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जानलेवा डेंगू से भगवान बचाए

जानलेवा डेंगू  से भगवान बचाए

दिल्ली में डेंगू का एक छोटा सा मच्छर जानलेवा और दहशत का पर्याय बन गया है। दिल्ली और एनसीआर सहित पूरे देश में लगातार डेंगू के मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है और कई लोग इसकी चपेट में आकर अपनी जान भी गंवा चुके हैं। अहमदाबाद में भी डेंगू से एक शख्स की मौत का मामला सामने आया। हाल ही में दिल्ली के पांच अस्पतालों में से दो मुख्य अस्पतालों साकेत स्थित मैक्स और मूलचंद ने डेंगू से पीडि़त सात साल के एक मासूम बच्चे अविनाश राउत को अपने यहां बेड की कमी बताकर भर्ती करने से ही इनकार कर दिया, आखिर में बत्रा अस्पताल में भर्ती कराने के चंद घंटे बाद ही मासूम अविनाश की मौत हो गई। दिल्ली के लाडो सराय में किराये के मकान में रहने वाले उड़ीसा के इस हंसते-खेलते परिवार को एक झटके में डेंगू और दिल्ली के अस्पतालों ने ही लील लिया, बेटे की मौत का सदमा उसके माता-पिता लक्ष्मीचंद और बबिता बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने भी 8-9 सितंबर की रात, एक-दूसरे की हाथ में दुपट्टा बांधकर मकान की चौथी मंजिल से नीचे छलांग लगाकर मौत को गले लगा लिया। देश की राजधानी दिल्ली में इलाज के बिना पहली कक्षा में पढऩे वाले मासूम अविनाश राउत की मौत के बाद उसके माता-पिता की खुदकुशी ने एक साथ कई सवाल खड़े करते हुए हमारी खोखली स्वास्थ्य व्यवस्था और आम आदमी के हितों के दम पर खड़ी हुई आम आदमी पार्टी और सबका साथ सबका विकास करने वाली दोनों सरकारों के बड़े लेकिन खोखले दावों की पोल जनता के सामने खोलकर रख दी, लेकिन फिर भी केंद्र और दिल्ली की सरकारें खोखले इंतजामों को ठोस बताती फिर रही हैं। मीडिया में मामला उछलने के बाद दिल्ली और केंद्र की सरकारों की नींद थोड़ी टूटी, दिल्ली सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए, प्राइवेट अस्पतालों पर नकेल कसने के लिये बिल लाने की बात कही, जबकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने अस्पतालों से डेंगू मरीजों का इलाज करने को कहा और जांच के आदेश दिये। फिलहाल सरकारों की जवाबदेही का यह मानवीय मामला सुनवाई के लिए दिल्ली हाईकोर्ट की चौखट के पार पहुंच चुका है, लेकिन इससे अमानवीय पहलू और क्या हो सकता है कि डेंगू मरीजों की जान के लाले पड़े हुए हैं और आम जनता के वोटों की बदौलत आलीशान जिन्दगी जीने वाले नेता और मंत्री कुछ करने की बजाय डेंगू पीडि़त कई मरीजों की मौत के बाद भी बयान बहादुर बनने में लगे हैं। इसके बाद दिल्ली के ही श्रीनिवासपुरी इलाके के अमन नामक 6 साल के बच्चे की भी इलाज के अभाव में डेंगू से मौत हो गई। परिजनों ने दिल्ली के नामी सफदरजंग और अन्य अस्पतालों पर अमन को भर्ती न करने का आरोप लगाया था। मासूम अविनाश राउत और उसके माता-पिता की दर्दनाक मौत के विरोध में प्रवासी उडिय़ा विकास समिति ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर सैकड़ों की संख्या में एकत्र होकर कैंडल मार्च निकाला और इंसाफ की मांग की। इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में पत्रकारों और समाजसेवियों समेत अन्य लोगों ने हिस्सा लिया। प्रवासी उडिय़ा विकास समिति ने पीडि़त परिवार को 1 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी है। मासूम अविनाश राउत और अमन के लिये आम जनता के इंसाफ की लड़ाई के साथ ही सरकारी जांच भी जारी है।

कहने को तो दिल्ली में करीब 34 सरकारी और करीब 1000 प्राइवेट नर्सिंग होम और अस्पताल हैं। सरकारी अस्पतालों में ज्यादातर केंद्र सरकार और एमसीडी के अधीन तो कुछ बड़े अस्पताल दिल्ली सरकार के अधीन हैं, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश में डेंगू से हाहाकार मचा हुआ है। ऐसे में डॉक्टरों का यह कहना कि डेंगू वायरस का कहर अगले महीने यानी की अक्टूबर में 15 तारीख तक ऐसे ही कायम रहने की उम्मीद है, यह सोचकर ही लोगों के दिलों-दिमाग में भय व्याप्त हो गया है कि ना जानें कब वह भी डेंगू के मच्छर के डंक का शिकार हो जायें।

10-10-2015

10-10-2015देश की राजधानी दिल्ली में डेंगू के कहर से हजारों लोगों के पीडि़त होने और सरकारी अस्पतालों की दयनीय हालत और प्राइवेट अस्पतालों और जांच लैब की मनमानी का मामला मीडिया में उछलने के बाद केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार कुछ करने के नाम पर कुछ करते हुए दिखना चाहती हैं। इसी के तहत केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के निर्देश पर हाल ही में दिल्ली के और दो अस्पतालों में बेड बढ़ाया गया। कुछ करते दिखने के नाम पर केजरीवाल सरकार ने डेंगू जांच के लिए किये जाने वाले एलाइजा टेस्ट की राशि 600 रुपये निर्धारित कर दी और अस्पतालों को बेड बढ़ाने को कहा। निजी अस्पतालों के कुछ डॉक्टर दिल्ली और केंद्र की सरकारों से भी सवाल करते हुए कहते हैं कि दिल्ली के अस्पतालों में बेड का अकाल है, लेकिन दिल्ली के दो बड़े सरकारी अस्पतालों ताहिरपुर का राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पीटल और जनकपुरी का सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पीटल पांच साल से बंद था, क्योंकि सरकार के पास मानव संसाधन की कमी है। ऐसे में जब जनता एक मामूली बेड और अमूल्य जान की हिफाजत के लिये अस्पतालों के धक्के खा रही है वैसे में केजरीवाल सरकार ने इन दोनों अस्पतालों को डेंगू मरीजों को बचाने के लिये पहले क्यों नहीं खोला? आखिर, संसाधनों का दूसरा नाम ही तो सरकार है। जबकि इन दोनों अस्पतालों में 500-500 बेड की जगह है। अब दिल्ली में बेहद बड़े पैमाने पर जानलेवा डेंगू के फैलने के बाद दिल्ली सरकार ने दोनों ही अस्पतालों को 100-100 बेड के साथ शुरु किया है। डॉक्टरों का यह भी आरोप है कि अब दिल्ली के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एम्स को ही देखिये, अब उसके दरवाजे खुल गये जो कहता है कि बेड होगा तो एडमिट करेंगे।

