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राजस्थान में खान-खजाने की लूट का मकडज़ाल

राजस्थान में खान-खजाने की लूट का मकडज़ाल

राजनीति के चाणक्य, मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र के जमाने की बात है। तब यह चर्चा जोरों पर थी कि मध्य प्रदेश और राजस्थान के भूगर्भ में अकूत खनिज सम्पदा के बेहतर दोहन से इतना राजस्व एकत्रित किया जा सकता है कि जनता पर टैक्स लगाने की जरूरत ही नहीं पड़े। स्कूली पाठ्यक्रम में राजस्थान को खनिजों के ‘अजायबघर’ की संज्ञा दी जाती थी। यह हकीकत भी है। दुनिया के प्राचीन पर्वतों में शामिल और हिमालय से भी पुरानी अरावली पर्वत श्रृंखला ने राजस्थान को प्राकृतिक रूप से दो भागों में विभक्तकर रखा है। यह उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में आता है। जिसके भौगोलिक क्षेत्रों के वर्गीकरण में क्षेत्रानुसार खनिज सम्पदा है, वही मरूस्थलीय इलाके में प्राकृतिक तेल एवं गैस के विपुल भंडार हैं। इसके योजनाबद्ध दोहन से राजस्थान आर्थिक दृष्टि से अग्रणी प्रदेशों की श्रेणी में शामिल होगा।

राजस्थान के सरकारी खजाने की महत्वपूर्ण चाबी खनिज संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भूगर्भ में है, लेकिन खान विभाग में घूसखोरी एवं महाघोटालों का मकडज़ाल सतह पर आ गया है। इस खजाने की चाबी घुमाने वाले निलंबित खान एवं पेट्रोलियम विभाग के प्रमुख शासन सचिव डॉ. अशोक सिंघवी उनके विश्वस्त दलाल संजय सेठी तथा खान विभाग के राजदार अतिरिक्त निदेशक पंकज गहलोत सहित आठ व्यक्ति जेल की सलाखों के पीछे हंै। ललित मोदी प्रकरण के साथ ही प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने खान महाघोटाले को लेकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को फिर से निशाने पर लिया है तो नवम्बर माह में राज्य सरकार के प्रस्तावित ”रिसर्जेन्ट राजस्थान’’ में तीन लाख करोड़ रूपये के निवेश के लक्ष्य के तहत पेट्रोलियम क्षेत्र में तीस हजार करोड़ के 09 एम.ओ.यू. होने के बाद खान क्षेत्र में 60 से 70 हजार करोड़ के निवेश के लिए एम.ओ.यू. को लेकर सवालिया निशान खड़े हो गये हैं।

इसकी तैयारी डॉ. सिंघवी की देखरेख में की जानी थी। राज्य की प्रस्तावित खनन नीति फिलहाल अधर में झूल रही है। घूसखोर लॉबी इस नीति की आड़ में अपने मंसूबे पूरे करने की तैयारी में थी।

24-10-2015तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जोधपुर क्षेत्र में अपने रिश्तेदारों को खान आवंटन संबंधी भारतीय जनता पार्टी के आरोप के संदर्भ में राज्य विधानसभा में वर्ष 2013-14 के बजट पर हुई चर्चा के दौरान 22 मार्च 2013 को ”खान विभाग की कारगुजारी’’ को दिलचस्प अंदाज में रखा था। अपने कार्यकाल में घोषित खनिज नीति-2011 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा था कि ट्रांसपेरेंसी का एक नया चैप्टर शुरू होना चाहिए और माइनिंग डिपार्टमेंट ऐसा है, जहां आप देखते हैं कि क्या हालत है? वहां का चपरासी और क्लर्क आपको बता देगा कि किसको कहां माइंस लगानी है? कहां माइंस मिलनी है? कैसे मिलनी है? यह गाइड वही करता रहा है आज तक। अवैध माइनिंग होती है। माइनिंग माफिया पैदा होते हैं, रॉयल्टी माफिया पैदा होते हैं और राजस्थान के अंदर माहौल खराब होता है। खान विभाग के घूसकांड ने इसका खुलासा कर दिया है। जिसमें चित्तोडग़ढ़ क्षेत्र की छह बंदखानों को चालू कराने की एवज में 22 करोड़ की डील में 2.55 करोड़ की प्रथम किस्त सहित आरोपियों से 4.28 करोड़ की राशि बरामद की गई। सिंघवी के घर से तो शराब की बोतलें भी मिलीं। यद्यपि खान आवंटन में गड़बडिय़ों के मामले मीडिया में उजागर होते रहे हैं, लेकिन सरकार ने गंभीरता से इसको नोटिस नहीं किया।

