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भारतीय भाषाएं और छात्रों के मानवीय अधिकारों का प्रश्न

भारतीय भाषाएं और छात्रों के मानवीय अधिकारों का प्रश्न

हमारी शिक्षा पद्धति की आंतरिक विसंगति है जिसने न जाने कितने क्षमतावान छात्रों का जीवन लील लिया है। उनकी बौद्धिक क्षमताओं को कुंठित कर दिया है। जब किस भाषा में छात्र को पढऩा है, किस भाषा में उत्तर देना है, इसका निर्णय संस्थान को करना था, तो उसका जो परिणाम निकल सकता है, वही निकला। छात्र लगातार फेल होते गये और संस्थान अपनी जीत के जश्न मनाता रहा।

पिछले दिनों उत्तराखंड के रुड़की नगर स्थित आईआईटी (भारतीय प्राद्यौगिकी संस्थान) ने अपने पचास से भी ज्यादा छात्रों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। संस्थान का कहना है कि ये छात्र पढ़ाई-लिखाई में बहुत पिछड़े हुए हैं। यहां का कोर्स पूरा कर पाना इन छात्रों के बस का काम नहीं है। ये छात्र अपनी फरियाद लेकर राज्य के उच्च न्यायालय के पास भी गये, लेकिन न्यायालय ने भी इन छात्रों को कोई राहत नहीं दी। (वैसे अब संस्थान ने इन छात्रों को दयावश एक मौका परीक्षा पास कर लेने के लिये और दे दिया है) अब प्रश्न यह है कि क्या ये सभी छात्र पढऩे-लिखने में सचमुच इतने निकम्मे हैं, जितना संस्थान बता रहा है? संस्थान के इस तर्क को प्रथम बार में तो स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह संस्थान अपने यहां किसी को बिना बौद्धिक जांच-पड़ताल के प्रवेश नहीं देता। प्रवेश से पहले यह ठोक-पीटकर स्वयं जांचता है कि छात्र योग्य है या नहीं? यदि योग्य है तभी उसे संस्थान में प्रवेश दिया जाता है। लेकिन, कुछ महीने बाद संस्थान स्वयं ठोक-पीटकर लिये गये अपने छात्रों को अब अयोग्य और निकम्मे बता रहा है। किसी एक-आध छात्र के बारे में संस्थान निकम्मा होने का फतवा जारी करता तो बात समझ आ सकती थी। असली सिक्कों के बीच धोखे से एक-आधा खोटा सिक्का भी चला ही जाता है। परन्तु यहां तो संस्थान बता रहा है कि पूरी गुल्लक ही खोटे सिक्कों से भरी पड़ी है।

ऊपर दिए गए तर्कों के बल पर ही संस्थान को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। क्योंकि, संस्थान के पास तो पुख्ता प्रमाण हैं। इन छात्रों को पढ़ाने के बाद बार-बार परीक्षाएं लीं गईं। लेकिन, परिणाम हर बार एक ही आया। ये सभी परीक्षा में बुरी तरह फेल हो गये। संस्थान का यही तर्क सभी पर भारी पड़ता है। जब छात्र परीक्षा में पास ही न हो पाये तो संस्थान बेचारा क्या करे? संस्थान ने इन छात्रों को प्रवेश दिया, इससे ही यह सिद्ध होता है कि ये छात्र योग्य हंै, लेकिन ये छात्र बार-बार फेल हो रहे हैं, इससे यह सिद्ध होता है कि ये छात्र अयोग्य हैं। इन दोनों ध्रुवों के बीच की पहेली को सुलझाना जरुरी है।