सच तो यह है कि, दिल्ली के अस्पतालों में पर्याप्त को छोडि़ए मरीजों के लिए जरुरी संख्या में बेड और डॉक्टर ही पर्याप्त संख्या में मौजूद नहीं हैं, जबकि जानलेवा डेंगू से लडऩे के नाम पर केंद्र और राज्य सरकारें पर्याप्त इंतजामों के दावे करती नहीं थक रही हैं। डेंगू की वजह से दिल्ली सहित पूरे देश में अब तक दर्जनों मरीजों की मौत हो चुकी हैं और इसके मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। राजधानी दिल्ली में इस बार पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा डेंगू के मामले सामने आ रहे हैं। इस बार डेंगू के ज्यादातर जो लक्षण सामने आ रहे हैं, उनमें मरीजों में प्लेटलेट्स की कमी देखी जा रही है। डॉक्टर के मुताबिक शरीर में प्रति माइक्रो लीटर ख़ून में 150000-450000 प्लेटलेट्स होते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में 17 सितंबर तक डेंगू के करीब 1800 मामले सामने आ चुके थे। इससे पहले साल 2009 में डेंगू के 1512 मामले दर्ज किए गए थे। वहीं निजी डॉक्टरों का आरोप है कि दिल्ली सरकार आंकड़ों को छुपा रही है और दिल्ली में डेंगू मरीजों की संख्या बीस हजार से भी पार हो सकती है।


सरकार करे डेंगू की जांच और प्लेटलेट की उपलब्धता सुनिश्चित –डॉ.एस.एस. अग्रवाल


10-10-2015

डेंगू वायरस के डंक ने कई परिवारों की खुशियां को मौत की आग में स्वाहा कर दिया है। किसी का इकलौता चिराग बुझ गया तो कोई अभागा अभिभावक अपनी जिंदगी भर की कमाई लुटाने के बाद ही अपनी संतान को मौत के मुंह में से नहीं बचा सका। कैसे पैदा होते हैं डेंगू के मच्छर? कैसे हम बच सकते हैं जानलेवा डेंगू के डंक से। इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिये उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता कुमार मयंक ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष (निर्वाचित) डॉ. एस. एस. अग्रवाल से विस्तार से बातचीत की। डॉ. अग्रवाल ने डेंगू महामारी से बचाव से लिए सरकार से प्रभावित इलाकों में डेंगू की जांच और प्लेटलेट की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश-

मादा एडिस इजिप्टी मच्छर के काटने का समय क्या है?

सूरज उगने के बाद सुबह के लगभग 11 बजे तक और शाम में सूरज ढलने के पहले डेंगू के मच्छर काटते हैं। सुबह के 10-11 बजे से लेकर दोपहर 2-3 बजे तक करीब-करीब यह मच्छर नहीं काटता है।

डेंगू के लक्षण किस तरह के होते हैं, इससे बचाव के क्या उपाय हैं?

डेंगू बीमारी मादा एडिस इजिप्टी मच्छर के काटने से होता है, जो डेंगू वायरस के द्वारा फैलता है। इसके लक्षण हैं, शरीर पर चिकत्ते, सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द एवम कभी उल्टी आना।

इसका क्या उपचार है?

बचाव ही इसका इलाज है। कहीं भी खुले में पानी का भराव-जमाव नहीं होना चाहिए। फ्रिज के पीछे लगे डिब्बे में, फूलदान, पक्षियों के पीने के पानी के बर्तन,कबाड़ और टायर में पानी इकट्ठा न रहे यहां पर नमी रहती है, इसका खास ध्यान रखना चाहिए, इन्हें हर हफ्ते रगड़ कर साफ करने के बाद सुखाना चाहिए। क्योंकि, इसी में डेंगू के मच्छर पनपते हैं। मच्छरों के काटने से खुद को बचाने के लिए दिन के समय में भी मॉस्क्यूटो क्वॉयल, मॉस्क्यूटो रिप्लेमेंट और इलेक्ट्रिक वेपन का इस्तेमाल और इनसेक्टिसाइड का छिड़काव भी करना चाहिए। बच्चों को खासकर जो दिन के वक्त और दोपहर के बाद ही सोते हैं, उन्हें दिन के वक्त भी मच्छरदानी के अंदर सुलाना चाहिए। डेंगू के मरीजों का खास ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें दुबारा मच्छर नहीं काट सके। अन्यथा डेंगू के मरीज को काटे हुए मच्छर से बीमारी फैलने की ज्यादा संभावना रहती है। हमे पानी की टंकी और पानी भरे बर्तन और बाल्टी को ठीक से बंद कर के रखना चाहिए। मच्छरों के लार्वा के खात्मे के लिए विशेष प्रकार की मछलियों को भी पानी में छोड़ सकते हैं।

क्या डेंगू पीडि़त को साधारण मच्छर काट ले और फिर वह मच्छर किसी स्वस्थ्य इंसान को काट लें तो क्या उसे डेंगू होगा?

नहीं, ऐसा कतई नहीं है। यह बीमारी साधारण मच्छर के काटने से नहीं होती है। डेंगू बीमारी मादा एडिस इजिप्टी मच्छर के काटने से ही होती है। डेंगू के लिए जिम्मेदार मादा एडिस इजिप्टी मच्छर की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है, इन मच्छरों को आराम से पहचाना जा सकता है, डेंगू वाले मच्छर छोटे काले होते हैं, जबकि इनकी टांगे बड़ी होती हैं।

डेंगू को हड्डी तोड़ बुखार क्यों कहते हैं?

डेंगू की बीमारी में तेज बुखार होता है, जोड़ों में भयंकर दर्द होने की वजह से इसे बोन ब्रेक फीवर भी कहते हैं।

बच्चों को डेंगू होने पर वयस्कों की तुलना में क्या-क्या खास सावधानियां बरतनी चाहिये? क्या उनके खून की तुरंत जांच करानी चाहिये?

