ब्रेकिंग न्यूज़ 

ताकतवर जातियों को भी चाहिए आरक्षण

ताकतवर जातियों को भी चाहिए आरक्षण

आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए है और कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि पटेलों को किसी भी तरीके से पिछड़ा माना जा सकता है, लेकिन आरक्षण अब सामाजिक न्याय का औजार नहीं रहा वह ताकतवर जातियों के लिए सत्ता को मजबूत करने का खेल हो गया है।

आरक्षण ने आज समाज की धारा को ही बदल दिया है। एक वक्त था जब अंग्रेजों ने जनगणना कराई थी और निम्न जाति के लोगों में अपने को ऊंची जाति का लिखाने की होड़ लग गई थी। तब हर कोई सामाजिक रुप से ऊंची सीढ़ी हासिल करना चाहता था। लेकिन, आरक्षण के प्रावधान ने इस धारा को उलट दिया है अब ताकतवर जातियों में पिछड़ों में शामिल होने की होड़ लग गई है। आज देश का नजारा यह है कि देश के कई हिस्सों में ताकतवर जातियों में पिछड़ी जातियों वाला आरक्षण पाने की होड़ लगी है। ताकतवर जातियां ही सामाजिक रूप से पंगु जातियों के लिए बनी आरक्षण की बैसाखी को पाना चाहती हैं। इन दिनों गुजरात की सबसे संपन्न राजनीतिक और सामाजिक ताकत वाली पटेल जाति पिछड़ी जातियों को मिलने वाले आरक्षण को पाने के लिए राज्य भर में आंदोलन चला रही है। आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए है और कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि पटेलों को किसी भी तरीके से पिछड़ा माना जा सकता है। लेकिन, आरक्षण अब सामाजिक न्याय का औजार नहीं रहा, वह ताकतवर जातियों के लिए सत्ता को मजबूत करने का खेल हो गया है। गुजरात में पटेलों का आरक्षण के लिए आंदोलन अपनी सत्ता को और मजबूत करने का खेल है। इस आंदोलन ने गुजरात की राजनीति में भूचाल ला दिया है। पटेल समाज मांग कर रहा है कि उन्हें भी अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) में शामिल कर आरक्षण का लाभ दिया जाये।

गुजरात के पटेल कोई सामान्य जाति नहीं बल्कि, समृद्ध और सत्तासंपन्न जाति के माने जाते हैं। लाखों गुजराती पश्चिमी देशों में बसे हुए हैं, जहां वे अपना व्यापार करते हैं। गुजरात में रहने वाले पटेल भी कुछ कम नहीं हैं। हर क्षेत्र में उनका खासा दबदबा है। नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में आधे से ज्यादा मंत्री पटेल समुदाय के थे। आज भी मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष आर.सी. फलदु दोनों ही पटेल हैं।

गौरतलब है कि गुजरात में पटेल समुदाय पिछले कई सालों से भाजपा का समर्थक माना जाता है। सन 1985 में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने एक नया प्रयोग किया था, जिसे ‘खामÓ के रूप में जाना जाता है। खाम(य॥ररू) यानी क्षत्रिय, दलित, आदिवासी और मुस्लिम। तब ओबीसी आरक्षण को लेकर पटेलों और अन्य पिछड़े वर्ग के बीच काफी हिंसा हुई थी। पटेल तभी से कांग्रेस से नाराज माने जाते हैं। शायद यही कारण है कि आज गुजरात में भाजपा पर पूरी तरह से पटेलों का प्रभुत्व माना जाता है। बहुत से राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस आंदोलन के जरियें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को चुनौती दी जा रही है। इसी कारण भाजपा इस आंदोलन से सकते में है और आंदोलन को दूसरी ओर मोडऩे की कोशिश में जुटी है। हाल ही में केन्द्रीय मंत्री और राज्य भाजपा के नेता मोहन कुंडारिया ने आरोप लगाया कि यह आंदोलन कांग्रेस द्वारा प्रेरित है। जिस तरह से यह आंदोलन तेजी से पूरे राज्य में फैल रहा है, उससे भाजपा चिंतित है। गुजरात में अक्टूबर में महानगर पालिका और नगर पालिका के चुनाव होने हैं। ऐसे में अगर भाजपा के जनाधार में नाराजगी आएगी तो चुनाव में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। यही कारण है कि यह पूरा मामला राजनैतिक तौर पर संवेदनशील बनता जा रहा है।

