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मिल्टन फ्रीडमैन और भारत न संसाधनों का अभाव, न क्षमता का, अभाव है सही आर्थिक नीति का

मिल्टन फ्रीडमैन और भारत न संसाधनों का अभाव, न क्षमता का, अभाव है सही आर्थिक नीति का

नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन बीसवीं सदी के उन कुछ गिने-चुने अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने, अपने समय के आर्थिक चिंतन को बहुत गहरे तक प्रभावित किया और आर्थिक विकास की राह ही बदल दी। वे आर्थिक-राजनीतिक स्वतंत्रता के ऐसे दिग्गज दाशर्निक थे जिन्होंने, मंदी से उबरने के लिए सरकारी हस्तक्षेप को अनिवार्य बताने वाले केंज के आर्थिक चिंतन पर कुठाराधात कर एक बार फिर मुक्त बाजार की सोच की विजय का झंडा गाड़ा। उन्होंने अपने समय के दो सबसे शक्तिशाली राष्ट्र नेताओं मार्गरेट थैचर और रोनाल्ड रेगन की आर्थिक नीतियों और साम्यवादी जगत में बढ़ते साम्यवाद विरोध को प्रभावित किया। आज भी वे आर्थिक स्वतंत्रता के समर्थकों के सबसे प्रिय और आदर्श अर्थशास्त्री और दार्शनिक हैं।

26-09-2015लेकिन मिल्टन फ्रीडमैन के जीवन का एक और पहलू है जो भारत के लिए बहुत प्रासंगिक है, लेकिन बहुत थोड़े भारतीय ही उसे जानते हैं। यह पहलू है कि इस महान आर्थिक विभूति का भारत से गहरा रिश्ता रहा है। वे तीन बार भारत आए थे। दो बार तो काफी लंबे समय तक यहां रहे और उन्होंने आजादी के बाद के उन वर्षों में जब भारत आर्थिक नवनिर्माण के निर्णायक दौर से गुजर रहा था उसके गवाह बने और उन्होंने उस पर अपनी गहरी अंर्तदृष्टि से युक्त विचार भी प्रकट किए। ये विचार आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। उन्हें पढ़ते समय बार-बार यह महसूस होता है कि काश उस समय हमारे देश के समाजवादी मृगतृष्णा के पीछे भागने वाले शासकों ने फ्रीडमैन की नेक सलाह मानकर उस पर अमल किया होता तो भारत कब का एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर चुका होता। 1991 में भारत ने आंशिक तौर पर ही सही मिल्टन फ्रीडमैन की आर्थिक स्वतंत्रता को स्थापित करने की राह अपनाई तो उसके चौंधिया देने वाले नतीजे कुछ वर्षों में ही दिखाई भी दिए।

भारत जब आजादी के बाद अपनी आर्थिक विकास की राह तय कर रहा था तब उसने दो जाने-माने अमेरिकी अर्थशास्त्रियों मिल्टन फ्रीडमैन और जे.के.गालब्रेथ को सलाहकार के तौर पर बुलाया था। आर्थिक चिंतन की दृष्टि से दोनों विपरीत धु्रवों के वासी थे। मिल्टन मुक्त बाजार के घनघोर हिमायती थे, तो केनेडी और पंडित नेहरू के नजदीकी गालब्रेथ सरकारी हस्तक्षेप के समर्थक। तब नेहरू सरकार ने अर्थव्यवस्था के सर्वोच्च शिखर यानी बुनियादी उद्योगों को सरकारी क्षेत्र में रखने का जो फैसला लिया था उसमें गालब्रेथ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही, ऐसा कहा जाता है और यह भारत का चरम दुर्भाग्य था।

