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सीरिया- शरणार्थी संकट के सबक

सीरिया- शरणार्थी संकट के सबक

सीरिया के शरणार्थी संकट से अब दुनिया को सबक लेने का समय आ गया है। सीरिया में साल 2011 से जारी गृहयुद्ध के कारण सवा दो लाख से ज्यादा लोग मारे गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी ने सीरिया के इस संकट को भीषण मानवीय संकट करार दिया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस संकट को सबसे बड़ी मानव त्रासदी माना जा रहा है। यूरोपीय, पश्चिमी और अरब देशों की भूमिका और उदासीनता के कारण यह संकट और गहराता जा रहा है। कुछ हफ्ते पहले ही तुर्की के तट पर डूबे सीरियाई बच्चे आयलान कुर्दी की तस्वीर ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद पश्चिमी तुर्की के समुद्र तट पर चार साल की एक सीरियाई बच्ची का शव पड़ा मिला। ऐसे हादसों के बाद दुनिया का ध्यान सीरिया संकट की तरफ गया। रोजाना लोगों के समुद्र में डूबने के समाचार भी आते रहते हैं। सीरिया के राष्ट्रपति बशर असद को हटाने के लिए जारी लड़ाई में सीरिया से 40 लाख से ज्यादा लोग दूसरे देशों में शरण के लिए भटक रहे हैं। कुछ देशों ने तो शरणार्थियों के लिये अपने दरवाजे तक बंद कर दिए हैं तो कुछ देशों में लाखों लोगों को शरण दी गई है। तुर्की में ही पिछले दस महीने में 11 लाख लोगों को शरण दी गई है। 70 लाख के आसपास लोग सीरिया में ही इधर-उधर भटक रहे हैं। इन लोगों को जो भी मदद मिल पा रही है, वह बहुत मामूली है। संकट का राजनीतिक हल निकालने के लिए कोई पहल भी नहीं हुई है। अगर हालात काबू में नहीं आए तो हो सकता है, ऐसा ही नजारा आसपास के देशों में दिखाई दे। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की उदासीनता से लगता है कि इस्लामिक आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के खिलाफ कार्रवाई करने को ये देश तैयार नहीं हैं।

ब्रिटिश सरकार ने तो लेबनान की चेतावनी पर भी ध्यान नहीं दिया। अपने तत्कालिक लेबनान-जॉर्डन के प्रवास पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून को लेबनानी शिक्षा मंत्री इलियास बॉसाब ने चेतावनी दी थी कि हरेक सौ शरणार्थी में दो आईएस मानें इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी भी हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय ताकतों के लिये यह चेतावनी भविष्य के खतरे की तरफ ध्यान खींचता है। अंतरराष्ट्रीय ताकतों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ती जाएगी। यह बात भी गौर करने वाली है कि सीरिया से बेघर हुए लोग अमेरिका, यूरोपीय और पश्चिमी देशों की तरफ ज्यादा रुख कर रहे हैं। कनाडा ने तो शरणार्थियों के लिए दरवाजे बंद कर दिए हैं। अमेरिका ने बहुत सीमित संख्या में अनुमति देने का ऐलान किया है। सऊदी अरब और कतर ने ऐसे नियम बना दिए हैं कि वहां जाना शरणार्थियों के लिए आसान नहीं है।