आंदोलन के तेज होने के बावजूद मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल इस पर चुप्पी साधे हैं। सिर्फ भाजपा ही नहीं, कांग्रेस भी इस मुद्दे पर कुछ नहीं कह रही, क्योंकि इस मुद्दे पर कोई भी टिप्पणी करना फायदे से ज्यादा नुकसान कर सकता है। अब देखना यह है कि आने वाले स्थानीय निकायों के चुनावों में इस आंदोलन का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं। गुजरात में करीब 20 फीसदी आबादी पटेल समाज की है। यह समुदाय पिछले दो दशकों से भाजपा के साथ रहा है। इस आंदोलन के संयोजक हार्दिक पटेल आंदोलन की सार्थकता के पक्ष में दलील देते हुए कहते हैं, कि यूं तो उनके समुदाय को आर्थिक दृष्टि से मजबूत माना जाता है, लेकिन इसमें करीब 40 फीसदी लोगों की हालत इससे अलग है और इसलिए सरकार को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण देना चाहिए।

12-09-2015

इस आंदोलन के शुरू होने की कथा भी काफी दिलचस्प है। कुछ दिनों पहले राज्य सरकार ने पुलिस विभाग में बहाली के लिये 1000 पदों की वैकेंसी निकाली थी, लेकिन जब भर्तियां हुईं तो पटेल या पाटीदार समुदाय के केवल सौ से कुछ ही ज्यादा पद थे जो उनकी जनसंख्या की तुलना में भी कम थे। यह बात जब फैली तो पाटीदार समाज को बहुत खटकी। अक्सर सरकारी भर्तियों में पाटीदार समाज के लोगों की अच्छी खासी संख्या होती है। लेकिन, राज्य की आरक्षण व्यवस्था के कारण पटेलों का प्रतिशत कम हुआ। 20 प्रतिशत आबादी वाले समुदाय को 20 प्रतिशत से कम पद मिले। तब से पटेलों में यह बात पैठ कर गई है, कि केवल आरक्षण के जरिये ही सत्ता पर अपना वर्चस्व और पकड़ को मजबूत रखा जा सकता है। बिना आरक्षण के तो सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में उनकी संख्या कम होती जाएगी। इसलिए वह पिछड़े वर्ग में शामिल करने की और आरक्षण की मांग कर रही है। आरक्षण आंदोलन से जुड़े एक नेता ने कहा कि हमारे बच्चों को अच्छे नंबर पाने के बावजूद अच्छे कालेजों में प्रवेश नहीं मिल पा रहा। यदि पटेलों को ओबीसी में शामिल किया गया तो ही भावी पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा। पटेल समुदाय की यह भी दलील है कि गुजरात राज्य में आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद भी पाटीदार समाज को सरकारी भर्ती में मौजूदा आरक्षण प्रणाली के चलते योग्य प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। इसलिए इस समाज को भी शैक्षणिक व अन्य पिछड़े वर्गों की आरक्षण व्यवस्था में शामिल करके उचित न्याय दिया जाना चाहिए। पटेल समाज अधिकांशत: गांवों में रहता है और खेती पर आधारित है। सीमित आय के संसाधन एवं अनियमित मौसम के चलते इस किसान समुदाय की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय है। इसका अनुमान प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के आकंड़ों से लगाया जा सकता है। लेकिन, पटेल समाज इस बात का ख्याल नहीं कर रहा कि क्या कोई आयोग पटेलों की राजनीतिक रूप से ताकतवर, बड़ी जोतों वाली, व्यापारिक तौर पर संपन्न, विदेशों में दो सौ साल से व्यापार करनेवाली जाति को पिछड़ा मान भी सकता है या नहीं। अचरज की बात यह है कि हर बात में सामाजिक न्याय की वकालत करने वाली राजनीतिक पार्टियां पटेलों की इस गलत मांग के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल पा रही है। आखिर, पटेल जैसे विशाल समुदाय के वोट कौन सी पार्टी खोना चाहेगी।


हिंसा से मिलेगा आरक्षण?