मिल्टन फ्रीडमैन ने 5 नवंबर 1955 में भारत सरकार को एक स्मरण पत्र दिया था जो भारत में पीसी महालनोबीस के नेतृत्व में चल रहे नियोजित विकास के मॉडल की रचनात्मक और बेबाक आलोचना है। इसके बाद फ्रीडमैन ने एक और लेख-‘इंडियन इकनॉमिक प्लानिंग’ लिखा था। ये दोनों ही दस्तावेज रूढ़ीवादी अर्थशास्त्री माने जानेवाले फ्रीडमैन की व्यावहारिक सोच और अर्थव्यवस्था की जमीनी सच्चाइयों को समझने वाली गहरी अंर्तदृष्टि को उजागर करती है। कई बार तो इस बात पर अचरज होता है कि जिंदगी इस देश में गुजार देनेवाले दिग्गज अर्थशास्त्री आर्थिक दुर्दशा की वजह नहीं जान पाए, जबकि फ्रीडमैन कुछ समय ही यहां रह कर हमारी अर्थव्यवस्था की नब्ज को समझने में कामयाब रहे। लेकिन, हमारे देश का दुर्भाग्य यह रहा कि फ्रीडमैन द्वारा 1955 में भारत सरकार को दिया स्मरण पत्र कई दशकों तक देश की जनता के सामने आ ही नहीं पाया। जब वह दिया गया था तब उसके कुछ अंश कुछ अखबारों में प्रकाशित हुए थे, लेकिन बाद में उसे दबा दिया गया। फिर वह सैतीस वर्षों बाद सुब्रतो राय और विलियम ई जेम्स की पुस्तक में सामने आया।

26-09-2015दोनों ही दस्तावेजों में फ्रीडमैन ने भारत के तेज गति से विकास कर सकने की क्षमता पर अपार विश्वास जताया है। स्मरण पत्र की शुरूआत ही वे करते हैं इस विचारोत्तेजक दलील के साथ- अन्य देशों और भारत के हालिया और अतीत दोनों के अनुभवों से वास्तविक राष्ट्रीय आय में प्रति वर्ष पांच प्रतिशत का इजाफा बिल्कुल संभव दिखाई देता है। भारत में बड़े पैमाने पर ऐसे तकनीकी और वैज्ञानिक संसाधन हैं जिनका दोहन नहीं हुआ है उसकी तुलना 150 वर्ष पुराने अमेरिका से की जा सकती है। उसके पास भी ऐसे संसाधन थे जिनका दोहन नहीं किया गया था। बुनियादी सवाल है तरीके और सामाजिक-आर्थिक संरचना का जो क्षमताओं को वास्तविकता में बदले और दूसरी तरफ लोकतंत्र और स्वतंत्रता को बनाए रखे और निरंतर बढ़ते अवसर भारतीय जनता को उपलब्ध कराएं। आज हमें यह बहुत सामान्य लगे, लेकिन मिल्टन फ्रीडमैन ने यह बात 1955 में कही थी जब भारत स्वतंत्रतर हुआ था और विकास की दिशा को तलाश रहा था। उस वक्त विकास दर बहुत शर्मनाक थी।

यह सब कहते हुए उन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में विकास के लिए जरूरी बातों को रेखांकित किया था- मंथर गति से बढऩेवाली मौद्रिक संरचना, शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए अवसरों को बड़े पैमाने पर बढ़ाना, माल और विशेष रूप से लोगों की मोबिलिटी को बढ़ाने के लिए परिवहन और संचार की सुविधाओं में सुधार तथा ऐसा माहौल बनाना, जिसमें किसानों, व्यापारियों और उद्योगपतियों की ऊर्जा और पहल को अधिकतम मौका मिले। उन्होंने इस दिशा में तब भारत सरकार द्वारा उठाए कुछ कदमों का स्वागत किया था, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी थी कि भारत सरकार कुछ ऐसे कदम उठा रही है या उठाने का इरादा रखती है जो आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के बजाय उसमें बाधा बन सकते हैं।

उनके लेख ‘इंडियन इकोनॉमिक प्लानिंग’ में भारत के आर्थिक विकास की अपार संभावनाओं को ज्यादा पुरजोर तरीके से उजागर करते हैं। वे एक जगह सवाल उठाते हैं और दूसरू जगह खुद ही उसका जवाब भी देते हैं। जिससे लगता है कि उन्होंने भारत की आर्थिक समस्या के मर्म पर उंगली रख दी है। उनके विश्लेषण से भारत की आर्थिक बदहाली के कारण की शिनाख्त करने के नाम पर पिछले कई दशकों में जो कई मिथक पैदा किए गए हैं वह ध्वस्त हो जाते हैं और असली कारण सामने आ जाता है। वे लिखते है- भारत की निराशापूर्ण धीमी विकास दर की क्या वजह है? अक्सर इसके जवाब में यह सुनने को मिलता है कि यह भारत की सामाजिक संस्थाओं, भारत के लोगों की प्रकृति, और जिस तरह के मौसम में वे रहते हैं उनको प्रतिबिंबित करती है। धार्मिक विधि -निषेध, जाति व्यवस्था और नियतिवादी दर्शन ने उन्हें परंपरा और कठोर रीति-रिवाजों का बंदी बना दिया है। ऐसा कहा जाता है, कि लोग उद्यमशीलता विहीन और आलसी हो गए हैं। इन सारे कारकों में वर्तमान की धीमी विकास दर की व्याख्या करते समय कुछ प्रासंगिकता हो सकती है, लेकिन सही जवाब आपको धार्मिक और सामाजिक व्यवहार या लोगों की गुणवत्ता में नहीं मिलेगा वरन भारत द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीति में मिलेगा। भारत के पास आर्थिक विकास के लिए आवश्यक किसी चीज का अभाव नहीं है। अभाव है तो सही आर्थिक नीति का।

