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कलशस्य मुखे विष्णु….कलशन्तु समाश्रिता:

कलशस्य मुखे विष्णु….कलशन्तु समाश्रिता:

कलश में ‘क’ का अर्थ है जल और ‘लश’ का अर्थ सुशोभित करने से है। यानी, वह पात्र जो जल से सुशोभित होता है। हिंदू धर्म में कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। इसलिए गृह प्रवेश या किसी भी तरह का पूजन होने पर कलश स्थापित किया जाता है। इसकी स्थापना चावल या अन्न की ढेरी पर की जाती है। मान्यताओं के अनुसार कलश के ऊपरी भाग में विष्णु, मध्य में शिव और तल यानी मूल में ब्रह्मा का निवास होता है। इसलिए पूजन से पहले कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थ स्थान आदि का प्रतीक मानकर रखा जाता है। शास्त्रों में बिना जल के कलश को स्थापित करना अशुभ माना गया है। कलश स्थापित करते समय निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है-

कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिता:

मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृता:।

कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्विपा वसुंधरा,

ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामगानां अथर्वणा:

अङेश्च सहितासर्वे कलशन्तु समाश्रिता:।’’

अर्थात कलश के मुख में संसार को चलाने वाले विष्णु, कलश के कंठ में संसार को उत्पन्न करने वाले शिव और कलश के मूल यानी की जड़ में संसार की रचना करने वाले ब्रह्मा ये तीनों शक्तियां इस ब्रह्मांड रूपी कलश में उपस्थित हैं। कलश के बीच वाले भाग में पूजनीय माताएं उपस्थित हैं। समुद्र, सातों द्वीप, वसुंधरा, चारों वेद (ऋगवेद, यर्जुवेद, सामवेद और अथर्ववेद) इस कलश में स्थान लिये हुए हैं। इन सभी को मेरा नमस्कार हैं।

कलश प्रतीक है, इनका- कलश का पवित्र जल इस बात का प्रतीक है कि हमारा मन भी जल की तरह हमेशा ही स्वच्छ, निर्मल और शीतल बना रहें। हमारा मन श्रद्धा, तरलता, संवेदना और सरलता से भरा रहे। हम क्रोध, लोभ, मोह-माया और घृणा आदि से दूर रहें। कलश पर लगाया जाने वाला स्वास्तिक चिह्न हमारे जीवन की चार अवस्थाओं बाल्य, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्था का प्रतीक है। कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है जो कि श्री गणेश का प्रतीक है। सुपारी, पुष्प, दुर्वा आदि चीजें जीवन शक्ति को दर्शाती हैं। कलश में डाली जाने वाली वस्तुएं इसे और अधिक पवित्र बना देती हैं। कलश को पवित्र बनाने वाली वस्तुएं हैं।

कलश: देव पूजन में लिया जाने वाला कलश तांबे या पीतल धातु से बना हुआ होना शुभ माना गया है। मिट्टी का कलश भी श्रेष्ठ माना जाता है।

पंचपल्लव: पीपल, आम, गूलर, जामुन, बड़ के पत्ते पंचपल्लव कहलातें है। कलश के मुख को पंचपल्लव से सजाया जाता है। ये पत्तें वंश को बढ़ाने वाले माने जाते हैं।

पंचरत्न: सोना, चांदी, पन्ना, मूंगा और मोती ये पंचरत्न कहे जाते हैं। वेदों में कहा गया है पंचपल्लवों से कलश सुशोभित होता है और पंचरत्नों से श्रीमंत बनता है।

जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। जल शुद्ध तत्व है। जिसे देव पूजन कार्य में शामिल किए जाने से देवता आकर्षित होकर पूजन स्थल की ओर चले आते हैं। जल से भरे कलश पर वरुण देव आकर विराजमान होते हैं।

नारियल: नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। नारियल को कलश पर स्थापित करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि नारियल का मुख हमारी ओर हो।

तांबे का सिक्का: तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।

सात नदियों का जल: गंगा, गोदावरी, यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी और नर्मदा नदी का जल कलश में डाला जाता है। अगर सात नदियों के जल की व्यवस्था न हो तो केवल गंगा का जल का ही उपयोग में लाया जा सकता है।

सुपारी: जल में सुपारी डालते हैं, इससे हमारे भीरत की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती हैं और हमारे भीतर अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है।

पान-पान की बेल को नागबेल भी कहते हैं। नागबेल को भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडऩे वाली कड़ी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकर्षित करने की क्षमता होती है।

दूर्वा: दूर्वा हरियाली का प्रतीक है। कलश में दूर्वा को डाला जाना जीवन में हरियाली यानी खुशियां बढ़ाता है।

 

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