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क्या इस्लामिक स्टेट मजबूत हो रहा है?

क्या इस्लामिक स्टेट मजबूत हो रहा है?

एक साल से ज्यादा समय से इस्लामिक आतंकी संगठन आईएस का खून-खराबा ईराक और सीरिया में जारी है। पहले इस सुन्नी आतंकी संगठन ने शिया इलाकों में धार्मिक कट्टरता का पालन करते हुए जातीय नरसंहार किया। साथ ही आईएस के आतंकियों ने कुछ यूरोपीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी मार डाला जो, आईएस के खिलाफ कोई कार्य नहीं कर रहे थे। इस्लामिक रीति-रिवाजों के पालन के नाम पर आईएस के हत्यारे आतंकियों ने खुद काले कपड़े पहनकर और बंदियों को नारंगी कपड़े पहनाकर मौत के घाट उतार दिया। सबसे पहली बात तो यह कि इन निरीह और गरीब लोगों के सामने आईएस का विरोध करने का कोई रास्ता ही नहीं बचा था, यहां तक कि उन निरीह लोगों के पास आईएस जैसे आतंकियों का विरोध करने की हिम्मत तक नहीं थी। इस्लामिक रीति-रिवाजों के नाम पर जनता के बीच असहाय लोगों का वध करने के पीछे आईएस आतंकी संगठन की मंशा साफ तरीके से पश्चिमी दुनिया को आतंकित करने की ही है।

आईएस आतंकियों की बर्बरता से परेशान होकर यूरोपीय देशों अमेरिका और इंग्लैंड ने पहले तो उनके खून-खराबे और बंदियों को बेहद अमानवीय तौर-तरीकों से मारने की निंदा की, इसके बाद अमेरिका ने हवाई जहाज से आईएस के आतंकियों और उनके कब्जे वाले इलाकों में बमबारी की। अमेरिका ने ईराक की सेना और सुरक्षाकर्मीयों को बड़े पैमाने पर आईएस आतंकियों से मुकाबला करने के लिए ट्रेनिंग भी दी। अमेरिका को आईएस के खिलाफ इस लड़ाई में बड़े पैमाने पर संयुक्त अरब गणराज्य का भी साथ मिला। इनका लक्ष्य आईएस आतंकियों के कब्जे वाले ऑयल रिफाइनरियों को मुक्त कराना था। लेकिन, न तो अमेरीका और न ही अन्य पश्चिमी देशों ने ही आईएस से लडऩे के लिए अपनी थलसेना का इस्तेमाल किया। ईराक की सेना को अमेरिकी सेना की टुकड़ी ने प्रशिक्षण और मानसिक मजबूती जरुर दी। जो कुछ इलाकों में आईएस आतंकियों को भगाने में सक्षम हुईं। कुर्द समुदाय के लोगों ने आईएस आतंकियों के खिलाफ चलाये गये इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। तुर्की के बॉर्डर और सीरिया की सीमा पर स्थित एक छोटे से शहर कोबान में कुर्दिश लोगों ने आईएस आतंकियों से आमने-सामने की लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में कुर्द समुदाय के लड़ाकों को तब सफलता मिली जब कुर्द सैनिकों ने जमीन पर सही जगह से आईएस के आतंकियों पर हमले किये और अमेरिकी बमवर्षक विमानों ने इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के ठिकानों पर रॉकेट से ताबड़तोड़ हमले किये।

एक वर्ष में यह बात साफ हो गई कि आईएस आतंकी संगठन सांगठनिक रुप से बेहद मजबूत है और उसके लड़ाके मजबूत आतंकी हैं। कोबान में अभी तक कुर्द लड़ाकों और आईएस के बीच जमीन के एक-एक इंच को लेकर लड़ाई जारी है। आईएस आतंकियों पर अब तक सैकड़ों हवाई हमले किये जा चुके हैं, लेकिन कई तेल शोधक कारखानें अभी भी उनके कब्जे में हैं। इससे साबित होता है कि आईएस आतंकियों के कब्जे में ना केवल कई बड़े इलाकें हैं, बल्कि इस आतंकी संगठन का अपने कब्जे वाले इलाकों में प्रशासनिक तंत्र भी बेहद मजबूत है। उत्तरी सीरिया में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट पावर लाइन और सीवेज सिस्टम तक स्थापित कर चुका है। रक्का में बेकार खाद्य-पदार्थों के लिए बाजार और बीमार जानवरों के लिए स्लॉटर हाउस खोजते हैं। डायर-अल-जोर के दक्षिण में किसानों और दुकानदारों पर कर लगाने के साथ ही उन लोगों पर जुर्माना लगाने का आदेश दे चुका है, जिन्होंने छोटी दाढ़ी रखी है। इराक से मोसुल बॉर्डर तक नियमित रुप से बसों का परिचालन कर रहा है। दासों और बंदियों को मारने के साथ ही बच्चों को गुरिल्ला वॉर के लिए ट्रेंिनंग देकर चर्चा बटोर रहा है। इस शहर में आईएस ने एक लक्जरी होटल भी खोला है। एक वर्ष बाद मोसुल पर आईएस ने दोबारा कब्जा कर लिया है। पहले अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने मोसुल को आईएस के कब्जे से छुड़ाने के लिए बमबारी की थी। यह सीरियाई और इराकी सरकार के लिए पैबंद के बराबर है। जिहादी खाली स्थानों पर कब्जा कर उसे भरने में लगे हैं। मसलन रोजगार और सुरक्षा देने की बात करके। लेकिन, यह एक धर्म के अंदर उपजाये जा रहे पूरे खौफनाक दृश्यों का मंजर है, जो किसी को अंदर से झकझोर देने के लिए काफी है।