बच्चों और बीमार लोगों में रोगों से लडऩे और सहने की प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों से कम होती है, इसलिए उनमें बीमारी जल्दी एवं गंभीर होने की ज्यादा संभावनाएं होती हैं। इसलिए बच्चों को इसकी आशंका होने पर फौरन डॉक्टर को दिखाना चाहिए। डेंगू के लक्षण का टाइम पीरियड तीन से चौदह दिन का होता है। करीब तीसरे दिन से बुखार वगैरह के लक्षण दिखने लगते हैं, एवम लक्षण पूरी तरह दिखने का समय पांचवें से लेकर आठवें दिन तक रह सकते हैं।

क्या इन लक्षणों के दिखने पर तुरंत डेंगू की जांच के लिए ब्लड टेस्ट करवाना चाहिए?

नहीं ऐसा नहीं है। इन लक्षणों के दिखने पर आराम करना चाहिए, मच्छरों से खुद के बचाव और सावधानियां बरतते हुए तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए एवं इलाज शुरु कर देना चाहिए। टेस्ट में डेंगू पॉजीटिव तभी आएगा जब वायरस खून के अंदर एक मात्रा से ज्यादा होगा।

आपके हॉस्पीटल में डेंगू से बचाव की क्या-क्या सुविधाएं हैं?

किसी भी अस्पताल में डेंगू के इलाज के लिये कोई खास इंतजाम नहीं करना पड़ता है। अगर, बीमारी के कारण कोई कॉम्पलीकेशन हो गये हैं तो हमें विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं, जो एक गंभीर रोगी के इलाज के लिये होते हैं। जैसे- आईसीयू यानी कि इंसेन्टिव केयर यूनिट। डेंगू से बचाव के जो भी उपाय बताये गये हैं उसका प्रबंध सभी अस्पतालों में होना चाहिए, जिन अस्पतालों में यह सुविधा नहीं है उन्हें भी इसका इंतजाम करना चाहिए। इसे महामारी के रुप में ले रहे हैं, इसलिए हर एक अस्पताल प्रबंधन को इसके रोगियों का प्राथमिकता के आधार पर इलाज की सुविधाएं रखनी चाहिए।

डेंगू, चिकनगुनिया और जापानी इंसेफ्लाइटिस जैसी जानलेवा बीमारी की रोकथाम को लेकर आईएमए की केंद्र सरकार से क्या डिमांड है?

मोदी जी ने जो स्वच्छ भारत का अभियान शुरु किया है, उसको पूर्ण रुप से अमल में लाएं। चाहे वह स्वयं के स्तर पर हो अथवा सरकार के स्तर पर किया जाए। जनता, नगर निगम और स्थानीय प्रशासन मिलकर सार्वजनिक स्थानों पर पड़े कचरे और बहते पानी का सही निपटान करें। समय-समय पर जरुरी कीटनाशकों का छिड़काव करना सुनिश्चित करें। सरकार डेंगू वायरस की जांच एवं प्लेटलेट्स की उपलब्धता प्रभावित क्षेत्रों में सुनिश्चित करें।


डेंगू एक खतरनाक बुखार

10-10-2015डेंगू में शरीर का काम आंशिक रूप से बंद हो जाता है, जिसके कारण प्लेटलेट का बनने की गति धीमी हो जाती है। डेंगू हेमोरेजिक बुखार में उपरोक्त लक्षणों के अलावा प्लेटलेट्स की कमी से शरीर में कहीं से भी खून बहना शुरू हो सकता है, जैसे नाक से, दांतों व मसूड़ों से, खून की उल्टी और मल में खून आना आदि। इसके साथ मरीज के हाथ-पैर ठंडे हो सकते हैं एवम मरीज आखिर में शॉक में चला जाता है या इलाज के अभाव में उसकी मौत हो सकती है। ऐसे में डॉक्टर मरीज़ के शरीर में पानी की सप्लाई बनाए रखते हैं और ब्लड प्रेशर देखते हैं। बारिश के मौसम में डेंगू सबसे ज्यादा फैलता है। डेंगू एडीज मच्छर द्वारा फैलाया जाने वाला रोग है, जिसके लक्षण फ्लू से मिलते-जुलते हैं। कई मामलों में डेंगू जानलेवा भी साबित होता है।

लक्षण और डेंगू के नये सरोटाइप

साधारणत: डेंगू की शुरुआत 1 से 5 दिनों तक तेज बुखार और ठंड के साथ होती है। अन्य लक्षण जैसे सिरदर्द, कमर एवम जोड़ों में दर्द, थकावट और कमजोरी, हल्की खांसी एवम गले में खराश, उल्टी और शरीर पर लाल-लाल दाने या चिकत्ते भी दिखाई देते हैं। शरीर पर दाने इस बुखार में दो बार भी दिखाई दे सकते हैं। पहली बार शुरू के दो-तीन दिनों में और दूसरी बार छठे या सातवें दिन। इस बुखार का मरीज करीब 15 दिनों में पूरी तरह ठीक होता है। यह बुखार बच्चों व बड़ी आयु के लोगों में ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि उनमें प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। डेंगू के कहर के बीच उसके लक्षण और बचाव के उपाय जानना बेहद जरूरी है। आइये आपको बताते हैं कि डेंगू जैसी घातक बीमारी की कैसे समय रहते पहचान कर उससे बचा जा सकता है।

10-10-2015

डॉक्टरों के मुताबिक डेंगू 4 तरह के होते हैं, उन्होंने यह भी बताया है कि यह कहां पर कितना खतरनाक हो सकता है। दिल्ली में डेंगू डेन1 और डेन 3 ही होता है। इस साल दिल्ली में डेंगू डेन 4(सरोटाइप) वायरस के भी केसेज बड़ी संख्या में आ रहे हैं, इसकी उम्मीद डॉक्टरों को भी नहीं थी। तुलनात्मक रुप से डेंगू डेन 4(सरोटाइप) का वायरस थोडा खतरनाक होता है, लेकिन डेंगू डेन 2(सरोटाइप) सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। डेंगू डेन 1 और 3 (सरोटाइप)डेंगू डेन 2 और 4 (सरोटाइप)की तुलना में कम खतरनाक है।

