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कैसे बनें कर्मयोगी

कैसे बनें कर्मयोगी

आज जब पूरा देश और हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत को विश्वगुरू बनाने में लगे हुए हैं, तब हर भारतीय का यह कत्र्तव्य बन जाता है कि कैसे हम कर्मपथ पर आगे बढ़ें। चाहे किसान हो, सैनिक हो, वैज्ञानिक हो, उद्योगपति हो, या नेता हो, सबका एक ही लक्ष्य होना चाहिए कि अपने-अपने तरीके से कैसे अपने राष्ट्र को आगे लेकर चलें। यह स्वाभाविक है कि राष्ट्र को आगे बढ़ाने में हमारा किसान और हमारे उद्योगों की एक बहुत बड़ी भूमिका रहती है। आज हर गांव शहर से जुड़ गया है और उच्च तकनीक विकसित हो जाने के कारण पूरा विश्व एक परिवार की तरह जुड़ गया है। आज हम ‘मेक इन इंडिया’ की बात करते हैं जिसके जरिये हमारे देश को बहुत बड़ा आर्थिक लाभ होने वाला है। यह ईश्वर का वरदान है कि अनादिकाल से भारत में विद्वानों की कभी कमी नहीं रही है। चांद और तारों के आलोक और भूखे पेट रहकर भी हमारे देश के लोग हर क्षेत्र में अपनी-अपनी सफलता दिखा चुके हैं। फिर चाहे वो आर्यभट्ट, चाणक्य, कालिदास, तुलसीदास, टाटा, अथवा बिड़ला ग्रुप की बात करें, हर किसी ने अपनी प्रखर बुद्धि एवं अथक प्रयास से अपने आप को तथा भारत के नाम को समग्र विश्व में स्थापित किया। इस बार हमने एक महान कर्मयोगी एवं उद्योगपति लक्ष्मीनिवास झुनझुनवाला की आत्मकथा को प्रस्तुत किया है, जो कि भावी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं। अगर हमारी युवा पीढ़ी लक्ष्मीनिवास की तरह कर्मयोगी बनें तो नरेन्द्र मोदी जी का जो सपना-भारत को विश्वगुरू बनाने का है वह जल्द ही सफल हो सकेगा।                                                                                                            — संपादक

मेरे जीवन में कुछ है भी तो ऐसा नहीं जो लोगों को रूचिकर लगे। पर आज क्यों ब्रह्मपुत्र नदी की याद आ रही है कभी यह भारत की सबसे बड़ी नदी थी। अंग्रेजों के समय के भारत से आज पाकिस्तान, वर्मा, लंका, बांग्लादेश निकल गया। अस्सी हजार वर्ग मील जमीन चीन ने दबा ली। सिकुड़ते भारत को देखकर दु:ख होता है, सो लिखने बैठ गया।

आज से 87 साल पहले की बात है। 1928 का वर्ष था। राजस्थान के छोटे से गांव मुकुंदगढ़ में एक छोटी सी कोठरी में मेरा जन्म हुआ। 125 साल पहले ही तो यहां से बारह मील दूर स्वामी विवेकानंद खेतड़ी महाराज के साथ टेलीस्कोप में आकाश की निहारिकाओं का निरीक्षण किया था। विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने की पृष्ठभूमि यहीं तो तैयार हुई थी। मेरा जन्मस्थान का गांव करीब पचास परिवारों की बस्ती थी। बूढ़े, बच्चे, महिलायें गांव में रहते थे। पुरूष कोलकाता-मुंबई अन्य शहरों में नौकरी पर चले जाते थे। एक आध समृद्ध परिवार था, जिनका अपना व्यवसाय कोलकाता में था। सर्वाधिक सम्पन्न परिवारों में एक कनोडिय़ा परिवार था। हमारी हवेली के ठीक सामने उनकी पुरानी हवेली थी। उसी के पास में एक नई हवेली उन्होंने बना ली थी। एक सुन्दर बैलगाड़ी थी, एक ऊंट था। उसकी निगरानी एक मुनीम करते थे। सारे गांव में ज्वालजी ‘मुनीम’ के नाम से विख्यात थे। गांव में कोई भी समस्या आती, आपस में झगड़े आदि हो जाते तो उनका समाधान करवाने में ज्वालजी ‘मुनीम’ सहायता करते थे। गांव में विवाह आदि के अवसर पर मुनीमजी यह बैलगाड़ी और ऊंट दे दिया करते थे, जिससे विवाह की शोभा बढ़ जाती थी। हमारी हवेली ठीक उनके सामने थी। काफी बड़ी थी, पर टूटी-फूटी अवस्था में थी। गांव में एक आयुर्वेदिक दवाखाना था। उसमें मेरे बाबाजी का युवावस्था का चित्र था। उससे अनुमान लगता है कि किसी समय हमारा परिवार भी समृद्ध था। परिवार में मेरे बाबाजी थे। उनको लकवा मार गया था। शायद तब तीस-बत्तीस साल की आयु होगी। मेरी दादी थीं जो उनकी सेवा करतीं। किसी नौकर-चाकर का तो सवाल ही नहीं था। पिताजी वगैरह तीन भाई थे। सबसे बड़े मेरे पिताजी, सबसे छोटे मेरे चाचाजी थे, मिलकर परिवार की देखभाल करते। मध्यम चाचाजी की बुद्धि अत्यन्त अविकसित थी। उनकी देखभाल भी मेरी दादी करतीं। बाबाजी के स्वर्गवास के समय मेरी आयु तीन वर्ष की थी।

26-09-2015

उसी हवेली में मेरे बाबाजी के दो भाईयों का परिवार भी रहता था। दो कमरे हमारे हिस्से के थे। उन्हीं में से एक कमरे में मेरा जन्म हुआ था। छोटा सा कमरा। कमरे के ऊपरी हिस्सों में सुन्दर छेद की हुई चौकोर खिडकियां जैसी थीं। उनमें से प्रकाश व हवा आती थी। मुझे बताया गया कि मेरे बाबाजी मुझसे अत्यन्त स्नेह करते थे। कमरे के बरामदे में वे एक टूटी-फूटी खटिया पर लेटे रहते और मैं जमीन पर लेटा रहता। वे मुझे देखते रहते तथा आनंदित होते रहते। मेरे प्रथम चार वर्ष गांव में बीते। मेरे पिता जी कोलकाता में हैसियन की दलाली करते तथा चाचा जी कनोडिय़ा के यहां नौकरी करते। कनोडिय़ा का काम पटसन निर्यात करने का था। आज जहां बांग्लादेश है वहां एक छोटा सा ग्राम सिरसाबाड़ी था। चाचाजी को कनोडिय़ा ने वहां पर रखकर छोड़ दिया था। उनका काम था वहां पटसन खरीदना। एक पक्की गोदाम थी। उसमें एक बिना बिजली से काम करने वाली छोटी सी प्रेस थी। उसमें पाट की गांठें बनाकर कोलकाता भेजने का उनका काम था। पांच वर्ष की आयु में मुझे चाचाजी ने अपने संरक्षण में सिरसाबाड़ी में रख लिया था। ब्रह्मपुत्र नदी की एक शाखा पद्मा नदी के किनारे यह गांव था। यह मेरी स्मृति में आज भी घूमता रहता है। दस परिवार से कम ही वहां रहते होंगे। बरसात में गांव में पानी भर जाता था तथा नाव से ही आना-जाना होता था। पद्मा नदी के किनारे कटहल के पेड़ के नीचे एक शिक्षक थे जो बांग्ला में पढ़ाया करते थे। करीब पन्द्रह बच्चे पढ़ा करते थे। गांव में बिजली आदि तब तक नहीं आई थी। 1933 तक हवाई जहाज भारत में चलने शुरू नहीं हुए थे। रेलगाड़ी भी सिरसाबाड़ी से करीब 20 मील दूर पर आती थी। एक रेल चौबीस घंटे में आती थी। शांति का साम्राज्य था। अद्भुत शांति थी। आज जब मैं रामकृष्ण मिशन के 1896-97 में 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थापित मायावती आश्रम की शांति के बारे में सोचता हूं तो उससे भी अधिक शांति मेरे गांव में उस समय थी। जंगली आम जब खाने को मिलते तो उतना ही आनन्द आता जो शायद आज लंगड़े व हापुस आम खाकर भी नहीं आता।

