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छोटे लाभ के लिए खो रहे हैं बड़े अवसर

छोटे लाभ के लिए खो रहे हैं बड़े अवसर

एक बात याद आती है, किसी समय में अमेरिकी पादरी हैरी एमर्सन फोसिडक ने चिड़चिड़े लोगों के बारे में कही थी। देखिए, लोग किस चीज के प्रति चिड़चिड़े हैं तभी यह पता लगेगा कि उनमें क्या कमी है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन कर हमारे सैन्य दिग्गजों में से कुछ लोग चिड़चिड़े लोगों की तरह बर्ताव कर रहे हैं और इस प्रक्रिया में वे न केवल अपने खोखलेपन को उजागर कर रहे हैं बल्कि, देश में आम नागरिकों और सेना के बीच अविश्वास के बीज भी बो रहे हैं। यह आगे जाकर कई अर्थों में देश के भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में तब हो रहा है जबकि पहली बार कोई केन्द्रीय सरकार सेना के मुद्दों पर सहानुभूतिपूर्व रवैया रखती है।

इसे भी याद रखना चाहिए कि पुराने सिपाहियों को साल 1971 तक ओआरओपी का लाभ मिल रहा था। इसी साल इंदिरा गांधी की सरकार ने सैन्यकर्मिंयों का पेंशन लाभ 50 से 70 फीसदी तक घटा दिया था और सिविल नौकरशाही के लिये 30 से 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी गई थी। इंदिरा गांधी ने सैन्य बल की तुलना में केंद्रीय अधिकारी तंत्र को अधिक खुलापन दे दिया था। इसके बाद आई सभी सरकारों ने केंद्रीय नौकरशाहों की तुलना में सेना को वेतन, अनुलाभ, पेंशन लाभ और महत्व देने के मामले में नीचे ही रखा। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए सैन्य बलों की तुलना में अधिक सीमाएं निर्धारित कर दी गईं थीं। नौकरशाहों के लिये यह एक ‘गैर क्रियात्मक उन्नयन’ का सिद्धांत है। ‘गैर क्रियात्मक उन्नयन’ नीति का मतलब है कि जब केंद्रीय नौकरशाह यानी की भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय विदेश सेवा के उच्च स्तर के अधिकारी एक तयशुदा प्रोन्नति पाकर (संयुक्त सचिव), बन जाते हैं और उनके सभी ग्रुप (ए) के केंद्रीय साथी प्रोन्नति के दो साल बाद संयुक्त सचिव स्तर का वेतनमान पाना शुरु कर देते हैं। यह हर प्रकार से जारी रहता है लेकिन, ऐसा भारतीय सेना पर लागू नहीं होता है। जिसकी संरचना बेहद उच्च स्तर के पिरामिड के समान है, जहां 60 फीसदी 40 साल की उम्र में, 20 फीसदी 54 साल की उम्र में और 19 फीसदी 60 साल की उम्र में सेवानिवृत होते हैं और बचे हुए सिर्फ एक फीसदी ही अपनी सेवा में मुखिया के पद पर पहुंचते हैं, जबकि 99.9 प्रतिशत नौकरशाह 60 साल की उम्र में ही सेवानिवृत होते हैं। यह किसी विडंबना से कम नहीं हैं। बेशक यह एक बड़ी मिथ्या ही है कि, ओआरओपी भारतीय सेना में लागू नहीं है जबकि, यह नौकरशाहों और अन्य सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिये है। वर्तमान में ओआरओपी नौकरशाही और सेना दोनों ही जगहों पर लागू है, उनके लिये जो अपने रिटायरमेंट के समय उच्चतम वेतनमान 80000 रुपये पा रहे हैं या फिर नौकरशाही में सचिव और सेना में लेफ्टिनेंट जनरल या कमांडर के पद पर पहुंचे हों। लेकिन, इन तथ्यों में सच तो यह है कि ज्यादातर सैनिक 60 साल की उम्र के पहले ही रिटायर हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि इन सैनिकों की मांग पर ध्यानपूर्वक और न्यायसंगत फैसला किया गया है, जिसे कांग्रेस के शासन में अचानक ही खत्म कर दिया गया था। जबकि सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ साल 1971 के युद्ध में भव्य तरीके से देश को विजय दिलाई थी। तब से भारतीय सेना के पुराने सैनिक (योद्धा) इस अन्याय के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी मांग है कि सेना के वे कर्मचारी जो एक रैंक पर एक समान अवधि तक नौकरी में रहने के बाद रिटायर हो चुके हैं, उन्हें पूर्व के पेंशनरों की तरह ही एक समान पेंशन और अन्य वृद्धि भत्ते दिये जायें।