आईएस को रोकने के कोई राजनीतिक प्रयास नहीं होने से इसे बढऩे से रोका नहीं जा रहा है। वहां के आम नागरिक ने इन कटु सत्यों के साथ समझौता करना सीख लिया है, क्योंकि अगर वे आईएस के नियमों का पालन करते हैं तो आतंकी संगठन उन्हें कुछ नहीं कहता। किंतु उन लोगों की जिंदगी पर भी शांतिपूर्ण नहीं है। आईएस लड़ाकों ने डायनामाइट लगाकर मछली पकडऩे पर प्रतिबंध लगा दिया है, शिक्षकों को अपने स्कूलों में काम करने के आदेश दिए हैं और जॉर्डन के पायलटों की हत्या करने पर ईनाम देने का ऐलान किया है।

इस्लामिक स्टेट की सीमा मध्य यूरोप के सीरिया से अलप्पो तक सैकड़ों मील बढ़ती ही जा रही है। यह उत्तर में तुर्क के लिए और बगदाद के दक्षिण भाग के लिए परिवर्तनशील सीमा का रुप ले चुका है। ये इलाका ज्यादातर रेगिस्तान का है। आईएस, अल कायदा जैसे आतंकी संगठन से अलग हैं क्योंकि, यह सुन्नी इस्लामिक स्टेट की स्थापना के लिए खून-खराबे में गहरा विश्वास रखता और लोगों की बर्बर तरीके से हत्याएं करता है। इसके लिए आईएस भौगोलिक स्थिति में बदलाव कर रहा है। जो भी इंसान पुलिस, सरकार और सेना के काम के लिए योग्य न हो उनकी हत्या तक कर देता है। ज्यादातर सुन्नी अरब समुदाय के लोग आईएस की विचारधारा से सहमत नहीं दिखते, लेकिन चोरों की पिटाई, कानून का कठोरता से पालन कराने की आईएस की कार्यशैली से सुन्नी अरब समुदाय उनकी व्यवस्थाओं पर निर्भर सा हो गया है।

इस वजह से ही कट्टर आतंकी संगठन आईएस मजबूत हो रहा है। आईएस बच्चों और शिक्षकों के लिए कार्यक्रमों में बदलाव कर उनके दिमाग में अपनी सोच भर रहा है। कई वयस्क मानते हैं कि आईएस ने उनकी सोच बदल दी है, ऐसे लोग आईएस में जाने की भी सोच रखते हैं। उनका विश्वास है कि गंदे खून वाले आईएस के लड़ाकों पर हमला कर रहे हैं और आईएस के लड़ाके उनका मुकाबला कर रहे हैं। आईएस जनता के सामने दंड दे रहा है, जानें ले रहा है, फसलों, बिजली और पानी पर भारी टैक्स लगा रहा है। आईएस की पॉलिसी लोगों को भूखा रखने की है, जिससे उनकी गुलाम जनता उनके शानदार जीवन जीने का साधन बन सके। पिछले महीने ही आईएस के मुखिया अबू-बकर-अल-बगदादी ने एक रेडियो संदेश में मुसलमानों से आईएस आतंकी संगठन ज्वाइन करने की अपील की थी। आईएस के अधीन रहने वाले इलाकों के निवासियों की ज़िंदगी मुश्किल में बीत रही है लेकिन, कुछ लोग चाहते हैं कि जिहादी वहां रहें, इसकी वजह वहां की राजनैतिक व्यवस्था का फेल होना है। सीरिया में रहने वाले ज्यादातर लोग असद सरकार और जिहादी विद्रोहियों के बीच पिसते हुए ज़िंदगी बीता रहे हैं। ऐसे लोग आईएस को चुनने के लिए मजबूर हैं। ईराक में रहने वाले ज्यादातर सुन्नी लोग आईएस पर वहां की शिया बहुल स्थानीय सरकार और सेना की तुलना में ज्यादा विश्वास करते हैं, क्योंकि उन्हें वहां ज्यादा सुरक्षा और आजादी मिलती है उन्हें, न तो गिरफ्तारी का डर है, न शोषण का, न किसी रुकावट और न ही चेकिंग का।