कनोडिय़ा ने कृपा कर 1935 में मेरे चाचा जी को कोलकाता बुला लिया, क्योंकि मेरी मां को टीबी (क्षय रोग) हो गया था। कोलकाता में शायद कुछ उपचार हो इस आशा से उन्हे पिताजी कोलकाता ले आये थे। हरीसन रोड़ पर एक बड़ा मकान था। शायद पांच तल्ले का था। प्रत्येक तल्ले में करीब बीस कमरे थे। बीस परिवार यानी सत्तर-अस्सी व्यक्ति रहते थे। दो शौचालय, एक मूत्राशय तथा एक स्नानघर था। प्रात: इनमें लाईन लग जाती थी। ताड़क बाबू डॉक्टरी पास कर अपनी प्रैक्टिस जमाने की चेष्टा कर रहे थे। उनकी घर आने की फीस उस समय एक रूपये थी। पिताजी उनका परिचय अनेक लोगों से करवाते, अत: मेरी मां का इलाज वह मुफ्त में करते। अत्यन्त अभाव के दिन थे। एक खटिया भी हम मां के लिये खरीद नहीं पाये थे। ताड़क बाबू आते तो पड़ोसी के यहां से एक कुर्सी उनके बैठने के लिये लाते। मां रेली सिंह के हाथ का बना शरबत पीने की बहुत शौकीनथी। दो पैसे में एक बड़ा सिकोरा शरबत का मिलता था। कभी-कभार जब पैसों का जुगाड़ होता तो मैं मां के लिये शरबत लाता। बीमारी में ही मां खाना बनाती तथा हम लोगों को खिलाती, फिर जब चाची कोलकाता आ गई तो मां को आराम हो गया। 1937 में मां का स्वर्गवास हो गया। तब मैं 8 साल का था।

26-09-2015

चाचाजी की थोड़ी तरक्की हो गई थी। हम लोगों ने सेंट्रल एवेन्यू के पास बिंदुपालित लेन में एक मकान का दूसरा तल्ला भाड़े पर ले लिया। तीन कमरे और रसोई थी। चौक में शौचालय व स्नान घर था। चाची को जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होना पड़ता, क्योंकि देर होने पर भीड़ लग जाती थी। मकान मालिक बगल के मकान में रहता था। उसके यहां शौचालय व स्नान घर नहीं था। वह भी हमारे ही मकान में शौच आदि के लिये आया करते थे। मैं, मेरा छोटा भाई देवकी, चचेरा भाई घनश्याम तथा विष्णुकांत शास्त्री (जो आगे जाकर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बने) के छोटे भाई पढऩे के लिये आर्य विद्यालय जाया करते थे, जो घर से करीब तीन मील दूर था। हम चारों पैदल जाया करते। शाम को 4 बजे घर पहुंचते। घर के नीचे एक घुघनी वाला बैठता। एक पैसे में घुघनी का दौना मिलता। घुघनी खाने के बाद दो तीन चम्मच घुघनी का चटपटा पानी मुफ्त पिलाता। एक पैसे में छोटा सा रसगुल्ला मिलता। कभी-कभी मैं यह सब खाता। पर प्राय: घर से मुड़ी लेकर उसमें तेल, नमक, नारियल के दाने व मिर्च मिलाकर हम सब लोग खाते। अत्यन्त आनंद आता। प्रत्येक रविवार को घर की सब्जी के लिये चार आने मिलते। नूतन बाजार में सब्जी का बाजार लगता था, वहां से सब्जी खरीदता था। वहीं के. सी. दास की दुकान थी। रसमलाई का शायद उसी ने आविष्कार किया था। एक आने में दो रसमलाई का सिकोरा बेचता था। महीने में एक आध बार वह भी खाता। महीने में एक बार आटा खरीदता। एक रूपये में दस सेर आटा मिलता तथा चार पैसा दुकानदार देता ताकि हमेशा उसके ही यहां से आटा खरीदूं। 1938 में द्वितीय महायुद्ध प्रारंभ हो गया। दादी व चाची को मुकुन्दगढ़ भेज दिया गया।

बाबू, चाचाजी एक गद्दी में रहने लग गये। करीब बीस आदमियों का सम्मिलित भोजन छत पर रसोई में बनता। विद्यालय बंद नहीं हुये थे, अत: मैं भी गद्दी में साथ ही रहता। द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो चुका था। गद्दी में सभी लोग स्वभावत: ही अंग्रेजों के विरूद्ध रहते थे। तब तक टेलीविजन तो आया ही नहीं था। रेडियो आ चुके थे। एक रेडियो गद्दी में था। शायद 7 बजे रेडियो में खबरें आतीं। हम सभी लोग एकत्र हो जाते। जर्मनी की लगातार जीत सुनकर बहुत आनंद आता। इंग्लैंड पर लगातार बम वर्षा की खबर सुनकर मन प्रसन्न हो उठता। साल 1941 में जापान के कोलकाता पर आक्रमण की संभावना दिखने लगी थी। साइरन बजाकर लोगों को मकान से नीचे आने का अभ्यास करवाया जा रहा था। हम लोग अत्यन्त प्रसन्न थे। एक दिन कोलकाता पर बम वर्षा हुई। पर फिर भी हममें उत्साह था। बम वर्षा के दो घंटे बाद कुछ गद्दी के लोग खिदिरपुर डोक, जहां बम गिरे थे देखने जा रहे थे। मैं भी उनके साथ हो गया। डोक पहुंच कर जब कुछ लोगों को लहुलुहान तथा घायल देखा तब पहली बार एक भय का अनुभव हुआ तथा जर्मनी की बम वर्षा से होने वाले फ्रांस व इंग्लैंड की जनता के कष्ट का अनुभव हुआ। मुझे मुकुन्दगढ़ अपने गांव भेज दिया गया। मैं मैट्रिक में पढ़ रहा था। समस्या आई कि मैट्रिक की परीक्षा का क्या होगा, चाचाजी ने एक शिक्षक मुकुन्दगढ़ में रखवा दिया। राधेश्याम भटनागर उनका नाम था। मुकुन्दगढ़ विद्यालय के वे हेडमास्टर थे। संयोग की बात है कि एक दूसरे शिक्षक भी चाचाजी को मिल गये। वे मुकुन्दगढ़ में घर पर ही रहते तथा मुझसे गहन अध्ययन करवाते।