इन छात्रों का शैक्षिक रिकॉर्ड तो बहुत बढिय़ा है, लेकिन इनमें से ज्यादा की पढ़ाई- लिखाई हिन्दी माध्यम से हुई है। दसवीं- बाहरवीं तक छात्रों को आमतौर पर किसी भी भारतीय भाषा में पढऩे-लिखने की सुविधा प्राप्त है। इस सुविधा का लाभ यह हुआ कि गांव की पिछड़ी जातियों के सामान्य परिवारों के बच्चे भी अपनी योग्यता का प्रदर्शन करने लगे हैं और ताल ठोंककर उन लोगों के साथ आकर खड़े हो जाते हैं, जिन्होंने सभी सुविधाओं का उपभोग करते हुये अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पढ़ाई की है। कबीर ने कहा भी है,’मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यानÓ। भाषा के म्यान को परे रखकर जब केवल ज्ञान का मोल किया गया था तो ये छात्र भी दूसरों के समकक्ष आ खड़े हुये थे। लेकिन, दुर्भाग्य से रुड़की के इस संस्थान में दाखिल हो जाने के उपरान्त, वहां फिर म्यान को लेकर ही चर्चा होने लगी। जिस भाषा में संस्थान इन लड़कों को इंजीनियरिंग पढ़ा रहा था, वह भाषा इन छात्रों के पल्ले ही नहीं पड़ रही थी और जिस भाषा में ये छात्र इंजीनियरिंग समझना चाहते थे, उस भाषा में न पढ़ाने की अपनी जिद पर संस्थान अड़ा हुआ है। किस भाषा में पढऩा है, इस विषय पर निर्णय लेने का अवसर आता है, तो हमारे देश में निर्णय करने की ताकत संस्थान के पास होती है, छात्र के पास नहीं। यह हमारी शिक्षा पद्धति की आंतरिक विसंगति है जिसने, न जाने कितने क्षमतावान छात्रों का जीवन लील लिया है। उनकी बौद्धिक क्षमताओं को कुंठित कर दिया है। जब किस भाषा में छात्र को पढऩा है, इतना ही नहीं बल्कि किस भाषा में उत्तर देना है, इसका निर्णय भी संस्थान को करना था, तो उसका जो परिणाम निकल सकता है, वही निकला। छात्र लगातार फेल होते गये और संस्थान अपनी जीत के जश्न मनाता रहा। कई समाज में जीत के जश्न पर बलि देने की परम्परा है। इसलिये संस्थान ने अपनी जीत के अनुष्ठान में इन छात्रों को बाहर निकालकर नर बलि देने का कर्मकाण्ड भी पूरा कर लिया।

इस नरबलि से बचने का इन छात्रों के पास एक ही रास्ता था कि वे उच्च न्यायालय में गुहार लगाते। लेकिन, इन छात्रों के धैर्य और गुरुभक्ति की दाद देनी होगी कि न्यायालय के पास भी दया की भीख मांगने के लिये ही गये कि संस्थान हमें परीक्षा देने का एक और अवसर प्रदान कर दे। बस इतना ही, हम एक बार फिर संस्थान की भाषा में बोल पाने और लिख पाने में सक्षम बनने के लिये जी-जान लगा देंगे। इन छात्रों ने ये नहीं कहा कि संस्थान ने अपने भीतर ही बीमारी के कीटाणु संभाल कर रखे हैं, जो प्रतिभावान छात्रों को भी एक-आध सत्र में ही पंगु कर देते हैं। उनमें हीन भावना भर देते हैं जिसके कारण वे अपनी बौद्धिक क्षमताओं के अनुरूप जीवन में लम्बी छलांग लगाने में नकारा हो जाते हैं। कानून तो अंधा होता है। उसे संस्थान के पक्ष में ही फैसला देना था। उसके लिये निर्णय करने के लिये यह विषय है ही नहीं कि छात्र को अपनी भाषा में पढऩे-लिखने का अधिकार है या नहीं। उसके लिये देखने का विषय केवल इतना ही है कि संस्थान के मापदंडों पर छात्र खरे उतरते हैं या नहीं? यह अलग बात है कि ये मापदंड उन विदेशी साम्राज्यवादी शासकों ने अपने हितों के लिये निर्धारित किये थे, जिन्होंने दो सौ साल इस देश पर राज किया और अब उन्हें यहां से गये भी सात दशक हो गये हैं। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है जब छात्र सब जगह से हार गये तब संस्थान ने तरस खाकर उन्हें परीक्षा उत्तीर्ण करने का एक और अवसर दे दिया। लेकिन, जिन कारणों से ये प्रतिभाशाली छात्र फेल हो रहे थे, उन कारणों को संस्थान ने बदलना तो दूर, उन पर गौर करना भी उचित नहीं समझा।

12-09-2015

अध्यापन का सबसे उत्तम तरीका अध्यापक की सम्प्रेषणियता है। अध्यापक के पास जो ज्ञान है, वह उसको ठीक तरीके से अपने छात्र तक पहुंचा दे। इस काम के लिये भाषा माध्यम या साधन का काम करती है। जाहिर है अध्यापक की भाषा वही होनी चाहिये जो उसके शिष्यों की भाषा हो। यदि शिष्य और गुरु की भाषा अलग-अलग होगी तो ज्ञान सम्प्रेषण का प्रवाह अवरुद्ध हो जायेगा। रुड़की का यह संस्थान राजकीय संस्थान है। वह आम आदमी के पैसे से चलता है। उसी आम आदमी के पैसे से जिसकी भाषा को संस्थान के प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया गया है। आम आदमी से संस्थान को चलाने के लिये पैसा तो लिया जा रहा है, लेकिन उसे उसकी भाषा में पढ़ाने को यह संस्थान तैयार नहीं है।

