आधारित समाज की रचना करना’ तथा ‘मुस्लिम बहुल राज्य’ की स्थापना करना है। हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी ने कभी इस बात को छिपाया भी नहीं कि वह कश्मीर में शरियत का शासन स्थापित करना चाहते हैं।

कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले हुर्रियत नेता पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की आजादी की बात कभी नहीं करते। गिलगित और बलूचिस्तान के बारे में भी चुप्पी साध लेते हैं। पश्चिमोत्तर कश्मीर का वह इलाका तो सीधे इस्लामाबाद के शासन में है। फिर जम्मू-कश्मीर के उस 20 प्रतिशत हिस्से के बारे में उनका क्या कहना है, जो चीन के कब्जे में है। कुछ इलाके पर चीन ने सीधे कब्जा कर लिया है और कराकोरम का कुछ इलाका पाकिस्तान ने उसे उपहार में दे दिया है। पाकिस्तान का आजाद कश्मीर कितना आजाद है, इसका पता हमें स्पष्ट रूप से पाक अधिकृत कश्मीर के उस संविधान से मिल सकता है, जो 1974 में बना था। इसमें साफ लिखा हुआ है कि ‘पाक अधिकृत कश्मीर का संविधान ऐसे किसी भी राजनीतिक गतिविधि का निषेध करता है, जो इस सिद्धांत के विरुद्ध है कि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है।

पिछले लगभग एक दशक से, खासतौर पर 26/11 के मुंबई हमले के बाद से कश्मीरी अलगाववादी खुद को अप्रासंगिक महसूस कर रहे थे। यूपीए सरकार ने अनेक कारणों से पाकिस्तान के साथ वार्ता प्रक्रिया की उपेक्षा की थी और इसका असर कश्मीर में नजर आ रहा था। इतिहास गवाह है कि अलगाववादियों को केवल तभी महत्व दिया जाता है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत का दौर जारी हो। भारत द्वारा वार्ता रद्द करने का निर्णय अप्रत्याशित था। प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी पाकिस्तान समेत सभी दक्षिण एशियाई देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस उद्बोधन में भी उन्होंने पाकिस्तान या कश्मीर का कोई उल्लेख नहीं किया। लेह में भी उन्होंने पाकिस्तान के ‘छद्म युद्ध’ पर तभी टिप्पणी की, जब पाकिस्तान की ओर से नियंत्रण रेखा, अंतर्राष्ट्रीय सीमा तथा संघर्ष विराम के उल्लंघन की बार-बार कोशिश की जा रही थी। लेकिन मोदी ने जो कहा, वह तो 1980 के दशक से ही भारतीय नेतृत्व का रुख रहा है। पाकिस्तान से वार्ता रद्द करने के मोदी के निर्णय से हुर्रियत के नेताओं को जो महत्व मिला, उससे यकीनन ही वे खुश हुए होंगे, लेकिन यदि भारत सरकार को लगता था कि अलगाववादियों और पाकिस्तानी उच्चायुक्त की मुलाकात नाजायज है तो वह हुर्रियत नेताओं को नई दिल्ली जाने से ही रोक सकती थी। मजे की बात है कि गिलानी, जो कि अप्रैल से ही हैदरपुरा स्थित अपने घर और कार्यालय में नजरबंद हैं, को नई दिल्ली की फ्लाइट पकडऩे की अनुमति दी गई। मीरवाइज और यासिन मलिक भी उनके साथ थे। विरोध-प्रदर्शनों के बीच वे पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलने पहुंचे। फिर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे यहां कश्मीरियों के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे हैं। साथ ही उन्होंने कश्मीरियों को नैतिक और कूटनीतिक समर्थन देने के लिए पाकिस्तान की तारीफों के पुल भी बांधे। पाकिस्तानी उच्चायोग में कश्मीरी अलगाववादियों का जाना कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान डे, कश्मीर एकता दिवस, ईद मिलन जैसे समारोहों की लजीज दावतों के लिए इन अलगाववादियों को न्योता दिया जाता है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय अलगाववादियों ने हमेशा की तरह चुनाव का बहिष्कार करने का फरमान जारी किया था, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ा और भाजपा अपने आक्रामक चुनाव प्रचार के कारण एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आई वैसे ही कुछ अलगाववादी धड़ों ने अपनी प्राथमिकता बदल दी। इतना ही नहीं इन्हें शह देने वाला पड़ोसी मुल्क भी घाटी में बदले माहौल से हैरत में है। इन धड़ों के कुछ नेताओं को पाकिस्तान की तरफ से हमेशा से ही उकसाया जाता रहा है। जम्मू-कश्मीर के विधान सभा चुनाव पर हर बार पाकिस्तान की पैनी नजर बनी रहती है। बहरहाल अलगाववादी किसी भी सूरत में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को राज्य में नहीं आने देना चाहते थे। यही वजह है, जिससे घाटी में अलगाववादियों के सबसे बड़े संगठन हुर्रियत कॉफ्रेंस ने चुनाव बहिष्कार करने के साथ राज्य के एक बड़े समुदाय को वोट न देने के लिए षडयंत्रपूर्ण तरीके से अभियान चलाया।