26-09-2015

कोलकाता रहने वाले छात्रों को बनारस में परीक्षा देने की सुविधा प्राप्त हो गयी। संयोग की बात है कि चाचाजी जहां काम करते उन्हीं के परिवार के वरिष्ठ सदस्य श्री गंगाबक्श कनोडिय़ा भी परिवार के बालकों व महिलाओं को लेकर मुकुन्दगढ़ आये हुये थे। उनके परिवार में भी दो बालक श्री श्यामसुन्दर व श्री आत्माराम को मैट्रिक की परीक्षा के लिये वाराणसी जाना था। श्री गंगाबक्शजी ने मुझे भी वाराणसी साथ चलने का आदेश दिया। चाचाजी का भी आदेश आ गया। बाबू गंगाबक्शजी के साथ मैं हो लिया। मेरे शिक्षक वाराणसी के ही थे। बाबू गंगाबक्शजी ने उन्हें भी साथ ले लिया तथा परीक्षा शेष होने तक वाराणसी साथ ही रखा। सैकेंड क्लास में रेल से पहले दिल्ली गये। सैकेंड क्लास की यात्रा भी मुझे नैसर्गिक आनंद दे रही थी। कहां थर्ड क्लास की भीड़ में मैं मुकुन्दगढ़ पच्चास घंटे का सफर कर आया था। दिल्ली में रिटायरिंग रूम में रहने की व्यवस्था थी। बाबू गंगाबक्शजी मुझे अत्यन्त स्नेह देते थे। जीवन में पहली बार टोस्ट मक्खन खाया। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि जहां मेरे चाचाजी नौकरी कर रहे हैं, उस परिवार का सर्वोच्च व्यक्ति मुझे इतना स्नेह दे रहा है। उस समय दिल्ली में एकाध मोटरगाड़ी दिखती थी। एक तांगा भाड़े का करके हम लोगों ने कुतुबमीनार, हुमायूं का मकबरा, जंतर-मंतर, बिड़ला मंदिर आदि देखें। अत्यन्त आनंद आया। रात गाड़ी में वाराणसी के लिये बैठ गये।

प्रात: काल वाराणसी पहुंच गये। कनोडिय़ाजी की एक कोठी वाराणसी में गंगा किनारे गायघाट पर थी। उसी में हम लोग रहते थे। गंगा स्नान का अत्यन्त आनंद आता था। गर्मी के दिन थे शायद मई का महीना होगा। तीन दिन बाद परीक्षा आरंभ होने वाली थी। श्री सीतारामजी सेक्सरिया कोलकाता के महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता थे। कोलकाता में एक बड़ा विद्यालय चलाते थे। उनकी पुत्री पन्नाबाई का विवाह श्री प्रहलाद राय पोद्दार से हुआ था (मेरी स्मृति धोखा नहीं दे रही है तो शायद यही नाम था)। शायद तीस वर्ष की आयु पन्नाबाई की थी। वे भी वाराणसी मैट्रिक की परीक्षा देने आयीं थी। वे भी कनोडिय़ा के घर में ही ठहरे थे। खूब रौनक थी। शाम को बनारस के घोड़े के इक्के में बाबू गंगाबक्शजी घूमने भेज देते। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय घूमकर आते। इक्कों की दौड़ होती। शाम को भोजन खूब अच्छा बनता। मुझे याद है कि अमरस बना करता। मेरे शिक्षक इतिहास तथा मैं गणित में रूचि रखता था। संध्या गंगाबक्शजी शिक्षक को पढ़ाने का आदेश देते तथा मुझे भी गणित पढ़ाने के लिये आदेश देते। मेरा पढ़ाने का अभ्यास हो गया। कोलकाता लौटकर आया। मुझे गणित का शौक था। मैंने सुना कि सेंट पाल कॉलेज के गणित के अध्यापक श्री चेल्ला राज अत्यन्त अच्छे हैं। मैं वहीं भर्ती हो गया। इस समय दो साल में आई.ए. व उसके बाद दो साल में बी.ए. होता था। सेंट पाल से आई.ए. की तथा बी.ए. के लिये स्कॉटिश चर्च कॉलेज में भर्ती हो गया। स्वामी विवेकानन्द इसी कॉलेज में पढ़ते थे तथा इसी के प्रोफेसर हेस्टी ने उन्हें श्री रामकृष्ण के पास भेजा था। बी.ए. की परीक्षा में विश्वविद्यालय में गणित में अच्छे नम्बर आने पर स्वर्ण पदक मिला। पिताजी तथा चाचाजी की इच्छा थी कि अब मैं शिक्षा समाप्त कर व्यापार में प्रवेश करूं। वैसे सुबह शाम मुझे व्यापार की शिक्षा श्री नेमचन्दजी कनोइ देते थे। वे भी चाचाजी से कुछ नीचे कनोडिय़ा के यहां ही काम करते थे।

अनेक नामों के बिल छपवाये हुये रहते। नेमचंदजी मुझे इन पर इन्वॉयस लिखना सिखाते। उस समय मुझे इतना ज्ञान नहीं था कि यह इनकम टैक्स से बचाव के लिये किया जाता है। आज मुझे लग रहा है कि व्यापार की व्यवहारिक शिक्षा इनकम टैक्स चोरी से ही होती है। पीछे जब कन्हैया लालजी जटिया के यहां काम सीखने जाता तो वहां दो अंग्रेज नौकरी करते थे। वे भी मुझे यही सिखाते थे। मेरी अत्यन्त इच्छा देखकर मुझे एम.ए. (शुद्ध गणित) पढऩे की अनुमति मिल गई। मैं कोलकाता विश्वविद्यालय जाने लगा। मेरा सौभाग्य था कि मुझे सत्येन बोस जैसे गुरू मिले। भारतवर्ष में वह सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ माने जाते थे तथा आइंस्टाइन से उनके अच्छे संबंध थे। आगे जाकर जब मैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट का अध्यक्ष बना तो देखा कि कहां हमारे विश्वविद्यालय का टूटा-फूटा मकान भारत के सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ के लिये तथा कहां आई.आई.एम. में करोड़ रूपये का स्वीमिंग पूल-ग्रेनाइट के फर्श तथा शान-शौकत।

