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खतरे की घंटी

खतरे की घंटी

बहुप्रतिक्षित 2011 की जनगणना के धर्म संबंधी आंकड़े आखिरकार जारी किए गए। यह जानकर कम ही लोगों को आश्चर्य हुआ होगा कि कुल आबादी में हिंदुओं की जनसंख्या घट गई है। कुल आबादी में हिंदुओं की संख्या 2.1 प्रतिशत घटकर 2001 में 80.45 प्रतिशत से 2011 में 78.35 प्रतिशत हो गई है। इसके विपरीत मुसलमानों की आबादी 24.4 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जबकि आबादी में बढ़ोतरी का राष्ट्रीय औसत 17.7 प्रतिशत है।

इसका दूसरा पहलू यह भी है कि मुसलमानों की कुल आबादी सिर्फ 0.8 प्रतिशत ही बढ़ी है इसलिए हिंदुओं की कुल आबादी में इतनी बड़ी गिरावट की वजह क्या हो सकती हैं? अधिक संभावना यही है कि कुछ लोगों ने खुद को ”अन्य धर्मों और आस्थाओं” में वर्गीकृत करवाया हो। पिछले तीन दशकों की हर जनगणना में विभिन्न समुदाय खासकर अनुसूचित जनजातियों में खुद को हिंदू धर्म के दायरे से बाहर वर्गीकृत करवाने का चलन देखा गया है। 1991 की जनगणना में 33 लाख लोगों ने खुद को ”अन्य धर्मों और आस्थाओं’‘ में वर्गीकरण करवाया था। यह संख्या 2001 की जनगणना में बढ़कर 66 लाख हो गई। अनुमान है कि 2011 की जनगणना में इस वर्ग में तीन गुना इजाफा हुआ है।

इससे मीडिया में ऐसी भारी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है कि मुसलमानों की आबादी में कोई खास फर्क नहीं आया है और आबादी में किसी बड़े असंतुलन का गंभीर खतरा नहीं है। ऐसे कई लेख अचानक हिंदुओं को आश्वस्त करने केलिए छप रहे हैं। लेकिन आंकड़े तो यही बताते हैं कि 2001 से 2011 के बीच मुसलमानों की आबादी 24.4 प्रतिशत की दर से बढ़ी ह,ै जबकिआबादी में बढ़ोतरी का राष्ट्रीय औसत 17.7 प्रतिशत है। फिर, हिंदुओं की वृद्धि दर और कम 14.5 प्रतिशत है।

इससे एकअलग तस्वीर सामने आती है कि मुस्लिम वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से करीब 38 प्रतिशत अधिक है। 2001 में राष्ट्रीय औसत और मुस्लिम वृद्धि दर में फर्क इससे कम 36.8 प्रतिशत ही था। दूसरी तरफ हिंदुओं की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से 20 प्रतिशत नीचे है। यही चिंता की बात है। आबादी के संतुलन का संकेत कुल वृद्धि दर से नहीं, बल्कि संबंधित वृद्धि दरों में इसी फर्क से पता चलता है।

जानकारों का यह भी कहना है कि वृद्धि दर में असंतुलन तत्कालिक मामला है, यह लंबा नहीं चलेगा। लेकिन जनगणना का इतिहास कुछ और ही बताता है। अगर मुसलमानों की आबादी में 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी का आंकड़ा वाकई सही है तो यह वृद्धि दर लगातार तीसरी बार दर्ज की गई है। मुसलमानों की आबादी में वृद्धि 1981-1991 और 1991-2001 के बीच भी 0.8 प्रतिशत रही है। उनकी आबादी में हिस्सेदारी 1981 में 11.8 प्रतिशत, 1991 में 12.6 प्रतिशत, 2001 में 13.4 प्रतिशत और अब 2011 में 14.2 प्रतिशत हो गई है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि 0.8 प्रतिशत वृद्धि लंबे समय से आजादी के बाद से ही जारी है। 1951 से 2011 के बीच 60 साल में मुसलमानों की आबादी 10.5 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गई है। इसमें दो-तिहाई बढ़ोतरी पिछले तीन दशकों में ही हुई है।

इससे भी चिंताजनक कुछ राज्यों में मुसलमानों की आबादी में क्षेत्रीय बढ़ोतरी है। असम, पश्चिम बंगाल, केरल, गोवा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और हरियाणा में मुस्लिम आबादी में तेजी से वृद्धि हुई है। असम में अब मुसलमानों की आबादी 34.2 प्रतिशत है, जो 2001 के 30.9 प्रतिशत से 3.2 प्रतिशत अधिक है। यह अभी बताया नहीं गया है कि कई जिलों और तालुकाओं में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं। इसलिए मुसलमानों की आबादी में बढ़ोतरी के असली असर का पता विस्तृत आंकड़ों के जारी होने के बाद ही लग सकता है।

अपुष्ट रिपोर्टों से पता चलता है कि कुछ इलाकों में तो मुस्लिम आबादी में बढ़ोतरी 600 प्रतिशत तक है। इसकी वजह बांग्लादेशी मुसलमानों के घुसपैठ और उसके परिणामस्वरूप उन इलाकों से हिंदुओं के पलायन से हुआ है। इसके मद्देनजर इलाकावार जनगणना के धर्म संबंधी आंकड़ों को जारी करना जरूरी हो गया है।

दरअसल, परिवार नियोजन पर एक पक्षीय अमल, समान नागरिक संहिता के लागू न होने, बेहिसाब गैर-कनूनी घुसपैठ और जबरन या लालच में धर्म परिवर्तन जैसे तमाम कारकों से हमारे देश के हिंदू चरित्र पर खतरा पैदा हो गया है।

मुस्लिम विचार दुनिया को दो हिस्सों में बांटता है। एक, दारूल इस्लाम, जहां मुसलमान बहुमत में हों, और दूसरे, दारूल हरब, जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हों। भारत को दारूल हरब बताया जाता है और इस्लाम हर मुसलमान का यह दायित्व तय करता है कि भारत को मुस्लिम बहुल या मुस्लिम शासित राज्य बनाया जाए, जहां कुरान और शरीयत का बोलबाला हो। इसी वजह से जनगणना के आंकड़े हिंदुओं के लिए सचेत हो जाने की चेतावनी देते हैं। उन्हें इस स्थिति पर गौर करके एकजुट हो जाना चाहिए, वरना वे कहीं के नहीं रहेंगे।

आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर में इस साल के शुरू में इस दलील के पक्ष में कुछ दिलचस्प आंकड़े दिए गए। इसमें कहा गया, ”मणिपुर में एक दशक (1991-2001) में हिंदुओं की आबादी में 5.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। लेकिन इसी अवधि में वहां ईसाइयों की आबादी 36.6 प्रतिशत और मुसलमानों की 43.1 प्रतिशत बढ़ गई।” इसमें आगे कहा गया है, ”असम को छोड़कर पूर्वोत्तर रज्यों में ईसाइयों की आबादी 50.6 प्रतिशत और मुसलमानों की 42.4 प्रतिशत (इसी अवधि में) बढ़ गई।’‘ अगर यह खतरे की घंटी नहीं है तो और क्या है?

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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