12-09-2015

गुजरात में आर्थिक और सामाजिक रुप से सबसे संपन्न वर्ग पटेल समाज को भी आरक्षण की दरकार है। इसलिए उनका नया नेता हार्दिक पटेल केंद्र और राज्य सरकार को चुनौती देने में जुटा हुआ है। आरक्षण की मांग को लेकर अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में संपन्न हुई पटेल रैली में हार्दिक पटेल ने हुंकार भरी। रैली में लाखों की संख्या में आरक्षण समर्थक शामिल हुए। हार्दिक ने ज्ञापन सिर्फ मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को ही देने की शर्त रखी थी। इसके पहले हार्दिक पटेल ने ओबीसी कोटा की मांग को लेकर गुजरात की सरकार पर दबाव बनाने के लिए पटेल समुदाय के लोगों की विशाल जनसभा को संबोधित किया। इस दौरान सुरक्षा चाकचौबंद थी, 20 हजार से ज्यादा जवानों के साथ ही कमांडो और अर्धसैनिक बलों को भी सुरक्षा में तैनात किया गया था। ड्रोन के जरिये भी नजर रखी गई और भीड़ की वजह से पश्चिम अहमदाबाद के ज्यादातर इलाकों को नो-वीकल जोन बना दिया गया था। पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल का कहना है कि आरक्षण मिले बिना आंदोलन खत्म नहीं करेंगे। हार्दिक पटेल ने केंद्र और राज्य सरकार को चेतावनी दी और कहा कि पटेल समुदाय को आरक्षण का हक प्यार से नहीं मिलेगा तो हम उसे छीन लेंगे।

गुजरात सरकार ने भी हालात को बिगड़ते देख हार्दिक पटेल को हिरासत में लेने का आदेश दिया। इसके बाद पटेल समुदाय के समर्थकों ने जमकर नारेबाजी करते हुए मुंबई की तरफ जाने वाले एनएच को जाम कर दिया, हिंसक भीड़ ने जमकर उत्पात मचाते हुए हिंसा और सूबे की गृह राज्य मंत्री रजनी पटेल के मेहसाणा स्थित आवास पर पत्थरबाजी और आगजनी की, पांच दर्जन सरकारी और निजी बसों को आग के हवाले कर दिया। इसके बाद पुलिस ने हार्दिक पटेल को अपनी हिरासत से मुक्त कर दिया। हार्दिक पटेल के समर्थकों के उग्र आंदोलनों की वजह से गुजरात के सूरत और मेहसाणा में पुलिस को कफ्र्यू तक लगानी पड़ी, अहमदाबाद को 13 सालों बाद सेना के हवाले करना पड़ा। कई शहरों में स्कूल-कॉलेज बंद कर दिये गये। कई शहरों में इंटरनेट की सेवा पर रोक लगानी पड़ी। इसका मकसद व्हाट्सऐप जैसी सेवाओं को रोकना था जिससे, कि अफवाहों से उपजी अशांति को रोका जा सके। अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर ने भी माना कि जिस तरह से आरक्षण की मांग को लेकर हिंसा की गई उससे साफ जाहिर होता है कि इसकी तैयारी अराजक तत्वों ने पहले से ही की थी। पुलिस फिलहाल तफ्तीश कर रही है। मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने लोगों से शांति बनाये रखने की अपील की। पूरे मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने एक-दूसरे से बात की। केंद्र सरकार ने 5000 पैरा मिलिट्री फोर्स के जवानों को गुजरात भेजा है। हिंसा प्रभावित इलाकों में बीएसएफ और आरएएफ की कई कंपनियां तैनात करनी पड़ी।

