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आदत बुरी सुधार लो, बस हो गया भजन

आदत बुरी सुधार लो, बस हो गया भजन

हम में से अनेक व्यक्ति ऐसे हैं जिनको यह ज्ञान है कि अच्छी आदतें हमारे जीवन को उज्जवलमय बना देती हैं। अच्छी आदत, अच्छी संगत हमें परिष्कृत करने के साथ ही और संस्कारी भी बनाती हंै, लेकिन किसी भी आदत को अगर मन से न अपनाया जाये तो उसका कोई मोल नहीं होता। इसका हमारे जीवन में कोई प्रभाव भी नहीं पड़ता। ऐसे बहुत से लोग हैं जो सत्संग में जाकर अपना समय व्यतीत करते हैं, ऐसे लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, लेकिन समाज पर उसका असर देखने को नहीं मिलता। लोग अपनी संकुचित सोच से आगे नहीं बढ़ पाते हैं, केवल सुनना उनके लिए एक मनोरंजन का माध्यम बन गया है। ऐसे लोगों के लिए शब्द उनके मुंह से निकल कर कानों तक ही सीमित हो जाते हैं, और दिल तक नहीं पहुंच पाते हैं। हर आदमी इन्द्रिय सुख के पीछे पड़ा रहता है, उनका प्रवचन सुनना केवल स्रवणेन्द्रीय के आनन्द के लिए किया जाता है।

जब कोई बीमारी हो जाती है तो व्यक्ति को उस बीमारी की दवाई दी जाती है, लेकिन वह बीमारी ठीक नहीं होती है तो इससे ये साबित हो जाता है कि दवाई में कुछ मिलावट है या हमारे खुद के शरीर में कोई खोट है। ठीक उसी तरह सत्संग में रहना, प्रवचन सुनना अच्छी बात होकर भी हमारे जीवन में प्रभाव नहीं डालती, हमें इसका कारण ढूंढना चाहिए। प्रवचन सुनने से पहले उसके बारे में विशेष ज्ञान होना चाहिए। सद्भावनापूर्वक और विश्वासपूर्वक सुनने से वह हमारे जीवन को प्रभावित कर सकता है। पहले के जमाने में जब तक गुरू खुद किसी वस्तु से संतुष्ट नहीं हो जाते थे, तब तक अपने शिष्यों को भी उसका ज्ञान नहीं देते थे। एक छोटी सी कहानी है एक बार किसी साधू के आश्रम में एक महिला अपने बेटे को लेकर आई, वह अपने बेटे के ज्यादा मीठा खाने की आदत से छुटकारा पाना चाहती थी। महिला ने साधू से निवेदन किया कि वह उसके बेटे को समझाएं। साधू ने उन दोनों मां-बेटे को 15 दिन बाद आने को कहा, 15 दिन बाद फिर वह दोनों साधू के आश्रम में पहुंचे। साधू ने फिर दोनों को 15 दिन बाद आने के लिए कहा। इस तरह साधू ने महिला को 2 महीने तक बुलाया। जब महिला 2 महीने बाद पहुंची तो साधू ने उस बच्चे को अपने पास बुलाकर विनम्रतापूर्वक कहा कि बेटा ज्यादा मीठा खाना सेहत के लिए हानिकारक है इसलिए मीठा खाने की आदत को छोड़ दो। कुछ दिन बाद वह महिला फिर साधू के आश्रम में पहुंची और साधू को धन्यवाद दिया। उसने साधू से पूछा की एक चीज मैं समझ नहीं पाई कि आपको इतनी सी बात बेटे से कहनी थी, तो पहले क्यों नहीं कहा उससे आपने। सन्यासी मुस्कुरा कर बोले असल में मेरी भी मीठा खाने की बहुत आदत थी। मुझे उस आदत से छुटकारा पाने में 2 महीने लगे जब तक हम खुद को नहीं सुधार लेते हैं तब तक दूसरों को ऐसा काम करने के लिए प्रेरित कैसे कर सकते हैं, क्योंकि ऐसे में प्रवचन देने से फल प्रदान कैसे होगा?

ठीक उसी तरह से आजकल लोग अपने प्रवचनों और भाषणों के माध्यम से भीड़ जुटा लेते हैं, अपने प्रवचन को आकर्षक बनाने के लिये अनेक बाहरी उत्पादन जोड़ लेते हैं। लेकिन, जो अपने अंदर का उत्पादन है, जो हमारे गुण हैं, उस पर कोई जोर नहीं डालते हैं। प्रवचन सुनने से पहले हमें यह जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि हमे ज्ञान देने वाला खुद को कितना क्षणिक सुख से दूर रखता है। जो व्यक्ति हमारे अन्दर के अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का दीया जलाते हैं, जो इंसान हमें खुद से वाकिफ कराते हैं, जो जीवन की सच्चाई का ज्ञान कराते हैं, जिसके द्वारा हमें हमेशा खुश रहने का रास्ता मिल जाए, ऐसे व्यक्ति को हमें अपना आदर्श मानना चाहिए। सत्संग कभी गलत नहीं हो सकता। लेकिन, जब सत्संग करने वाले स्वार्थी, दिखावटी और उद्देश्य रहित हो तो वह सत्संग कभी फायदेमंद नहीं हो सकता। इसलिए हमेशा अपनी संगत, गुरू और किताब यह सभी चीजें जीवन में बहुत महत्व रखते हैं। इन सभी चीजों को चुनने के लिए समय तथा विवेक का उपयोग करें। अर्थात आपका चयन ही आपके जीवन को सही या गलत रास्ता दिखाता है। इसलिए चयन सोच-विचार कर ही करें।

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