26-09-2015

मैं तीन घंटे विश्वविद्यालय जाता तथा तीन घंटे कार्यालय जाता। तब तक मेरे चाचाजी ने नौकरी छोड़ दी थी तथा जयपुरिया परिवार के साझे में स्वतंत्र काम आरंभ कर दिया था। एक टूटे-फूटे मकान में दफ्तर भाड़े पर ले लिया था तथा एक नई कंपनी इंडो ईस्टर्न टेऊडिंग कंपनी लिमिटेड बना ली थी। जयपुरिया परिवार भी अद्भुत था। सबसे बड़े भाई श्री श्यामसुन्दर राजनीति में बहुत रूचि रखते। राम मनोहर लोहिया के कोलकाता प्रवास में उनसे रोज मिलते थे। एक बार वे बीमार हो गये। डाक्टर ने कैंसर बता दिया। तुरन्त छह किलो वजन घट गया। अनेक परीक्षाओं के बाद पता लगा कि उन्हें कैंसर नहीं है तो वजन तुरन्त बढ़ गया। उनके बहनोई महाबीर प्रसाद पोद्दार गोरखपुर में रहते थे तथा प्राकृतिक चिकित्सा किया करते। उनका ही लड़का आनंद कोलकाता में एम.ए. में पढ़ता था। उनके पास एम.एन.राय जैसे राजनेता आया करते। उसने बाईस-चौबीस की अवस्था में आत्महत्या कर ली थी। जीवन के ऐसे दृष्टांन्त मैं भूल नहीं पाता। उन्हीं के छोटे भाई शंभु प्रसादजी इंडो ईस्टर्न के दफ्तर में आते तथा मैं उनसे काम सीखता। यह 1948 की बात है। विश्व में पटसन (जूट) में भारत की मोनोपोली थी। यद्यपि विभाजन होने से पटसन पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में अधिक होता था पर उद्योग सारे कोलकाता में लगे थे। अत: जूट से बने सामान बोरे आदि पर भारत का एकाधिकार था। सरकार ने प्रत्येक देश के जूट उत्पादन के कोटे तय कर दिये। छोटे देश जैसे पेरू आदि को आधा टन तथा बड़े देशों के पांच सौ टन तक के कोटे होते थे। उस समय कोलकाता में जूट कंट्रोलर का ऑफिस था। एक-एक कंपनी दस-दस नाम से कोटे के लिये एप्लीकेशन देती। हजारों एप्लीकेशन आ गये। आधे-आधे टन के कोटे लोगों को मिले। कंट्रोलर के दफ्तर के बाहर विभिन्न देशों के अधिकारियों की भीड़ लगी रहती थी। सब अपने देश को अधिक कोटा मिले इसका प्रयास करते थे। हमने उत्पादन बढ़ाने का प्रयास नहीं किया। नई मिलें नहीं लगाई अन्यथा अच्छा अवसर था। दूसरे देशों ने जूट के बदले कागज, पॉलिथिन आदि के बोरे बनाने शुरू कर दिये। हम गफलत में रहे। नतीजा यह हुआ कि यह उद्योग आज अत्यन्त बुरी अवस्था में है। साउथ अफ्रीका को कोई कोटा नहीं दिया गया। साउथ अफ्रीका में जूट-उत्पादनों के दाम खूब बढ़ गये।

संयोग की बात है कि मेरे मित्र परमानन्द चूड़ीवाल तथामैं मैट्रिक में एक साथ पढ़ते थे। वह माहेश्वरी विद्यालय तथा मैं आर्य विद्यालय में। फिर भी हमारी दोस्ती थी। मैं उससे एक क्लास आगे था वह मुझ से गणित पढऩे आया करता था। उसका विवाह छोटी उम्र में हो गया। शायद 17 वर्ष की उसकी उम्र होगी। उसके पिताजी प्रहलादरायजी चूड़ीवाल नेपाल में चमडिय़ों की जूट मिल संभालते थे। मैं सोचने लगा कि नेपाल तो स्वतंत्र देश है। भारत का कोई शासन उस पर नहीं है। यदि उनकी जूट मिल का माल मैं नेपाल से दक्षिण अफ्रीका भेज सकूं तो काफी मुनाफा हो सकता है। कोटे के लिये सरकारी दफ्तरों में काफी चक्कर लगाता। एक बालक के प्रति अधिकारियों की भी थोड़ी सहानुभूति रहती थी। मैंने नेपाल के माल को विदेशों में भेजने का रास्ता निकाल लिया। साउथ अफ्रीका को भेजने से काफी नफा होता पर अधिकारियों ने मुझे राय दी कि साउथ अफ्रीका यदि माल भेजेंगे तो भारत सरकार अपने बंदरगाहों का उपयोग नहीं करने देगी। सिंगापुर या हांगकांग भेज दो। वहां से आसानी से साउथ अफ्रीका चला जायेगा। मैंने मेरे मित्र परमानन्द के पिताजी से एक हजार टन माल खरीदकर निर्यात कर दिया। इन बोरों को सवा दो पाउन्ड के हेमीसी बैग कहते थे। मुझे सात लाख रूपये का मुनाफा हुआ। मेरे व्यापार की नींव इससे पड़ी। जब परमानंद के पिताजी को इस मुनाफे का मालूम पड़ा तो उन्होंने अपनी मील के उत्पादकों के दाम काफी बढ़ा दिये। मुनाफा गायब हो गया। मैं सपने देख रहा था कि यदि किसी तरह भारत का माल सिंगापुर, हांगकांग भेज सकूं तो मुनाफा कमा सकता हूं।

संयोग की बात है 1934 में बिहार में भंयकर भूकंप आया था। जन-धन की बहुत बड़ी क्षति हुई थी। बिड़ला ने वहां सहायता करने के लिये कुछ लोगों को भेजा था। मेरे पिताजी का भी संपर्क युगलकिशोरजी बिड़ला से था। उन्हें सट्टे का शौक था तथा पिताजी सट्टे बाजार में दलाल थे। इन्हें भी बिहार भेजा गया। समस्तीपुर वे गये तथा एक बिहारी परिवार में रहे। इसी परिवार के श्री सत्यनारायण सिन्हा आगे जाकर नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री बने। मैंने पिताजी से नेपाल का उल्लेख किया तो वह मुझे व चाचाजी को लेकर दिल्ली आये तथा सत्यनारायण सिन्हा से परिचय करवाया। सत्यनारायण सिन्हा से कोई काम नहीं बना। श्री घनश्याम दास बिड़ला के संबंधी श्री कृष्णलाल थिरानी से सत्यनारायण बाबू का बड़ा घनिष्ठ संबंध था। मैं व चाचाजी उनसे मिले तथा समझाया कि यदि भारतीय हेमीसी बैग को सिंगापुर, हांगकांग भेज सकें तो बड़ा मुनाफा है। उनके साथ मैं व चाचाजी दिल्ली जम गये तथा सत्यनाराण बाबू ने मुझे अधिकारियों के पास भेजना शुरू किया। श्रीमान एल. के. झा तथा श्री के. बी. लाल उस समय कॉमर्स सेक्रेटरी व ज्वाइंट सेक्रेटरी थे। सत्यनारायण बाबू ने के. बी. लाल को फोन कर मुझे भिजवा दिया। मैं चला गया। कार्ड उनके निजी सचिव चांडक को दे दिया। दो घंटे तक प्रतीक्षा की। अत्यन्त छटपटाहट थी। प्रतीक्षा करता रहा कि बाथरूम जायेंगे तो उनसे बात हो जायेगी। उस समय कमरे में बाथरूम नहीं हुआ करते थे। आखिर चार घंटे की प्रतीक्षा के बाद जब वह बाथरूम के लिये निकले तो उन्होंने कहा कि तुम अभी गये नहीं। मुझ से परसों मिलना मैं बताऊंगा कि कुछ हो सकता है या नहीं।

