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बिहार का कप्तान कौन?

बिहार का कप्तान कौन?

‘बिहार की सत्ता के कप्तान नीतीश कुमार ‘लालटेन’ को ‘पंजे’ से पकड़कर चुनावी समंदर को पार करना चाहते हैं, लेकिन मंद रोशनी में ‘तीर’ की गति से पार उतर जाने पर लगातार संशय बना हुआ है। राजनीतिक पंडित भी अभी खामोश हैं। उनकी खामोशी की वजह दिल्ली विधान सभा चुनाव को छोड़कर बाकी सभी विधान सभा और लोकसभा चुनाव में धर्म, जाति, संप्रदाय की राजनीति से ऊपर उठकर भाजपा को मिला जनता का विश्वास है। यहां तक कि विरोधी दलों द्वारा व्यापम घोटाला और ललित मोदी प्रकरण पर हल्ला मचाने के बाद भी मध्य प्रदेश और राजस्थान के स्थानीय चुनावों में भाजपा को सफलता भी मिली है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी के अनुसार बिहार चुनाव को लेकर नीतिश कुमार भ्रम में हैं। वह राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के सहारे बहुमत का सपना देख रहे हैं। जबकि, बिहार में कांग्रेस का जनाधार सबको पता है। वहीं, लालू प्रसाद के जंगलराज के विरोध में ही भाजपा-जद (यू) की सरकार बनी थी। अब ऐसे में अपने सपने का आधार वही जानें, लेकिन इतना तो तय है कि जनता इस बार सबक सिखाएगी।

भाजपा के दावे के उलट जद(यू)के के.सी. त्यागी कहते हैं कि भाजपा दिन में सपना देख रही है। त्यागी के अनुसार इंतजार कीजिए और देखिएगा कि कैसे विधानसभा चुनाव में जनता सबक सिखाती है। खैर नतीजा चाहे जो आए, लेकिन जनता दल(यू), राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के तालमेल से बने महागठबंधन के कप्तान मुलायम सिंह यादव की पार्टी के अकेले चुनाव लडऩे का फैसला भी इनके लिये बड़ा झटका माना जा रहा है।


बिहार को लेकर दिल्ली में भ्रम है’’-राजीव प्रताप रूडी


Rajiv-PratapRudy

बिहार चुनाव में एनडीए और नीतीश महागठबंधन में कौन बाजी मारेगा? टक्कर कांटे की है। दोनों ही जीत के दावे कर रहे हैं। ऐसे में भ्रम में कौन है? इन्हीं सवालों का जवाब जानने के क्रम में उदय इंडिया संवाददाता ने बात की केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रुडी से। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश।

अभी बिहार का चुनाव कितना भ्रम में है और कौन-कौन भ्रम में है?

दिल्ली भ्रम में है, बिहार अब भ्रम में नहीं है। दिल्ली के वातावरण में बैठे नेताओं को लगता है कि लालू-नीतीश अब भी बहुत मजबूत हैं। वो वोट के आंकड़े जोड़ते हैं कि इतने फीसदी यादव और इतने प्रतिशत मुसलमान उनके साथ हैं। लेकिन, अब यह गणित खतरे में है। इसी गणित के आधार पर लालू यादव के पास नीतीश कुमार गये। इसी के आधार पर लालू यादव और रघुवंश बाबू कहते हैं कि जो भीड़ आई थी उसमे 70 फीसदी राजद का है। ऐसे में नीतीश से पूछा जाना चाहिए कि क्या बचे 30 फीसदी ही नीतीश के साथ हैं? लालू उस गणित के साथ अभी भी ताकतवर हैं लेकिन, इसमें शक है कि लालू के वोटर नीतीश का भी साथ देंगे। क्योंकि, 100-100 सीटों का बंटवारा है तो लालू अपनी पूरी ताकत लगाएंगे कि हम ज्यादा हों और नीतीश कम हों और उनकी पार्टी सरकार बनाए। ऐसे में यह गणित फेल हो चुका है। यह दोनों एक-दूसरे के खिलाफ हर बाजी खेलेंगे। राजद पहले 200 सीटों पर चुनाव लड़ती थी, ऐसे में बिहार में 100 सीटों पर राजद के बागी प्रत्याशी नीतीश का खेल बिगाड़ेंगे। जबकि जेडीयू पहले 135 सीटों पर चुनाव लड़ती थी, उसके बागी राजद का खेल बिगाड़ेंगे। जबकि बीजेपी पहले 100 सीटों पर लड़ती थी, ऐसे में हमारे पास 100 और सीटों पर बेहतर कैंडिडेट खड़े करने का मौका है। इसमें से 50 प्रत्याशी तो जीतेंगे ही। बीजेपी के पास वोटों का बेस बहुत ज्यादा है। जीतन राम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, शकुनी चौधरी, वृष्णि पटेल, कुछ मुस्लिम नेता और नरेन्द्र सिंह जैसे लोग हैं तो भ्रम में बिहार नहीं दिल्ली हो सकती है।