24-10-2015विधानसभा के पटल पर गहलोत द्वारा कही गई बात का खुलासा खान विभाग में घूसखोरी तथा महाघोटालों से उजागर हो गया है और संयोगवश ”सितम्बर माह’’ का घटनाक्रम इससे जुड़ गया है। एक चिकित्सक पिता ने अपने बेटे को ब्यूरोक्रेट यानी आईएएस बनाने के सपने की वर्षों पुरानी कथा सुनाने के दस दिन बाद उसकी गिरफ्तारी क्या महज संयोग थी। जोधपुर के डॉ. एस. एन. मेडिकल कॉलेज का गोल्डन जुबली 18 से 20 दिसम्बर 2015 को मनाया जाना है। इसी समारोह की श्रृंखला में पांच सितम्बर शिक्षक दिवस पर मेडिकल टीचर्स को सम्मानित किया गया। डॉ. देसाई और जोधपुर अंचल के जानेमाने सर्जन डॉ. अजीतमल सिंघवी भी इनमें शामिल थे। अपने परिवार और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की चर्चा के दौरान डॉ. सिंघवी ने सहज भाव से कहा कि डॉक्टरी पेशे में जितनी मेहनत होती है उतना रिटर्न नहीं मिलता। पैसा तो कमा लिया जाता है, लेकिन पावर या अथॉरिटी नहीं मिलती। नेतागण भी यही शिकायत करते हैं कि ब्यूरोक्रेट हमारी नहीं सुनते। इसी कथाक्रम में यादों को ताजा करते हुए उन्होंने अपने बेटे अशोक सिंघवी को ब्यूरोक्रेट बनाने संबंधी ”मन की बात’’ बताई। पाली जिले में जैतारण स्थित अपने ननिहाल में 11 सितम्बर 1959 को पैदा हुए अशोक ने जयपुर के सेंट जेवियर में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। तब पिता 1966 से 1969 तक एसएमएस मेडिकल कॉलेज में थे। जोधपुर आने पर अशोक, महेश पब्लिक स्कूल में जीव विज्ञान विषय के साथ टॉपर स्टूडेंट बना। लेकिन, पिता उसे चिकित्सक की जगह ब्यूरोक्रेट बनाने के इच्छुक थे। लिहाजा अशोक ने बी.ए. ऑनर्स में जोधपुर यूनिवर्सिटी में टॉप किया। अशोक सिंघवी के साल 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन से पिता का सपना तो साकार हुआ, लेकिन तीन दशकों बाद इसका परिणाम ऐसा होगा, इस बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।

ठीक दस दिन बाद जयपुर में 16 सितम्बर को चौदहवीं राज्य विधानसभा का पांचवां सत्र आरम्भ हुआ और शाम होते-होते भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (एसीबी) की गिरफ्त में आये डॉ. अशोक सिंघवी और उनकी टीम अब मीडिया की सुर्खीयों में हैं। इससे पांच दिन पहले 11 सितम्बर को उनका 56वां जन्मदिन था, तब इस महाघूसकांड की प्रमुख कड़ी दलाल संजय सेठी अपने आका को बधाई देने शासन सचिवालय पहुंचा था। गिरफ्तारी से दो दिन पहले 14 सितम्बर को सलाहकार परिषद की बैठक में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने डॉ. सिंघवी के प्रदर्शन की जमकर तारीफ करते हुए अन्य अधिकारियों को उनसे नसीहत लेने की सीख दी थी। यह भी संयोग रहा कि डॉ. सिंघवी करीब दो दशक पहले उदयपुर में कलेक्टर रह चुके थे और खान विभाग के महाघूसखोरी कांड के खुलासे में अहम भूमिका निभाने वाले एसीबी महानिरीक्षक दिनेश भी उदयपुर में पुलिस अधीक्षक रहे थे।

