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अध्यात्म ही परम सुख

अध्यात्म ही परम सुख

हम जीवन को जितना समझने की कोशिश करते हैं, जीवन उतना ही ज्यादा उलझा हुआ दिखाई देता है। हम समस्याओं को जितना सुधारना का प्रयास करते हैं, समस्याएं उतनी ही ज्यादा उलझ जाती हैं। वास्तव में न तो जीवन सरल होता है और न ही जटिल, बल्कि उसे बनाने वाले हम खुद होते हैं। हम हमेशा हालात को जिम्मेदार मानकर खुद को मजबूर साबित कर बैठते हैं। हमारे सुख या दु:ख हमारे कार्यों के द्वारा नियंत्रित होते हैं। सर्वश्रेष्ठ ईश्वर को हम सब दिल से मानते हैं, लेकिन अपने नित्य जीवन में उनकी उपस्थिति और उनके निर्देश में होने वाले कार्यों का हमें आभास भी नहीं होता। जब हमारे सामने किसी भी कार्य को करने का या निर्णय लेने का वक्त आता है तो हम खुद को महान समझकर ईश्वर का स्मरण करना भी भूल जाते हैं। ईश्वर हमें सही दिशा दिखा सकते हैं, हम यह भी भूल जाते हैं।

भगवान की सृष्टि में मनुष्य एक ऐसा प्राणी है, जिसके पास सोचने की क्षमता है। उसी क्षमता के कारण वह सफलता के शिखर तक पहुंच पाता है, लेकिन यही सोच जब नकारात्मक हो जाती है या जरूरत से ज्यादा मनुष्य पर हावी हो जाती है तो मनुष्य खुद का कितना नुकसान करता है, वह इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा पाता है। जब हम पहली बार किसी व्यक्ति से मिलते हैं तो उसके चरित्र का अपनी नजर से विश्लेषण करने लगते हैं। उसकी पोशाक, उसके पहनावे के अंदाज, उसके बोलने का तरीका, उसके आचरण इन सभी बातों को विशेष रूप से जानने के लिये अपनी पूरी क्षमता लगा बैठते हैं। हमें उस व्यक्ति से क्या फायदा मिल सकता है या हमें उससे कोई नुकसान तो नहीं है, इन सब बातों को हम अपनी सोच के दायरे में ले आते हैं, लेकिन उस व्यक्ति के बारे में जरूरत से ज्यादा सोचने में हम खुद का कितना नुकसान कर बैठते हैं, उसका अंदाजा हमें नहीं होता है। हमारा अंदाजा हमेशा सही भी नहीं हो सकता। समय जो कि अनेक चीजों का उपचार है, समय ही उनको रास्ता दिखाता है। किसी के व्यक्तित्व का हमारे जीवन पर क्या असर होता है, इसका निर्णय केवल समय ही कर सकता है। हमारे परखने के प्रयास के कारण हम एक सच्चे इंसान को भी खो बैठते हैं। हमारी विचारशक्ति का जरूरत से ज्यादा प्रयोग अनेक अस्वाभाविक परिस्थितियों को जन्म देता है।

विवेकपूर्ण व्यक्ति ऐसे स्थान पर अपनी बुद्धि को लगाता है, जहां पर उसकी जरूरत हो। हमें दूसरों से ज्यादा स्वयं पर सोचना चाहिए। दूसरों का आचरण हमें कितना अच्छा लगता है, यह न सोचकर यह सोचना चाहिए कि हमारा आचरण दूसरों को कितना प्रभावित करता है। मनुष्य का मन ऐसी तीव्र गति से भागता है कि एक क्षण में कहां पहुंच जाता है, पता ही नहीं चलता। एक बार मन किसी विषय पर सोचने बैठ जाता है तो यह किसी के वश में नहीं रहता। कभी-कभी हमारी यही अनचाही सोच न जाने हमारे कितने अच्छे क्षणों को बर्बाद कर देती है। जब यह भावना मजबूत बन जाती है तो वह क्रियाशील हो जाती है। इसलिए हमारी सोच हमेशा सकारात्मक होनी चाहिए। शंका से भरी सोच हमें अनेक चिन्ताओं में डाल सकती हैं।

हम अपने बचपन को याद करें तो यह शिक्षा जरूर मिलती है कि हम बचपन में ज्यादा खुश रहा करते थे, जिससे जो मांगना होता था वह बेझिझक मांग लेते थे। जब कोई बात मन को ठेस पहुंचाती थी तो तुरंत रो पड़ते थे, लेकिन आज हम यह सभी कार्य करने से पहले यह सोचने लगते हैं कि कोई हमारे बारे में क्या सोचेगा? हम खुलकर अपनी बात नहीं कहने से या खुलकर नहीं हंसने या रोने से अंदर-ही-अंदर घुटते रहते हैं।

भविष्य के लिये योजना बनाना अच्छी बात है, लेकिन जरूरत से ज्यादा सोचकर खुद को भटकाना सही नहीं है। भविष्य की सोच में वर्तमान को नष्ट करना भी नहीं चाहिए। हमें समय केवल अपना कार्य करने में लगाना चाहिए ना कि सोचने में। अध्यात्मिक आधार पर जीवन के रहस्य को जान लेने से हमारे मन में उत्पन्न सकारात्मक सोच हमारे जीवन को सुगम बना सकती हैं।

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