जब मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो इसकी लार मानव की त्वचा में प्रवेश कर जाती है। वायरस इंसान की श्वेत रक्त कणिकाओं से जुड़कर उनमें प्रवेश कर जाता है। दरअसल श्वेत रक्त कणिकाओं का काम संक्रमण जैसे खतरों से निपटने के लिये सहायता करने का होता है और जब श्वेत रक्त कणिकाएं शरीर में इधर-उधर जाती हैं तो वायरस पुर्नउत्पादन करता है। डॉक्टर के मुताबिक श्वेत रक्त कणिकाएं कई तरह के संकेतों प्रोटीन (माइटोकाइन) के माध्यम से प्रतिक्रिया करती हैं, जैसे- इंटरल्यूकिन्स, इंटरफेरॉन तथा ट्यूमर परिगलन कारक। इन प्रोटीन के कारण डेंगू के साथ बुखार, फ्लू जैसे लक्षण तथा गंभीर दर्द पैदा होते हैं। अगर किसी व्यक्ति को गंभीर संक्रमण हैं तो वायरस उसके शरीर में और अधिक तेजी से बढ़ता है। व्यक्ति का रक्तचाप इतना कम हो जाता है कि हृदय महत्वपूर्ण अंगों को पर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति करने में करीब-करीब अक्षम हो जाता है।

इसके साथ ही, अस्थिमज्जा जरुरी प्लेटलेट्स का निर्माण नहीं कर पाती है, जो रक्त का थक्का बनाने के लिये बेहद जरुरी है। पूरे प्लेटलेट्स के बगैर व्यक्ति को ब्लीडिंग होने की समस्या होने की काफी संभावना रहती है। डेंगू शॉक सड्रोम में शरीर के भीतर पैदा होने वाली मुख्य जटिलता की वजह से होने वाली ब्लीडिंग इस बीमारी में होने वाली सबसे गंभीर समस्याओं में से एक मानी जाती है। डेंगू एक वायरस से होता है इसलिए इसकी कोई सटीक दवा नहीं है, इसका इलाज इसके लक्षणों का इलाज करके ही किया जाता है। तेज बुखार बीमारी के पहले से दूसरे हफ्ते तक रहता है।


डेंगू पीडि़तों पर दिल्ली सरकार का आंकड़ा है सफेद झूठ- डॉ. नोमिता गुप्ता


10-10-2015

डेंगू वायरस बच्चों के लिये किस कदर जानलेवा साबित हो सकता है और क्या है, इससे बचाव के उपाय? इस बारे में उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता कुमार मयंक ने विस्तार से बात की बत्रा अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नोमिता गुप्ता से। उन्होंने भी बेबाकी से सवालों के जवाब दिये। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

बच्चों को डेंगू होने पर वयस्कों की तुलना में क्या-क्या खास सावधानियां बरतनी चाहिये? क्या उनके खून की जांच तुरंत करानी चाहिये?

अगर किसी भी बच्चे को बुखार अगर दो या तीन दिन से ज्यादा रहता है, तो सावधानी बरतें लेकिन पहले और दूसरे दिन टेस्ट न कराएं, क्योंकि इसमें नॉर्मल रिपोर्ट आने की संभावना रहती है पॉजीटिव नहीं। डेंगू टेस्ट या प्लेटलेट्स काउंट्स की जो मुख्य रिपोर्ट आती है वह तीसरे, चौथे या पांचवें दिन से आती है। इसलिए घबराकर बुखार होने पर शुरु के दो दिनों में जांच कराने से फायदा नहीं है। लेकिन, इस दौरान बच्चे को साफ पानी, नींबू पानी और जीवन रक्षक घोल समय-समय पर पिलाते रहिये। लेकिन, इस दौरान अगर बच्चे को पहले से ही कोई खास दिक्कत जैसे बुखार के दौरान दौरे वगैरह पड़ते हैं तो फौरन आपको डॉक्टर को दिखाना और बताना चाहिए। बुखार की वजह जो भी हो दौरा नहीं पडऩा चाहिए। इसका तत्काल इलाज जरुरी है।

डेंगू होने या होने की आशंका दिखने के दौरान बच्चों को कौन सी दवा देनी चाहिए?

इस दौरान बच्चों और वयस्कों सभी को सिर्फ और सिर्फ पैरासिटामॉल ही देना चाहिए। आइब्रूफेन और एस्प्रिन जैसी दवाइयां बिलकुल ही नहीं देनी चाहिए।

किन आयु वर्ग के बच्चों में डेंगू जानलेवा साबित हो सकता है?

हर एक कंडीशन में यह खतरा इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे को किस स्टेज की समस्या है और वह कितनी गंभीर है। लेकिन, जितना छोटा बच्चा होगा उसे उतनी ही ज्यादा समस्या होगी। वैसे उन छोटे बच्चों को जिनकी उम्र एक साल या दो साल से कम है उनको परेशानी उतनी ही ज्यादा जटिल और गंभीर होगी।

बुखार होने और जांच में डेंगू वायरस के साबित होने के पहले पीडि़तों को कौन-कौन सी दवा खासतौर पर नहीं लेनी चाहिए, जिनसे उनकी जान को खतरा पैदा हो सकता है?

जब डेंगू का कहर इतने बड़े पैमाने पर जारी है तो ऐसी हालत में हम सभी को खास सावधानी बरतनी चाहिए। बुखार होने की दशा में सिर्फ पैरासिटामॉल ही देना चाहिए। आइब्रूफेन और एस्प्रिन जैसी दवाइयां बिलकुल ही नहीं देनी चाहिए, क्योंकि इससे पेट में अल्सर या पेप्टिक असर हो सकता है जिससे मरीज के पेट में इंटरनल ब्लीडिंग हो सकती है। क्योंकि, डेंगू में भी ब्लीडिंग हो सकती है, ऐसे में मरीज और डॉक्टर को यह पता नहीं चलेगा कि ब्लीडिंग डेंगू की वजह से हो रही है या आइब्रूफेन और एस्प्रिन दवा के सेवन की वजह से हो रही है। इसलिए केवल पैरासिटामॉल ही मरीजों को देना चाहिए। लेकिन, इस दौरान मरीज अपने रुटीन बीपी या दौरे के इलाज की दवाईयां नियमित रुप से ले सकते हैं।

जिन्हें पहले डेंगू हो चुका है, उन्हें दुबारा डेंगू होना कितना ज्यादा खतरनाक है? ऐसे मरीजों को इलाज में क्या-क्या खास सावधानियां बरतनी चाहिए?

