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आरक्षण आन्दोलन की लपटें

आरक्षण आन्दोलन की लपटें

राजस्थान के पड़ोसी राज्य गुजरात में पटेल समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी) में आरक्षण देने की मांग का समर्थन करके राजस्थान में गुर्जर संघर्ष समिति ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है। संघर्ष समिति के अग्रणी नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला मई माह में रेल पटरियों को जाम कर राज्य व केन्द्र सरकार को अपनी ताकत दिखा चुके हैं। अहमदाबाद रैली के संदेश का अहसास होने में अभी वक्त लग सकता है। लेकिन, गोलबंद हुए पटेल समुदाय के आरक्षण आंदोलन की लपटों को हवा मिल रही है। महाराष्ट्र में कांग्रेस ने मराठा धनगर तथा मुस्लिम समाज के आरक्षण की मांग के समर्थन में राज्य सरकार को अल्टीमेटम देकर अपने राजनैतिक इरादे जता दिये हैं। इससे पहले दस अगस्त को राजस्थान उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुनील अंबवानी एवम न्यायाधीश वी. एस. सिराधना की खण्डपीठ ने जैन समुदाय की धार्मिक प्रथा और जातीय आरक्षण से जुड़े दो ऐतिहासिक फैसले सुनाये। जैन धर्म की संथारा या संल्लेखना प्रथा को आत्महत्या के बराबर अपराध मानने के खण्डपीठ के निर्णय की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप देशव्यापी मौन जुलूस प्रदर्शन इत्यादि के आयोजन हुए। खण्डपीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि संविधान में किसी को भी जीवन लेने का अधिकार नहीं है। जीवन जीने का अधिकार अन्य अधिकारों से अलग है। जीवन जीने के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं है। यह न तो धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है और न ही मूल अधिकार। दूसरी तरफ अपने कड़वे प्रवचनों के लिये विख्यात जैन मुनि तरूण सागर का यह कहना है कि उच्च न्यायालय द्वारा संथारा पर रोक दुर्भाग्यपूर्ण है। यह जैन धर्म के सिद्धांतों को पूरी तरह समझे बिना लिया गया निर्णय है। यह आजाद भारत का अब तक का सबसे गुलाम फैसला है। संथारा का मतलब आत्मस्वतंत्रता है, न कि आत्महत्या। याचिकाकर्ता निखिल सोनी ने 2006 में दायर अपनी याचिका में कहा था कि संथारा लेने वाला शख्स अन्न-जल छोड़ देता है। मृत्यु का इंतजार करता है। इसे धार्मिक आस्था कहना गलत है। कानून में आस्था की कोई जगह नहीं है। इसे अवैध घोषित कर ऐसा करने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमें कायम हों। करीब नौ साल तक हुई सुनवाई के बाद खण्डपीठ ने याचिकाकर्ता की दलील से सहमत होते हुए अपने निर्णय में कहा है कि संथारा लेने वालों के खिलाफ आई.पी.सी. की धारा 309 अर्थात आत्महत्या का मुकदमा तथा संथारा के लिये उकसाने पर धारा 306 के तहत कारवाई की जानी चाहिए।

इसी दिन खण्डपीठ ने अपने अन्य फैसले में भरतपुर और धौलपुर जिले के जाटों को ओ.बी.सी. वर्ग में मिल रहे आरक्षण को गलत ठहराया तथा राजस्थान सरकार को इन दोनों जिलों के जाटों को ओ.बी.सी आरक्षण वर्ग से बाहर करने के निर्देश देने के साथ ही इस संबंध में 10 जनवरी 2000 को जारी की गई अधिसूचना को भी यह कहकर रद्द कर दिया कि ओ.बी.सी आरक्षण की प्रक्रिया अधूरी थी। अलबत्ता खण्डपीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह आदेश पूर्व में आरक्षण का लाभ ले चुके लोगों पर लागू नहीं होता, बल्कि भविष्य के लिये यह नियम लागू होगा। खण्डपीठ ने फैसले में चार माह में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग गठित करने तथा ओ.बी.सी में शामिल जातियों का फील्ड सर्वे करके जमीनी हकीकत जानने की प्रक्रिया में दस साल से इस वर्ग में आरक्षण सुविधा का लाभ ले रही (केन्द्र व राज्य सरकार की सूची के अनुसार) जातियों की समीक्षा किए जाने तथा ओ.बी.सी वर्ग के लि दावेदार जातियों का भी अध्ययन करने को कहा है। ओ.बी.सी आयोग 2012 की रिपोर्ट के हवाले से खण्डपीठ ने कहा है कि प्रदेश में ओ.बी.सी में शामिल 82 जातियों के 21 प्रतिशत आरक्षण के तहत जाट, चारण, यादव तथा अहीरों का सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व अधिक है और बाकी 36 जातियों का तो प्रतिनिधित्व ही नहीं है। गौरतलब है कि वर्ष 1999 में रतनलाल बागड़ी, अर्जुन सिंह, रामकिशोर गुर्जर, मानसिंह और हंसराज कुमावत ने तथा वर्ष 2002 में सुभाष कुमावत और 2013 में पूर्व आई.ए.एस सत्यनारायण सिंह ने इस संबंध में उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, सत्यनारायण सिंह तो ओ.बी.सी आयोग के सदस्य सचिव भी रह चुके हंै। इस मामले में जाट समुदाय की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री जगदीप धनकड़ ने कहा कि आयोग के सदस्य सचिव रहे तत्कालीन अधिकारी के आरक्षण के खिलाफ याचिका लगाना तथा ऐसी याचिकाओं का अर्से तक लम्बित रहना उचित नहीं है। वही सत्यनारायण सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि फैसला त्रुटिपूर्ण है। शैक्षणिक, सामाजिक हालातों पर ओ.बी.सी में जाति का चयन होता है।