26-09-2015

मैंने सत्यनारायण बाबू को बताया कि मुझे परसों बुलाया है। पर यदि आप जोर देकर नहीं कहेंगे तो कुछ नहीं होगा। मुझसे चार घंटे प्रतीक्षा के बाद बाथरूम के रास्ते में बात हुई है। उन्होंने मेरे सामने ही फोन किया तथा कहा कि बच्चे की कड़ी प्रतीक्षा मत लेना। वह चार घंटे प्रतीक्षा करेगा पर भागेगा नहीं। अगली बार लाल साहेब ने पंद्रह मिनट में ही बुला लिया तथा कहा कि तुम दो हजार टन का एप्लीकेशन हांगकांग के निर्यात का डाल दो तथा उनसे कह देना कि मैं हांगकांग के अधिकारियों की सर्टिफिकेट दे दूंगा कि यह माल वहां से निर्यात नहीं करने दिया जायेगा। उनसे कहने का साहस नहीं हुआ कि यह सर्टिफिकेट मैं कहां से लाऊंगा। पैसे कमाने का पागलपन था। हांगकांग चला गया। किसी प्रकार एक ऊंचे अधिकारी से मिलने का संयोग हो गया था। मैंने अध्ययन कर लिया था कि हांगकांग की सारी व्यवस्था विदेशों से माल आयात कर निर्यात करने पर निर्भर करती है। बंदरगाह में जहाज को जल्दी-से-जल्दी खाली करने की व्यवस्था थी। एक घंटे देर होने पर लाख रूपये करीब लगते थे। मैंने अधिकारी को समझा दिया कि मुझे इस प्रकार की सर्टिफिकेट चाहिये। आपके बंदरगाह में माल के निर्यात-आयात से आमदनी बढ़ेगी। करीब तीन सप्ताह मुझे लग गये। हांगकांग मुझे अच्छा लग रहा था। चीन की प्रसिद्ध लीची तथा जापान के प्रसिद्ध आड़ू वहां खूब खाता तथा अधिकारियों के यहां चक्कर लगाता। आखिर मुझे सर्टिफिकेट मिल गया कि दो हजार टन जो आप हांगकांग भेज रहे हैं, उसका हांगकांग से निर्यात नहीं करने दिया जायेगा।

मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था पर दिल्ली में एक के बाद एक अड़चन नीचे के लोग डालते गये तथा लाल साहेब की सिफारिश पर भी चार महीने बाद दो हजार टन माल निर्यात करने की अनुमति आखिर मिल ही गयी। काफी आमदनी होने लगी। कोलकाता के सफल व्यापारियों में मेरी गिनती होने लग गयी थी। बाबू घनश्यामदासजी बिड़ला ने भी एक बार संध्या में घर पर भोजन के लिये बुलाया।