डेंगू के 4स्ट्रेन होते हैं। 1, 2, 3, और 4। अगर किसी को 1स्ट्रेन वायरस का डेंगू हो चुका है और उन्हें दुबारा 1स्ट्रेन वायरस का डेंगू होने पर कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन दूसरे स्ट्रेन 2, 3, और 4वायरस का डेंगू होने पर मरीज की हालत ज्यादा बिगड़ सकती है, इसे सेंकेंड्री डेंगू बोलते हैं। इसमें शरीर की प्रतिक्रिया ज्यादा होती है। इसलिए मरीज को ज्यादा खतरा होता है। लेकिन, साधारण तौर पर ऐसा कहा जाता कि सेम स्ट्रेन का डेंगू दुबारा नहीं होता है, क्योंकि मरीज का शरीर जीवन भर उसके प्रतिरोध की क्षमता विकसित कर लेता है।

आपके हॉस्पीटल में डेंगू से बचाव की क्या-क्या सुविधाएं हैं?

हम जांच कर तुरंत डेंगू की जांच के लिए एलाइजा टेस्ट करते हैं, क्योंकि इसकी रिपोर्ट ही सही होती है। जितने मरीज आते हैं उन्हें शरीर को पूरे कपड़ों से ढ़कने को कहते हैं। घर में छिड़काव कराने और मच्छरदानी लगाकर ही सोने की सलाह देते हैं। डेंगू से बचाव सबसे ज्यादा जरुरी है।

दिल्ली सरकार का आंकड़ा है कि राजधानी में डेंगू मरीजों की संख्या 2000 की है। इस पर आपका क्या कहना है।

दिल्ली में सरकार ने डेंगू मरीजों के बारे में जो आंकड़ा दिया है और डेंगू मरीजों की संख्या 2000 बताई है वो पूरी तरह गलत और गड़बड़ है। सच तो यह है कि सिर्फ बत्रा अस्पताल में ही आने वाले डेंगू केसों की संख्या ही 2000 से ज्यादा होगी। दिल्ली सरकार को डेंगू पीडि़तों की सही संख्या का पता ही नहीं है और इनकी गणना ही पूरी तरह झूठी है। डेंगू का केस आज थोड़े न सामने आया है, इसका कहर तो पिछले एक महीने से जारी है। हम तो पिछले एक महीने से इसका टेस्ट करवा रहे हैं। तब सरकार क्यों नहीं जगी थी, कहां सोयी थी? दिल्ली में तो डेंगू पीडि़तों की संख्या 20000 से भी ज्यादा होगी।


डेंगू से बचाव और उपचार

10-10-2015डेंगू से बचाव का टीका अभी नहीं बना है। ऐसे में बुखार लगने या डेंगू के लक्षण दिखने पर पर तुरंत ही डॉक्टर से दिखाएं। सबसे ज्यादा मच्छरों से बचें। डेंगू होने पर खून में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से कम होने लगती हैं, ऐसे में दवाओं के साथ ही खानपान भी बेहद आराम से पचने लायक और बेहद संतुलित होना चाहिए। ऐसी जगहों पर भी जानें से बचना चाहिए, जहां बहुत ज्यादा गंदगी और मच्छर हों। जहां बीमारी अधिक मात्रा में हो, वहां फेस मॉस्क लगाकर जाएं। डेंगू वायरस से जल्द निजात पाने के लिए इसके लक्षणों को पहचान कर सही समय पर डॉक्टर की सलाह लें। डेंगू के उपचार में अगर अधिक देरी हो जाए तो यह डेंगू हेमोरेजिक फीवर का रूप ले लेता है। तेज बुखार और दर्द निवारक दवाई, जैसे- पेरासिटामॉल हर छह घंटे में डॉक्टरों के निर्देश के मुताबिक ही लें। अन्य दर्द निवारक दवाई जैसे एस्प्रिन या एंटीबायटिक कभी नहीं लेना चाहिए, यह जानलेवा हो सकता है। इससे शरीर में कहीं से भी खून का रिसाव शुरू हो सकता है। जिसके समय से पता न चलने पर मरीज की मौत भी हो जाती है। इसलिए योग्य डॉक्टर के निर्देशन में ही डेंगू का उपचार कराना चाहिए। मरीज को पूरी तरह आराम करना चाहिए। डेंगू के मरीजों को दिन हो या रात सभी समय मच्छरदानी में ही सुलाना चाहिए। अनार का जूस, मौसमी का जूस, नारियल पानी, अंगूर का जूस और नींबू पानी मरीज को पिलाना चाहिए। हर चार घंटे में मरीज का पेशाब बाहर आना चाहिए। विटामिन सी से भरपूर फलों जैसे नारंगी, अंगूर, मौसमी, स्ट्रोबरी, नींबू और जामुन का सेवन करें। ताजा फल और बिना मसाले और कम से कम नमक से बना ताजा खाना ही मरीज को खिलाना अनिवार्य है। घर में मच्छर भगाने वाले मशीनों और क्वायल का प्रयोग करें। पूरी बांह के कपड़े पहनें और समय-समय पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव कराएं।

डेंगू वायरस से बचें

डेंगू बुखार सिर्फ मच्छरों से फैलता है। मरीज दूसरे स्वस्थ आदमी को यह बीमारी नहीं देता है। यह मच्छर साफ, इकट्ठे पानी में पनपते हैं, जैसे घर के बाहर पानी की टंकियां या जानवरों के पीने की हौद, कूलर में इकट्ठा पानी, पानी के ड्रम, पुराने ट्यूब या टायरों में इकट्ठा पानी, गमलों में इकट्ठा पानी, फूटे मटके में इकट्ठा पानी आदि। इसके विपरीत मलेरिया का मच्छर गंदे पानी में पनपता है। इन्हीं मच्छरों से चिकनगुनिया भी फैलता है, जो हम पिछले के वर्षों में देख चुके हैं। पूरे विश्व में हर साल लाखों मरीज डेंगू बुखार से प्रभावित होते हैं। इस बुखार को हड्डी तोड़ बुखार का नाम भी दिया गया है। अगर इसका सही उपचार नहीं हुआ तो यह बुखार डेंगू हेमोरेजिक फीवर और डेंगू शॉक सिंड्रोम में बदल जाता है, जिससे मरीज की जान भी जा सकती है। यह एक वायरल बुखार है, जो 4 प्रकार के डेंगू वायरस (डी-1, डी-2, डी-3, डी-4) से होता है।

जानलेवा डेंगू से बचाव संभव है। इसके लिए यह अनिवार्य है कि जनता, नगर निगम और स्थानीय शासन के स्तर पर सब मिलकर सार्वजनिक स्थानों पर पड़े कचरे और बहते पानी का सही निपटान करें। समय-समय पर जरुरी कीटनाशकों का छिड़काव समय-समय पर जरुर करें। साथ ही सरकार भी बयानबाजी करने की बजाय आम जनता के जान की हिफाजत के लिये डेंगू की जांच एवम प्लेटलेट्स की उपलब्धता प्रभावित क्षेत्रों में सुनिश्चित करें। जिससे कि समय रहते लोगों और मासूम बच्चों को डेंगू के जानलेवा डंक से बचाया जा सके।