भारत के आर्थिक संकट का मुख्य कारण है सही आर्थिक नीति का अभाव- यह कहने वाले मिल्टन फ्रीडमैन ने भारत सरकार को दिए अपने स्मरण पत्र में बताया था कि हमारी आर्थिक नीति में असल गड़बडी़ कहां है। इस संदर्भ में उन्होंने सबसे पहले निवेश नीति की आलोचना की थी जो निवेश-आउटपुट अनुपात पर बहुत ज्यादा जोर देती थी। फ्रीडमैन की दलील थी कि इन दोनों के बीच सीधा नहीं एक ढीला-ढाला संबंध है, क्योंकि प्रमुख उत्पादक शक्ति भौतिक पूंजी नहीं मनुष्य होते हैं। उनका कहना था कि पूंजी की मात्रा जितनी महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उसका वितरण कैसे किया गया है। इसके अलावा जिसे पूंजी निवेश कहा जाता है वह अर्थव्यवस्था की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए किए गए खर्च का एक हिस्सा भर होता है। किसी भी अर्थव्यवस्था में उत्पादक शक्ति का मुख्य स्रोत मशीनरी, उपकरण, विशाल इमारत और भौतिक पूंजी नहीं होते वरन समाज को बनाने वाले मनुष्य होते हैं। इस सिलसिले में उन्होंने उदाहरण दिया था अमेरिका का, जिसके बारे में उनका कहना था कि ‘उसकी विकास दर का 20 प्रतिशत का कारण भौतिक पूंजी है तो विकास दर का 80 प्रतिशत अमेरिकियों की उत्पादकता में हुई वृद्धि के कारण हैं।’ दरअसल हर वर्ष वहां मानव संसधनों की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार पर जो खर्च होता है वह भौतिक पूंजी पर होने वाले निवेश से ज्यादा है। मनुष्य बल की गुणवत्ता ही अमेरिका को अनूठा और चरम उत्पादक बनाती है। इसलिए अमेरिका के सारे कल कारखानों को खत्म कर दीजिए, लेकिन अमेरिकियों के कौशल को बरकरार रहने दीजिए तो अमेरिका कुछ वर्षों में फिर वैसी ही समृद्धि हासिल करने में कामयाब हो जाएगा। लेकिन, उनके कौशल को खत्म कर दीजिए और कल कारखानों को बने रहने दीजिए तो इसके उलट होगा। उत्पादन दुबारा वह ऊंचाइयां हासिल नहीं कर पाएगा। फिर वे टिप्पणी करते हैं कि दरअसल मध्यकालीन यूरोप, कैथेड्रिल हो या मिस्र के पिरामिड, भारत में मुगल साम्राज्य के द्वारा बनाई गईं भव्य इमारतें वे सब इस बात के गवाह हैं कि आम लोगों के जीवन स्तर में वृद्धि किए बगैर भौतिक पूंजी में भारी निवेश करने से क्या हो सकता है।

ये सारी बातें भारतीय संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उसकी मुख्य पूंजी तो उसकी श्रम शक्ति ही है। उनका ऐसा मानना था कि भारत में भी ऐसा उत्पादक क्षमता वाला, उद्यमशील मनुष्य बल है जो विकास का इंजन बन सकता है।