मोदी सरकार ने बीते 5 सितंबर को भारतीय सेना के सैनिकों की ये मांगे मान लीं और कहा कि ये सुविधाएं पहली जुलाई साल 2014 की तारीख से प्रभावी होंगी, जबकि ओआरओपी के आकलन के लिए साल 2013 बुनियादी वर्ष होगा। एरियर का भुगतान किस्तों में साढ़े चार साल में होगा। सैनिकों की विधवाओं, युद्ध में मारे गए सैनिकों की विधवाओं को एरियर का भुगतान एक किस्त में किया जाएगा। एक रैंक पर एक समान अवधि तक नौकरी में रहने के बाद रिटायर होने वाले सैन्य कर्मियों की पेंशन दोबारा निर्धारित की जाएगी। इसके लिए साल 2013 में, औसतन कम-से-कम और ज्यादातर पेंशन को आधार बनाया जाएगा। जो औसत से ज्यादा पेंशन पा रहे हैं उनका ध्यान रखा जाएगा। सरकार ने यह तय किया है कि पूर्व और वर्तमान पेंशन दरों और पेंशनरों के बीच की खाई को पाटने के लिये हर पांच साल में इसकी समीक्षा की जाएगी।

24-10-2015

बीते 5 सितंबर को जब रक्षा मंत्री मनोहर पारिकर ने ओआरओपी स्कीम का ऐलान किया। तब इस बात के ऊपर थोड़ा संशय था कि जिन सैनिकों ने स्वैच्छिक सेवानिवृति ली है उन्हें ओआरओपी स्कीम का लाभ मिलेगा या नहीं। लेकिन, बाद में प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री दोनों ने ही अलग-अलग अपने बयानों में साफ किया कि कोई भी सैनिक या सैन्यकर्मी जो चोट लगने, जख्मी होने, बीमार होने या पारिवारिक समस्याओं की वजह से आगे प्रमोशन नहीं पा सके और समय से पहले रिटायर हो गये उन्हें ओआरओपी स्कीम का लाभ मिलेगा। लेकिन, इसके लिये एक तय सेवा अवधि सैनिकों से लेकर अधिकारियों तक के लिये पूरा करना अनिवार्य है, जो सैनिकों के लिये 15 साल और अधिकारियों के लिये 20 साल तय है, उन्हें ओआरओपी स्कीम का लाभ जरुर मिलेगा। बहरहाल पूर्व सैनिक हर साल पेंशन नीति की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। जबकि, सरकार ने इसके लिए पांच वर्षों का समय तय किया है। दरअसल यह पूर्व सैनिकों और उनकी मांगों के बीच रास्ता निकालने का एक तरीका है। क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में सरकारी कर्मचारियों के वेतन की समीक्षा हर दस साल में एक बार होती है। यह कहा गया है कि यह समझौता वित्तीय संबंधों की वजह से (जो बहुत ज्यादा नहीं है) नहीं बल्कि प्रशासनिक दिक्कतों की वजह से किया गया है। हर साल पेंशन की समीक्षा करना बेहद ही बोझिल और जटिल होगा। हां, यहां कई छोटे-छोटे तकलीफ देने वाले मुद्दे हैं, पेंशन से जुड़े सभी मुद्दे विसंगति और समीक्षा के विषयों को सदस्यों की एक कमेटी देखेगी। लेकिन, यह ऐसा विषय नहीं है, जिस पर राजनीति और रैली की योजना बनाकर केन्द्र सरकार को बिहार में होने वाले चुनाव के पहले घेरा जा सके। पूर्व सैनिकों का एक वर्ग दिल्ली के जंतर-मंतर पर यही करता दिख रहा है। लेकिन, इसमें से भी अधिसंख्य पूर्व सैनिक और सैनिक सरकार के फैसले को स्वीकार करते दिख रहे हैं। सच तो यह है कि जिस तरीके से आंदोलन अपनी चाल बदल रहा है उससे तो यही लगता है कि इसे देश-विरोधी तत्वों ने अपने हाथों में ले लिया है। एक रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन ने राजद्रोह भरे ई-मेल को लिखकर भारतीय सैनिकों से पूछा कि वे इस देश के लिये सीमा पर अपनी जान क्यों दे रहे हैं? इसे जंतर-मंतर पर मौजूद एक रिटायर्ड मेजर जनरल ने खूब प्रचारित किया। वैसे यह ई-मेल पाकिस्तानी हाई कमिशन के साथ ही विदेशी शिष्टमंडलों को भी भेजा गया। इस मेल की प्रति को लेकर पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सैनिकों का मजाक भी उड़ाया। उस मेजर जनरल को अब ओआरओपी आंदोलन को और मजबूती से चलाने के लिए कैलिफोर्निया आमंत्रित किया गया है, वहां स्थित एक गैर सरकारी संगठन ने उन्हें 3 लाख डॉलर की मदद की पेशकश की है। इस एनजीओ का मालिक पाकिस्तानी मूल का नागरिक इफितखार चौधरी है। