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फिर से उभर रही है उग्रवादी राजनीति

फिर से उभर रही है उग्रवादी राजनीति

असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने बिहार से चुनाव लडऩे की घोषणा कर लालू और नीतीश के महागठबंधन में खलबली मचा दी है। उन्हें डर है कि एआईएमआईएम अल्पसंख्यक वोट काटकर भाजपा की जीत की राह आसान बना सकती है। एआईएमआईएम हैदराबाद और आसपास के इलाकों में दशकों से खासा दबदबा रखने वाली मुस्लिम क्षेत्रीय पार्टी है। निजाम के शासन काल में जन्मी यह पार्टी अपनी उग्र सांप्रदायिक नीति और हिन्दू विरोध के लिए कुख्यात रही है। वहां से वह लोकसभा और कई विधानसभा की सीटें जीतती रही है। लेकिन पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उसके दो विधायक चुनकर आने के बाद उसकी महत्वाकांक्षाओं को पर लग गए हैं और अब मुसलमानों की राष्ट्रीय पार्टी बनाने के हसीन सपने देखने लगी है, लेकिन उसके विरोधी कहते है कि यह कुछ नहीं है कि चूहे को हल्दी की गांठ मिल जाए तो वह अपने को पंसारी समझने लगता है। उसके नेता असदुद्दीन ओवैसी इन दिनों काफी चर्चा में हैं और कई राज्यों में घूमकर अपने पार्टी का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे सेक्युलर दलों में हडकंप मचा है। उन्हें लगता है कि ओवैसी की पार्टी सीटें भले ही जीत नहीं सकें, लेकिन वोट कटवा पार्टी के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कुछ सेक्युलर नेता तो यह भी मानते हैं कि एआईएमआईएम भाजपा के इशारे पर चुनाव लड़ रही है ताकि, सेक्युलर वोटों का बंटवारा हो।

यह बेबुनियाद नहीं है। एआईएमआईएम महाराष्ट्र में चुनाव लड़ी, वहां कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस का गठबंधन हारा। फिर एआईएमआईएम पिछले दिनों बैंगलुरू नगर निगम के चुनाव लड़ी, वहां वह सीट एक भी नहीं जीती, लेकिन कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। अब उसने बिहार विधानसभा के चुनाव में मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र से लडऩे का फैसला किया है। इससे सेक्युलर दलों में खलबली मची हुई है। इसके बाद वह उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव लड़ेगी। कुछ समय पहले तक हैदराबाद तक सीमित ओवैसी अपनी पार्टी का विस्तार अब तेलंगाना के दूसरे शहरों में भी कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले की एडोनी नगर पालिका में भी इस पार्टी के लोग जीते हैं। कर्नाटक के बीडर, बसव कल्याण और महाराष्ट्र के नांदेड़ वाघेला और औरंगाबाद में उनकी पार्टी के उम्मीद्वारों ने विजय हासिल की है।

हाल ही में एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार के किशनगंज में सभा की। यह क्षेत्र बिहार के सीमांचल में आता है, यहां 40 प्रतिशत मुसलमान हैं और किशनगंज में तो 69 प्रतिशत मुसलमान हैं। यहां ओवैसी का भाषण सुनने के लिए जितने बड़े पैमाने पर भीड़ जुटी उससे जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस जैसी सेक्युुलर पार्टियां परेशान हो गईं। उन्हें लगता है यदि ओवैसी की पार्टी यहां से चुनाव लड़ती है तो उनके वोट बंट जाएंगे। दूसरी तरफ भाजपा के नेता मन्नत मांग रहे थे कि ओवैसी की पार्टी जरूर यहां से चुनाव लड़े क्योंकि, यही वह इलाका है जहां से जीतना उनके लिए मुश्किल होता है। ओवैसी के लडऩे से उनकी राह आसान हो जाएगी।

