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सुख की खोज

सुख की खोज

सुख की खोज में चलने के पूर्व यह जान लेना बहुत जरूरी है कि आखिर उसका निवास कहां है? सुख ‘महल’ में है या कुटिया में, धन-दौलत में या औरत में, संसार की सुंदर वस्तुओं में या असीम आकर्षण वाली भोग-विलास की वस्तुओं में। दूसरों की सहानुभूति, सहायता और दया पर शिक्षा पाने वाला एक गरीब छात्र उस उज्जवल दिवस की आशा लगाये रहता है कि जब वह अपनी शिक्षा पूरी करेगा, एक अच्छी सी नौकरी पाएगा और फिर घर-गृहस्थी बसाएगा। उसे नौकरी भी मिल जाती है। परिवार की जरूरतों को अधिक प्रकार से पूरा भी करने लगता है। यद्यपि यह घटना उसे सुख प्रदान करती है पर बहुत जल्दी ही वह लड़का अपनी तुलना अपने साथियों से करने लगता है। वह अनुभव करने लगता है कि उसकी तुलना में दूसरे लोग अधिक सौभाग्यशाली हैं-वह लोग कम काम करते हैं और ज्यादा तनख्वाह पाते हैं। वस्तुत: धन-दौलत के पीछे भागने वाला व्यक्ति अपने से गरीब लोगों से तुलना नहीं करता, बल्कि अपने से समृद्ध लोगों से तुलना कर स्वयं को दु:खी बनाये रखता है। यदि वह धन-दौलत संबंधी अपनी आकांक्षा को पूरा करने में सफल भी हो जाता है तो और बातें उसे सुखी नहीं रहने देती। वह देखता है कि या तो उसका अपना स्वास्थ्य उसे सुखी नहीं रहने दे रहा है या फिर परिवार की चिन्ताएं उसे घेरे रहती है।

इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने को सुखी बनाने की दौड़ में लगा हुआ है, ज्यों-ज्यों वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है, त्यों-त्यों वह देखता है कि सुख बड़ी तेजी के साथ विपरीत दिशा की ओर भाग रहा है। व्यक्ति सुख के पीछे जितना भागता है, उतना ही उसे पाना कठिन होता है। कोई व्यक्ति अपनी सीमा के भीतर सुख का एक लक्ष्य निर्धरित करता है और फिर बड़ी कोशिशों के बाद उस तक पहुंचता है और अनजाने कारणों और स्रोतों से आई दु:ख की बड़ी लहर, उसके सुख की क्षणिक लहर को लील लेती है। इसका कारण यह है कि जब तक हमारी इच्छाओं का एक खास अंश पूरा होता है, तब तक और बहुत सी इच्छाएं उत्पन्न हो जाती हैं और इस तरह यह भाग-दौड़ लगी ही रहती है। अत: कुछ खास अवसरों पर व्यक्ति सुखी हो जाता है पर उसका यह सुख क्षणिक होता है और पलभर में ही दूसरी कई बातें उसके सुख की मन:स्थिति को भंग कर देती है तथा तमाम कोशिशों के बावजूद दु:ख की भूमिका पुन: शुरू होकर व्यथित करने लगती है।

इस तरह यह बात स्पष्ट है कि सांसारिक वस्तुओं की लालसा करना, उनके पीछे भागना-दौडऩा, सच्चे सुख की ओर ले जाने वाला सही रास्ता नहीं है। सांसारिक आनन्द का मार्ग हमें, दु:ख कष्ट के साथ उन क्षणिक आनन्दों की ओर ले जाता है जो मृगतृष्णा की भांति वास्तविक और स्थायी नजर आते हैं। हमारे आत्मकेंन्द्रित स्वार्थों तथा लालसाओं-इच्छाओं के मध्य चलने वाले सतत संघर्ष का एक ही परिणाम निकलता है। वह है- कष्ट और आपत्ति। सच्चा सुख प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव है पर यह सुख बाहरी वस्तुओं पर निर्भर रहता है, न कि बाहरी वस्तुओं से प्राप्त किया जा सकता है। अत: हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि सुख का उचित स्थान भीतर है बाहर नहीं। बाहरी सुखों का आकर्षण व्यक्ति को आत्मकेंन्द्रित होने का अपने भीतर देखने का अवसर ही नहीं देता, फलत: सतत् मौजूद रहने वाले सुख के स्रोत का अनुभव तक नहीं हो पाता। सुख के साम्राज्य की कुंजी बाहरी आकर्षणों को त्यागने में है। बाहरी वस्तुओं का क्षणभर के लिए भी सच्चा त्याग हमें अखंड, अमर सुख के अक्षय स्रोत, हमारी अपनी अंतरात्मा का दर्शन करा जाता है।

गणि राजेन्द्र विजय

(प्रस्तुति: ललित गर्ग)

 

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