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव में जिस ओआरओपी को देने का वादा किया था उसे सरकार बनने के 15 महीने बाद पूरा कर दिया। कुछ विरोध प्रदर्शन मोदी सरकार के विरोध में चल रहे हैं, जबकि सरकार के इस कदम की काफी सराहना हुई है। विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी इसका दावा करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है कि संप्रग (यूपीए) सरकार ने इस योजना को मंजूरी दी थी। एक निर्दलीय राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर भी ओआरओपी को लागू करने के पक्ष में आवाज उठाने में आगे रहे हैं। उन्होंने रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर द्वारा ओआरओपी लागू किये जाने के बाद कहा कि पूर्व सैनिकों और उनकी विधवाओं के 40 वर्षों की लंबित मांग पूरी हुई है। देश इन्हें दशकों तक जान पर खेलकर सेवा और बलिदान देने के लिए धन्यवाद देता है। उन्होंने ओआरओपी देने के फैसले के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और वित्त मंत्री अरुण जेटली की जमकर तारीफ की और इसे आजादी के बाद पूर्व सैनिकों के लिये उठाया गया सर्वाधिक महत्वूर्ण और कल्याणकारी फैसला करार दिया। उन्होंने इसे खासकर खुद के द्वारा 9 वर्षों से किये गये संघर्ष का सुखद अंत बताया और कहा कि पूर्व योद्धाओं को इसके लिए तिरस्कार भरे दिनों का सामना करना पड़ा और इसे लागू करने के लिए उन्होंने साल 2006 में अपने मेडल तक लौटा दिए थे। उन्होंने कहा कि सक्रिय राजनीति में आने के बाद से ही ओआरओपी उनके लिए हमेशा पहला मुद्दा रहा, इस वजह से उनके लिए ओआरओपी एक बड़ी सौगात के समान है। इन सबसे अलग हटकर सांसद राजीव चंद्रशेखर इस विषय को संसद और मीडिया में लगातार उठाते रहे, इस वजह से उन्हें कई बार राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा ‘ओआरओपी राजीव’ के नाम से भी पुकारा गया। ‘राजीव को इस बात का गर्व है कि वे भारतीय सेना के पूर्व योद्धाओं द्वारा बेंगलुरु, दिल्ली और जंतर-मंतर पर गये कई प्रदर्शनों में शामिल हुए’। एक और संभ्रांत राजनीतिक शख्सियत हैं, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोशियारी। इनके नेतृत्व में ही साल 2011 में ओआरओपी की योजना बनाने वाली संसदीय कमेटी का गठन किया गया था, कोशियारी इस धरना-प्रदर्शन से नाराज हैं, वे कहते हैं कि ‘शायद कुछ प्रदर्शनकारी यह समझते हैं कि सरकार उनको सुन रही है इसलिए वे संभव से ज्यादा निचोडऩा चाहते हैं। लालच इस खेल का एक हिस्सा हो सकता है। मैं यह नहीं कह सकता कि इसके पीछे कोई राजनीतिक प्रेरणा काम कर रही है। एक पार्टी ने देश में छह दशकों तक शासन किया, लेकिन ऐसी चीजें देखने को नहीं मिलीं। ये सरकार मुश्किल से एक साल पुरानी है और आप इस तरह विरोध को ऊंचा स्वर दे रहे हैं या उठा रहे हैं। कोशियारी के मुताबिक मोदी सरकार ओआरओपी पर किये अपने वादे को 99 प्रतिशत पूरा कर चुकी है। प्रदर्शनकारियों को अब लचीलापन और उदारता दिखानी चाहिए। एक महान सैनिक हमेशा इस बात को जानता है कि कभी-कभी मुख्य लक्ष्य को हासिल करने के लिए थोड़ा पीछे हटना पड़ता है।’