सीरिया के राष्ट्रपति असद यह बात बार-बार उठा रहे हैं कि यूरोपीय देश, पश्चिमी ताकतें और अमेरिका का रवैया शुरु से ही भेदभावपूर्ण रहा है। सऊदी अरब, कतर और सीरिया के अलगाववादी, विद्रोही गुटों को समर्थन दे रहे हैं। इन देशों की कोशिश सीरिया के राष्ट्रपति बशर असद को हटाने की है। बशर असद इस्लामिक आतंकी संगठन आईएस से जमकर टक्कर ले रहे हैं। इस कारण दोनों देश असद को हटाने के लिये विद्रोहियों की मदद कर रहे हैं। राष्ट्रपति असद ने यह भी कहा है कि पश्चिमी देशों की मदद के दम पर ही इस्लामिक आंतकी समूह आईएस ने सीरिया के कई इलाकों पर अपना कब्जा किया है। असद की तरफ से हाल ही में रूसी मीडिया से बातचीत में कहा गया कि यूरोपीय देशों ने शरणार्थियों के असली संकट को पहचानने की कोशिश ही नहीं की। शरणार्थियों के संकट का असली कारण आतंकियों के लिए पश्चिमी देशों का समर्थन है। असद ने कहा कि सीरिया की जनता शांति और सुरक्षा चाहती है। असद ने यूरोपीय देशों से भी अपील की है कि यदि आप शरणार्थियों से सहानुभूति रखते हैं तो आतंकियों की मदद बंद कीजिए। सीरिया के नागरिक देश में शांति और सुरक्षा के इच्छुक हैं। असद चाहते हैं कि बातचीत के जरिये इस संकट का हल खोजा जाए।

जरूरत इस बात की है कि पश्चिमी देशों, अमेरिका, ब्रिटेन और सऊदी अरब, तुर्की व यूरोपीय देशों को सीरिया में विद्रोही गुटों को समर्थन देना पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए। यह भी जरूरी है कि सीरिया में जारी संकट को दूर करने के लिए राजनीतिक बातचीत हो। इस बातचीत में दमिश्क से शासन चला रहे राष्ट्रपति असद को भी शामिल किया जाये। दरअसल संकट की शुरुआत में ही कई देशों ने इसका राजनीतिक हल होने पर आशंका जताई थी। इन देशों का मानना है कि असद सीरिया में विद्रोही गुटों और उनके नागरिक ठिकानों पर केमिकल बमों का इस्तेमाल करते हैं। यह आरोप सही हो तो भी असद को शरणार्थी संकट दूर करने के लिये बातचीत में शामिल किया जाना चाहिए। आईएस भी अब दुनिया भर के लिए खतरा बन रहा है। यह जरूरी है कि यूरोप और पश्चिमी देश सीरिया के प्रति अपनी नीति बदलें। मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ओमान, बहरीन और कतर के इस रुख को अमानवीय बताया है और कहा है कि पड़ोसी देशों की बेरुखी से शरणार्थियों का संकट गहराया है।

इसी तरह के हालात इराक, यमन और मोरक्को में भी हैं। यह आशंका भी है कि कुछ समय बाद अन्य देशों में भी ऐसे हालात बन सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया का मानना है कि सीरिया के संकट के लिये यूरोपीय देशों के साथ पश्चिमी और अरब के देश भी जिम्मेदार हैं। इसके लिये शिया और सुन्नी के बीच भड़के विवाद भी जिम्मेदार हैं। सीरिया में बेघर हुए लोगों को यह सच्चाई मालूम है कि राष्ट्रपति असद को हटाने के लिए अरब मुसिलम देश, विद्रोही गुटों को आर्थिक सहायता दे रहे हैं। ऐसे सीरिया के शरणार्थी मुस्लिम देशों की बजाय यूरोपीय देशों में शरण लेने के लिये भाग रहे हैं। इसी कारण यह संकट और गहरा गया है। सबसे ज्यादा 11 लाख से ज्यादा शरणार्थी तुर्की पहुंच चुके हैं, अभी इनकी संख्या और बढऩे वाली है। लेबनान में लगभग 10.20 लाख और जॉर्डन में 6.50 लाख शरणार्थी पहुंचे हैं। सीरिया से बड़ी तादाद में शरणार्थी यूरोप जा रहे हैं। बेघर लोगों की संख्या तो बढ़ रही है पर उन्हें मिलने वाली सहायता राशि बहुत कम है।

