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विकृत मानसिकता की शिकार औरत

विकृत मानसिकता की शिकार औरत

नारी ईश्वर का वह रूप जिसे शायद ईश्वर ने अपनी ही माटी से तराश कर बनाया है। इस नाश्वर संसार में अगर जीता-जाता भगवान किसी रूप में दिखाई देता है तो वह मां है, एक सच्चा जीवन साथी पत्नी के रूप में दिखाई देता है और अगर एक सच्चा दोस्त बहन के रूप में, छोटी सी उम्र में बाबा को चप्पल और गमछा ढंूढ कर देने वाली और अपने पिता का ख्याल रखने वाली बेटी ही होती है। रिश्ता चाहे कोई भी हो पर निभाने वाली औरत ही तो है। जो कभी बेटी बनकर, तो कभी पत्नी बनकर, तो कभी बहू और बहन बन कर अपनों की खुशी के लिए खुद को पल-पल जमाने की आग में मोम की तरह पिघलाती है, अपने आस्त्वि को रौंद कर खुशी-खुशी आगे बढऩे वाली औरत ही तो है। लेकिन उसके बदले में उसे मिलती है जमाने से केवल वेदना, अविश्वास, ठोकर, धोखा। जिस समाज की रचनाकर स्वयं नारी है वही समाज का रखवाला जिसे खुद नारी ने जना है वही नारी के आस्त्वि को ठोकर मारने में अपनी शान समझता है। नारी की वेदना को उसके ही दर्द भरे शब्दों में पेश किया है लेखिका वंदना मोदी गोयल ने अपनी पुस्तक ‘हिमखंड’ में। लेखिका ने औरत की वो समाजिक हकीकत इस पुस्तक में दर्शाई है जो सदियों से चली आ रही है वक्त चाहे कितना भी बदला लेकिन औरत हमेशा किसी खिलौने जैसी ही रही। पुरूष वर्ग के मानस पटल पर औरत मात्र साधन रही है उसके मनोरंजन का इससे ज्यादा कुछ नहीं। पुरुष वर्ग की इस मानसिकता को लेखिका ने पुस्तक में बहुत ही खुले शब्दों में पेश किया।

पुस्तक में सावित्री देवी उर्फ जन्नत बाई और मेघा ऐसी ही महिलाओं का उदाहरण हैं जिन्हें समाज ने अपनी हवस और बदले की आग में होम कर दिया। लेखिका ने पुस्तक में बहुत खूबसूरती से दर्शाया है कि महिला अपने बुरे अतीत को भूलकर चाहे कितनी भी कोशिश कर ले अपने वर्तमान में जीने की पर समाज खासतौर पर पुरूष वर्ग उसके ह्दय की वेदना को वक्त-वक्त पर कुरेदकर अपनी तृप्ती करता रहता है। सावित्री देवी जो कि अपने अतीत यानी जन्नत बाई को भूल कर बहुत आगे बढ़ गई लेकिन समाज के कुछ ठेकेदारों ने उनकी वेदना को कुरेदकर उनसे उनकी खुशी यहां तक की जीने का हक भी छिन लिया और जब इससे भी उसकी तृप्ती नहीं हुई तो उनकी बेटी मेघा को भी उस हवन कुंड में होम कर दिया।

समाज में औरत पूरे विश्वास के साथ पुरूष को वो हक देती है कि वो उस पर अपनी हूकूमत कायम कर सके। लेकिन, पुरूष उसे वह हक क्यों नहीं दे पाता? पुरूष, औरत से हमेशा छीनना चाहता है क्यों जो औरत उसे जिंदगी पर्यान्त खूशियां लूटाती है वह उसके बदले में उसे वैसी ही खुशियां नहीं दे सकता। इस पुस्तक में इस तरह के तमाम सावल हैं जो किसी को भी यह सोचने पर मजबूर कर देगा। क्यों औरत उस सम्मान की हकदार नहीं इस समाज में जो उसे स्वयं ईश्वर ने बक्श है। ईश्वर ने भी औरत के देवी स्वरूप की स्तुति की है। वो भवानी-दुर्गा ही थी जो राक्षसों से हारने पर देवों की रक्षक बनी थी। जो देवों में पूज्नीय है वहीं औरत समाज के लोगों के लिए इतनी छोटी परिभाषा कैसे रखती है। क्या दुनिया में आते ही औरत की शक्ति और सम्मान की कद-काठी छोटी हो जाती है। पुस्तक से ये बात साबित होती है कि औरत अपने दम पर अपना संसार बना सकती है और आगे बढ़ा भी सकती है, जिसका जीता-जागता उदाहरण सवित्री देवी हैं जिन्होंने एक जिल्लत भरी जिंदगी के बाद अपने दम पर एक सम्मानित औरत की जिंदगी जी यही नहीं उसने बेटी मेघा को भी अच्छी परवरिश के साथ पोषित किया। लेकिन, अतीत के कुछ ठेकेदारों ने तूफान बनकर उनकी सारी खुशियों को एक झटके में उड़ा दिया। इस पुस्तक में लेखिका वंदना मोदी गोयल ने औरत की संवेदना और वेदना दोनों को सामाजिक स्तर पर बाखूबी दर्शाया है।

प्रीति ठाकुर

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