24-10-2015

जिस तरह मोदी सरकार ओआरओपी की मांग को स्वीकृत दे चुकी है, उससे केंद्र सरकार के खजाने पर कम-से-कम 18,000 से 22,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। इन चीजों के अलावा यह भी सच है कि भारतीय सेना की जन शक्ति का खर्चा बहुत ही ज्यादा है। साल 2014-15 के रक्षा बजट में सरकार ने एक बार नहीं बल्कि, दो बार वेतन, पेंशन और प्रतिदिन के खर्चों को पूरा करने की कोशिश की। इसके लिए राजस्व और पूंजीगत खर्चों में बदलाव भी किया। पहली बार जनवरी 2014 में अतिरिक्त राशि के रुप में 7,870 करोड़ रुपये और दूसरी बार जल्द ही 13,000 करोड़ रुपये की रकम जारी की थी। विशेषकर, सेना के पेंशन की बात की जाये तो यह राशि हर साल बढ़ ही रही है। साल 1981-82 में कुल रक्षा बजट में इसकी राशि 6.8 फीसदी यानी 1,670 करोड़ रुपये थी। साल 2015-16 के रक्षा बजट में इसकी राशि बढ़कर 54,500 करोड़ रुपये हो गई जो कुल रक्षा बजट का 16.5 फीसदी है। सच तो यह है कि ताजे अनुमान के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में इसकी राशि 44,475 करोड़ रुपये थी। पिछले बीस सालों से इस राशि में सालाना 10,000 करोड़ रुपये से भी अधिक का इजाफा हो रहा है। कहते हैं कि गैर सेना क्षेत्रों की तुलना में सेना की पेंशन की राशि में यह बढ़ोतरी एक साल में सबसे ज्यादा है और अभी सातवें वेतन आयोग का लाभ मिलना बाकी ही है, इससे तो रक्षा क्षेत्र का पेंशन कई हजार करोड़ बढ़ जाएगा। अध्ययनों के मुताबिक हर एक भारतीय सैनिक के पीछे 1.7 पेंशनर है। हर साल 70,000 रिटायर कर्मी रिटायर होंगे – वर्तमान में पेंशनरों की संख्या 26 लाख और सैनिकों के विधवाओं की संख्या 60,000 है – तो स्थिति कितनी भयावह होगी। इसका अनुमान लगाया जा सकता है कि ओआरओपी (एक साल, एक रैंक और एक पेंशन) कितना कटु प्रस्ताव है।

अभी तक मोदी सरकार ने ओआरओपी की मांग मान ली है। लेकिन, प्रदर्शनकारी इसकी तारीफ करने में विफल रहे हैं। इसकी पृष्ठभूमि में देखा जाये तो हमें कोशियारी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर मनमोहन सिंह सरकार का रिकॉर्ड देखना होगा, तब सरकार ने साल 2011-12 में ओआरओपी के तहत 1300 करोड़ रुपयों को एरियर के तौर पर देने के लिए लाई थी। साल 2013-14 में सरकार ने इसमें इजाफा करते हुए इस राशि को बढ़ाकर 1573 करोड़ किया। उस समय में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने अपने अंतरिम बजट भाषण 17 फरवरी 2014 को कहा था कि इसके लिए साल 2014-15 के लिए 500 करोड़ रुपये (1573 करोड़ रुपये के अनुमान के आधार पर) मंजूर किया गया है, जो कि बहुत कम था