राजद का अपना दावा है। जदयू का दावा 23 फीसदी वोटों का है। दोनों के वोटों का समीकरण 37-38 प्रतिशत माना जाता है, आपका क्या कहना है?

जदयू का दावा तो काल्पनिक है। यादव समाज का नौजवान भी अब विचलित है। संभव है कि यादव इस बार लालू यादव को अंतिम रुप से एक मौका दे दें। यादव वोटर भी बीजेपी के साथ हैं। राजद-जदयू का अपना वोट बैंक है लेकिन, इन पर जनता कितना विश्वास करेगी, नीतीश सरकार के काम से निराश और उनका रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में होगा, यह सब देखकर ही वोटर्स फैसला करेंगे। ऐसा गठबंधन तभी कामयाब होता है जब कोई लहर चल रही हो। विधानसभा क्षेत्र के बदलने के साथ ही वोटों का समीकरण भी बदल जाता है। जहां मुसलमान-यादव हैं वहां तो वह मजबूत हैं। लेकिन, अगर वहां एक भी यादव खड़ा हो गया तो पूरा खेल बिगड़ सकता है। ऐसा इस दफे जरुर होगा, इसे कोई रोक नहीं सकता है।

कितनी सीटों की उम्मीद है आपको? क्या बीजेपी को बहुमत मिलेगा या एनडीए को?

हमें बहुमत मिलेगा। राजद-जदयू भ्रम में हैं, सूबे की जनता नहीं। बीजेपी के पक्ष में बोलूंगा तो बात तूल पकड़ लेगी। अभी हमारे बीच सीटों का बंटवारा तक नहीं हुआ है। लेकिन, एनडीए को 170-180 सीटों पर विजय हासिल होगी।

मुद्दे क्या होंगे, जिनके सहारे बीजेपी चुनाव लड़ेगी?

मुद्दा तो शिफ्ट कर चुका है। पहले कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राज किया, मुसलमान-हिन्दू के नाम पर। लेकिन, सबसे ज्यादा दंगे और हत्याएं मुसलमानों का एक वर्ग ही करता था। यादव का एक वर्ग ही हत्या करता था। इससे उबकर लोगों ने लालू को मौका दिया, लालू ने भी मंडल की राजनीति की। इससे भी लोग उब गये और विकास की मांग की। लोगों ने विकास के लिये नीतीश को वोट दिया। लेकिन, नीतीश ने स्मार्ट तरीके से आगे की राजनीति के लिए दलितों को महादलितों को बांटा, पिछड़ों को अतिपिछड़े और मुसलमानों को भी पसमांदा, अगड़े-पिछड़े में बांट दिया। अब पीएम के बिहार जाने के बाद लोगों में विकास को लेकर नये जोश का आगाज हुआ है।

विकास का क्या पैमाना और तरीका होगा, बिहार का आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक?