डेंगू से इलाज का टीका अगले साल –डॉ. के.के. अग्रवाल


10-10-2015

डेंगू के डंक से कई लोगों की असमय मौत हो चुकी है। हजारों लोगों बच्चे, जवानों और बुजुर्गों को डेंगू अपना निशाना बना चुका है। लेकिन सही समय पर डेंगू के लक्षण पहचान लेने पर इससे बचा जा सकता है। बस अपनी तबियत में हो रहे बदलावों को समय रहते पहचान लीजिए और तुरंत अपने पास वाली दवा की दुकान से लेकर कोई दवा बिल्कुल मत खाइये, न ही किसी नीम-हकीम से इलाज कराइये, बल्कि किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाइये। अगर आप ऐसा करेंगे तो डेंगू से बचना पूरी तरह संभव है। डेंगू के इलाज और भ्रांतियों से जुड़े सवालों को लेकर उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता कुमार मयंक ने बात की हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के संस्थापक और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव डॉक्टर के.के. अग्रवाल से। डॉक्टर के.के. अग्रवाल ने भी सभी सवालों का दिया सीधा जवाब। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश:

कई डॉक्टरों का कहना है कि डेंगू का इलाज संभव नहीं है, क्योंकि यह वायरस जनित रोग है। इस पर आपका क्या कहना है, और इससे बचाव के क्या उपाय हैं?

यह बात पूरी तरह गलत है। डेंगू का इलाज सौ प्रतिशत संभव है। जो लोग भी यह कह रहे हैं वह इस विषय पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अगर इलाज संभव नहीं है तो मरीज को आईसीयू में क्यों रखते हैं, ऑक्सीजन क्यों देते हैं। एक बात जो हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए वह यह है कि डेंगू में एंटिबायोटिक की कोई जरुरत नहीं है। एंटिबायोटिक ही हर बीमारी का इलाज नहीं है।

बच्चों को डेंगू होना वयस्कों की तुलना में कितना ज्यादा खतरनाक है? ऐसे में क्या-क्या खास सावधानियां बरतनी चाहिए?

सावधानियां यही बरतनी हैं कि जिसे डेंगू हो जाये तो मच्छरदानी में सोयें, जिससे आपको मच्छर दुबारा न काटें। हर एक घंटे में आधा गिलास नींबू-पानी पीना है, चार घंटे में पेशाब होना चाहिए। इतनी चीजें मुख्य रुप से जरुरी है। परेशान न हों, घबराएं नहीं। हां, सुस्ती और कमजोरी महसूस होने पर अपने डॉक्टर को तुरंत जरुर दिखाएं।

आपके अस्पताल में डेंगू के कितने मरीज भर्ती हैं और कितने मरीज ठीक होकर जा चुके हैं?

मुझे अपने अस्पताल के डेंगू मरीजों के आंकड़ों की जानकारी नहीं है। मैं रोज 10 से 15 डेंगू मरीजों को देखता हूं और सभी ठीक होकर जा रहे हैं।

क्या दिल्ली या केंद्र सरकार ने गरीब मरीजों के इलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों को कोई निर्देश देने के साथ ही मदद देने का कोई वायदा किया है?

मदद देने का तो कोई वायदा नहीं किया है। लेकिन, यह निर्देश दिया है कि अस्पताल डेंगू मरीजों के इलाज से इनकार नहीं कर सकते।

आपके मानवीय पहलू से हर कोई वाकिफ है, लेकिन मास्टर अविनाश राउत मामले में मूलचंद अस्पताल का नाम आने पर आपका क्या कहना है? उनके माता-पिता भी पेडियाट्रिक आईसीयू के लिये काफी इधर-उधर भटके थे।

मूलचंद अस्पताल का जवाब बहुत साफ है कि मरीज के आने पर उसे प्राथमिक चिकित्सा दी गई थी, हालत में सुधार होने पर एंबुलेंस में ऑक्सीजन देकर ट्रांसफर किया गया। मुझे तो मूलचंद अस्पताल की कोई गलती नहीं लगती।

क्या डेंगू वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में लार या शारीरिक संबंधों से पहुंच सकता है?

नहीं। डेंगू शारीरिक संबंधों या स्लाइवा के संपर्कों के आने से नहीं फैलता है। डेंगू मच्छरों के बिना नहीं फैल सकता है।

दिल्ली में डेंगू का प्रकोप कब तक रहने की उम्मीद है?

खबरों के मुताबिक 15 अक्टूबर तक डेंगू का खतरा बरकरार रहेगा।

डेंगू के टीके के निर्माण पर शोध तेजी से चल रहा है, कब तक सफलता मिलने की उम्मीद है।

एक साल तक में आ जाएगा।


10-10-2015

डेंगू टाइप 4 है कम जानलेवा- आईएमए

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने डेंगू के बारे में दिशा-निर्देश जारी किए हैं और इससे न घबराने की सलाह दी है। साथ ही यह कहा है कि साल 2013 के मुकाबले अब होने वाला डेंगू जानलेवा नहीं है। डेंगू डेन 4 (सरोटाइप) में जान को ज्यादा खतरा नहीं होता। प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए एचसीएफआई के अध्यक्ष और आईएमए के महासचवि डॉ. के.के. अग्रवाल ने बताया कि गंभीर लक्षणों वाले डेंगू के मामलों में ही अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत है। ज्यादातर मामलों में ओपीडी ही काफी है। प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन की जरूरत सिर्फ तब होती है, जब प्लेटलेट्स की संख्या 10000 से कम होती है और ब्लीडिंग हो रही हो।

मशीन से जांच के दौरान दिखाई जा रही 40000 तक की प्लेट्लेट्स की संख्या गलत हो सकती है और विश्वसनीय नहीं है। इसकी उचित जांच हाईमाटोक्रिट से होती है ना कि प्लेटलेट्स काउंट से लेकिन बहुत से मामलों में यह जांच किए बगैर केवल उच्च और निम्न ब्लड प्रेशर में अंतर मापकर इसकी जांच की जा सकती है। नब्ज का दबाव 40 एमएम एजजी से ज्यादा रखना चाहिए।