संस्थान में अंग्रेजी भाषा में ही पढ़ाये जाने की नीति के पक्षधर यहां एक तर्क दे सकते हैं कि संविधान की सूची में तो अनेक भाषाओं को दर्ज किया गया है, इसलिये कल कोई छात्र आकर कह सकता है कि उसे तमिल में पढ़ाया जाये, दूसरा कह सकता है मुझे पंजाबी में पढ़ाया जाये, तीसरा हिन्दी की मंाग करेगा और चौथा असमिया की। इस प्रकार तो संस्थान में अराजकता फैल जायेगी। ऊपर से देखने पर यह तर्क भारी-भरकम लगता है। इसके नीचे बाकी सारी बहस दब सकती है। लेकिन, यह तर्क ऊपर से जितना भारी दिखाई देता है, भीतर से उतना ही खोखला है। किसी भी राजकीय संस्थान को दो भाषाओं में पढ़ाने की अनुमति तो देनी ही होगी। पहले उस प्रदेश की भाषा जिस में संस्थान स्थित है और दूसरी हिन्दी भाषा, क्योंकि वह संविधान के अनुसार राजभाषा है। उदाहरण के लिये जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तमिलनाडु में है, उसे तमिल और हिन्दी में पढऩे-पढ़ाने का अधिकार तो देना ही होगा। इसके अतिरिक्त वह जितनी ज्यादा भाषाओं में अध्यापन की सुविधा प्रदान कर सकता है, वह उसकी उदारता ही मानी जायेगी। रुड़की का यह संस्थान हिन्दीभाषी प्रदेश उत्तराखंड में स्थित है। अत यहां तो छात्रों को हिन्दी में पढऩे-लिखने का और भी ज्यादा अधिकार है।

कुछ अति बुद्धिजीवियों ने छात्रों की जाति तलाशना शुरु कर दिया है। अपनी तलाश में उन्होंने पाया कि अधिकांश छात्र अनुसूचित जातियों के हैं। बस, उन्होंने अपना वही पुराना राग अलापना शुरु कर दिया। अनुसूचित जातियों के छात्रों से अन्याय। जो लोग अनुसूचित जाति के छात्रों से खार खाए रहते हैं, उन्होंने भी मोर्चा संभाला। हमने तो पहले ही कहा था, जैसी शैली में, कि अनुसूचित जातियों के लिये सीटें आरक्षित करके, आईआईटी जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता मत बिगाड़ो। ये लोग यहां चल नहीं पायेंगे। दरअसल दोनों ही पक्ष उन्हीं साम्राज्यवादी हितों की रक्षा कर रहे हैं, जिन हितों की रक्षा की जिम्मेदारी इन्हें गोरे प्रभु सौंप गये थे। इनका तरीका अलग-अलग है और ऊपर से परस्पर विरोधी भी मालूम पड़ता है, लेकिन उद्देश्य दोनों का एक समान ही है। मारों कहीं, लगे वहीं। अपनी भाषा में पढऩे के अधिकार की तर्कसम्मत लड़ाई को इन्होंने जाति की लड़ाई में बदल दिया। ध्यान रहे आईआईटी में अनुसूचित जाति के जिन छात्रों को प्रवेश मिलता है, उनकी शैक्षिक उपलब्धियां किसी से कम नहीं होतीं। वे भी मुकाबले की लड़ाई जीतकर ही यहां तक आ पाते हैं। यह अलग बात है कि यहां उनकी घेरेबंदी की पूरी व्यवस्था है। वे कबड्डी में यानी अपनी भाषा में पढऩे-लिखने में माहिर हैं और संस्थान उनको क्रिकेट यानी अंग्रेजी की पिच पर घेरकर मारता है। संस्थान की इस तरकीब को भी स्वीकार किया जा सकता है यदि, वह इस घटिया तरकीब में भी संस्थान के सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार कर रहा होता। संस्थान यदि उन छात्रों की परीक्षा, जो दस जमा दो की अपनी क्लास अंग्रेजी माध्यम से उत्तीर्ण करके आये हैं, हिन्दी भाषा के माध्यम से ले लेता और जो दस जमा दो की क्लास हिन्दी माध्यम से पास करके आये थे, उनकी परीक्षा अंग्रेजी माध्यम से लेता और फिर परिणाम घोषित करता तब पता चल जाता कि विपरीत भाषा में परीक्षा देने से परिणाम पर क्या असर पड़ता है। तब शायद पहले वर्ग के छात्र भी बार-बार के प्रयास में पास न हो पाते। संस्थान खेल कोई भी खेले, लेकिन कम से कम खेल के नियम तो सभी छात्रों के लिये समान रखे। दुर्भाग्य से संस्थान यही नहीं कर पाया। नियम अंग्रेजी भाषा के पक्ष में हैं और खेलने के लिये बुलाया जा रहा है भारतीय भाषा के माध्यम से परीक्षा देने वालों को। इस पर भी धूर्तता यह कि उनके हार जाने पर उनकी योग्यता को लेकर ही प्रश्न खड़े किये जा रहे हैं।