कुछ माह पहले हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात रही कि उग्रवादी मुस्लिम पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के भी दो विधायक चुनकर आए। एक मुंबई के भायखला से और दूसरा औरंगाबाद से। एआईएमआईएम ने महाराष्ट्र में पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा। उसने महाराष्ट्र में कुल 24 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। राज्य में अपने पहले ही चुनाव में एआईएमआईएम ने बेहतर प्रदर्शन करके सबको हैरान कर दिया। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से उसे ज्यादा सीटें मिली हैं। दो सीटें जीतने के अलावा पार्टी पांच सीटों पर दूसरे नंबर पर और नौ पर तीसरे स्थान पर रही। पार्टी का उभार इस तथ्य की और इंगित करता था कि राज्य के मुसलमान सेक्युलर दलों से निराश होकर एआईएमआईएम जैसे उग्रवादी मुस्लिम राजनीतिक दलों की ओर जा रहे हैं। औरंगाबाद नगर निगम के चुनावों में वह दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी। मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने महाराष्ट्र में सफलता पाने के बाद अन्य राज्यों में चुनाव लड़कर अपना आधार बढ़ाने की योजना बनाई। अभी पार्टी के तेलंगाना विधानसभा में सात सदस्य और मध्य प्रदेश विधानसभा में एक सदस्य है।

इस ताकत के बल पर एआईएमआईएम राष्ट्रीय स्तर की मुस्लिम पार्टी बनने के ख्वाब देख रही है। वैसे हमारे देश में मुस्लिम क्षेत्रीय पार्टियों की कमी नहीं हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कई मुस्लिम पार्टियां हैं। कश्मीर में नेशनल कॉन्फंरेस और पीड़ीपी मूलत: मुस्लिम पार्टियां ही है। लेकिन वह अपने को कशमीर तक ही सीमित रखती है। नेशनल कॉन्फंरेस का तो पहले नाम ही मुस्लिम कॉन्फंरेस था। केरल में मुस्लिम लीग काफी ताकतवर मुस्लिम पार्टी है जो राज्य के सत्तारूढ़ गठबंधन की घटक भी है। मुसलमान तो सारे देश में फैले हैं, लेकिन मुस्लिम लीग ने कभी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनने की आकांक्षा नहीं पाली। असम में अजमल की ऑल इंडिया यूडीएफ मुसलमानों की प्रतिनिधि पार्टी बनकर उभरी है। उसने कई बार बंगाल में हाथ पांव मारने की कोशिश की मगर उसे कभी सफलता नहीं मिली। उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी तेजी से उभरी थी, लेकिन वह जितनी तेजी से उभरी उतनी तेजी से अस्त भी हो गई। पिछले कुछ समय से एआईएमआईएम कई राज्यों में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही है।

ओवैसी की पार्टी का नाम भले ही ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन हो मगर ओवैसी दावा यह करते है कि उनकी पार्टी केवल मुसलमानों की पार्टी नहीं है। यह उनके बारे में गलत प्रचार किया जा रहा है। हमने कई गैर मुस्लिम, दलित और ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। एआईएमआईएम के विधायक इम्तियाज जलील अपने पार्टी के सांप्रदायिक होने का पुरजोर खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि हम मुस्लिम, पिछड़ों और वंचित वर्गों की आवाज संसद और विधानसभाओं तक पहुंचाना चाहते है। यदि एआईएमआईएम सांप्रदायिक पार्टी होती तो वह वंचितों को टिकट नहीं देती। दरअसल यह पार्टी मुस्लिमों और दलितों का संगठन होने का दावा करती है, उसने कुछ सीटों पर दलित उम्मीदवार खड़े भी किये थे लेकिन जीता कोई नहीं। वैसे यह पार्टी दलितों को लुभाने के लिये जय भीम और जय मीम का भी नारा लगाती है, लेकिन अपने को सेक्युलर कहना इस पार्टी का कोरा झूठ है। इसके नेता सलाउद्दीन ओवैसी, असदुद्दीन ओवैसी और अकबरूद्दीन ओवैसी अक्सर हिन्दुओं के खिलाफ आग उगलते रहते हैं। अकबरूद्दीन को तो कुछ साल पहले भड़काऊ बयान देने कारण गिरफ्तार भी किया गया था और मुकदमा भी चला था।