इस विरोध का सामना अमेरिका के आईएस विरोधी अभियान को भी करना पड़ा। अमेरिका, ईराक में अतिरिक्त मिलिट्री बेस को बना रहा है, ताकि आईएस के खिलाफ लड़ाई को और तेज कर सके। इसकी जानकारी अमेरिका के एक सीनियर सैन्य जनरल ने दी है। सौ से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सलाहकारों की एक टीम ईराकी सेना के साथ मिलकर चरमपंथी सुन्नी संगठन आईएस के कब्जे वाले इलाकों को दुबारा हासिल करने की रणनीति बना रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने हाल ही में फैसला किया है कि ईराक में अमेरिका अतिरिक्त 450 ट्रेनर भेजेगा। जिससे कि इराकी सेना रमादी और अन्य शहरों पर दुबारा कब्जा कर सके। इसकी जानकारी अमेरिकी सेना के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ जनरल डेम्पसी ने दी, उन्होंने बताया कि, उनकी रणनीति ईराकी सेना और स्थानीय जनजातीय लोगों के साथ मिलकर आईएस के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लडऩे की है।

Fighters from Islamic State group sit on their tank during a parade in Raqqa, Syria copy

डेम्पसी का दावा है कि आप इसे बगदाद और मोसुल के बीच फैले कॉरिडोर में देख सकते हैं। ऐसे इलाकों में 3500 और सैनिकों की जरुरत है, लेकिन अमेरिका के लिये ईराक में अपने थल सैनिकों को भेजना खतरे से खाली नहीं है। इससे राष्ट्रपति भवन और रक्षा नीति का केंद्र पेंटागन भी परेशान है। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए खासतौर पर जिन्हें वहां होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में प्रचार करेंगे और ईराक में सीधी लड़ाई के खिलाफ हैं, क्योंकि कोई भी एक सैन्य विस्तार सदमा दे सकती है। शुरु से ही इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिकी सेना की सीधी कार्यवाही और ज्यादा संख्या में अमेरिकी सैनिकों को इराक में भेजने का राष्ट्रपति ने प्रतिरोध किया। वह हमेशा से इराक में कम-से-कम अमेरिकी सेना के लोगों को भेजने के पक्ष में रहे हैं। सच तो यह है कि अमेरिका तीन हजार से ज्यादा सैनिकों को वहां नहीं भेजना चाहता। वह सभी लड़ाई लडऩे वाले सैनिक नहीं बल्कि, सैन्य सलाहकार और प्रशिक्षक हैं। पेंटागन को इस बात का डर है कि इससे कम-से-कम इस्लामिक स्टेट को अमेरिकी सेना को निशाना बनाने का मौका तो मिल ही जाएगा। अमेरिकी सेना के सूत्र भी इसे स्वीकार करते हैं कि ईराक में ज्यादा अमेरिकी सैन्य दस्तों की संख्या होना, आईएस के आतंकियों के लिये बोनस के बराबर होगा क्योंकि, आईएस को उन पर हमला करने का मौका मिलेगा। यहां एक पूर्व उदाहरण भी है। फरवरी में बमों से लैस आईएस के आठ आत्मघातियों ने खुद को रक्षा अधिकारी बताकर नॉर्थ बगदाद के सैन्य एयर बेस में हमला करने की कोशिश की थी, जहां सैकड़ों अमेरिकी नेवी के सैनिक अपने ईराकी समकक्षों को प्रशिक्षण दे रहे थे। आईएस के आठों आत्मघातियों को तुरंत मार गिराया गया था। लेकिन, आईएस का यह हमला इस बात की पूर्व चेतावनी था कि कोई भी मिलाजुला सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम अमेरिकी सेना के लिये खतरा है। अमेरिकी मदद से ईराक के अल-तकाद्दम में एक सशक्त सैन्य बेस नेटवर्क बनाया गया है, जो कि पूर्वी अनबर के हबानिया शहर में स्थित है। इसका लक्ष्य ईराकी सेनाओं को सलाह और सहायता देने के साथ ही अनबर के सुन्नी जनजातीय लोगों को भी सहभागी बनाना है। अमेरिका की तेज कोशिश ईराकी सेना में मौजूद सुन्नी लड़ाकों और शिया सैनिकों में एकीकरण की है। क्योंकि, यहां शियाओं का वर्चस्व है। अल-तकाद्दम में सैन्य बेस बनाने की वजह आईएस के खिलाफ रमादी शहर पर कब्जे के लिये चलाये गये अमेरिकी और ईराकी सेना के ऑपरेशन की नाकामी है। जनरल डिम्पसे के मुताबिक वह सभी लक्ष्य से कुछ ही महीने दूर हैं, जब रमादी शहर को कब्जे में करने के लिये अमेरिकी और इराकी सेना अभियान चलाएगी। हालांकि उन्होंने इसके लिए समय सीमा बताने से इनकार कर दिया। जनरल डिम्पसे ने यह कहा कि अल-तकाद्दम बेस में जरुरी सैन्य कमांड और कंट्रोल रुम बनाने में कई हफ्ते लग सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति भी इराक में थलसेना की तैनाती के अनिच्छुक हैं। अमेरिका अब भी यह उम्मीद कर रहा है कि ईराकी सरकार इस्लामिक स्टेट को हराने और भगाने के लिये सुन्नी सैनिकों की तैनाती का कोई रास्ता निकालेगी।