ऐसे मौकों पर बुद्धिजीवियों की एक और जमात नमूदार होती है। यह इस पूरी बहस को एक नया ऐंगल देती है। चेहरे पर गंभीरता इतनी है कि इनकी धूर्तता को कोई लाख चाहने पर भी सूंघ नहीं सकता। इनका कहना है कि उच्च शिक्षा भारतीय भाषाओं के माध्यम से दी ही नहीं जानी चाहिए, क्योंकि भारतीय भाषाओं में पढऩे से छात्रों के भविष्य पर ग्रहण लग जाता है। उनको नौकरी कहां मिलेगी, यह सोचकर इस जमात का हाजमा खराब होने लगता है। छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुये यह जमात, उच्च शिक्षा, खासकर विज्ञान के विषयों की, भारतीय भाषाओं में देने का निषेध करती हैं। आम आदमी इस जमात की मंशा को लेकर धोखा खा जाता है। वह सोचता है, ठीक ही कहते हैं। इस जमात का इसमें अपना स्वार्थ तो है नहीं। बेचारे हमारे भविष्य की खातिर तो कह रहे हैं। लेकिन, सच्चाई इसके विपरीत है। पहला प्रश्न तो यही है कि इनको, दूसरों के भविष्य को लेकर दूरगामी प्रभाव के निर्णय लेने का अधिकार किसने दिया? कहीं ऐसा तो नहीं कि इनको चिन्ता अपने भविष्य की है और ये नाटक भारतीय भाषाओं में पढऩे वाले छात्रों के भविष्य की चिन्ता का कर रहे हैं? उच्च शिक्षा संस्थानों में पढऩे के लिये जो भी छात्र आते हैं, वे बालिग या व्यस्क ही होते हैं। उनको हमारा संविधान सभी अधिकार देता है। वे सम्पत्ति खरीद और बेच सकते हैं। वे अपने जीवन का सबसे बड़ा निर्णय यानी अपनी इच्छा से विवाह करने का अधिकार रखते हैं। इतना ही नहीं, उन्हें वोट देने का अधिकार है। संविधान मानता है कि वे इतने मैच्योर हो चुके हैं कि अपनी इच्छा से सरकार बना सकें। परन्तु उन्हें यह निर्णय करने का अधिकार नहीं है कि उन्हें किस भाषा में परीक्षा देनी है। किस भाषा में पढऩा है। यह निर्णय करने का अधिकार उनके पास नहीं है। उनका यह अधिकार, उन्हीं के भविष्य की दुहाई देकर छीना गया है। हमारा तर्क बहुत सीधा है। एक बालिग व्यक्ति को यदि लगता है कि उसका भविष्य अंग्रेजी के माध्यम से पढऩे-लिखने में है तो वह जरुर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ेगा और लिखेगा। उसे ऐसा करने का पूरा अधिकार भी है और सरकार उसके इस अधिकार की रक्षा भी करती है। लेकिन, दूसरे बालिग व्यक्ति को लगता है कि उसका भविष्य भारतीय भाषा में पढऩे-लिखने में है। उसे भी इसका अधिकार है। लेकिन, दुर्भाग्य से सरकार और उसके द्वारा संचालित शिक्षा संस्थान उसे उसका यह अधिकार देने को तैयार नहीं है। जाहिर है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में बालिग छात्रों के दो समूह बन गये हैं। पहला समूह अपना भविष्य अंग्रेजी माध्यम से पढऩे लिखने में देखता और दूसरा समूह अपना भविष्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढऩे-लिखने में देखता है। बालिग होने के कारण दोनों समूहों के छात्रों को यह निर्णय करने का अधिकार है। लेकिन उच्च