जयपुर के बाद कांग्रेस ने राजस्थान की भाजपा सरकार के खिलाफ दिल्ली में मोर्चा खोला। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी ने प्रेस वार्ता में वसुंधरा राजे सरकार पर अपने चहेतों को करीब एक लाख बीघा जमीन में फैले 653 खानों की बदंरबाट का आरोप लगाते हुए यह दावा किया कि इन खानों की नीलामी से सरकार को 45,000 करोड़ रूपये मिल सकते थे। कांग्रेस ने इसे राजस्थान का सबसे बड़ा घोटाला बताते हुए प्रधानमंत्री की चुप्पी पर हैरानी जताई और सड़क पर उतरने की चेतावनी दी है। कांग्रेस ने उच्चतम न्यायालय की निगरानी में मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री से त्यागपत्र की मांग करते हुए विधानसभा सत्र में पांचों दिन हंगामा किया। पायलट ने जयपुर में सिटिंग जज से प्रकरण की जांच कराने की मांग की थी।

मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकारों में गिने जाने वाले संसदीय कार्य विधि एवं चिकित्सा मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने उदय इंडिया से बातचीत में कांग्रेस की मांग को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सरकार खुद ही घोटालों को उजागर करने में आगे आई है। खानों की बंदरबांट करने वाले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को जेल में भिजवाया है। राठौड़ ने दावा किया कि राज्य सरकार के निर्देश पर एसीबी ने कार्यवाही की है और हमें केन्द्र से इस बारे में कोई निर्देश नहीं मिला है। राठौड़ ने यह सवाल किया कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा पिछले शासनकाल में अपने रिश्तेदारों को खान आवंटित किए जाने पर क्या भाजपा की मांग पर सरकार ने सीबीआई से जांच कराई थी? दिल्ली की तर्ज पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी ने भी शुक्रवार को जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस के आरोपों को बेबुनियाद बताया और कांग्रेस राज में भी खानों के अवैध आवंटन की बात कही। आईएएस अशोक सिंघवी के वसुंधरा राजे के नजदीकी होने के कांग्रेस के आरोप से बचाव में परनामी ने याद दिलाया कि हिन्दुस्तान जिंक को खान आवंटन मामले में सरकार को लगभग 600 करोड़ के नुकसान में एसीबी ने 2011 में अशोक सिंघवी के खिलाफ मामला दर्ज कराने और कठोर कार्यवाही के लिए कहा था, लेकिन कांग्रेस राज में इसे विभागीय जांच में बदला गया।


राजस्थान में खान घोटाले का क्रमवार ब्यौरा


राजस्थान में इन दिनों खान घोटाले की भारी चर्चा है। इसी क्रम में प्रमुख षासन सचिव श्री अषोक सिंघवी एवं खान विभाग के अनेक आला अधिकारी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के घेरे में है एवं जेल में है। भ्रष्टाचार का यह सिलसिला अभी षुरू नहीं हुआ है बल्कि तभी से चालू है जबसे श्रीमती वसुन्धरा राजे मुख्यमंत्री बनी एवं केन्द्र सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के आदेषों की पालना में नई नीति की चर्चा प्रारम्भ हुई। राज्य सरकार ने इसे अपने जारी सुगम भ्रष्टाचार पर कुठाराघात समझा एवं केन्द्र के निर्देषों के बावजूद आनन-फानन से अनेकों खानों का आवंटन कर डाला। जो किसी भी दषा में कोयला घोटाले से भिन्न नहीं है।