मेरी सफलता की कहानी बहुत लंबी है। खुद के बारे में बतानाभी किसी बहुत लंबे काम से कम नहीं। कुछ हालात ऐसे रहे कि मैं आध्यात्म और सियासत सहित विभिन्न क्षेत्रों के कई सम्माननीय लोगों से मिला, उनसे बातें करने का मौका मिला। जब शुरुआत में मेरे पास 5-7 लाख रुपये आ गये तो लोगों ने मेरा थोड़ा-बहुत सम्मान करना शुरु कर दिया। मेरे जो 10-12 साल गये वो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में गये। उस समय हिंदुस्तान से जूट एक्सपोर्ट हुआ करता था। अमेरिका में मैंने जब जूट का एक्सपोर्ट शुरु किया तो मेरी ख्वाहिश अमेरिका को देखने की हुई, मैं अमेरिका गया तो उस समय सेकेंड वल्र्ड वार के बाद जिसमें अमेरिका शामिल था उसकी भयावहता देखकर दंग रह गया। मैं सोचने लगा कि कहां अमेरिका इतना आगे और कहां हम लोग इतने पीछे हैं कि कभी अमेरिका की बराबरी की कल्पना भी नहीं कर सकते। खैर अमेरिका में बहुत घूमा दक्षिणी अमेरिका के टेक्सटाइल्स मिल्स को देखा और मेरे मन में साधन होने पर भारत में भी एक टेक्सटाइल मिल खोलने की इच्छा पैदा हुई। मैं जब अमेरिका से भारत लौटा तो उस समय हालात काफी अलग थे, भारत में सब कुछ लाइसेंस से होता था, इसके बाद मैंने पता किया कि टेक्सटाइल मिल लगाने के लिये क्या करना पड़ेगा। संयोग की बात है कि उस समय जय प्रकाश नारायण कोलकाता आये हुए थे और शांति छाबड़ी जैन के यहां वो ठहरे हुए थे, मैं उनसे आशीर्वाद लेने गया और वहीं राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाडिय़ा भी ठहरे हुए थे तो मेरी मुलाकात दोनों से हो गई। इस दौरान मैंने मोहन लाल सुखाडिय़ा से एक टेक्सटाइल मिल खोलने की बात की तो उन्होंने कहा कि तुम जयपुर आ जाओ तो बात करेंगे, इसके बाद मैं जयपुर जाकर उनसे मिला तो राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाडिय़ा ने कहा कि देखो, केन्द्र सरकार ने हमें तीन टेक्सटाइल मिल्स खोलने के लाइसेंस दिये हैं। उन्होंने कहा कि तीन टेक्सटाइल मिल्स में से एक तो हम बिड़ला को देंगे और दूसरा जो बिड़ला के सहयोगी कानोडिय़ा हैं उनको देंगे क्योंकि उन्होंने मेरी बहुत सहायता की है, तीसरा अभी खाली है उसे आपको देने के बारे में मैं सोच सकता हूं। दो महीने मैं राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाडिय़ा के पीछे-पीछे घूमता रहा तो उन्होंने कहा कि देखो, मैं तुम्हें एक टेक्सटाइल मिल देना चाहता हूं, लेकिन घनश्याम दासजी बिड़ला तुम्हारा बहुत विरोध कर रहे हैं, इसकी क्या वजह है? मैनें कहा कि उनके इस विरोध की कोई वजह मुझे तो दिखाई नहीं देती है, क्योंकि उस समय बिड़लाजी से मेरा कोई संपर्क नहीं था। तब सुखाडिय़ाजी ने बताया कि घनश्याम दासजी बिड़ला कह रहे थे कि एल.एन.झुनझुनवाला को मिल लगाने का कोई अनुभव ही नहीं है, उसे क्या पता कि मिल लगाने के लिये कितने पापड़ बोलने पड़ते हैं, वो यानी की झुनझुनवाला मिल लगाने के नाम पर सरकारी पैसे हजम कर जाएगा। उस समय सरकार की नीति थी कि एक टेक्सटाइल मिल खोलने के लिये 25 लाख रुपये होने चाहिये थे, जबकि 60-70 लाख रुपये सरकार मदद के तौर पर देती थी। हम चार पार्टनर्स ने मिलकर 25 लाख रुपये जुटाये थे, इसमें घनश्याम दासजी बिड़ला का नाती प्रदीप डागा भी शामिल था, जबकि दूसरे पार्टनर एक गुजराती जयंती भाई थे। तब मैंने प्रदीप डागा से कहा कि तुम्हारे नानाजी ही विरोध कर रहे हैं, अब क्या होगा, फिर मैंने कहा कि ऐसा करो कि एक बार तुम उनसे मिलकर बात करो और मुझसे मुलाकात के लिये उनसे समय मांगो तो प्रदीप डागा ने कहा कि टाइम लेने की कोई जरुरत नहीं है उनकी सुबह की सैर के बाद उनके आवास पर एक दरबार लगता है, वहां कोलकाता के 20-25 लोग आते हैं बिड़लाजी से मुलाकात करने, इसके बाद मैं घनश्याम दासजी बिड़ला से मिलने गया, बातचीत में न जाने कैसे इसका जिक्र आया तो बिड़लाजी से मैंने कहा कि इन दिनों मैं राममनोहर लोहिया से मिला तो मैंने उनसे कहा कि राममनोहरजी मेरा 80 प्रतिशत समय इनकम टैक्स की चोरी कैसे हो, रुपया कैसे निकले फिर उन रुपयों को कैसे वापस लगाया जाय, इसमें चला जाता है, फिर बचे 20 फीसदी में 15 प्रतिशत दिल्ली सचिवालय के चक्कर काटने में चले जाते हैं और इसके बाद बचे मात्र 5 फीसदी समय मे ही मैं सही काम कर पाता हूं। यह सुनकर घनश्याम दासजी बिड़ला क्रोधित हो उठे और मुझसे कहा कि तुम लोगों की यही तकलीफ है कि बेकार के लफंगों के साथ बैठते हो और व्यापार की बातें करते हो। राममनोहर लोहियाजी जैसे ईमानदार, त्यागी और तपस्वी इंसान के बारे में घनश्याम दासजी बिड़ला के मुंह से ऐसी बातें सुनना मेरे लिये किसी बिजली के झटके से कम नहीं था। खैर, हमें टेक्सटाइल मिल का लाइसेंस मिल गया और भिलवाड़ा मिल लगनी शुरु हुई तो मेरा एकमात्र बड़ा लक्ष्य खूब रुपये कमाने की बजाय घनश्याम दासजी बिड़ला की उन बातों को झुठलाना था, जो उन्होंने मेरे बारे में मिल लगाने को लेकर नकारात्मक बातें राजस्थान के तत्कालीन सीएम सुखाडिय़ाजी से कही थीं। मैंने ठान लिया कि घनश्याम दासजी बिड़ला की मिल से मेरे मिल के माल का उत्पादक स्तर और उसकी क्वालिटी काफी बेहतर हो, और यह बिड़लाजी की कल्पना से परे हो, इसके लिए मैनें बहुत मेहनत की। जब हमारे मिल से पहला माल बनकर निकलना शुरु हुआ और उसके बाद बिड़ला की मिलों और शूटिंग्स में उनके मिलों का नहीं बल्कि, मेरे मिल का धागा इस्तेमाल किया गया। इसकी जानकारी जब बिड़लाजी को मिली तो उन्होंने मुझे संदेशा भिजवाया कि एल.एन. झुनझुनवाला मेरे पास क्यों नहीं आया? इसके बाद मैं उनके दरबार में पहुंचा तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से कहा कि देखो, ये कल का छोकरा हमसे बढिय़ा यार्न (धागा) बना रहा है और मेरे आदमी जिन्हें मैं इतनी तनख्वाह दे रहा हूं वो सब क्या गधे हैं? जब यह बात बिड़लाजी के बेटे बसंत कुमार के कानों में पहुंची तो उन्होंने अपनी कंपनी के चीफ एक्जीक्यूटिव को फोन किया कि बिड़लाजी ने आप लोगों के बारे में बहुत नाराज होकर यह बातें कही हैं। उनके मिल के चीफ एक्जीक्यूटिव हमारे भिलवाड़ा के नजदीक के ही शाहपुर के थे तो वह हमारी मिल के भिलवाड़ा निवासी नौजवान चीफ एक्जीक्यूटिव रांका को जबरदस्ती अपने यहां ज्यादा तनख्वाह पर नौकरी का लालच देकर ले गये। इस पर मैनें धनश्याम दासजी को कहा कि साहब हमनें आपसे मुलाकात की और बदले में आपने हमारे ऊपर यह उपकार कर दिया। पर मैं आपको कह दूं कि उसके जाने से हमारे काम और क्वालिटी पर कोई असर नहीं पडऩे वाला है। साथ ही यह भी कहा कि हमारा लड़का आपके मिल में नहीं टिकेगा, क्योंकि आपके यहां तो कई एक्जीक्यूटिव हैं जबकि रांका हमारी मिल का इकलौता चीफ एक्जीक्यूटिव था जिसे मैं भाई समान मानता था। साथ खाना-खेलना और उठना-बैठना था। उसके जाने के बाद हमारे यार्न की क्वालिटी में कोई अंतर नहीं आया और बिड़लाजी की इस चुनौती के कारण हमारी टेक्सटाइल मिल काफी सफल हुई। हमनें इतनी तरक्की कर ली की इस क्षेत्र में बिड़ला घराना हमसे काफी पीछे रह गया। यह मेरी इंडस्ट्रियल लाइफ की पहली शानदार शुरुआत थी। समय बीतने के साथ ही मेरा अमेरिका से संपर्क भी बना रहा और मैंने समझा कि टेक्सटाइल मिलइंडस्ट्री के स्केल पर सबसे निचले पायदान पर और अविकसित देशों के ही लायक है और रीयल इंडस्ट्री का मजा लेना हो तो हाई टेक्नोलॉजी और डिफिकल्ट मैनेजमेंट के लिये दूसरे क्षेत्र में जाना पड़ेगा। मैं दो-तीन साल तक यह सोचता रहा कि अगला कारखाना किस चीज का लगाऊं। तब मुझे पता चला कि हिंदुस्तान में ग्रेफाइट एलेक्ट्रोट बनते नहीं हैं और दुनिया में चार ही बड़ी कंपनियां हैं, जिनके पास यह जटिल तकनीक है। इसमें अमेरिका की दो कंपनियां यूनियन कार्बाइड और ग्रेट लीप्स, जर्मनी की रेस्ट और चौथी फ्रांस की पेशीने थी। मैं सबसे पहले यूनियन कार्बाइड के पास गया तो उन्होंने मेरी उम्मीदों को गिराने की पूरी कोशिश की और कहा कि यह बेहद जटिल तकनीक से लैस इंडस्ट्री है जो भारत में कभी कामयाब नहीं हो सकती है। इसे तो हिंदुस्तान को इंपोर्ट ही करना पड़ेगा। इसके बाद जर्मनी गया और रेस्ट कंपनी के अधिकारियों से मिला तो उन्होंने भी यही किया। इसके बाद भारत वापस आया तो उद्योग विभाग के तत्कालीन संयुक्त सचिव एम.जे.कामथ से मिला और कहा कि यह कंपनियां तो कहती हैं कि भारत में ग्रेफाइट एलेक्ट्रोट की कंपनी लग ही नहीं सकती, इसे तो हिंदुस्तान को इंपोर्ट ही करना पड़ेगा। तब एम.जे.कामथ ने मुझे रास्ता दिखाते हुए कहा कि रुस से तुम ग्रेफाइट एलेक्ट्रोट की तकनीक ले लो और उसके आधार पर तुमको सरकार लाइसेंस दे देगी और इसके बाद यह सभी बड़ी कंपनियां तुम्हारे पीछे-पीछे घूमेंगीं। मैंने उद्योग विभाग के तत्कालीन संयुक्त सचिव एम.जे.कामथ की बातों का पूरी तरह पालन किया, मुझे लाइसेंस मिल गया। इसके बाद फ्रांस की पेशीने कंपनी जो पहले मुझसे बात तक करने को तैयार नहीं थी लाइसेंस मिलने के बाद मुझसे मिलने को बेताब हो उठी थी और मेरी अमेरिका यात्रा के दौरान संदेश भिजवाया की जब आप भारत लौटें तो हमसे पेरिस में मिलते हुए ही वापस जायें। भारतीय राजदूत ने भी मुझसे कहा कि एक बार उनसे मिल लीजिए। मैंने पेशीने के लोगों से मुलाकात की तो उन्होंने कहा कि झुनझुनवाला हिंदुस्तान तो हमारे दुनिया के नक्शे पर ही नहीं है। मैंने पूछा कि आखिर क्यों नहीं है तो उन्होंने कहा कि भारत तो पांच लाख लोगों की बस्ती है, बाकी जनता तो जानवर है, गाय-भैंस के समान है, वह तो केवल खाते हैं, कुछ भी कन्ज्यूम नहीं करते हैं। न तो उनके पास पहनने को कपड़ा है और न ही रहने को मकान है। मैंने वापस लौटकर उद्योग विभाग के तत्कालीन संयुक्त सचिव एम.जे.कामथ को बताया कि साहब देख लीजिए कि फ्रांस में हमारे देश की क्या प्रतिष्ठा है। तब एम.जे.कामथ ने मुझसे कहा कि मैंने आपकी फाइल अनुशंसा के साथ केंद्रीय उद्योग मंत्री को भेज दी है, आप एक बार उनसे मिल लें उस समय भारत के उद्योग मंत्री मोइनुल हक चौधरी थे जो कि असम के निवासी थे। मुलाकात में केंद्रीय उद्योग मंत्री ने मुझसे कहा कि झुनझुनवाला मैं तुम्हारी फाइल पर साइन कर दूंगा, लाइसेंस दे दूंगा, लेकिन तुम्हें फैक्ट्री असम में लगानी होगी। जवाब में मैंने कहा कि यह किसी भी तरह से सही नहीं होगा, क्योंकि यह मेरे हाथ में नहीं है, क्योंकि मुझे जो यह तकनीक मिली है उसकी पहली शर्त यह है कि इसमें फ्रेंच 40 प्रतिशत इक्विटी लेंगे और वो असम के लिये मानेंगे नहीं और यह कहा कि इसके लिये मंत्री का दबाव है तो फिर भाग ही जायेंगे। वो यह सोचेंगे की जिस देश में उद्योग लगाने को लेकर इस तरह राजनीतिक दबाव डाला जाता है वहां जाकर क्या करेंगे। एम.जे.कामथ ने भी इंतजार करने को कहा। इसके बाद केंद्रीय उद्योग मंत्री दिनेश सिंह बनें। कामथ साहब के कहने पर मैं दिनेश सिंह से मिला तो उन्होंने कहा कि देखो झुनझुनवाला ये बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है तुमसे नहीं होगा। उन्होंने इसे मोदी को देने की बात कही और कहा कि वो बहुत बड़ा ग्रुप है इसे मैनेज कर लेगा। मैंने तत्कालीन उद्योग मंत्री दिनेश सिंह को हरसंभव समझाने और बताने की कोशिश की, कहा कि इस प्रोजेक्ट पर मेरा और मोदी दोनों का तुलनात्मक प्रजेंटेशन देख लें, क्योंकि टेक्सटाइल मिल के कारखाने भी तो दोनों ही चलाते हैं। दोनों के प्रबंधन और क्वालिटी को देखकर ही फैसला करें और इसके बाद जो ठीक लगे फैसला करें। मैंने प्रजेंटेशन भी दिया लेकिन मंत्री दिनेश सिंह नहीं माने और कहा कि यह तो बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है तुमसे नहीं होगा। मैंने कामथ साहब को फिर कहा कि यह तो बड़ा गड़बड़ हो गया तो उन्होंने एमआरटीपी जाने की सलाह दी। मैंने यही किया। इस प्रोजेक्ट पर मेरा और मोदी दोनों का तुलनात्मक प्रजेंटेशन एमआरटीपी में हुआ। इसमे हमारी जीत और मोदी की हार हुई। आखिर में हमें लाइसेंस तो मिल गया। इसके बाद पेशीनो वाले जो हमारी इतनी सहायता कर रहे थे उनकी सोच ही बदल गई और वो पांच सालकी रॉयल्टी पांच की बजाय दस फीसदी और 40 फीसदी इक्विटी मांगने लगे और कहा कि इसके बिना वो तकनीक कभी नहीं देंगे। मैं परेशान होकर पेशीने के चीफ एक्जीक्यूटिव जगाल से मिला और एंग्रीमेंट का पेपर दिखाया तो उन्होंने पेपर फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया। मैं हक्का-बक्का सा रह गया मैंने भारतीय राजदूत से शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस तरह दस साल बीत गये और मैं 15 दफे फ्रांस भी आया-गया।