खण्डपीठ के फैसले से अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़ी जातियों तथा इस वर्ग के तहत आरक्षण की दावेदारी जताने वाली जातियों में हलचल मच गई है और अपने-अपने स्तर पर भावी रणनीति के लिये मंथन किया जा रहा है। लेकिन, यह माना जा रहा है कि ओ.बी.सी में शामिल तथा अन्य दावेदार जातियां जाट समाज को इस वर्ग में शामिल किए जाने के पक्ष में नहीं हैं।

गौरतलब है कि भारत सरकार ने 13 अगस्त 1990 को मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू किया था, जिससे देशभर में आरक्षण को लेकर माहौल गरमाया था। वर्ष 1993 में राजस्थान सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया। जाट समाज ने आरक्षण के लिये हर स्तर पर पैरवी की और 1995 में केन्द्र सरकार को ज्ञापन दिया और चुनाव की बेला में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नवम्बर 1999 में जाटों को आरक्षण देने की घोषणा की। तब इसे राजनैतिक दृष्टिकोण से लिया गया फैसला माना गया और भाजपा को चुनाव में इसका लाभ भी मिला। वर्ष 1993 के एक्ट में हर दस साल में आरक्षण सुविधा का लाभ ले रही जातियों के बारे में समीक्षा का प्रावधान है। इन्द्रा साहनी मामले में भी न्यायालय ने

समीक्षा करने को कहा था। इस हिसाब से 2003 तथा 2013 में समीक्षा की जानी थी। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। उच्चतम न्यायालय के रामसिंह मामले में दिये गये फैसले से भरतपुर-धौलपुर जिले के जाटों को आरक्षण सुविधा मिली। पूर्व में भरतपुर-धौलपुर में जाट शासकों के चलते इस समुदाय को आरक्षण से वंचित रखा गया।

जाट समाज के प्रतिनिधि के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता जगदीप धनकड़ का तर्क था कि खाती, यादव, कुम्हार, माली, गुर्जर, जाट इत्यादि जातियां सदियों से एक ही जाजम पर सुख-दुख में शामिल रही हैं। जाटों ने तो सबसे अधिक सामंती क्रूरता सही है। इसलिये सरकार को इन जातियों को आपस में नहीं बांटना चाहिए। उनका तर्क था कि जाट समाज को ओ.बी.सी वर्ग में शामिल करने के मार्ग में कई बाधायें उत्पन्न की गई हैं। इसलिए ओ.बी.सी वर्ग में आरक्षण सुविधा का लाभ लेने वाली जातियों की हर दस साल में समीक्षा की जानी चाहिए।

26-09-2015

अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्ण अध्यक्ष रिटायर्ड जज इन्द्रसेन असरानी का कहना है कि जो जातियां पिछड़े से अब अगड़ा बन गईं हैं, उन्हें सूची से निकाला जा सकता है। कुछ जातियां इस सूची से हटकर सामान्य वर्ग में शामिल होंगी और कुछ जातियां सामान्य से इस सूची में शामिल हो सकती हैं। ऐसा होने से सूची में पहले से मौजूद ऐसी जातियों को भी फायदा होगा जिनको ओ.बी.सी की सूची में होते हुए भी आरक्षण सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा था।

