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मन और बन्धन

मन और बन्धन

विवेकचूडामणि में यह समझाया गया है कि बुद्धि, उसकी विभिन्न वृत्तियां, ज्ञानेन्द्रियां और कर्तापन ये सभी विज्ञानमय कोश के घटक हैं (श्लोक 186)। विज्ञानमय कोश के आवरण के कारण ही मनुष्य को आत्मतत्व का बोध नहीं हो पाता है। परमाचार्य श्री शंकर विज्ञानमय कोश का निषेध करने के लिए निम्न प्रकार से विचार करने की युक्ति बताते हैं।

अतो नायं परात्मा स्याद्विज्ञानमयशब्द भाक्।

विकारित्वाज्जडत्वाच्च परिच्छिन्नत्वहेतुत:।

दृश्यत्वाद्व्यभिचारित्वान्नानित्यो नित्य इष्यते।

जिसे विज्ञानमय कोश कहते हैं, वह परम आत्मा नहीं हो सकता, क्योंकि वह विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है, जड़ है, परिच्छिन्न अर्थात् सीमित है, इन्द्रियगोचर है और अनित्य है। एक मत्र्य, विनाशशील और दृश्यरूप वस्तु कभी भी अमर, अविनाशी नहीं कही जा सकती।

विज्ञानमय कोश परिवर्तनशील है। हमारे विचार एवं सिद्धान्त या आदर्श हमेशा बदलते रहते हैं। हमारी बुद्धि भी कभी तीक्ष्ण, कभी मंद और कभी स्पष्ट अनुभव में आती है। बुद्धि स्वयं में जड़ है। आत्म-चैतन्य का संस्पर्श पाने पर ही वह चेतनवत् होती है। चिदाभास के कारण ही वह विचार, तर्क, निर्णय आदि के रूप में प्रकाशित होती है। बुद्धि की अपनी सीमाएं हैं। एक महान कलाकार कला के संबंध में पारंगत हो सकता है पर शायद भौतिक विज्ञान से अनभिज्ञ हो। हम सब अपनी-अपनी बुद्धि को जानते हैं। हम कहते हैं- ‘मैं मंदबुद्धि हूं, मैं कुशाग्र बुद्धि हूं’ आदि-आदि। इसका अभिप्राय है कि बुद्धि दृष्यरूप है, फिर वह दृष्टा अर्थात् आत्मा कैसे हो सकती है? विज्ञानमय कोश सतत् विद्यमान नहीं होता (व्यभिचारित्वात्)। सुषुप्ति में वह सुलभ नहीं होता। जाग्रतावस्था में वह सुलभ होता है और स्वप्नावस्था में वह चित्त में सग्रहित संस्कारों के अनुरूप दासवत् कार्य करता है। बुद्धि नित्य नहीं है (अनित्यत्वात्), इसलिए नित्य-शाश्वत आत्मा नहीं हो सकती है।

इस तरह विचार करते-करते असत् अर्थात् अनात्म तत्व का निषेध हो जाता है और शाश्वत परमात्मा की अनुभूति होती है। यही आध्यात्मिक साधना का मर्म है।

स्वामी चिन्मयानन्द

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