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बधाई हो बधाई, जुग-जुग जीये जोड़ी

बधाई हो बधाई, जुग-जुग जीये जोड़ी

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: आपने सुना कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने नई शादी रचा ली है?

पिता: तू भाजपा में तो नहीं शामिल हो गया जो दिग्गी राजा के बारे झूठी अफवाहें फैला रहा है?

बेटा: पिताजी, आपको तो पता है कि मुझे राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। हां, राजनीति में जो कुछ हो रहा है उस पर नजर जरूर रखता हूं और यदि कभी मुझे किसी पार्टी में जाना भी होगा तो आपसे पूछे बिना तो जाऊंगा नहीं। मैं तो हर काम व निर्णय आपकी सलाह और अनुमति से ही करता हूं।

पिता: बेटा, तेरी इस बात से तो मेरी छाती चौड़ी हो गई है। आजकल के बच्चे तो मां-बाप की परवाह ही नहीं करते और सब निर्णय स्वयं ही कर डालते हैं। पर तू यह बता कि ऐसी झूठी खबरें कहां से सुन कर आता है?

बेटा: पिताजी, यह झूठी खबर नहीं है। शत-प्रतिशत सच्ची है। लगता है आपने आज रेडियो या टीवी नहीं देखा। अखबारों में भी यह खबर प्रमुखता से छपी है। आखिर दिग्विजय सिंह कोई छोटे-मोटे व्यक्ति तो हैं नहीं। अपनी रियासत के राजा हैं। दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। पिछले 12/13 साल से वह कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वह तो सदा ही खबरों में छाये रहते हैं।

पिता: बेटा, इसमें तो कोई शक नहीं कि वह कोई आम राजनीतिज्ञ नहीं हैं। उन्होंने राजनीति में कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं।

बेटा: आपके कहने का मतलब है कि इस शादी में भी कोई राजनीति है?

पिता: नहीं बेटा, मेरा यह मतलब नहीं है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि वह एक बड़े आदमी हैं और बड़े आदमियों की बातें भी बड़ी ही होती हैं।

बेटा: पिताजी, एक बात तो माननी पड़ेगी कि दिग्गी राजा हैं तो दमदार व्यक्ति। उन्होंने जो किया उसे सार्वजनिक रूप से स्वीकारा। उन्होंने इसे और राजनीतिज्ञों की तरह छुपाया नहीं।

पिता: हां, यह तो है। कई तो लुके-छिपे अनैतिक सम्बंध बनाये रहते हैं पर साथ ही उससे इनकार भी करते रहते हैं।

बेटा: पिताजी, क्या दिग्विजय सिंह कुंवारे थे?

पिता: नहीं बेटा, कभी कोई इतने बड़े राजा-महाराजा व उसके बेटे को इतनी उम्र तक कुंवारा रहने देता है भला? उनका तो भरा-पूरा परिवार है। बेटे हैं, बेटियां हैं, पोते-पोतियां हैं। उनका एक बेटा तो मध्य प्रदेश में विधायक भी है।

बेटा: तो फिर उन्हें यह शादी रचाने की क्या आवश्यकता पड़ी?

पिता: बेटा, पिछले वर्ष उनकी धर्मपत्नी का देहांत हो गया था।

बेटा: ओह-हो, अब याद आया यह वही दिग्गी राजा हैं जिनके प्यार के किस्से पिछले वर्ष हर जुबान पर थे। हर अखबार की सुर्खियों में थे और हर समाचार चैनल मसाले लगाकर खूब मजे ले रहे थे और दर्शकों का भी मनोरंजन कर रहे थे। लेकिन, पिताजी ये भाजपा वाले बहुत घटिया लोग हैं। इस प्रेम कहानी की तारीफ करने की बजाय उन्होंने कटाक्ष किया कि ब्याह रचाने की घोषणा के लिये दिग्गी राजा को अपनी पत्नि की चिता ठंडी होने की प्रतीक्षा तो कर लेनी चाहिये थी।

पिता: इन लोगों को ऐसा नहीं कहना चाहिये था। उन्होंने उसकी पीड़ा समझने की कोशिश नहीं की, जिसने अपना जीवनसाथी खो दिया और जो जीवन में बिल्कुल अकेला पड़ गया।

बेटा: पर पिताजी, जहां तक मुझे याद है विवाद खड़ा होने पर दु:खी होकर कुछ मास बाद ही उन्होंने अपने प्यार को कुर्बान कर दिया था और शादी के इरादे को तिलांजली देने की भी घोषणा कर दी थी।

पिता: बेटा, राजनीति भी तो इसी का नाम है। इसमें वह हो जाता है जो कहा नहीं जाता और वह नहीं होता जो कहा जाता है।

बेटा: इस पर तो मुझे एक और किस्सा याद आ गया।

पिता: क्या?

बेटा: जब 2003 में दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उनके नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव हार गई थी तो उन्होंने घोषणा कर दी थी कि वह अब अगले दस वर्ष तक कोई पद ग्रहण नहीं करेंगे पर कुछ ही मास बाद वह राष्ट्रीय महासचिव बन बैठे थे।

बेटा: पिताजी, यह पता नहीं चल सका कि इस शादी में दिग्गी राजा के बच्चे भी शामिल हुये या नहीं?

