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राजनयिक छूट के दायरे

राजनयिक छूट के दायरे

सत्रहवीं सदी के यूरोप में आधुनिक कूटनीतिक मर्यादाओं के स्थापित होने के काफी पहले से भारत में यह मान्यता रही है कि राजदूतों के साथ विशेष व्यवहार किया जाए। प्राचीन काल से ही इस पर विशेष जोर दिया जाता रहा है कि राजदूतों का सम्मान किया जाए। दूसरे राज्यों से जब वह गुजरें तो उन्हें स्वतंत्रता और सुरक्षित राह मुहैया कराई जाए। भारतीय इतिहास में ऐसे राजनयिक छूट के उदाहरण भरे पड़े हैं। सन् 994 में चोल राजा के दूत के साथ दुव्र्यवहार की वजह से कंडालुर का युद्ध लड़ा गया था। मध्य एशिया मे चंगेज खान की फौज अपने राजदूतों के साथ सम्मानजनक व्यवहार पर जोर दिया करती थी और अपनी इस नीति के लिए पूरे शहर को भी बर्बाद करने से पीछे नहीं हटती थी।

राजनयिक छूट को लेकर अनेक तरह की मान्यताएं और विचार रहे हैं। उनमें एक विचार यह है कि राजदूत किसी विदेशी राजा की सशरीर मौजूदगी का प्रतीक होता है। एक दूसरी मान्यता यह रही है कि कोई दूतावास पराये देश की तरह है। इसलिए विदेशी संबंध कायम रखने के लिए राजदूतों के साथ विशेष व्यवहार और उन्हें हर तरह की छूट देना अनिवार्य माना गया। हालांकि इन सिद्धांतों के पीछे कड़वी सच्चाई यह भी है कि अगर कोई देश किसी राजनयिक को दुराचार के लिए दंडित करता है तो उसे रोकने का दूसरे देश के पास कोई उपाय नहीं है। व्यावहारिक तौर पर राजनयिकों के बंधक बनाए जाने का खतरा बना रहता है। यह पिछली सदी में ईरान, सैगोन, वियतनाम और कंबोडिया में हो चुका है।

ताजा मामला सऊदी अरब के एक राजनयिक के खिलाफ दो नेपाली महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और अप्राकृतिक यौनाचार का है। गुडग़ांव पुलिस द्वारा दर्ज मामला शायद सामान्य न कहलाए। दो गरीब नेपाली औरतों के साथ राजनयिक और उनके दोस्तों के इस दुष्कर्म से पूरा देश हिल उठा है। पुलिस के मुताबिक राजनयिक ने गुडग़ांव के एक महंगे फ्लैट में उन्हें दो महीने से सेक्स गुलाम बनाकर रखा था और अपने दोस्तों के साथ मिलकर उनके साथ बलात्कार किया करता था।

यह मामला भारत और सऊदी अरब के संबंधों के नाजुक दौर में सामने आया है। बेशक, आरोप बेहद संगीन हैं फिर भी भारत उस देश के साथ हाल में ही हुए रक्षा करार पर शायद इसकी आंच न आने दे। प्रधानमंत्री मोदी अगले कुछ महीनों में सऊदी अरब के दौरे पर जाने वाले हैं।

सऊदी अरब 2012 में आतंकी अबु जिंदाल और कुछ अन्य अपराधियों को भारत को बेझिझक सौंप चुका है। इसके अलावा, भारत और सऊदी अरब के बीच अच्छे रिश्ते हैं। यही नहीं, सऊदी अरब भारत को कच्चे पेट्रोलियम तेल का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है और चौथे नंबर का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है (उसके साथ हमारा द्विपक्षीय व्यापार 2014-15 में करीब 40 अरब डॉलर तक पहुंचा है)। फिर, वहां करीब 25 लाख अप्रवासी भारतीय भी हैं।

नेपाल निश्चित रूप से इस मामले को लेकर काफी उत्तेजित होगा और भारत के खिलाफ तीखे बोल भी बोलेगा, जिससे भारत-नेपाल रिश्ते प्रभावित होंगे। यह पहली बार नहीं है कि ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति का सामना हुआ है। भारत में तैनात राजनयिकों ने पहले भी कानून तोड़े हैं। दुर्भाग्य से, सभी राजनयिक छूट का हवाला देकर बरी हो गए हैं। गुडग़ांव का मामला भी शायद संगीन अपराध करके राजनयिकों के बरी हो जाने की लंबी फेहरिस्त में शुमार हो जाए। जनवरी 2000 में भारत में सेनेगल के राजदूत के बेटे पर अपने ड्राइवर की हत्या करने का आरोप लगा। मगर वह राजनयिक छूट की वजह से बरी हो गया। चाणक्यापुरी के राजनयिक क्षेत्र में चार रूसी राजनयिकों ने पुलिस बैरिकेड को तोड़कर चार पुलिसवालों और दूसरे लोगों को जख्मी कर दिया। मगर वे भी राजनयिक छूट का हवाला देकर बरी हो गए।

कुछ साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक कार्यक्रम में दक्षिण अफ्रीका के एक राजनयिक की पत्नी ने एक पुलिस वाले को थप्पड़ जड़ दिया। लेकिन, उसके खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। पिछले साल तीन इजरायली राजनयिकों पर दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक आव्रजन अधिकारी के साथ दुव्र्यवहार करने का आरोप लगा। उनके खिलाफ एक आपराधिक मुकदमा भी दर्ज हुआ, लेकिन राजनयिक छूट की वजह से वे भी बरी हो गए। केरल के तट पर दो इतालवियों पर मछुआरों की हत्या करने का मामला अभी घिसट रहा है।

दूसरा पहलू यह भी है कि विदेशों में तैनात भारतीय राजनयिकों पर भी उस देश के कानून तोडऩे के आरोप लगे हैं। ताजा मामला न्यूयॉर्क में देवयानी खोबरागडे का है। वहां उन पर अपनी नौकरानी के साथ दुव्र्यवहार का आरोप लगा था। भारत सरकार के समर्थन से उन्होंने राजनयिक छूट का इस्तेमाल किया। एक दूसरा ताजा उदाहरण न्यूजीलैंड का है। वहां भारतीय उच्चायुक्त को अपनी नौकरानी के साथ दुव्र्यवहार के लिए बुलाया गया। इससे जाहिर है कि अभी तक भारतीय राजनयिकों पर अपने नौकर-नौकरानियों के साथ दुव्र्यवहार के छोटे-मोटे आरोप ही लगे हैं।

सऊदी अरब को खुद ही संगीन अपराध करने वाले राजनयिक से छूट हटाने का एकतरफा ऐलान कर देना चाहिए। शरीया कानून के तहत बलात्कार को हदूद मामलों में गिना जाता है, यानी ये अल्लाह के खिलाफ अपराध की तरह होते हैं और इसकी अधिकतम सजा दी जाती है। गौरतलब यह भी है कि अप्राकृतिक यौनाचार, जिसके लिए राजनयिक पर आईपीसी की धारा 377 के तहत आरोप लगे हैं, की सजा सऊदी अरब में भारत से भी कड़ी है।

हालांकि कानून के विद्वान ड्रोर बेन-एशेर ने 2000 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ”राजनयिक छूट के नियमों का कभी-कभार उल्लंघन उनके जारी रखने की जरूरत पर ही जोर देते हैं।’’

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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