जिंदगी के महज 22 वसंत देख चुके हार्दिक पटेल को अपने समुदाय का रुतबा और उसके वोटों का महत्व पता है इसलिए वो गुमान में हैं और यहां तक कह दिया कि हम जहां से निकलते हैं, क्रांति वहीं से शुरू हो जाती है। इस दौरान हार्दिक पटेल की जुबान सख्त होने के साथ बहक भी गई कहा कि युवाओं को हक नहीं मिला तो नक्सलवाद पैदा होगा। बीजेपी और कांग्रेस पर सिर्फ राजनीति करने का आरोप लगाया। पटेल को देश में अपने समाज की आबादी पता होने के साथ ही सियासतदारों के वोटों की सियासत भी पता है। भाषण के दौरान उन्होंने कहा कि हम सूबे में 1.80 करोड़ और पूरे हिंदुस्तान में बड़ी आबादी में हैं। 170 एमपी हमारे हैं। बिहार में नीतीश हमारा है, आंध्र में चंद्रबाबू हमारा है। इस दौरान खुलकर आरक्षण न मिलने की दशा में आगामी चुनाव में गुजरात सरकार को चलता करने का दावा तक किया। आरक्षण के साथ ही 6 हजार किसानों की खुदकुशी का बयान देकर लोगों की सहानुभूति पाने की कोशिश की।

हार्दिक पटेल के पिता गुजरात बीजेपी के छोटे नेता हैं। लेकिन, वह गुजरात की पॉलिटिक्स का किंग मेकर बनने की हसरत जरुर पाले बैठे हैं। जिस तरह की राजनीति हार्दिक पटेल कर रहे हैं उसका बड़ा फायदा उन्हें दिख रहा है। क्योंकि उन्हें पता है कि यह आंदोलन 100 मीटर की रेस नहीं मैराथन है। इसमें सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी लड़ाई भी एक साथ लडऩी होगी। पटेल ने गुजरात में बीजेपी के वोट मैनेजमेंट पर भी जमकर तंज कसे और कहा कि इसकी हवा आंध्र में निकल गई तो बीजेपी की असली परीक्षा बिहार विधानसभा का चुनाव करार दिया। पटेल ने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि केवल वल्लभाई पटेल की प्रतिमा लगाने से काम नहीं चलेगा।

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की अखबारों में खुली चिट्ठी के जरिये पटेल समुदाय से अपना आंदोलन खत्म करने की अपील पर भी हार्दिक पटेल ने करारा वार किया कि एक आतंकी के मसले पर सुप्रीम कोर्ट रात को खुल सकता है तो हमारे हक की बात क्यों नहीं होती। हार्दिक पटेल ने दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के नक्शे कदम पर चलने की बात कही और कांग्रेस-बीजेपी पर पटेल समाज को छलने का तोहमत मढ़ दिया। इसका सीधा मतलब तो यही है कि वो गुजरात में पटेल समाज के नेता बनना चाहते हैं। उन्हें पता है कि पटेल समाज के बल पर अपनी सरकार तो नहीं बना सकते हैं लेकिन, कई सरकारों का खेल बिगाड़ जरुर सकते हैं।

                (कुमार मयंक)


केवल गुजरात ही नहीं महाराष्ट्र में भी ऐसा ही हुआ है। कुछ समय पहले तक लोगों में अपने को ऊंची जाति का बताने की होड़ थी। आरक्षण ने इस प्रवृत्ति को बदल दिया। अब उच्च जातियों में अपने को पिछड़ा साबित करने की होड़ है। इसका उदाहरण है- महाराष्ट्र की मराठा जाति। कभी मराठा जाति के लोग अपने को क्षत्रिय कहते थे। आज वे अपने को पिछड़ा साबित करने में लगे हैं। यहां मैं आप को बता दूं हमें मराठा जाति और मराठी मानूस में घालमेल नहीं करना चाहिए। हर मराठी भाषी को मराठी मानूस कहा जाता है, लेकिन मराठा महाराष्ट्र की एक जाति है जिसमें युद्ध करने वाले भी है और खेती करने वाले भी। यानी क्षत्रिय भी हैं और कुर्मी भी, जो खेती करते हैं। महाराष्ट्र में मराठा जाति पंजाब और हरियाणा में जाटों की तरह राजनीतिक और आर्थिक रूप से ताकतवर है। इस जाति के लोग शिवाजी को अपना महानायक मानते हैं, क्योंकि उन्होंने इसे सत्तासंपन्न बनाया। आज यह जाति राज्य की राजनीति पर हावी है। ज्यादातर मुख्यमंत्री और मंत्री इसी जाति के रहे है। राजनीति में इस समुदाय को अपनी संख्या से कहीं ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला हुआ है 35 प्रतिशत आबादी वाली इस जाति को राज्य विधान सभा में 43 प्रतिशत प्रतिनिधित्व हासिल है। पंचायतों, पंचायत समिति और जिला परिषदों पर भी उसका कब्जा है। आर्थिक रूप से भी वह खासी सशक्त हैं, इस समुदाय के पास जमीन-जायदाद है। शक्कर कारखाने, कॉपरेटिव, कॉपरेटिव बैंक, शिक्षा संस्थाएं जो महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उन पर इस जाति का ही नियंत्रण है। इस सबके बल पर मराठाओं ने सत्ता पर भी अपनी पकड़ मजबूत कर रखी है। मगर तब भी उन्हें आरक्षण चाहिए।

