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भगवान बचाये अविनाश के परिजनों को

भगवान बचाये अविनाश के परिजनों को

ओडिशा के केंद्रापाड़ा जिले के डेराबिशी ब्लॉक के जगुलेइपाड़ा गांव में सन्नाटा दफन है। गांव के लोगों की आंखों से बहते आंसू उनके गालों से होकर नीचे लुढ़क रहे हैं, क्या बच्चे और क्या बुजुर्ग सबका एक ही हाल है। लोगों को जब से यह पता चला है कि लक्ष्मणचंद्र और उनकी पत्नी बबीता ने अपने सात साल के बेटे की बीते 7 सितंबर को डेंगू से हुई मौत के बाद खुदकुशी कर ली, गांव के लोगों का बुरा हाल है।

अपने बेटे की मौत से दुखी लक्ष्मणचंद्र और बबीता ने बीते 8 सितंबर को अपने दिल्ली स्थित आवास से कूदकर खुदकुशी कर ली थी। दोनों का अंतिम संस्कार 10 सितंबर को किया गया था।

अपने मृत बेटे लक्ष्मणचंद्र की याद में उनकी 76 वर्षीय बूढ़ी मां माली की आंखों से आंसू बह रहे हैं। वह कहती हैं कि उनके बेटों में से एक लक्ष्मणचंद्र पढ़ाई में तेज था जिसकी वजह से उसे चार साल पहले ही दिल्ली की एक निजी कंपनी में नौकरी मिली थी। लक्ष्मणचंद्र अपने पिता को हर महीने पैसे भेजते थे। लक्ष्मणचंद्र की बुजुर्ग मां माली को इस बात का भी दुख है की वह अपने मृत बेटे-बहू और पोते के शव को अंतिम संस्कार के पहले देख भी नहीं सकीं। बेबस मां बन चुकी माली कहतीं हैं कि बेटे की मौत के बाद उनका जीवन अंधकारमय हो गया है, जहां उम्मीद की कोई रोशनी नजर नहीं आती। माली की हालत अब मरनासन्न हो चुकी है। उनके दो बेटे दिहाड़ी मजदूर हैं।

लक्ष्मणचंद्र के बड़े भाई रामचंद्र ने बताया कि अपने पिता को 1 सितंबर को फोन कर पैसा भेजने का जो वादा उन्होंने किया था, उसे उन्होंने निभाया और उनकी मौत के बाद उनका भेजा हुआ पैसा 11 सितंबर को उनके पिता कार्तिक को मिला।

रोते हुए लक्ष्मणचंद्र के बड़े भाई श्रीनिबास ने बताया कि पिछले साल ही लक्ष्मणचंद्र ने अपने गांव में मकान का निर्माण कार्य शुरु कराया था, जिसे इस साल वह पूरा करने वाले थे, लेकिन मकान बनने के पहले ही डेंगू ने असमय उनके परिवार को खत्म कर दिया। लक्ष्मणचंद्र, उनकी पत्नी और बेटे की मौत के बाद उनके घर और गांव के आसपास के इलाकों का माहौल ह्दय विदारक है।

10-10-2015लक्ष्मणचंद्र के दोस्त नृसिंह राउत के मुताबिक वह एक सौम्य स्वभाव के युवक थे, जिसे उन्होंने कभी गुस्से में नहीं देखा, लेकिन डॉक्टरों के नकारेपन ने उनका बेटा उनसे छीन लिया और इस वजह से ही लक्ष्मणचंद्र और उनकी पत्नी ने मानसिक संतुलन खोते हुए मौत को गले लगा लिया। शोक में डूबे लक्ष्मणचंद्र के बड़े भाई ने कहा कि उनका परिवार उजड़ चुका है, उन्हें तो इस बात का गम है कि वह अपने गांव जगुलेइपाड़ा में अंतिम संस्कार और रीति-रिवाजों को नहीं कर सके, क्योंकि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में किया गया था।