आईएमए ने लोगों से अपील की कि वह घबराएं न और डॉक्टरों को भर्ती करने के लिए जोर न दें। डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा कि जिन लोगों की भर्ती होने की आवश्यकता नहीं है वह भर्ती न हों, जिन्हें इसकी अत्यधिक आवश्यकता है उनके लिए अस्पताल में जगह रहने दें। वहीं, आईएमए के प्रतिनिधियों डॉ. वी.के. मोंगा और डॉ. आर.एन. टंडन का कहना था कि डेंगू के ज्यादातर मरीजों की देखभाल मुंह से तरल आहार देकर की जा सकती है।

उन्होंने बताया कि डेंगू आमतौर पर डेन1, डेन2, डेन3 और डेन4 सरोटाइप का होता है। 1 और 3 सरोटाइप के मुकाबले 2 और 4 सेरोटाइप कम खतरनाक होता है। इस साल 2 और 4 सरोटाइप ज्यादा चल रहा है। एम्स के मुताबिक, पहली बार राजधानी में टाइप 4 का डेंगू प्रमुख तौर पर उभर कर सामने आया है, उसके साथ टाइप 2 डेंगू भी पाया जा रहा है।

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टाइप 4 डेंगू के लक्ष्णों में शॉक के साथ बुखार और प्लेट्लेट्स में कमी, जबकि टाइप 2 में प्लेट्लेट्स में तीव्र कमी, हेमोरेजिक बुखार, अंगों में शिथिलता और डेंगू शॉक सिड्रोंम प्रमुख लक्षण हैं। डेंगू की हर किस्म में हेमोरेजिक बुखार होने का खतरा रहता है, लेकिन टाइप 4 में टाइप 2 के मुकाबले इसकी संभावना कम होती है। डेंगू टाइप 2 के वायरस में गंभीर डेंगू यानी की डेंगू शॉक सिंड्रोम होने का खतरा रहता है।

2003 में पाए गए इक्का-दुक्का मामलों के मुकाबले, दिल्ली में पहले डेंगू टाइप 4 के मामले इतने बढ़े स्तर पर विशेष तौर पर पहले कभी नहीं देखे गये थे। डॉक्टरों को इस बार डेंगू की किस्म में बदलाव की संभावना लग रही थी, लेकिन डेन 4 (सरोटाइप) की संभावना उन्हें कतई नहीं थी, क्योंकि पहले दिल्ली में यह मामले इतने ज्यादा नहीं होते थे।


डेंगू पर लड़ रही हैं सरकारें- डॉ. विनय अग्रवाल


10-10-2015

दिल्ली में डेंगू से हजारों लोग पीडि़त हैं। कईयों की मौत भी हो चुकी है। ऐसे में लोगों का इलाज करने के बदले अस्पतालों में बेड की भारी कमी पड़ गई है। रोजाना हजारों संदग्धि केस सामने आ रहे हैं। हर कोई अस्पताल में दाखिला चाह रहा है, ऐसे में सभी बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों में ही नहीं नर्सिंग होम तक में बेड का टोटा है। प्लेटलेट की भारी डिमांड है, इसे लेकर मारामारी मची है। ऐसे में मरीज बेहाल हैं तो उनके तीमारदार उनके इलाज और सेहत को लेकर बेहद परेशान हैं। आम जनता घबराई हुई है कि कहीं उसे डेंगू का वायरस अपनी चपेट में न ले ले। क्या है डेंगू वायरस को मात देने और उससे बचने का तरीका? डेंगू होने पर क्या करें और क्या न करें? इन्हीं सवालों को लेकर उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता कुमार मयंक ने बात की, पुष्पांजली क्रॉसले अस्पताल के सीएमडी डॉक्टर विनय अग्रवाल से। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

10-10-2015डेंगू और डेंगू शॉक सिंड्रोम में क्या अंतर है और इससे इंसान की मौत कैसे होती है?

डेंगू को दो भागों में बांट सकते हैं। पहला है, बुखार होना, बदन में दर्द होना, ब्लड प्रेशर कम होना और प्लेटलेट में कमी आना। ऐसे में आपको डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। वो समझेगा तो इससे रिलेटेड जांच कराएगा। दूसरा है, डेंगू शॉक सिंड्रोम। इसमें प्लेटलेट बहुत कम होने से मानव शरीर की प्रतिरोधी क्षमता घटने लगती है। इस वजह से शरीर के अंदर कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। ब्लड प्रेशर कम हो जाता है, आपके शरीर में पानी की कमी हो जाती है। कैपिलरी से लीकेज शुरु हो जाता है। ये सभी सिवियर डेंगू के लक्षण हैं। ऐसी दशा में मरीज को तुरंत ही अस्पताल में दाखिल कराना चाहिए।

रेटरो ओरबिटल पेन और हेमोरेजिक फीवर के क्या-क्या लक्षण है?

रेटरो ओरबिटल पेन के दौरान आंखों के अंदर भारी दर्द होता है। इस दौरान आंखों से पानी आता है, बदन में तेज दर्द होता है, बदन पर रैशेज निकल आते हैं, इन सबके साथ तेज बुखार होता है और भारी सुस्ती महसूस होती है। यह सभी डेंगू के लक्षण हैं।

आपके अस्पताल में कितने डेंगू मरीज भर्ती है, कितने ठीक होकर जा चुके हैं और अब तक कितने मरीजों की मौत हो चुकी है?

अब तक मेरे अस्पताल में डेंगू से 200-225 डेंगू मरीज और डेंगू लाइक पॉजीटिव मरीज भर्ती हो चुके हैं, इनमें से करीब 80-90 मरीज ठीक होकर जा चुके हैं। आज (22-09-2015) की सुबह तक मेरे अस्पताल में 100 मरीज भर्ती हैं, इनमें से 60-62 मरीज डेंगू और डेंगू लाइक पॉजीटिव है बाकी मरीजों की रिपोर्ट आनी है। इनमें से 10-12 मरीजों की हालत गंभीर है। मेरे अस्पताल में करीब 5 मरीजों की मौत डेंगू से हुई है।

क्या दिल्ली में डेंगू से मौत के आंकड़े छुपाए जा रहे हैं, आपके मुताबिक दिल्ली में अब तक कितने लोगों की मौत हो चुकी होगी?

दिल्ली में अंडर रिपोर्टिंग भी है। दिल्ली में बताया गया है कि करीब 19-21 डेथ है, इससे मैं असहमत हूं, क्योंकि डेंगू से जो समस्याएं और मल्टी ऑर्गेन फेल्योर होती हैं, वह कई बार डेंगू डेथ के रुप में नहीं जानी जाती है। मेरी अपनी सोच के मुताबिक दिल्ली में करीब 100 लोगों की डेंगू और इसकी कॉम्पलीकेशन की वजह से मौत हो चुकी होगी।

क्या केजरीवाल सरकार के साथ ही मोदी सरकार भी डेंगू से मौत के मामले छुपा रही है, क्योंकि ज्यादातर अस्पताल केंद्र सरकार के अधीन हैं?