बिहार को पिछले पचपन वर्षों में भी एक विकासोन्नमुख नेता नहीं मिल सका है। आपको एक साधारण उदाहरण दे रहा हूं। धरती के अवतरण के बाद से लेकर आज तक, पटना से सटे तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित गंगा के दियारा क्षेत्र में बिजली तक नहीं पहुंची है। जबकि, पूरा पटना इस इलाके का सब्जी और दूध खाता है। इस इलाके में सबकी कोशिशों से पावर सब-स्टेशन लगाने का टेंडर पास हुआ। बिहार के दियारा इलाके में 50 लाख लोग रहते हैं, अब वो भी कहते हैं कि जब पटना के दियारा में सब-स्टेशन लगाने पर काम हो रहा है तो हमारे इलाके में क्यों नहीं। बात पर, जात पर, गरीबी पर, ही हमलोग खेलते रहे हैं। बिहार एक मेगावाट बिजली तक नहीं बनाता है। देश के अन्य राज्य तो इससे उबर ही चुके हैं।

बिहार के विकास के लिये बीजेपी का क्या प्लान है? सत्ता में आने के बाद बीजेपी कितने महीनों में इतना काम कर देगी कि विकासकार्य जमीन पर दिखने शुरु हो जाएंगे।

यह कहना बहुत ही मुश्किल है। हर प्रोजेक्ट का समय अलग-अलग होता है। किसी का पांच तो किसी का तीन साल और किसी का दो साल। बिहार में कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।

आप डेवलपमेंट पर पीएम ट्विटर पर लालू टम-टम पर और सुशासन पुरुष रहे नीतीश कुमार क्षेत्रीय अस्मिता पर चुनाव लड़ रहे हैं। क्या कहेंगे आप?

ट्विटर संवाद का एक माध्यम है। नीतीश कुमार ने तो नरेन्द्र मोदी की नकल की है। लेकिन, पहले ही दिन चंदन और सांप वाले संदेश पर उनका एक्सीडेंट हो गया। जवाब देते-देते परेशान हो गये। उनकी टीम में काम करने वाले यह जानते हैं कि उनका नेता तो साफ-सुथरा है, लेकिन लालू यादव तो गलत आदमी है। दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं है। टम-टम और लालटेन तो लालू के सियासत की परिभाषा है। उसके लिए यह एक राजनीतिक सिंबल है वो टम-टम पर चढऩे वाला आदमी तो है नहीं, वो तो महंगे जीवन जीने का आदी है।

आपके लिए नीतीश कभी सुशासन पुरुष थे लेकिन लालू से दोस्ती के बाद नहीं, जबकि गुजरात मामले पर रामविलास पासवान ने बीजेपी का साथ छोड़ा था, अब फिर आप उन्हीं के साथ हैं, इस पर आप क्या कहेंगे?

लालू यादव ने तो कभी विकास की बात तक नहीं की हमेशा जात की राजनीति की है। रही बात बीजेपी और रामविलास के बीच दोस्ती की तो देश की जनता ने उसे बड़ा बहुमत दिया है।


बिहार विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की भूमिका को कम आंकना ठीक नहीं है। सपा भले ही राज्य में सीट न जीत पाए लेकिन, कुछ हजार वोटों से विधानसभा में होने वाली हार जीत में वह राजद का खेल बिगाड़ सकती है। खासकर यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों के मामले में। दूसरा बड़ा फैक्टर जीतन राम मांझी हैं। मांझी पिछले चुनाव में जद(यू) में थे। जद(यू) ने भाजपा के साथ चुनाव लड़ा था। पप्पू यादव राजद में थे। लवली आनंद का भी साथ था। इस बार न केवल मांझी भाजपा के साथ खड़े हैं बल्कि, रामविलास पासवान, पप्पू यादव, लवली आनंद सब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों का गुणगान कर रहे हैं। भाजपा के पास अगड़ी, पिछड़ी, दलित, महादलित सभी जातियों का समर्थन है। इसलिए राजीव प्रताप रूडी के दावे में दम है। वह पार्टी गठबंधन को 170 से अधिक सीटें मिलने का दावा कर रहे हैं।