बहरहाल यह स्पष्ट है कि ओ.बी.सी आरक्षण का लाभ ले रही जातियों की समीक्षा से काफी फेरबदल होगा। आरक्षण सुविधा का लाभ ले रही जातियां अपने को सूची में बनाये रखने का भरसक प्रयास करेंगी तो दावेदार जातियां सूची में शामिल होना चाहेंगी। इस प्रकार फील्ड सर्वे में सशक्त पैरवी का दबदबा रहेगा। समीक्षा का आधार क्या होगा इस बारे में अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। फिर भी यह माना जा रहा है कि आर्थिक की अपेक्षा सामाजिक व शैक्षणिक स्तर के मापदण्ड को प्रमुखता दी जाएगी। सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व, सामाजिक रहन-सहन, खान-पान आजीविका के साधन, वार्षिक आमदनी, बी.पी.एल परिवारों का प्रतिशत इत्यादि बिन्दुओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।

ओ.बी.सी वर्ग में जातियों की समीक्षा के साथ ही गुर्जरों व अन्य जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग में आरक्षण का मुद्दा भी गरमा रहा है। राज्य सरकार ने गुर्जरों, रेवारी, आदि जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग (एस.बी.सी) में पांच फीसदी तथा आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण तबके को 14 फीसदी आरक्षण दिये जाने के उद्देश्य से आरक्षण अधिनियम 2008 जारी किया था। अन्य जातियों को प्राप्त आरक्षण सुविधा के कारण राज्य में कुल आरक्षण 68 फीसदी हो गया था। अत: 50 फीसदी से अधिक आरक्षण होने पर इस अधिनियम को याचिका के जरिये चुनौती दी गई। इस मामले में उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता नरपत मल लोढ़ा ने एक प्रार्थना पत्र देकर कहा है कि सरकार आरक्षण के मौजूदा अधिनियम को वापस ले रही है। अधिनियम की समीक्षा कर नया मसौदा तैयार किया जा रहा है। न्यायाधीश अजय रस्तोगी तथा ए.एस. ग्रेवाल की खण्डपीठ ने मामले की अगली सुनवाई आठ अक्टूबर निर्धारित की है। उधर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुखर विरोधी भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवारी सामाजिक न्याय के तहत आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण का लाभ दिलाने की मुहिम में जुटे हुए है। वे कई जिलों का दौरा कर चुके हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा धौलपुर-भरतपुर जिले के जाटों के लिये आरक्षण सुविधा रद्द किये जाने के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की गई, लेकिन वहां भी इसी फैसले को बरकरार रखा गया। उधर निकाय चुनाव के दूसरे चरण में धौलपुर जिले में ओ.बी.सी वर्ग के लिए आरक्षित निकायों के वार्डों में पार्षदों द्वारा नामांकन भरे जा चुके थे। लिहाजा राज्य सरकार ने राज्य निर्वाचन आयोग के समक्ष स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि पार्षदों के नामांकन यथावत रहेंगे। लेकिन, उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद धौलपुर नगर परिषद के सभापति पद के लिए जाट समाज से निर्वाचित पार्षद अपना नामांकन दाखिल नहीं कर पाये। यह पद ओ.बी.सी के लिये आरक्षित था।

गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला को उम्मीद है कि राज्य विधानसभा के सितम्बर माह में होने वाले सत्र में गुर्जर तथा अन्य जातियों के विशेष आरक्षण के लिये कानून लाया जाएगा। पिछले मई माह में आंदोलन के दौरान सरकार ने इसका भरोसा दिलाया था। यदि इस बार हमारे साथ नाइंसाफी हुई तो हम किसी भी सूरत में राजनैतिक जुआ (पॉलिटिकल गैंबलिंग) बदर्शत नहीं करेंगे। गुजरात में तो कुछ नहीं हुआ, हम वह करके दिखायेंगे जो कहीं नहीं हुआ। गुजरात में पटेलों के आरक्षण आंदोलन के संदर्भ में उनकी स्पष्ट राय है कि यदि पाटीदार समाज आरक्षण के मापदंड पूरे करता है तो उन्हें उनका हक मिलना चाहिए। वे पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के युवा नेता 22 वर्षीय हार्दिक पटेल से मिलने के इच्छुक हैं और यह मानते है कि गुर्जरों ने आरक्षण के लिये जो लड़ाई लड़ी अब अन्य समाज इसका अनुसरण करने लगे हैं। उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार ओ.बी.सी वर्ग में शामिल जातियों की समीक्षा की अवधि दिसंबर माह में पूरी होनी है वहीं सितंबर माह में गुर्जर तथा अन्य समुदायों को विशेष आरक्षण संबंधी कानून का क्या स्वरूप बनेगा, अभी कुछ कहना मुश्किल है लेकिन, 2015 के आखिर में राजस्थान में आरक्षण आंदोलन फिर से गरमा सकता है।

 

जयपुर से गुलाब बत्रा

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