कनाडा की कन्जर्वेटिव सरकार ने तो तुर्की के तट पर डूबे तीन साल के बच्चे की भयावह तस्वीर देखने के बावजूद सीरिया के लोगों को शरण देने से इनकार कर दिया। कनाडा सरकार का कहना है कि सीरियाई शरणार्थी शिविरों को अतिरिक्त मानवीय मदद के तौर पर दस करोड़ डॉलर उपलब्ध कराएगा। कनाडा ने जनवरी 2014 के बाद से अब तक महज 2500 शरणार्थियों को ही देश में आने दिया है। कनाडा सरकार की इस कारण आलोचना भी हो रही है। कनाडा सरकार ने अगस्त की शुरुआत में दस हजार शरणार्थियों को शरण देने का वायदा किया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से कोसोवो, युगांडा, वियतनाम आदि देशों में संकट के चलते 12 लाख से अधिक शरणार्थियों को कनाडा शरण दे चुका है। वर्ष 2006 में हार्पर के प्रधानमंत्री बनने के बाद से वहां शरणार्थियों की संख्या में कमी आई है। अमेरिका की भी शरणार्थियों की मदद नहीं करने पर आलोचना हो रही है। अमेरिका ने भी दस हजार शरणार्थियों को शरण देने का ऐलान किया है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने प्रशासन से शरणार्थियों को प्रवेश देने की संख्या बढाने को कहा है। 62,000 से अधिक अमेरिकियों ने एक याचिका पर हस्ताक्षर करके ओबामा प्रशासन से 2016 तक कम-से-कम 65,000 सीरियाई के पुनर्वास में मदद करने का ऐलान किया है। अमेरिका ने इस संकट के समाधान के लिए करीब चार अरब डॉलर की मानवीय मदद मुहैया कराने की बात कही है। अमेरिका विश्व भर के 70,000 शरणार्थियों को हर साल शरण देता है, लेकिन सीरियाई शरणार्थियों को शरण देने में उदासीन बना हुआ है।

सीरिया के राष्ट्रपति असद के ये आरोप अंतरराष्ट्रीय मीडिया के जरिये पूरी दुनिया जान चुकी है कि उन्हें बेदखल करने के लिए इस्लाम के नाम पर कातिलाना राजनीति की जा रही है। इस संकट का समाधान करने के लिये अंतरराष्ट्रीय ताकतों को आगे आना होगा। यह भी सच्चाई है कि इस संकट के लिए सबसे ज्यादा अरब देश जिम्मेदार हैं। यह बात सीरिया के राष्ट्रपति असद लगातार दोहरा रहे हैं। अरब देश इस्लामी आतंकवादी गुटों को धन देकर समस्या को बढ़ाने में लगे हुए हैं। यह सच्चाई भी दुनिया के सामने आ रही है कि मुस्लिम देशों में लोकतंत्र मिट चुका है। ईरान और इराक में पैदा हुए हालातों ने भी सीरिया और आसपास के देशों में आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। सद्दाम हुसैन से इराक की हुकूमत हथियाने के लिए अमेरिका ने भारी तबाही मचाई। रासायनिक हथियारों के नाम पर की गई कार्रवाई के बाद इराक में शिया-सुन्नी के बीच खूनी संघर्ष बढ़ गया।

इस संकट को दूर करने के लिए तुर्की से लगी सीरियाई सीमा में इन शरणार्थियों के लिये संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक सुरक्षित क्षेत्र बनाया जाये। इस क्षेत्र को ‘नो फ्लाई जोन’ घोषित किया जाए और इस सीमित क्षेत्र की निगरानी संयुक्त राष्ट्र की सेना करे। इस व्यवस्था के बाद शरणार्थियों में डर कम होगा। शरणार्थियों की सहायता करने से अमेरिका और यूरोपीय देशों को भी शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से राहत मिलेगी। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता के जरिये शरणार्थियों को स्वास्थ्य और शिक्षा मुहैया कराई जा सकेगी। इससे उनके पुनर्वास का काम तेजी से हो सकेगा।

           कैलाश विजयवर्गीय

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं।)

 

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