इसी दौरान पेशीनो का चेयरमैन जापान से वापस जा रहा था और उनकी मीटिंग इंदिरा गांधी से दिल्ली में तय हुई थी। मैनें इंदिराजी के प्राइवेट सचिव एलेक्जेंडर के बेटे को अपने पिता से मिलवाने की बात कही और उसे अपनी परेशानी बताई तो वह तैयार हो गया। इस तरह एलेक्जेंडर जी ने मेरी पांच मिनट की एक छोटी मुलाकात पेशीनो के चेयरमैन से करा दी और मैं उनसे मिलने पेरिस गया और बुद्ध की कांसे की एक प्रतिमा उन्हें भेंट की। इसके बाद उनसे पांच मिनट की तय मुलाकात 25 मिनटों तक बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच अंतर पर ही चलती रही। इसके बेहद प्रभावित हुए पेशीनो के चेयरमैन ने मुझे आश्वासन दिया की उनके अधिकारी उनसे हरसंभव सहयोग करेंगे। इसके बाद कल तक लात मारकर बात करने वाले पेशीनो के सभी अधिकारी मेरी आवभगत करने लगे। उनसे भी हिंदू संस्कारों और पुर्नजन्म पर खूब चर्चा हुई और आखिर में 1962 में लाइसेंस मिलने के 16 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भोपाल में ग्रेफाइट प्लांट चालू हो गया। लेकिन, पेशीनो ने कुछ तकनीक छुपा ली थी, जिससे हमारा माल हल्का बन रहा था। इसे हमनें बाद में उचित स्तर का बना लिया। सबसे खुशी की बात तो यह रही की शाम के छह बजे की पहली फायरिंग के बाद ही हम सफल हो गये। सब दंग रह गये। ये मेरी बहुत बड़ी कामयाबी रही।26-09-2015

इसके बाद पेशीनो से पाकिस्तान और साउथ कोरिया में अपने माल को एक्सपोर्ट करने की गुजारिश की, लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। मंैने सहगलजी से कहा कि हमारी मदद कीजिये, पेशीनो का एक्सपोर्ट लाइसेंस एक साल बाद खत्म होने वाला है उसे विस्तार मत दीजिये। सहगलजी के दबाव के बाद पेशीनो ने मेरी मांग मान ली। हमारा एक्सपोर्ट 500 टन माल के साथ साउथ कोरिया के लिए शुरु हो गया। लेकिन, इन चारों बड़ी कंपनियों के कॉर्टेज के दाम बहुत ज्यादा थे, इसका फायदा एक्सपोर्ट करने में ज्यादा दाम मिलने का हमें भी था। लेकिन, इनके कॉर्टेज टूटने के बाद इनका घाटा बढ़ा और इनमें झगड़ा शुरु हुआ और हमसे एक्सपोर्ट बढ़ाने को कहा। क्योंकि इनके निर्माण की लागत बहुत ज्यादा थी। इसके बाद हमारी कंपनी ने 3000 टन माल एक्सपोर्ट किया। इंटरनेशनल मार्केट में हमारी धाक जम गई। जर्मनी की हिस्ट ने फ्रांस की पेशीनो को खरीद लिया। मैनेजमेंट बदला और हम भी बंधनों से आजाद हो गये और हमारा एक्सपोर्ट 10000 टन से बढ़कर 40000 टन हो गया। मेरी इस कामयाबी की एक बहुत बड़ी वजह लो कॉस्ट यानी कि कम वेतन पर हमें मजदूरों, इंजीनियरों और अधिकारियों की उपलब्धता रही है। लेकिन हमारे और उनके वर्क कल्चर में जमीन और आसमान का अंतर है। उनके कारखानों में राजनीति और निकम्मापन नहीं है। यूनियन कार्बाइड बंद होने से हमें बहुत फायदा हुआ। हमारा एक्सपोर्ट 40000 टन से बढ़कर 80000 टन हो गया। लेकिन, हमारा 200000 टन एक्सपोर्ट का लक्ष्य अधूरा ही रह गया। इस मुद्दे पर हमने मदद के लिये चिदंबरम साहब से मुलाकात भी की थी, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया। खैर, हमारा प्लांट अच्छा चल रहा है।