इस भ्रष्टाचार का सिलसिलेवार विवरण निम्न प्रकार है।

24-10-2015

केन्द्र सरकार के खान मंत्रालय ने राज्य सरकार को 30 अक्टूबर, 2014 को पत्र लिखकर नई नीति का प्रारूप भेजा एवं साथ ही स्पष्ट किया कि अभी लंबित प्रार्थना पत्र व भविष्य में नये आवेदन सभी इस नीति के अन्तर्गत जारी होगें एवं राज्य सरकार इस पत्र के माध्यम से नई प्रस्तावित नीति पर सुझाव एवं आपत्तियाँ मांगी। पत्र में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का हवाला देकर बताया गया है कि 1957 के कानून के अन्तर्गत अब भविष्य में खानों का आवंटन नहीं बल्कि नीलामी होगी एवं पत्र में लिखा कि –

“These guidelines come into force with immediate efect. State Governments are requested to process all proposals in accordance with these guidelines to facilitiate expeditious disposal of mineral concession applications. The Central Govt. will process all cases Including those presently under its consideration) in accordance with these guidelines.”

इससे स्पष्ट है कि राज्य सरकार को पुराने आवेदनों पर आवंटन का अधिकार नहीं था। लेकिन राज्य सरकार ने इसकी परवाह किए बिना पुराने प्रार्थना पत्रों पर ही आवंटन कर दिया।

24-10-2015

राजस्थान सरकार ने केन्द्र सरकार के खान मंत्रालय को अपने पत्र सं. F.14 (7) Mines/Gr-II/86 Pt. दिनांक 08.12.2014 को नई खनन नीति के प्रस्तावित प्रारूप पर अपनी आपत्तियाँ एवं सुझाव भेजे। इससे स्पष्ट है कि राज्य सरकार केन्द्र की खान आवंटन नहीं नीलामी की नीति से भलीभांति परिचित थी, फिर भी अनियमित तरीके से सभी पुराने प्रार्थना पत्रों पर आवंटन कर दिया, जो स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार प्रतीत होता है।

केन्द्र सरकार ने राज्यों के सुझावों के बाद समस्त राज्य सरकारों को पत्र लिखा कि नई खनन नीति 12.01.2015 को जारी होगी, अत: अब नई नीति से ही खाने नीलाम हो। लेकिन भारत सरकार की मंषा के विरूद्ध राज्य सरकार ने नई नीति से पूर्व ही लगभग 20 दिन में आवंटन का कार्य पूर्ण कर दिया।

24-10-2015

नई आवंटन नीति से पूर्व की राज्य सरकार ने चार बड़ी सीमेंट कम्पनियों को 35 स्क्वायर कि.मी. क्षेत्र आवंटन कर दिया (तालिका क)।

इन चारों कम्पनियों को इस तरह से केन्द्र सरकार की नई खनन नीति के विरूद्ध आवंटन करना। राज्य सरकार की नीयत में खोट दिखाई देता है।

24-10-2015

राज्य सरकार ने नई नीति के आने से पूर्व 652 खाने आवंटन की, जो मात्र 15-20 दिन में ही सारा कार्य पूर्ण किया गया। यहाँ तक की अनेक कम्पनियों के प्रार्थना पत्र दो से चार दिन पूर्व लिए गये एवं षीघ्र ही आवंटन कर दिया गया (तालिका ख)।

इससे स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार पर जो भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जो कार्यवाही है वह अपने आप में राज्य सरकार एवं मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार की सच्चाई बयान कर रही है।

                (उदय इंडिया ब्यूरो)


 


सीबीआई जांच से उजागर होगा सच —अशोक गहलोत


24-10-2015

राजस्थान के राजनीतिक नेतृत्व को यदि खान विभाग की इस महाघूसखोरी का पता होता तो इसका खुलासा ही नहीं हो पाता। यह तो कुछ अधिकारियों की हिम्मत थी जिसने अपने नेटवर्क से इस कांड का भंडाफोड़ किया। अवैध खनन किसी कीमत पर नहीं हो तथा समूची व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए। इस प्रकरण की तह तक जाने के लिये सीबीआई जांच जरूरी है।’’ पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खान महाघूसखोरी कांड के सिलसिले में अपनी यह भावना व्यक्त करते हुए उदय इंडिया द्वारा इस संबंध में। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:

 

राजस्थान की अर्थव्यवस्था के लिये खान एवं खनन गतिविधियों का क्या महत्व है?