वास्तव में इस बार के विधान सभा चुनाव में लोगों की अभूतपूर्व भागीदारी और मुख्यधारा की राजनीति में विस्तार के चलते राज्य में भाजपा की स्थिति मजबूत हो गई थी, जिसके चलते अलगाववादियों के हौसले पस्त हो गए। वर्षों से राज्य के राजनीतिक धरातल पर हाशिये पर रहे अलगाववादी इस बात से परेशान नजर आ रहे हैं कि पल-पल बदलते परिदृश्य में कहीं वे दर्शक मात्र न बनकर रह जाएं। इसमें आश्चर्य की बात नहीं कि इन स्थितियों ने अलगाववादियों को अपनी कार्यप्रणाली को लेकर फिर से सोचने और आत्मावलोकन करने पर मजबूर कर दिया है। यह आत्मावलोकन इसलिए, ताकि राज्य में न सिर्फ उनका अस्तित्व बचा रहे, बल्कि वे राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकें। अब सवाल ये है कि जम्मू-कश्मीर में बढ़ती हुई अप्रासंगिकता के खिलाफ खुद को बचाने के लिए हुर्रियत को कौन सी राह पकडऩी होगी? इस सवाल का जवाब ढूंढना उनके लिए अब कुछ ज्यादा ही जरूरी हो गया है। पिछले कुछ समय में हुर्रियत के धड़ों के नेताओं ने नई रणनीतियों पर मशविरा किया है। कुल मिलाकर ये दिख रहा है कि हुर्रियत को राज्य में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिये मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में उतरना चाहिए, जिसका अलगाववादी लंबे समय से बहिष्कार करते रहे हैं।

बहरहाल, अभी इस मुद्दे पर चर्चा बंद दरवाजों के भीतर और हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के बहुत ही छोटे से हिस्से में हो रही है, जो चुनावी हस्तक्षेप के कुछ रूपों के पक्ष में है। यह धड़ा इस बात को लेकर आशावादी है कि ‘इस्लामाबाद’ इस मामले में उनका साथ देगा। ऐसे में अलगाववादी धड़े निकट भविष्य में राजनीतिक तौर पर कोई भी प्रगति होते नहीं देख रहे। इन स्थितियों ने राज्य में हुर्रियत के विभिन्न धड़ों में अस्तित्व का खतरा पैदा कर दिया है।

ऑल पार्टी हुर्रियत कॉफ्रेंस में शामिल प्राय: सभी बड़े घटक दलों का किसी-न-किसी आतंकवादी या जिहादी संगठन से संबंध है। मीर वायज उमर फारुख उदारवादी हुर्रियत नेता समझे जाते हैं, किंतु उन्हें उल उमर मुजाहिदीन जैसे जिहादी संगठन का समर्थन प्राप्त है। सैयद अली शाह गिलानी, हिजबुल मुजाहिदीन के कंधे पर सवार हैं, यह प्राय: सबको पता है। पाकिस्तान के सैनिक मुख्यालय रावलपिंडी में बैठे सैनिक अफसर हुर्रियत कॉफ्रेंस का संचालन करते हैं। पाकिस्तान में सत्ता के समीकरण बदलते हैं, तो कश्मीरी संगठनों का ढांचा बदल जाता है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की सैयद अली शाह गिलानी के नेता काजी हुसैन अहमद से तनातनी शुरू हो गयी थी, तो उन्होंने मीरवायज उमर फारूक को हुर्रियत का नेता बनवा दिया। इस पर गिलानी ने अलग होकर अपना अलग गुट खड़ा कर लिया। मुशर्रफ के हटते ही मीर वायज का असर कम हो गया। अब पाक सेनाध्यक्ष का जमात-ए-इस्लामी के नेताओं से फिर संंबंध अच्छा हो गया, तो कश्मीर में गिलानी सर्वशक्तिमान हो गये। भारत सरकार द्वारा कश्मीर समस्या का समाधान खोजने के लिये यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकार कश्मीर में जिन लोगों से बातचीत कर रहे थे, उनमें से कोई भी कश्मीर की राजनीति में कोई महत्व नहीं रखता। हुर्रियत का कोई नेता उनसे बातचीत के लिए तैयार ही नहीं होता था, लेकिन यदि वे तैयार भी होते, तो उनसे बातचीत का कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि वे सबकी सब कठपुतलियां थे, जिनका सूत्रधार कहीं इस्लामाबाद व रावलपिंडी में बैठा होता है।

वास्तव में इस देश को तथा दुनिया को कश्मीर आंदोलन के मूल चरित्र को समझने की जरूरत है। यह वास्तव में इस्लामी विस्तारवाद की लड़ाई है। यह 1947 में भारत के विभाजन की लड़ाई का अवशिष्टांश है। यह न कश्मीरियत की लड़ाई है, न कश्मीर की आजादी की, यह इस्लामी सम्राज्यवाद की लड़ाई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर की 45 प्रतिश्त से अधिक आबादी कश्मीरी नहीं है, जिसमें डोगरा, पंजाबी, पहाड़ी, गुज्जर, बकरवाल, बौद्ध, शिया आदि शामिल हैं। जम्मू और लद्दाख के लोग कतई जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग नहीं होने देना चाहते। घाटी के भी 4 लाख हिन्दू पंडित बाहर न भगा दिये गये होते, तो पूरी घाटी को भी अलगाववादी नहीं कहा जा सकता था। फिर वह कौन सा कश्मीरी वर्ग है, जो भारत से आजादी चाहता है। वह है कश्मीर घाटी का वहाबी आंदोलन से प्रभावित सुन्नी मुसलमानों का वह समुदाय, जिसने अपनी निष्ठा पाकिस्तान के हाथ बेंच रखी है। उनकी आजादी की आवाज वस्तुत: पूरे जम्मू-कश्मीर को शरिया का गुलाम बनाने की आवाज है। कुल मिलाकर कश्मीर की आजादी कश्मीर घाटी (जम्मू और लद्दाख इसमें शामिल नहीं हैं) के वहाबी सुन्नियों द्वारा विदेशी ताकतों के इशारे पर चलाया जाने वाला आंदोलन है। हुर्रियत उसका प्रतिनिधि है, वह जिस दिन चुनाव लड़ेगा उसे अपनी कथित लोकप्रियता की असलियत पता चल जाएगी।

                                                                                                                                                                (सतीश पेडणेकर)

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