रामचंद्र कहते हैं कि हमें अपने भाई और उनकी पत्नी की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार करने का अधिकार था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सिर्फ उनके बड़े भाई श्रीनिबास का 19 वर्षीय बेटा प्रसन्न राउत ही अंतिम संस्कार में शरीक हो सके, क्योंकि वह उस समय दिल्ली में मौजूद थे। बीते 14 सितंबर को प्रसन लक्ष्मणचंद्र और बबीता की अस्थियों के साथ गांव लौटा।

जगुलेइपाड़ा गांव में ही चाय की दुकान चलाने वाले रामचंद्र कहते हैं कि उनके 80 वर्षीय पिता कार्तिक दिल के मरीज हैं। पिछले साल उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा था। इसी वजह से हमने उनसे लक्ष्मणचंद्र की मौत की जानकारी छुपाई है और कहा है कि सिर्फ बबीता और उसके बेटे की ही दिल्ली में मौत हुई है। हम उन्हें टीवी पर खबरें भी नहीं देखने दे रहे हैं क्योंकि, इससे उनकी जान को खतरा है। उनकी मां माली भी लकवाग्रस्त हैं और मरनासन्न हालत में हैं। भाई और उसके परिवार की मौत की खबर सुनकर उनकी 34 वर्षीये अविवाहित और विक्लांग बहन रंगलता की आंखों से भी लगातार आंसू निकल रहे हैं।

रामचंद्र का आरोप है कि राज्य सरकार की लापरवाही की वजह से ही हवाई जहाज से उनके भाई और उसकी पत्नी का मृत शरीर अंतिम संस्कार के लिये जगुलेइपाड़ा गांव नहीं लाया जा सका।

बलिया के जिला परिषद सदस्य रघुनाथ मोहंती कहते हैं कि इतना होने के बाद भी प्रशासन संवेदना शून्य है और घडिय़ाली आंसू बहा रहा है। लक्ष्मणचंद्र के पीडि़त परिवार को मदद के नाम पर महज 3 लाख रुपये दिये हैं।

स्थानीय लोगों में भी राज्य सरकार की तरफ से बरती गई लापरवाहीपूर्ण रवैये को लेकर उसकी आलोचना की है। लोगों के मुताबिक लक्ष्मणचंद्र और उनकी पत्नी बबीता के मृत शरीर को हवाई जहाज से उनके गांव लाने की जिम्मेदारी केंद्रापाड़ा के सांसद वैजयंत पांडा और दिल्ली स्थित ओडीशा भवन के अधिकारियों की थी।

केंद्रापाड़ा के वकील उमेश सिंह भी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं कि दोनों के शवों को उनके गांव लाने में ओडीशा सरकार का पूरा तंत्र ही नाकामयाब रहा। केंद्रापाड़ा के स्थानीय कांग्रेस नेता जयंत मोहंती ने कहा कि यह बात तो साफ है कि राज्य सरकार ने इस संगीन मामले को बेहद हल्के तरीके से लिया है। घटना के सात दिनों बाद ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने लक्ष्मणचंद्र के पीडि़त माता-पिता को तीन लाख रुपये की आर्थिक मदद देने की घोषणा की। मोहंती कहते हैं कि यह बहुत ही दुखद घटना है और उन्हें आशा है कि दिल्ली सरकार उन सभी पांचों अस्पतालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी, जिन्होंने लक्ष्मणचंद्र के सात साल के बेटे को इलाज के लिये अस्पताल में भर्ती करने से इनकार कर दिया था।

लक्ष्मणचंद्र और उनकी पत्नी की खुदकुशी से हुई मौत के बाद विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं का जगुलेइपाड़ा गांव में आने का सिलसिला जारी है। वहीं जिलाधिकारी देबराज सेनापति का कहना है कि जिला-प्रशासन मृतक लक्ष्मणचंद्र के परिवार की हर संभव मदद करेगा।

केंद्रापाड़ा से आशीष सेनापति

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