यह जाहिर बात है कि खान एवं खनन गतिविधियों का राज्य की अर्थव्यवस्था को चलाने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। अकूत खनिज सम्पदा के दोहन से प्राप्त राजस्व से प्रदेश में विकास कार्यों के लिए मदद मिलती है।

खान विभाग का मौजूदा सिस्टम सही है या इसमें किसी बदलाव की जरूरत है?

खान विभाग के मौजूदा सिस्टम में यदि कुछ बदलाव लाना है, तो सरकार को इस बारे में सोच-विचार कर आवश्यक कदम उठाने चाहिए। सिस्टम ‘फुलप्रूफ’ बनें और अवैध खनन नहीं होने पाये।

खान विभाग में गड़बडिय़ों एवं घूसखोरी के ताजा प्रकरण के बारे में आप क्या सोचते है?

खान विभाग में घूसखोरी तथा गड़बडिय़ों का ताजा प्रकरण सभी के सामने है। लगातार इसकी परतें खुल रही हैं। यह ट्रेपकांड नहीं था। यह तो कुछ अधिकारियों की हिम्मत थी, जिन्होंने अपने नेटवर्क के बलबूते इसका भंडाफोड़ किया। यदि राजनेताओं को पता होता तो शायद वे ऐसा होने ही नहीं देते। अभी इस मामले की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) कर रही है। एसीबी स्टेट गवर्नमेंट के अधीन है और विभिन्न पदों पर उन्हीं के लोग बैठे हैं। ऐसे में सीबीआई जांच से सही मामला उजागर होगा तथा असलियत सामने लाने में मदद मिलेगी। मैंने पहले भी यह कहा था कि खान विभाग के रिश्वत प्रकरण की जांच वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए संभव नहीं है। पहले ही उन पर खान विभाग को लेकर आरोप लगते रहे हैं। एसीबी भी बधाई की पात्र है, क्योंकि यह कार्यवाही बिना ट्रेप किये की गई है। चाहे मुख्यमंत्री हो या गृहमंत्री उन्हें तफ्तीश में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। पहली बार हस्तक्षेप किया जा रहा है और आईओ की रिपोर्ट भी कमिश्नरेट में बैठकर वकीलों द्वारा बनायी जा रही है। दवाब डालकर आईओ के हस्ताक्षर कराये जा रहे है। प्रमुख शासन सचिव के रहते खान विभाग में बड़े घपले हुए हैं। इनको मालूम था कि जब भारत सरकार दो-तीन दिन में ही खान आवंटन को लेकर नया कानून बनाने जा रही थी, फिर क्यों चार सीमेंट ब्लॉक आवंटित कर दिये गये। इसमें कितना बड़ा भ्रष्टाचार हुआ होगा उसका खुलासा होना चाहिए।

क्या इस प्रकरण की एसीबी जांच से असलियत का पता चलाया जा सकेगा अथवा अन्य स्तर पर किसी जांच की आवश्यकता होगी?

इस प्रकरण के जिस बड़े अधिकारी को भी गिरफ्तार किया गया है, सभी जानते हैं कि वह मुख्यमंत्री का ‘चहेता’ था। सवाल यही उठता है कि पिछले कार्यकाल में मुख्यमंत्री ने उन्हें माइनिंग डिपार्टमेंट में लगाया और अब दूसरे कार्यकाल में दिल्ली से बुलाकर फिर माइनिंग डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी दे दी गई। उन्हें इस पद पर रखा ही क्यों? यह समझ से परे है। मुख्यमंत्री के पिछले कार्यकाल में जब ललित मोदी का बोलबाला था, तब भी मुख्यमंत्री तथा ललित मोदी के साथ इस अधिकारी के आपसी संबंधों के बारे में सबको मालूम था।

इस प्रकरण में वरिष्ठ नौकरशाह की गिरफ्तारी के तौर-तरीकों के संदर्भ में नौकरशाही तथा राजनीतिक परिदृश्य एवं राज्य सरकार के कामकाज के बारे में आप क्या कहेंगे?