मेरी तीसरी बड़ी कामयाबी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट रही है। हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन सीएम प्रेम कुमार धूमल ने केंद्र सरकार से इसका लाइसेंस दिलाने में मेरी बहुत मदद की थी। कुल्लू जिले से 40 मील दूर मलाना नदी के उपर बने इस 100 मेगावाट वाली हाइड्रो प्रोजेक्ट को हमने हिमाचल में अपने मजदूरों और इंजीनियरों की मेहनत के बूते डेढ़ साल से भी कम समय में पूरा कर दिखाया। हमने काम का समय और रुटीन तक तय कर रखा था। धूमल साहब ने इसे विधानसभा में अपनी सरकार की बड़ी कामयाबी के तौर पर भी स्वीकार किया था। प्राइवेट सेक्टर का यह पहला हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट है। नेताओं को अपने प्रदेशों में प्रोजेक्ट लगवाने और उन्हें चलाने में विशेष रुचि रहती है। क्योंकि, इससे उन राज्यों में और प्रोजेक्ट लगने की उम्मीदें बंधी रहती हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और हिमाचल प्रदेश के पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल इसके सबूत हैं।

डॉ. कलाम से प्रभावित हूं

मैं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की सादगी, सज्जनता और उनके आध्यात्म प्रेम का सदैव कायल रहूंगा। उनके राष्ट्रपति पद पर रहने के दौरान एक बार उनसे व्यापार नीति पर बात करने का सौभाग्य मिला। रामकृष्ण मिशन के एक संन्यासी की लिखी किताब उन्हें भेंट की, पुस्तक को पढऩे के दस मिनट बाद ही खुद इसके विमोचन को तैयार हो गये। फिर उन्होंने किताब का विमोचन भी किया। इस दौरान उन्होंने मेरी बहू की एक पेंटिंग भी स्वीकार की और राष्ट्रपति भवन में लगी एक कलाकृति पर चर्चा भी की।

रामकृष्ण मिशन से मिलती है उर्जा

आध्यात्म और संस्कृति पर चर्चा के बिना एक-दूसरे को समझना मुश्किल है। मैं दर्शनशास्त्र का छात्र रहा हूं। परिचर्चा मेरा पसंदीदा विषय है। मेरे कई रुके हुए काम इसकी मदद से पूरे हुए हैं। यह मल्टी डायमेनश्नल इफेक्ट है। रामकृष्ण परमहंस हों या मां शारदा या स्वामी विवेकानंद सबके जीवन का लक्ष्य ईश्वर के दर्शन करना और हर मानव की मदद करना था। बेलूर मठ और बनारस का रामकृष्ण मिशन आश्रम (कौडिय़ा अस्पताल) इसका शानदार उदाहरण है। लेकिन, अफसोस तो इस बात का है कि, बेलूर मठ, बनारस हो या दिल्ली आम जनता आश्रम के संसाधनों का लाभ तो उठाती है, अस्पतालों में नाममात्र शुल्क देकर ईलाज कराती है, लेकिन वह सभी ठाकुर रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा या स्वामी विवेकानंद के जीवन दर्शन, त्याग, तपस्या और विचारों से कोई सीख नहीं लेना चाहते हैं। यहां कई महाराज और संन्यासी हैं जो लोगों की मदद कर रहे हैं चुपचाप बिना आवाज के। रामकृष्ण परमहंस मिट्टी में लोट जाते थे जिस दिन उन्हें ईश्वर के दर्शन नहीं होते थे।

मैं टेक्सटाइल मिल लगाने के समय से ही रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों के गहरे संपर्क में रहा हूं। भिलवाड़ा टेक्सटाइल मिल के शिलान्यास के मौके पर राजस्थान के तत्कालीन सीएम मोहन लाल सुखाडिय़ा के साथ ही रामकृष्ण मिशन के सन्यासियों को भी बुलाकर उनसे आशीर्वाद लिया था। मेरे सभी प्रोजेक्ट्स के शिलान्यास और उद्घाटन रामकृष्ण मिशन के किसी-न-किसी सन्यासी ने ही किया है। हालांकि इस दौरान विभिन्न बैंकों और एलआईसी के चेयरमैन तक मौजूद रहे हैं। भारत सरकार के बड़े अधिकारी इन सन्यासियों से बहुत कम परिचित हैं, उन्हें लगता है कि ये तो पूजा-पाठ करते हैं, लेकिन जब वह इन सन्यासियों को अमेरिकन अंग्रेजी में बोलते और सामाजिक विषयों पर उनके विचार सुनते-देखते हैं तो उन्हें भी आश्चर्य लगता है। इससे मुझे यह लाभ हुआ कि उनकी अपेक्षाएं मुझसे बहुत कम हो गईं कि यह लोग रामकृष्ण मिशन के लोग हैं। रामकृष्ण मिशन से मुझे ऊर्जा मिलती है।

सामाजिक असमानता दूर हो

समाज की असमानता दूर होनी चाहिये। नक्सलवाद की यह बड़ी वजह है। अंतर एक रुपये और लाख के बीच का नहीं, एक और 18-20 रुपये का होना चाहिये। आध्यात्म का स्तर सर्वप्रथम हैं। दूसरा स्तर रक्षक का है। रुपया कमाना यानी व्यापारी का स्तर तीसरे नंबर का है। आध्यात्म में 100 फीसदी तीव्रता है तो बिजनेस में भी कुछ तो स्वच्छता होनी चाहिये।

नैतिकता का हो रहा पतन

रिश्वत की बात तो पूछिए ही मत। राजस्थान के पूर्व सीएम सुखाडिय़ाजी चुनाव में रुपये मांगते थे। ये तो नॉर्मल था, इसको तो घूस मानते ही नहीं थे। लेकिन, जब शिव चरण माथुर सीएम बनें तो ऐसा कोई महीना नहीं बीता जब कांग्रेस पार्टी को रुपयों की दरकार नहीं हुई। इतना ही नहीं कांग्रेस पार्टी के 100 लोग हमारी कंपनी के पेरोल पर थे, उनकी केवल हाजिरी लगती थी। वेतन उनके खाते में जाते रहे। आज भी राजस्थान का वही हाल है। खराब चरित्र के लोग सरकार में बैठे हैं। आडवाणीजी से मैनें कहा कि कुछ कीजिये तो उन्होंने कहा कि मैं भी बेबस हूं।

जबसे केंद्र में नरेन्द्र मोदीजी की सरकार बनी है, उद्योग जगत को फायदा हुआ है और उद्योग जगत में भारी उत्साह का संचार हुआ है। सबसे अच्छी बात यह है कि अब कारखाने लगाने के लिये दरबारी बनने की जरुरत नहीं है।

लक्ष्मीनिवास झुनझुनवाला

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