12-09-2015

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की मांग नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से मराठा आरक्षण के लिए आंदोलन चला रहे थे। गोपीनाथ मुंडे और छगन भुजबल जैसे ओबीसी जातियों के नेता शुरूआत में आरक्षण का विरोध कर रहे थे। उनका मानना था कि मराठा जाति राज्य की राजनीतिक और आर्थिक रूप से सशक्त जाति है उसे आरक्षण देना आरक्षण का मजाक है । तब उन्हें आशंका थी कि पिछड़ों के आरक्षण में से मराठा जाति को आरक्षण दिया जाएगा। लेकिन, जब यह स्पष्ट हो गया है कि मराठा आरक्षण से पिछड़ों के आरक्षण पर कोई आंच नहीं आएगी तो उन्होंने विरोध छोड़ दिया और मराठा आरक्षण का समर्थन करने लगे। वैसे मराठा जाति की विशाल आबादी को देखते हुए कोई भी राजनीतिक दल मराठा आरक्षण का विरोध नहीं करता। राज्य सरकार ने आखिरकार उन्हें आरक्षण दे भी दिया जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में भी आरक्षण का वही हश्र हो सकता है, क्योंकि मराठा आरक्षण मिलने के बाद राज्य में आरक्षण पचास प्रतिशत से ज्यादा हो जाएगा।

कुछ समय पहले जाटों जैसी ताकतवर जाति भी आरक्षण के लिए आंदोलन कर रही थी। मनमोहन सिंह सरकार ने उसे आरक्षण दे भी दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। यह अनुभव बताते हैं कि हमारे देश के राजनीतिक दल इतने अवसरवादी हैं कि वह वोट बैंक के दबाव के सामने तुरंत आत्मसमर्पण कर देते हैं। दरअसल ताकतवर और संपन्न जातियों को आरक्षण देना आरक्षण के सिद्धांत का मजाक उड़ाना है, लेकिन राजनीतिक दल इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट रुख अपनाने से बचते हैं। कई बार तो ऐसी जातियों को खुश करने के लिए सरकारें आरक्षण दे भी देती हैं। महाराष्ट्र में ऐसा ही हुआ। सरकार को पता था मराठा समुदाय को आरक्षण देने पर आरक्षण पचास प्रतिशत से ज्यादा हो जाएगा, और कोर्ट उसे खारिज कर देगा तो भी महाराष्ट्र सरकार ने आरक्षण दिया, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। पटेलों ने इससे सबक लेकर अपने को ओबीसी सूची में शामिल करने की बात की है। इससे ओबीसी जातियों और पटेलों में तनाव पैदा होगा। आखिर ओबीसी जातियां नहीं चाहेंगी कि उनके आरक्षण में पटेल समुदाय की भी हिस्सेदारी हो जाए। इस तरह पटेल आरक्षण की मांग ने गुजरात भाजपा के लिए नया सिरदर्द पैदा कर दिया है, जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं है।

सतीश पेडणेकर

tks tour отзывыru oltatravel

Leave a Reply

Your email address will not be published.