शायद, डेंगू के मामले को लेकर लोगों में खलबली ना मचे, इसलिए मौत की संख्या को छुपाया जा रहा है, क्योंकि मरीज अस्पताल में भर्ती होना चाहते हैं। देखिए, स्वास्थ्य राज्य का विषय है, ऐसे में भले ही दिल्ली के ज्यादा अस्पताल केंद्र सरकार के अधीन हों लेकिन महामारी फैलने के समय उनकी जवाबदेही और समन्यवय का काम राज्य सरकार करती है। दिल्ली में तीन एजेंसियां हैं, केंद्र सरकार, राज्य सरकार और एमसीडी। लेकिन, तीनों ही एक-दूसरे से तालमेल बनाने की बजाय थप्पड़ मारने में लगी है। यह ठीक नहीं है। एमसीडी को साफ-सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए। दिल्ली सरकार लोगों को डेंगू के खतरों के प्रति जागरुक करे।


जब एक किस्म की बीमारी लंबे समय तक रहती है तो बड़ी संख्या में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता उसके लिए बन जाती है और इस बीमारी के मामले बहुत कम आने लगते हैं। लेकिन टाइप 4 के मामले तो कभी भी इतनी बड़ी संख्या में सामने नहीं आए। एक नई किस्म हमेशा महामारी की तरह लगती है। एक बार एक किस्म के डेंगू से पीडि़त हो जाने के बाद मरीज के शरीर में जिंदगी भर के लिए उस किस्म के वायरस के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है, लेकिन दूसरी किस्म के डेंगू के वायरस से पीडि़त होने की संभावना बनी रहती है। दूसरी किस्म के वायरस से दोबारा डेंगू होना गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है।

बढ़ती उम्र के साथ गंभीर डेंगू होने का खतरा कम होता जाता है, खास कर 11 साल की उम्र के बाद। आम डेंगू बुखार में सिर दर्द, रेटरो ओरबिटल पेन, मांसपेशियों में खिचाव और जोड़ों में दर्द होता है। यह लक्ष्ण मच्छर के काटने के 4 से 7 दिनों के बाद दिखाई देने लगते है। इनक्यूबेशन अवधि 3 से 14 दिन तक हो सकती है। बुखार 5 से 7 दिन तक रहता है। इस दौरान कमजोरी दिनों से लेकर हफ्तों तक रह सकती है, खास कर बालिगों में जोड़ों का दर्द, बदन दर्द और महिलाओं में रैशेस हो सकते हैं।


प्राकृतिक चिकित्सा से डेंगू का उपचार-निभानपुदी सुगना


 

  • पपीता के पत्तों के रस को लेते रहने से खून में प्लेटलेट्स की संख्या में तेजी से वृद्धि होती है। पपीते के पत्तों का 2 चम्मच जूस प्रतिदिन मरीज को देना फायदेमंद होता है।
  • तरल पदार्थ और फलों का जूस अधिक-से-अधिक मात्रा में लेते रहना चाहिए।
  • तुलसी के पत्तों का अर्क लेना चाहिए।
  • तीन तुलसी के पत्तों और एक काली मिर्च को पीसकर मटर के दाने के आकार की छोटी गोली बनाकर पानी के साथ लेने से फायदा होता है।
  • अनार का रस और काले अंगूर का रस खून में प्लेटलेट की संख्या में इजाफा करते हैं, इसलिए इनका रस भी अधिक-से-अधिक मात्रा में लेना फायदेमंद होता है।
  • मेथी के पत्तों का इस्तेमाल हर्बल चाय की तरह करने से बुखार को नियंत्रित किया जा सकता है। यह शरीर में बेहतरीन तरीके से सफाई का काम करती है।
  • गिलोय पुराने-से-पुराने बुखार को भी नियंत्रित करने की शक्ति रखता है, क्योंकि इसमें ज्वारनाशक गुण विद्यमान होते हैं। डेंगू होने के दौरान इसके रस का प्रयोग करने से डेंगू का असर कम होता है साथ ही प्लेटलेट काउंट में वृद्धि होती है। 1 चम्मच गिलोय का चूर्ण और 2 ग्राम सोंठ को एक गिलास पानी में उबाल कर दिन में दो बार लेने से डेंगू के बुखार से राहत मिलती है।

नोट- (इन प्राकृतिक उपचारों का प्रयोग अपने चिकित्सक की देखरेख में ही लेने की सलाह दी जाती है।)

घर पर ही तैयार करें मच्छर भगाने की दवा

सूखे सरसों के दानों का पाउडर बना लें, ये पाउडर बाजार में भी आसानी से उपलब्ध होता है, उसे खरीद लें। नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण और समुद्री नमक इन सभी चीजों को एक साथ लेकर मिश्रण बना लें और किसी बंद डिब्बे में भरकर रख लें। लोहे की छोटी कटोरी में जलता हुआ कोयला लें और उस पर इस मिश्रण को डाल कर धूंआ पूरे घर में करे। इसके इस्तेमाल से मच्छर घर में नहीं टिकेंगे। अगर कोयला उपलब्ध न हो तो सुलगते हुअ उपले पर भी आप इस मिश्रण को डाल कर धुंआ कर सकते हैं। इस धुएं में किसी भी तरह के जहरीले तत्व मौजूद नहीं होते हैं, इसलिए ये नुकसानदायक भी नहीं है, लेकिन अगर किसी को इस धूंएं से किसी तरह की ऐलर्जी हो रही हो तो इसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर दें।


डेंगू में बुखार खत्म हो जाने के बाद जटिलताएं पैदा होती हैं। बुखार ठीक होने के बाद के दो दिन बेहद खतरनाक होते हैं और इस अवधि के दौरान मरीज को अत्यधिक मात्रा में तरल आहार लेना चाहिए, जिसमें नमक और चीनी मिश्रित हो। इसमें मुख्य समस्या कैपिलरी में रिसाव और रक्त नलिकाओं के बाहर रक्त का जमाव होने से होती है, जिससे इंट्रावसकुलर डीहाईडरेशन हो जाता है। उचित समय पर मुंह से या नाड़ी से दिया गया तरल आहार मरीज को जानलेवा समस्याओं से भी बचा सकता है।

कुमार मयंक

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