इस पर आश्चर्य नहीं होता जब रक्षा विशेषज्ञ नितिन गोखले यह कहते हैं कि यूपीए सरकार में लंबे समय तक रक्षा मंत्री रहे ए.के.एंटनी ने इस मामले में तत्परता नहीं दिखाई। सिर्फ साल 2014 के चुनाव की पूर्व संध्या पर आधे-अधूरे मन से पूर्व सैनिकों के प्रति प्रेम दिखाने का प्रयास किया। इसलिए अब मिस्टर एंटनी कहते हैं कि हमने ओआरओपी के मूल सिद्धातों को स्वाकार कर लिया था और एनडीए उसे लागू कर रही है, यह इनकी दगाबाजी को दर्शाती है। पूर्व सैनिकों का ये आंदोलन चार साल के लंबे समय साल 2008 से 2012 तक चलता रहा। जब बेहद ही तकलीफों से अर्जित अवार्डों को लौटाने के लिए सेना के पूर्व सैनिक हर हफ्ते मार्च निकाल कर राष्ट्रपति भवन जाते थे, लेकिन यूपीए की सरकार उन्हें कोई भी सकारात्मक संकेत देने में विफल रही। जैसे कि मैंने लिखा है, यहां खबर यह है कि अर्धसैनिक बलों के पूर्व जवान भी सेना की तरह ही ओआरओपी की मांग को लेकर धमकी दे रहे हैं। सेना के रिटायर्ड सैनिक भी उनकी मांगों को खारिज नहीं कर सकते, वे कहते हैं कि अर्धसैनिक बलों के कर्मी भी 60 साल की उम्र तक काम करते हैं, ऐसे में उन्हें किसी खास प्रावधान, ओआरओपी की जरुरत नहीं है। लेकिन, जब अर्धसैनिक बल का एक अधिकारी मुझे फोन कर कहता है कि अगर यही मामला है तो जिन रिटायर्ड सैन्यकर्मियों को ओआरओपी की सुविधा मिल रही है, उन्हें अन्य सुविधाओं से वंचित कर दिया जाना चाहिए। जैसे कि राज्य सरकारों से बेहद कम दामों पर उन्हें जमीन के टुकड़े का मिलना, रिटायर होने के बाद राज्य सरकार में नौकरी मिलना और जीवन भर सेना की कैंटीन की सुविधाएं मिलना बंद कर दिया जाना चाहिए। तो मैं किंकर्तव्यविमूढ़ रह जाता हूं।

ओआरओपी का मामला अब तय हो चुका है। लेकिन, इसके जरिये यह बताना जरुरी है कि यह आदर्श स्थिति नहीं है। क्योंकि, बजट की अधिकांश राशि जनशक्ति पर ही खर्च होती है, भारतीय सेना के पास पर्याप्त संसाधनों का अभाव है जिससे कि वह बेहद ही महत्वपूर्ण और युद्ध जिताऊ हथियारों को खरीद सके, जिसकी बदौलत लड़ाईयां जीती जा सकें। यहां एक आदर्श स्थिति यह हो सकती है कि जो सैनिक जवानी के दिनों में ही नौकरी छोड़ देते हैं, रिटायर हो जाते हैं, उन्हें अर्धसैनिक बलों या अन्य सरकारी नौकरियों में शामिल कर लिया जाये। लेकिन, यह एक अलग पैमाना था इसके बारे में बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता। शायद यह अलोकप्रिय भी हो, लेकिन यह कटु सत्य है कि भारतीय सेना इतनी बड़ी जनशक्ति को वहन नहीं कर सकती है और इसे जरुर छोटा किया जाना चाहिए।