ओवैसी बाते भले ही धर्मनरपेक्षता की करते हों मगर उनका और उनके परिवार की राजनीति का इतिहास मुस्लिम सांप्रदायिकता और नफरत की राजनीति का इतिहास रहा है। निजाम के राज्य हैदराबाद को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की मांग को लेकर 1927 में निजाम के समर्थन में एआईएमआईएम का गठन किया गया था। इसकी पहली बैठक में पहला ही प्रस्ताव यही था कि एआईएमआईएम का लक्ष्य हैदराबाद को भारत का हिस्सा बनने से रोकना है।

पाकिस्तान की मांग 1930 के दशक में हुई मगर एआईएमआईएम उसके पहले से मुस्लिम अलगाववाद की समर्थक रही है। उसने आजादी के पहले हैदराबाद से हिंदुओं के सफाए के लिए डेढ़ लाख रजाकारों की फौज तैयार की थी। तब निजाम की हैदराबाद रियासत में महाराष्ट्र का वर्तमान मराठवाड़ा भी हिस्सा था। जब 1948 में रजाकारों ने हिंदुओं पर अत्याचार शुरू किया तब केंद्र सरकार ने हैदराबाद में सैनिक कार्रवाई का आदेश दिया। रजाकारों के मुखिया कासिम राजवी को जेल में ठूंस दिया गया। जब उसने अपने गुनाहों से तौबा कर लिया तब उसे 1957 में पाकिस्तान जाने की शर्त पर जेल से रिहा किया गया। राजवी के भागने के बाद एआईएमआईएम ठंडी पड़ गई। उसका नेतृत्व अब्दुल वाहिद ओवैसी के हाथ में आ गया।

ओवैसी परिवार तब से ही नफरत की राजनीति करता रहा। हाल ही में हिन्दुओं के खिलाफ बेहद भड़काऊ बयान देने वाले अकबरूद्दीन ओवैसी के दादा मौलाना अब्दुल वहीद ओवैसी को भी नफरत फैलाने के लिए 11 महीने तक जेल में रखा गया था। अब्दुल वाहिद ओवैसी स्वयंभू संगठन सालार-ए-मिल्लत (कौम का कमांडर) कहलाता था। 1960 में उसने हैदराबाद महानगर पालिका का चुनाव जीता। 1962 में अब्दुल वाहिद ओवैसी का बेटा सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी पथरघट्टी विधानसभा सीट जीतकर आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचा। 84 में सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी पहली बार हैदराबाद से लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब हुआ। 2004 में उन्होंने अपनी जगह अपने बेटे असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद से लोकसभा प्रत्याशी बनाया। सलाहुद्दीन के बाद उसका बड़ा बेटा असदुद्दीन ओवैसी एआईएमआईएम का प्रमुख बन गया। उनका भाई अकबरुद्दीन ओवैसी माफिया गतिविधियों और हिंदूद्रोही वक्तव्यों के लिए कुख्यात है। 2007 में इसी अकबरुद्दीन ओवैसी ने ऐलान किया था कि यदि सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन कभी हैदराबाद आए तो वह उनके सिर कलम कर देगा। तस्लीमा नसरीन पर एआईएमआईएम के कार्यकर्ताओं ने हमले की योजना भी बनाई थी, पर आज के दिन तक आंध्र की कांग्रेस सरकार ने अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। उसके बाद उसने 24 दिसंबर को आदिलाबाद में हजारों मुसलमानों की मौजूदगी में बयान दिया कि यदि पुलिस हटा ली जाए तो मुसलमान 100 करोड़ हिंदुओं को 15 मिनट में खत्म करने की कूवत रखते हैं।

ओवैसी परिवार और मजलिस के नेताओं पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे अपने भड़काऊ भाषणों से हैदराबाद में साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा देते रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर मजलिस के समर्थक उसे भारतीय जनता पार्टी और दूसरे हिन्दू संगठनों का जवाब देने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि मुसलमानों का सेक्युलर पार्टियों से मोहभंग हुआ है, इसलिए वह मुस्लिम पार्टियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन क्या मुस्लिम पार्टियां मुसलमानों की आकांक्षाओं को पूरा कर पाएंगी?

सतीश पेडणेकर

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