पिता: बेटा, बड़े परिवारों की बड़ी बातें होती हैं। उनका दिल बड़ा होता है। शायद हो गये होंगे।

बेटा: इस पर तो पिताजी, मेरे साथ जो घटा मुझे उसकी याद आ गई। मैं बहुत छोटा था। स्कूल में ही पढ़ता था। मैं क्लास में किसी बात पर बड़ा हंस रहा था। तो एक लड़के ने मुझ पर कटाक्ष कर दिया। तू इतना क्यों खुश हो रहा है? क्या तेरे बाप की शादी हो रही है? इस पर मैं संजीदा हो गया था और उससे लड़ पड़ा था। मुझे तो डर है कि कहीं यही मजाक लोग उनके बच्चों के साथ न कर बैठें।

पिता: बेटा, तू फिजूल में चिन्ता कर रहा है। बड़े परिवारों में ऐसे घटिया मजाक नहीं चलते। और अगर कोई कर बैठा तो वह सब लोग उसका सिर फोड़ देंगे।

बेटा: पिताजी, दिग्गी राजा की उम्र तो ज्यादा नहीं होगी।

पिता: हां, यही 70 के करीब।

बेटा: सत्तर? फिर भी उन्होंने शादी रचा ली? उनके तो पोते-पोतियां भी हैं। इन बच्चों ने तो शादी का बड़ा मजा लूटा होगा। अपने दादा की शादी देखने का सौभाग्य तो बिरले बच्चों को ही मिलता है।

पिता: तू ज्यादा बातें मत बनाया कर।

बेटा: पिताजी, कुछ भी हो। उन्होंने अपने बच्चों को अपनी मां की कमी महसूस नहीं होने दी। उन्हें एक नई नवेली जवान मां लाकर दे दी।

पिता: बड़े आदमी लंबी सोचते हैं। इस उम्र में साथी की बहुत आवश्यकता होती है। उन्होंने अपने आवश्यकता और बच्चों की मां की कमी दोनों को ही पूरी कर दिया।

बेटा: उनकी नई धर्मपत्नी ने भी एक मिसाल पेश की है। अपने प्यार के लिये उन्होंने अपने पति को त्याग दिया और तलाक ले लिया। उनकी उम्र तो उनकी बेटियों के बराबर लगती है।

पिता: यह तो बेटा और भी अच्छा है। मां-बेटियां सहेली बन कर रहेंगी और आपस में प्रेमभाव भी पैदा होगा।

बेटा: पिताजी, उनकी इस कहानी पर तो मुझे बिहार के उस प्रोफेसर की याद आ गई जिसने अपनी पत्नी को छोड़ अपनी एक शिष्या से ही खुलेआम प्यार कर शादी रचा ली थी। वह अपने प्यार को एक आध्यात्मिक प्रेम की संज्ञा देता था।

पिता: हां, मुझे भी याद आ गया। उसकी पत्नी ने झाड़ू से उसकी काफी सेवा भी कर दी थी।

बेटा: पर दिग्गी राजा की ही तरह उस प्रोफेसर का भी प्यार सच्चा था। वह भी परिणयसूत्र में बंध गये थे।

पिता: उन दोनों की उम्र में भी ऐसा ही अन्तर था।

बेटा: जब प्यार हो जाये तो आदमी अंधा हो बैठता है। ठीक ही तो कहते हैं कि प्यार अंधा होता है। कुर्बानी मांगता है।

बेटा: पर पिताजी मैं उनसे एक बात पर नाराज हूं।

पिता: किस बात पर?

बेटा: पिताजी, दिग्गी राजा अपने आपको राहुल गांधी का राजनीतिक गुरू मानते व बताते है न?

पिता: हां, मैंने सुना तो है ।

बेटा: तो फिर यह बताओ कि उन्होंने अपनी तो दूसरी शादी रचा ली पर राहुल की अभी एक भी नहीं करवाई? वह कैसे गुरू हैं?

पिता: बेटा, वह राहुल के राजनीतिक गुरू तो हो सकते हैं पर उसके जीवन के गुरू कभी नहीं हो सकते।

बेटा: पिताजी, आपको पता है कि आजकल दिग्गी राजा कहां हैं?

पिता: नहीं।

बेटा: वह शादी करने के तुरन्त बाद विदेश चले गये।

पिता: हनीमून मनाने?

बेटा: नहीं, अपनी बेटी को देखने जिसका वहां कैंसर का उपचार चल रहा है।

पिता: अच्छा किया बेटा, यह तो उनका नैतिक व पारिवारिक फर्ज बनता था।

बेटा: पिताजी, उनकी बीमार बेटी का मन तो पिता की शादी का समाचार सुनकर बाग-बाग हो गया होगा और उसकी हालत पहले से बेहतर हो गई होगी।

पिता: यह तो स्वाभाविक ही है बेटा।

बेटा: एक फायदा और हो गया।

पिता: क्या?

बेटा: उनकी रियासत को अपनी रानी-महारानी मिल गई।

पिता: यह भी तूने ठीक कहा।

बेटा: इसका एक लाभ तो कांग्रेस को भी हो जाएगा। कई बार दिग्गी राजा की जुबान फिसल जाती है और पार्टी को अपने आपको उनके कथन से अलग रखना पड़ता है या स्पष्टीकरण देना पड़ता है। अब उनकी जुबान पर ताला लगाने वाली आ गई है।

पिता: यह भी तो हो सकता है कि उनकी प्रेमिका उनकी इन बहकी-बहकी बातों के ही जाल में ही फंस गई हो। पर बेटा, इतना याद रखना कि विवाहपूर्व व विवाहोपरान्त जीवन में बड़ा अन्तर होता है। पहला मीठा स्वप्नकाल होता है और बाद का कड़वा यथार्थ।

बेटा: जो भी हो पिताजी, हमें तो उनके सुखी जीवन की ही कामना करनी है। जुग-जुग जिये यह जोड़ी।

बेटा: यह तूने अकल की बात की, व्यवहार की बात की।

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