शिक्षा संस्थान पहले समूह के इस अधिकार की तो रक्षा करते हैं लेकिन, दूसरे समूह के छात्रों के अधिकार की रक्षा करने की बात तो दूर, वह उसका डंके की चोट पर हनन करते हैं। इसलिये मूल प्रश्न भारतीय भाषाओं के महत्व या उनकी उपादेयता का नहीं है, बल्कि यह प्रश्न एक खास वर्ग के मानवीय अधिकारों के हनन का है।

रुड़की का यह संस्थान अपने छात्रों से पहले तो, उनका यह मानवीय अधिकार या जन्मसिद्ध अधिकार छीनता है और उसके बाद उनको अयोग्य घोषित करता है। वह पहले उनके प्रकृति प्रदत्त कवच और कुंडल छीनता है और उसके बाद उनको निहत्था करके, उन्हें अयोग्य घोषित करता है। लेकिन आश्चर्य है कि इस बात पर तो सभी टीका-टिप्पणी कर रहे हैं कि उन छात्रों को एक और अवसर दिया जाना चाहिये या नहीं, लेकिन मूल प्रश्न की ओर कोई ध्यान देने को तैयार नहीं है। यहां तक भी सिर धुना जा रहा है कि कैसे-कैसे लोग अब आईआईटी तक में आने लगे हैं। भाव कुछ इसी प्रकार का है जैसे किसी अभिजात्य वर्ग के क्लब में कोई धोती पहने नंगे पैरों, देहात का आदमी घुस आया हो।

किसी ने यह प्रश्न नहीं उठाया कि इन छात्रों के अपनी भाषा में पढऩे के मानवीय अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिये। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग भी चुप्पी साधकर बैठ गया है। अपने देश में आतंकवादियों के मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिये भी खून पसीना एक कर देने वाले खूंखार बुद्धिजीवियों की भी एक जमात है। याकूब मेनन के मामले में, उसके मानवीय अधिकारों के लिये लडऩे वाले अली बाबा के ऐसे ‘चालीसÓ ने तो अपनी शिनाख्ती परेड भी इस देश के लोगों के सामने कर दी थी। लेकिन, इस ग्रुप के मुंह पर, इन प्रतिभाशाली छात्रों के मानवीय अधिकारों का प्रश्न आने पर ताला क्यों लग गया? यहां यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि रुड़की के संस्थान का नाम तो इस पूरी बहस में केवल एक प्रतीक के रुप में प्रयोग किया गया है। यह बहस और इसमें उठाये गये मुद्दे भारत के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों पर समान रुप से लागू होते हैं।

एक और समूह भी इस पूरी बहस में अपनी हिस्सेदारी संभाल कर बैठा है। यह समूह, ऊपर से देखने पर उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश ले लेने के बावजूद वहां के माहौल में स्वयं को मिसफिट पाते हुये, अनुत्तीर्ण हो गये छात्रों का सबसे बडा हितचिन्तक दिखाई देता है। लेकिन, असल में यह समूह इन छात्रों का सबसे बड़ा शत्रु है। यह समूह सबसे पहले तो व्यवस्था और सरकार को लताड़ लगाता है कि वह भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़कर आये छात्रों को आईआईटी और ऐसी ही अन्य संस्थाओं में प्रवेश दे देने के बाद उनको

भूल जाती है। अब इन छात्रों की अंग्रेजी कमजोर है, इस वजह से ही तो ये छात्र बाकी छात्रों के साथ चल नहीं पाते और फेल हो जाते हैं। इसलिये शिक्षा संस्थानों को चाहिए कि वे ऐसे छात्रों को अंग्रेजी में अव्वल बनाने के भी प्रयास करें ताकि ये छात्र दूसरे छात्रों का मुकाबला कर सकें। इस समूह के इस दयानुमा सुझावों के पीछे वही धूर्तता छिपी हुई है कि यदि आईआईटी में पढऩा है तो अंग्रेजी तो सीखनी ही पड़ेगी। हां तुम्हें सिखाने के अतिरिक्त प्रयास किये जा सकते हैं। कोई कम्बख्त यह नहीं कहता कि जो छात्र भारतीय भाषाओं में पढऩा चाहते हैं, उनके लिये वैसी ही व्यवस्था कर दी जायेगी, ताकि सारी समस्याओं का ही अंत हो जाये।

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

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