बीते 25 जून को तीन देशों में आतंकियों ने खूनी शिकार किये। फ्रांस, ट्यूनीशिया और कुवैत में आतंकी हमले हुए। फ्रांस में हमलावर ने खुद को लीन स्थित अमेरिकी इंडस्ट्रीयल प्लांट के पास उड़ा लिया, वह फैक्ट्री को नुकसान तो नहीं पहुंचा सका, लेकिन फैक्ट्री के गेट पर कई सिर पड़े मिले जो ब्लास्ट के बाद धड़ से अलग हो गये थे। ट्यूनीशिया के बीच रिसोर्ट पर बंदूकधारी ने खुलेआम फायरिंग कर 27 लोगों की हत्या कर दी। कुवैत में शिया मस्जिद के बाहर हुए आत्मघाती धमाके में 24 लोगों की मौत हो गई, इसकी जिम्मेदारी आईएस ने ली थी। किसी गल्फ देश में आईएस का यह पहला आतंकी हमला था। तेल बेचकर बेहद धनवान देश बना कुवैत इस आतंकी हमले से स्तब्ध रह गया। आईएस के नेताओं ने अपने भीतरी घेरे को बेहद मजबूत बनाया हुआ है और विभिन्न तरीकों के प्रादेशिक कमांडरों को सीरिया और ईराक में तैनात किया है, जिससे कि हमले में किसी बड़े कमांडर की मौत होने पर संगठन में बिखराव न हो सके और नये कमांडर के नेतृत्व में उसके लड़ाके दुबारा लड़ सकें। ऐसा अमेरिकी और इराकी गुप्तचर विभाग के सूत्रों का मानना है। आईएस के चीफ अबू-बकर-अल-बगदादी ने शूरा यानी काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स को लड़ाई, आर्थिक और धार्मिक मामलों को जरुरत के मुताबिक देखने की जिम्मेदारी दी है।

इराकी आईएस नेताओं में अल-कायदा गुट के वह नामी आतंकी भी शामिल हैं जो खुद को अमेरिकी हमलों और सद्दाम हुसैन के शासन काल में भी बचाने में पूरी तरह कामयाब रहे। दो गुटों के विलय के बाद ही आईएस संगठन इस कदर मजबूत होने में कामयाब हो सका। एक बेहद महत्वपूर्ण आजादी आईएस के इन कमांडरों को मिली हुई है कि वह चाहे तो ईराक या फिर सीरिया में अपना ऑपरेशन चला सकते हैं। जबकि, लड़ाकों को आईएस की भीतरी प्रक्रिया के बारे में बेहद सीमित जानकारी होती है। अभी भी आईएस में बेहद ऊंचे पदों पर ईराकी ही हैं।

