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आर्थिक विकास का गडकरी मॉडल

आर्थिक विकास का गडकरी मॉडल

नरेन्द्र मोदी सरकार में विकसित भारत और समाज में एक समान विकास का नजरिया रखने वाले कई मंत्री हैं। उनमें सबसे विलक्षण रणनीतिकार नितिन गडकरी देश में विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिये अपने चुनिंदा अधिकारियों के साथ दिन-रात जुटे हुए हैं, ताकि भारत ‘मेक इन इंडिया’ के लिए दुनिया भर में पूंजी निवेश का पसंदीदा ठिकाना बन सके। अपने इसी नजरिए के साथ वे देश के हर बंदरगाह के लिए बेहतरीन तकनीक की तलाश में दुनिया भर के दौरे कर रहे हैं। इससे बेहतर और क्या होगा कि लंबे वर्षों के बाद एकदम नये विचारों के साथ कोई ऐसा मंत्री आया है, जो बंदरगाहों को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करके और नदियों को जोड़कर देश में किफायती परिवहन व्यवस्था तैयार करने की कोशिश में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है। उनकी योजना इसके जरिये देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 1 प्रतिशत अतिरिक्त वृद्धि दर हासिल करना है।

भारत के 7,517 किलोमीटर लंबे समुद्र तट में 12 बड़े बंदरगाह, 187 छोटे बंदरगाह और दुनिया में सबसे बड़ा व्यापारिक समुद्री बेड़ा है। इन आंकड़ों के बावजूद दुनिया के देशों में जहाजरानी के मामले में हम 16वें स्थान पर हैं। जहाजरानी मंत्रालय के मुताबिक देश का करीब 95 प्रतिशत व्यापार समुद्री परिवहन के जरिये होता है, जिसका मूल्य लगभग 70 प्रतिशत है।

प्राचीन काल से ही भारतीय अर्थव्यवस्था में जल परिवहन की बड़ी भूमिका रही है। सबसे आसान और सस्ता होने के नाते देश की विशाल नदियों को परिवहन के राजमार्ग की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। आयात और निर्यात के लिये नदियों व समुद्री बंदरगाहों का आर्थिक स्थिति की वृद्धि में अहम पहलू है। देश के भीतर पर्याप्त मात्रा में व्यापार न सिर्फ विभिन्न क्षेत्रों की जरूरतें पूरी करता है, बल्कि इससे देश में विकास भी संतुलित होता है। विदेशी व्यापार हमारे अतिरिक्त उत्पादनों की बिक्री और उन सामानों को पाने के तरीके है जो हमारे यहां उपलब्ध नहीं है। इससे देश का तेज गति से आर्थिक विकास होता है।

आज देश में जल परिवहन के जरिये होने वाले व्यापार का 95 प्रतिशत हिस्सा समुद्री रास्तों से होता है, और इसमें करीब 85 प्रतिशत व्यापार मुंबई, कोलकाता, कोच्चि, चेन्नई और विशाखापत्तनम के बंदरगाहों से होता है। हमारे लगभग समूचे समुद्री व्यापार का ज्यादातर हिस्सा इन्हीं बंदरगाहों के जरिये होने की भौगोलिक और ऐतिहासिक वजहें रही हैं। मुंबई, कोच्चि और कोलकाता लंबे समय तक देश के प्रशासनिक केंद्र रहे हैं। 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में रेल संपर्क मार्ग बनने के बाद इन शहरों की आर्थिक वृद्धि में तेजी आई। इस तरह राजनैतिक और रेल संपर्क का केंद्र होने के नाते यहां बड़े बंदरगाह भी विकसित हुए।