जद(यू) का भी अपना बीज गणित है। पिछले चुनाव में कुछ सीटों को छोड़ दें तो जहां भाजपा और जद(यू)के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी, वहां राजद के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे। ऐसे में जद(यू) नेताओं का तर्क है कि जद (यू), राजद, कांग्रेस का गठबंधन न केवल सत्ता में आएगा बल्कि, बिहार में भाजपा सिमट जाएगी। ऐसे में सारा दारोमदार आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों पर टिका है। अगर विधानसभा चुनाव में जाति आधार बनी और यह तबका महागठबंधन की तरफ खिसका तो भाजपा मुसीबत में पड़ जाएगी। लेकिन, यदि विकास मुद्दा बनकर प्रभावी हुआ तो महागठबंधन पस्त हो जाएगा। कुशवाहा, बनिया, दलित, महादलित समेत अन्य पर राजग की पकड़ मजबूत है। ऐसे आर्थिक रूप से पिछड़ा तबका भाजपा गठबंधन के साथ रह गया तो नीतीश कुमार का चुनावी मॉडल फ्लॉप होना तय है। वैसे भी लालू की छवि को लेकर लोगों में चिंताएं हैं। बिहार की जनता को भी पता है कि जद(यू) और राजद केवल चुनाव भर के सहयोगी हैं। इसके बाद सत्ता के लिए सिर फुटौव्वल होगी। इसलिए दोनों तरफ से केवल दावे किए जा रहे हैं। यह सत्य है कि बिहार का नौजवान रोजगार की तलाश में न केवल दूसरे राज्यों में बल्कि मुंबई के साथ-साथ दुबई और शंघाई का सपना भी देखता है। सिंगापुर, मॉरीशस, कतर, ओमान तक फैला है। इसलिए विकास उसके लिये अहम है। लिहाजा चुनाव का ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है।

India's RJD chief Lalu Prasad Yadav speaks in Patna

बागी बिगाड़ेंगे खेल

भाजपा अभी तक राज्य में 100 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। इस बार उसके पास पर्याप्त सीटें हैं। सहयोगियों से बंटवारे के बाद भी वह 70 से अधिक नई सीटों पर उम्मीदवार उतारने की स्थिति में हैं। वहीं पिछली बार 135 सीटों पर चुनाव लडऩे वाले जद(यू) के कोटे में 100 विधानसभा सीटें हैं। यही स्थिति राजद की भी है। ऐसे में टिकट का दंगल और बागियों की संख्या बढ़ेगी। ये बागी भी महागठबंधन का खेल बिगड़ेंगे।

मुलायम काटेंगे वोट

समाजवादी पार्टी के महागठबंधन से अलग होने के बाद वोटों में बिखराव तय है। सपा न केवल यादव बल्कि मुसलमानों और पिछड़ों के भी वोट काटेगी। वैसे भी उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार है और उत्तर प्रदेश से लगती बिहार राज्य के विधानसभा सीटों पर उसका असर पड़ सकता है।

ओवैसी फैक्टर

एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी भी दांव लगा रहे हैं। किशनगंज से लेकर करीब 25 विधानसभा सीटों का फैसला अल्पसंख्यक करते हैं। इनमें अधिकांश सीटे राजग, जद (यू) के कब्जे में आती रही हैं।

भाजपा में भितरघाती

शॉटगन नाराज हैं। सीपी ठाकुर, सुशील मोदी में 36 का आंकड़ा है। रवि शंकर प्रसाद की राजनीति बिहार में चमक रही है और राधा मोहन सिंह चुपचाप पत्ते बिछा रहे हैं। माना जा रहा है कि जैसे-जैसे चुनाव करीब आएगा गिरिराज सिंह, शाहनवाज हुसैन भी सक्रिय होंगे। अश्विनी चौबे भी जोर लगाएंगे और समीकरण कई राउंड उतार-चढ़ाव लेगा। बताते हैं कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह इसी को साधने में लगे हैं।

रंजना

лобановский александр харьков класскак краситься

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