26-09-2015उत्पादक मनुष्य के बारे में उनका नजरिया खासा यथार्थवादी था। उनका मानना था कि जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति उद्यमशील, जोखिम उठाने वाला आर्थिक जीव हो। क्योंकि जिस भी देश ने आर्थिक समृद्धि को हासिल किया उनका इतिहास बताता है कि समाज का एक छोटा सा हिस्सा ही राह बनाता है और नए दुस्साहसपूर्ण व्यापारिक वेंचर हाथ में लेता है। बाकी ज्यादातर लोग तो वही सामान्य मेहनत मजदूरी के काम करते जीवन बिताते हैं। लेकिन औद्योगिक और व्यापारिक क्षेत्र में नई जमीन जोडऩे वाले थोड़े बहुत लोग और बाद में उनका अनुसरण करने वाले कुछ और लोगों का काम इतना महत्वपूर्ण होता है कि उसके बाद मेहनत मजदूरी करने वाले तमाम लोगों का काम भी उत्पादक बन जाता है। मिल्टन फ्रीडमैन का मानना था कि भारत में इस तरह के भावी उद्यमियों की कमी नहीं है। भारतीयों की उद्यमशीलता की मिसाल देते हुए उन्होंने अपने लेख में जिक्र किया था कि जो भी भारतीय अफ्रीका या दक्षिण पूर्वी एशिया में जाकर बसे वे वहां के व्यापारी वर्ग का प्रमुख हिस्सा बन गए। इसलिए यह विश्वास कर पाना मुश्किल है कि जो भारत में रह गए वो उनसे बहुत अलग तरह के लोग हैं। उनकी नजर में इसका जीता-जागता उदाहरण था लुधियाना जो लघु और मध्यम स्तर के उद्योगों के केंद्र के रूप में उभर रहा था। उसे देखकर उन्होंने लिखा था कि यहां क्रांति की शुरूआत हो रही है। एक आत्मविश्वास से भरा मजबूत और अनगढ़ पूंजीवाद हिलोरे ले रहा है।

फ्रीडमैन ने अपने लेख में एक जगह कहा है कि अक्सर पश्चिमी लोगों को लगता है कि भारत में उद्यमों और उद्यमशीलता की कमी है, लेकिन ऐसा इसलिए है कि उनकी अपेक्षाएं पश्चिम के विकसित देशों के आधार पर जन्मीं हैं। वे अपने देश के जनरल मोटर्स और जनरल इलेक्टीकल्स जैसे आधुनिक निगमों के आधार पर ही भारत को भी तोलते हैं। लेकिन, ये कंपनियां अमेरिका में औद्योगिक क्रांति नहीं ला सकी थीं, वे तो आखिरी नतीजा थीं। फ्रीडमैन कहते हैं इसी तरह भारत की उम्मीद टाटा जैसे अपवादात्मक औद्योगिक दिग्गजों से पूरी नहीं होगी वरन लघु और मध्यम दर्जे के उद्यमियों से पूरी होगी। वह लुधियाना से पूरी होगी न कि जमशेदपुर से। यह उम्मीद उन लाखों छोटे व्यापारियों से पूरी होगी जो हर शहर में अपनी छोटी सी दुकान या वर्कशॉप के साथ सड़कों पर लाइन लगाकर बैठे रहते हैं। उन्होंने कहा कि लुधियाना में मुझे जो प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई दी उसे अगर पूरी तरह फलने- फूलने दिया गया और सरकार ने उसमें बाधाएं नहीं डालीं तो भारत वह विकास दर हासिल कर सकता है जिसकी आज हम कल्पना भी नहीं कर पा रहे हैं।

मिल्टन फ्रीडमैन के विचार उन लोगों को चौंका सकते हैं जिनके मन में उनकी छवि एक चरम पूंजीवादी बुद्धिजीवी की रही है। जिनके बारे में यही धारणा रही है कि बह बड़े उद्योगों और बड़े निगमों के हितों के रक्षक थे, लेकिन फ्रीडमैन का नजरिया उनके बारे में बनी इन मिथों को तोड़ता है और यह स्पष्ट करता है कि वे बुनियादी तौर पर चंद लोगों के हितों के रक्षक नहीं थे वरन सभी को आर्थिक स्वतंत्रता उपलब्ध कराने के सशक्त हिमायती थे। जिन्हें शिद्दत से यह महसूस होता था कि राजनीतिक स्वतंत्रता देने वाली लोकतंत्र जैसी व्यवस्था तभी मजबूत बन सकती है जब आम जनता को आर्थिक स्वतंत्रता भी हासिल हो। इस तरह उनकी सोच पूंजीवादी कुल, बड़े उद्योगपतियों के हितों की रक्षा की विचारधारा नहीं वरन आम जनता को आर्थिक आजादी दिलाकर उसे समृद्धि की राह पर ले जाने वाली आम जनता का पूंजीवाद था।

सतीश पेडणेकर

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