भाजपा ने अपने 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में अटलजी की ”सागर माला’’ यानी देश के समुद्र तटों पर बंदरगाहों की कड़ी बनाने की योजना पर नए सिरे से अमल का जिक्र है। मोदी अपने मुंबई दौरे के दौरान बंदरगाहों को भारत की आर्थिक समृद्धि का सदर दरवाजा बता चुके हैं। उनका मानना है कि भारत को ”बंदरगाह विकास’’ से ”बंदरगाह आधारित विकास’’ की ओर बढऩा चाहिए, जिससे देश में अवरुद्ध विशेष आर्थिक क्षेत्रों को नया जीवन मिलेगा। भारत अभी भी अपने बंदरगाहों के विकास की ही सोच रहा है, जबकि चीन कई कदम आगे बढ़कर अपनी सीमाओं के पार समुद्री परिवहन सुविधाओं के विकास में जुट गया है। ग्वादर (पाकिस्तान) और हंबनटोटा (श्रीलंका) में वह ग्रीनफील्ड बंदरगाह विकसित कर रहा है। चीन मालद्वीप में एक और बंदरगाह बना रहा है। ये सभी भारत के पड़ोस में ही हैं। बंदरगाह आधारित विकास की एक मिसाल सिंगापुर है, जो 50 साल के अंतराल में ही तीसरी दुनिया के देश से पहली दुनिया का देश बन गया है। जापान और दक्षिण कोरिया दोनों ही अपने अहम समुद्र तटों और बंदरगाहों से ज्यादा होने वाले व्यापार से काफी लाभान्वित हुए हैं।

इसके मुकाबले भारत में बंदरगाहों का ढांचा आधा-अधूरा है। मजदूरों और मशीनी उपयोग में भारतीय बंदरगाह उन बंदरगाहों से कमतर हैं। मुंबई, कांडला और कोच्चि को छोड़कर पश्चिमी भारत के बंदरगाह मौसम की गड़बडिय़ों की वजह से मई से अगस्त तक बंद रहते हैं। दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक चीन के पास दुनिया में सबसे व्यस्त बंदरगाह हैं। विश्व शिपिंग काउंसिल के मुताबिक चीन (हांगकांग समेत) के पास दुनिया के दस सबसे बड़े कंटेनर बंदरगाह हैं। दुनिया में तीन सबसे बड़े बंदरगाह सिंगापुर, बुसान (दक्षिण कोरिया) और दुबई (यूएई) हैं। मुंबई का नवशेवा बंदरगाह इस फेहरिस्त में 33वें स्थान पर है। 32वें स्थान पर कोलंबो भी मुंबई से ऊपर है। इससे पता चलता है कि 1990 के दशक में आर्थिक भूमंडलीकरण के बाद व्यापार काफी बढऩे के बावजूद हमारे बंदरगाहों का विकास कितना पीछे है।

नितिन गडकरी के जहाजरानी मंत्रालय में होने से सरकार बंदरगाहों के आधुनिकीकरण की ओर तेजी से बढ़ी है। जहाजरानी क्षेत्र के उत्थान के लिए कई कदम उठाए गए हैं। सरकार की योजना माल परिवहन और जीडीपी में वृद्धि दर तेज करने के लिये जल परिवहन को बढ़ावा देने की है। भारत में करीब 14,500 किलोमीटर जल मार्ग परिवहन के लिए अनुकूल है। इनमें नदियां, नहर, समुद्री झीलें, क्रीक वगैरह हैं। 2013-14 में 8 करोड़ टन माल की ढुलाई देश के भीतर जल परिवहन से हुई। हालांकि यह अभी गंगा-भागीरथी-हुगली नदियों के कुछ हिस्से, ब्रह्मपुत्र, बराक नदी, गोवा की नदियों, केरल की समुद्री झीलों, मुंबई की अंदरूनी खाडिय़ों और गोदावरी-कृष्णा के समुद्री किनारों तक ही सीमित हैं, लेकिन इसमें इजाफे की अकूत संभावना है। ओडिशा की ब्राह्मणी नदी में जल परिवहन की व्यवस्था करने से तलचर कोयला क्षेत्र से कोयले की ढुलाई में क्रांति आ जाएगी। इसके अलावा यह सबसे सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल भी है। इससे जल परिवहन के मार्ग में पडऩे वाले क्षेत्रों का विकास तेज होगा। पहले से भीड़भाड़ वाली सड़कों और रेल मार्गों पर बोझ भी काफी कम होगा। यह सचमुच बेहद खुशी की बात है कि नितिन गडकरी लंबे समय से उपेक्षित भारतीय जलमार्गों और बंदरगाहों को पुर्नजीवित करने में लगे हैं।

 

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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