पिछले बीस सालों में सभी बड़े देशों की सेनाओं की जनशक्ति में भारी कटौती की गई है। बहुत पहले साल 2003 में चीन ने अपनी 25 लाख की मजबूत सेना को छोटा करने का फैसला किया। ग्रेट ब्रिटेन ने सेना में 20 फीसदी की कटौती का ऐलान करते हुए 82,000 सैनिकों की संख्या को एक दशक में कम करने की बात कही। ब्लादिमिर पुतिन के नेतृत्व में एक बार मरनासन्न दिखने वाली रुसी सेना कम और फुर्तीले तरीके से वार करने वाली सेना होती दिखती है। वर्तमान समय में रुसी सैनिक बड़े डिवीजनों में नहीं बल्कि, टुकडिय़ों में लड़ते हैं। उसी प्रकार अमेरिका ने भी सैन्य घाटों को पाटने के लिए सेना को छोटा करने का फैसला किया है। इसके लिए वित्तीय अवरोधों का हवाला दिया गया, जिसे वह महसूस कर रहा है। पेंटागन ने भी सेना के बजट में बड़े पैमाने पर करोड़ों डॉलर की कमी करने के लिए कहा है। इसके साथ ही अमेरिकी रक्षा विभाग एक नये रक्षा प्लान और रक्षा पॉलिसी के दस्तावेज तैयार करने में जुटा है। जिससे कि आने वाले वर्षों में अमेरिकी सेना में मानव शक्ति को कम किया जा सके। उल्लेखनीय है कि जिन देशों का जिक्र ऊपर किया गया है वह विश्व के चार सबसे बड़ी सैन्यशक्ति हैं, हालांकि एक क्रम में नहीं हैं। क्या भारतीय सेना जो विश्व में एक विशिष्ट सैन्य शक्ति है उसे अन्य देशों के अपनी सेना को छोटा करने के फैसले के चलन को अपनी सेना में लागू करने की बजाय टाल देना चाहिए? जैसा कि भारतीय सेना विश्व की दूसरी बड़ी सेना है। जिसमें 38,000 अधिकारी और 11.38 लाख सैनिक हैं। जनशक्ति के मामले के साथ ही बुनियादी ढांचे की एक विस्तृत समीक्षा, दोनों ही एक लागत प्रभावी सेना को बनाने के लिए अपेक्षित है। यहां यह भी उल्लेखनिय है कि सेना को छोटा करने का मतलब कमजोर करना नहीं है। जनशक्ति को घटाने से विशेष रूप से, अंतरिक्ष में नई प्रौद्योगिकियों और ऐसे आईएसआर (खुफिया, निगरानी और टोही) और मानव रहित प्रणाली के रूप में होशियार सिस्टम होंगे और साइबर स्पेस क्षमताओं में, पूंजीगत व्यय के लिए अधिक संसाधन बचेंगे। बेहतर हार्डवेयर के साथ, सेना को और अधिक चुस्त, लचीला, घातक, अभिनव और रचनात्मक बनाया जा सकता है। इसी प्रकार, सेना के पुनर्गठन का मतलब इसे कमजोर बनाना नहीं है। इस तरह के सैन्य फर्मों और सेना डाक सेवा के रूप में अनावश्यक कार्यों को आउटसोर्स क्यों नहीं किया जा सकता है। यहां इसका कोई कारण नहीं दिखता हैं। हमारी तीनों सेवाओं चिकित्सा, खुफिया, वेतन और आपूर्ति विभाग के कर्मियों का क्यों नहीं विलय किया जा सकता है। यहां इसकी कोई वजह हमें नहीं दिखाई देती है कि हम इसे शुरु क्यों नहीं करते हैं। इसी प्रकार पेंशन बिल को कम करने के लिए शॉर्ट सर्विस कमीशन (5 वर्ष) के तहत रंगरूटों को शामिल क्यों नहीं किया जाना चाहिए। यह सब हमारे सशस्त्र बलों को मजबूत बनाएगा, अन्यथा नहीं। किंतु ये जैसे भी हो, यह कल्पना करना मुश्किल है कि कट्टर ओआरओपी प्रदर्शनकारी, जिनकी कुछ हजार रुपयों की लालची मानसिकता को देखते हुए, भारतीय सेना और देश की सुरक्षा के दीर्घकालिक हित के बारे में सोचेंगे। वे जिस रास्ते पर अडिग हैं और जैसी राजनीति कर रहे हैं, वो भारतीय राज्य और सेना के संबंधों के बीच मूलभूत बदलाव ला सकता है। इस बिंदु को अनदेखा किया गया लगता है।