बीते मई महीने में ही पूर्वी सीरिया में एक अमेरिकी कमांडो के हाथ लगे आईएस के सामानों की बरामदगी के बाद से अमेरिका आईएस के नेताओं की रणनीति, आर्थिक संचालन, भर्ती प्रक्रिया और उसके सुरक्षा के तौर-तरीकों को जानने में जुटा है। एक जानकारी के मुताबिक आईएस को ड्रोन हमले की पूरी जानकारी है, साथ ही अपने बड़े कमांडरों की मौत होने की दशा में दोबारा खुद को खड़ा करने के लिये मध्य स्तर के कमांडो को भी आजादी मिली हुई है। आईएस के शीर्ष नेताओं के कुरियर इस्तेमाल करने का रहस्य अब तक पश्चिमी विश्लेषक नहीं जान सके हैं। आईएस के चीफ अबू-बकर-अल-बगदादी के बाद इसके दो बड़े नेता हैं। पहला नाम अबू-अला-अल-अफरी का है, जो कि अबू-मुसान-अल-जरकावी जो कि ईराक का एक आतंकी नेता था का पूर्व सहायक था और दूसरा नाम फदल-अल-हयाली उर्फ अबू-मुस्लिम-अल-तुर्कमानी जो कि पूर्व में ईराकी स्पेशल सेना का अधिकारी था। ऐसी खबर है कि यह दोनों नेता आईएस के खिलाफ जारी हवाई हमले में मारे गये। यह अब तक साफ नहीं हो सका है कि, आईएस के चीफ अबू-बकर-अल-बगदादी के मारे जाने की सूरत में कौन इस्लामिक स्टेट की कमान संभालेगा। क्योंकि, खलीफा अरब के कुरायेश जनजाति से ही होगा, इस वजह से ही अमेरिका लगातार आईएस चीफ अबू-बकर-अल-बगदादी के शिकार के लिये निशाना लगा रहा है।

10-10-2015

इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के हाथों धड़ल्ले से अंजाम दिये जाने वाला यह दहशत कैसे संभव है? कैसे परपीड़ा में वास्तविक आनंद को उठाया और दिखाया जा सकता है, एक इंसान का काम दंड देना हो सकता है, मौत नहीं, लेकिन आईएस दर्दनाक, अपमानजनक और अन्य तरीकों से मौत दे रहा है।

एक साधारण उदाहरण यह है कि, आईएस के कसाई प्राचीन काल के सैन्य युद्ध-नीति को अपना रहे हैं, जिसे चंगेज खान और अत्तिला द हूण ने अपनाया, शत्रुओं को आतंकित करने के लिये। लेकिन आईएस ने उन्हें भी पीछे छोड़ दिया। जब लोग डरते हैं तो उनमें घृणा भी बढ़ जाती है और वह इसे शेयर करते हैं। हमें कभी भी शैतान से भयभीत नहीं होना चाहिए। हमने समाचार-पत्रों में देखा है कि किस तरह इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने उन र्निदोष विदेशी नागरिकों का वध करते हुए उसका प्रदर्शन किया जो हथियारविहीन थे और ईराक के गरीब लोगों की जीवनशैली को सम्मानजनक बनाने के लिये वहां गये थे। इस दौरान पीडि़तों को नारंगी रंग का ड्रेस पहनाया गया जबकि, अपनी पहचान छुपाने के लिये आईएस के आतंकियों ने नकाब और काले कपड़े पहने हुए थे। इसके बाद र्निदोष लोगों का सिर एक झटके में काटकर उनका वध कर दिया गया। हम जॉर्डन के उस पायलट की दर्दनाक मौत को कैसे भूल सकते हैं, जो अपने हवाई जहाज पर हमले के बाद मजबूरी में पैराशूट से जमीन पर उतरा था, जिसे आईएस के आतंकियों ने पकड़ लिया और मौत की सजा एक पिंजड़े में जिंदा कैद करने के बाद उसमें आग लगाकर दी। आईएस के नेता नीच और कायर हैं, परपीड़ा में आनंद उठाते हैं, वह नृशंस सजा के हकदार हैं। वे सम्माननीय सैनिक नहीं हैं, उनकी लड़ाई सिर्फ स्वार्थ के लिये है। आईएस के आतंकी क्रूरता की गठरी हैं, जो पथभ्रष्ट हैं। उन्हें दिशा देने की कोई जरुरत नहीं है, युद्ध के मैदान में पराजित कर उनकी नृशंसता के लिये आजमाये हुए कठोरतम दंड देने की जरुरत है। दुनिया को जल्द-से-जल्द दूसरों को मौत देकर अट्टहास करने वाले इन क्रूर जाहिलों से छुटकारा पाना ही होगा।

इ. एन. राममोहन

(लेखक बीएसएफ के पूर्व डायरेक्टर जनरल हैं)

 

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