24-10-2015

हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि भारत उन कुछ देशों में शामिल है जो उपनिवेशिक बस्ती के बाद राजनीतिक रुप से स्वाधीन है। यहां कभी भी राजनीति के ऊपर सेना का दबदबा नहीं रहा। यह कोई उपलब्धि नहीं बल्कि तुलनात्मक है कि जहां एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में सेना का दबदबा है, इसके साथ ही भारत के ही नजदीकी पड़ोसी देश पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार में सेना का दबदबा है। सच तो यह है कि पूर्व उपनिवेशिक लोकतांत्रिक देशों के लिए सेना के वर्चस्व को कम करना बड़ी चुनौती रही है। लेकिन, भारतीय लोकतांत्रिक ढ़ांचे में सेना का दबदबा नहीं होने के कई कारण हैं। लेकिन, हमें दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए। पहला यह कि स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई के समय से ही हमारी विचारधारा लोकतांत्रिक रही है, आजादी के बाद से ही देश के नेताओं में धर्म और पार्टी के ऊपर उठकर लोकतंत्र के प्रति गहरे विश्वास की सोच रही। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आजादी के बाद से ही भारतीय सेना में लगातार विविधता यानी की हर जाति, धर्म और देश के कोने-कोने के लोगों का शामिल होना। जिन देशों में सेना का दबदबा है उन देशों की सेना में एक दबंग वर्ग और क्षेत्र विशेष के लोगों का दबदबा है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान में सेना के जबरदस्त वर्चस्व के पीछे में वहां के सबसे बड़े प्रांत पंजाब के ही 70 फीसदी लोगों का सेना में होना है। इसके विपरीत भारतीय सेना पर नागरिक और राजनीतिक नियंत्रण है। भारत के विशेष संदर्भ में देखा जाये तो विद्वान लोग साल 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय और 1987-90 में एलटीटीई से लड़ाई के समय ‘व्यक्तिपरक नियंत्रण’ के रुप में देखते हैं। रक्षा मंत्रालय में तैनात नौकरशाह भी सामरिक लक्ष्यों को निर्धारित करने में और इसे अधिक प्रभावी बनाने की बजाय इसकी उपेक्षा कर अस्वस्थ्य कार्य कर रहे हैं। सामरिक गुरु स्व. सुब्रह्मण्यम ने लिखा है, ‘राजनेता बिना किसी भी जिम्मेदारी के शक्ति का आनंद उठा रहे हैं, नौकरशाह बिना किसी जवाबदेही के काम में लगे हैं और सेना तमाम जिम्मेदारियों के साथ दिशाहिन चल रही है। वास्तव में, सेना के इन वैध तर्कसंगत शिकायतों का मैंने हमेशा समर्थन किया है। इसकी कोई वजह नहीं कि भारत में एकीकृत रक्षा मंत्रालय नहीं हो। आखिर भारत में इसकी क्या वजह है कि देश की सेना में पांच सितारा प्रधान न हो। जैसा कि हम अन्य विकसित लोकतांत्रिक देशों में देखते हैं। सैनिकों का प्रदर्शन और उनकी दलीलें अनोखी हैं। देश के लिए उनका काम बेमिसाल है और उन्हें उनके द्वारा किये गये सेवा के लिए अन्य सेवाओं में कार्यरत कर्मियों की बजाय ज्यादा सुविधाएं और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन, जब वे यह कहते हैं कि वे अन्य से श्रेष्ठ हैं तो उनकी मांग खतरनाक रुप से सामने आ जाती हैं। वे किसी प्रकार की तर्कसंगत और समझौता वादी आवाज को भी सुनना नहीं चाहते हैं। यहां बताना चाहूंगा कि आजादी के बाद से अब तक की सभी सरकारों में मोदी सरकार सेना की सबसे बड़ी हितैषी है। यह बारंबार विशेष रुप से कहने की बात नहीं है कि मोदी सरकार के दो मंत्रियों की पृष्ठभूमि सेना की है, जिनमें एक पूर्व सेनाध्यक्ष और कर्नल हैं। (मैं समझता हूं कि शायद ऐसा पहले नहीं देखा गया) पहले केवल यह देखा गया कि रिटायर होने के बाद नौकरशाह राजनीति में आकर मंत्री बनें थे। पिछले लोकसभा चुनाव में एक पूर्व गृह सचिव और पूर्व पुलिस कमिश्नर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर सांसद बनें। लेकिन, मोदी ने नौकरशाहों को मंत्री बनाने की नीति को तोड़ते हुए लीक से अलग हटकर दो पूर्व सैन्य अधिकारियों जनरल वी.के. सिंह और राज्यवर्धन सिंह राठौर को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया।

इसे देखते हुए लगता है कि मोदी सरकार सेना की दो पुरानी लेकिन, बड़ी आवश्यकताओं की मांगों को जल्द ही पूरा कर सकती है। जिससे की सेना अपना लक्ष्य हासिल कर सके। इसमें पहली एकीकृत रक्षा प्रणाली और दूसरी सैन्य सेवाओं का पांच सितारा प्रधान पद इसे आसानी से अमल में लाया जा सकता था। लेकिन, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे पूर्व योद्धा हर बीतते दिन के साथ ही असल में इन दोनों लक्ष्यों को हासिल ही नहीं करना चाहते हैं। वो छोटी चीजों को हासिल करने के लिए बड़े अवसरों को खो रहे हैं।

प्रकाश नंदा

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