खानों के आवंटन के स्थान पर इनकी नीलामी करना अधिक उपयुक्त होगा। कुछ मामलों में लॉटरी भी निकाली जा सकती है। लेकिन, यह जरूरी है कि सारी व्यवस्थायें पारदर्शी होनी चाहिए। समूचा सिस्टम ही फुलप्रूफ बने इसके लिए आवश्यक और प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

क्या खानों का आवंटन बंद करके केवल नीलामी या लॉटरी की प्रक्रिया अपनाना उचित होगा?

खान विभाग में नीलामी या लॉटरी से जुड़ी प्रक्रिया के संबंध में ऑनलाइन टेंडरिंग बेहतर प्रणाली है। हमने अपने पिछले कार्यकाल में कुछ विभागों में ई-टेंडरिंग की शुरूआत भी की थी।

मीडिया में भी उजागर हो गया है कि खनन कारोबार के मकडज़ाल में नेताओं एवं अफसरों की अपने परिजनों तथा चहेतों के प्रति भूमिका तथा हिस्सेदारी रही है, इसकी रोकथाम कैसे संभव है?

खनन कारोबार के मामले में इस तरह की शिकायत आम बात है। लेकिन यह जरूरी है कि राजनेताओं तथा उनके परिवार वालों या अन्य अधिकारियों के मामले में समान व्यवहार होना चाहिए। किसी भी मामले में किसी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

यह माना जाता है कि प्रदेश में खान माफिया का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। इस पर अंकुश के लिये क्या कदम उठाने होंगे?

यह सही है कि खान माफिया सक्रिय रहता है। खनन गतिविधियों को लेकर अपराध भी होते हैं मर्डर तक हो जाते हैं। रात के वक्त खानों में ट्रकों की आवाजाही होती है। प्रशासन को चाकचौबंद व्यवस्था से इसकी रोकथाम के लिए पहल करनी चाहिए। खनन क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है। हमने पिछले कार्यकाल में खान चौकीदारों के लगभग एक हजार पद सृजित किये थे। वर्तमान में क्या स्थिति है इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। गौरतलब है कि गहलोत के पिछले कार्यकाल में अवैध खनन की रोकथाम के लिये खान विभाग ने माइंस प्रोटेक्शन फोर्स के गठन के उद्देश्य से एक हजार जवानों की भर्ती हेतु दो साल पहले परीक्षा आयोजित करवाई थी। इस फोर्स की मॉनिटरिंग आईपीएस अधिकारी या खान विभाग द्वारा कराये जाने से उत्पन्न विवाद के चलते परिणाम घोषित नहीं किया गया। अभ्यर्थियों के अदालत में जाने पर सरकार ने गत अप्रैल माह में नोटिफिकेशन जारी कर फोर्स के गठन का जिम्मा पुलिस मुख्यालय को सौंपा था। पुलिस विभाग ने परिणाम जारी कर दिये हैं और चयनित एक हजार जवानों को आरएसी 14 बटालियन के तहत अलग-अलग कार्यों के लिए रिजर्व रखा जायेगा।

खान विभाग के लिये राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर खनन नीति की घोषणा का क्या औचित्य रह जाता है जब इसी के आधार पर भ्रष्टाचार एवं गड़बडिय़ों के आरोप तो लगते है, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाता?

खनन नीति का निर्धारण करने के लिए गंभीर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। एक बार में सभी बिन्दुओं पर चर्चा करके अंतिम रूप देने की कोशिश की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी तरह की परेशानी नहीं हो।

ऐसी सूरत में भ्रष्टाचार मुक्त सिस्टम बनाने के लिये आप क्या ठोस सुझाव देंगे?

खानों से जुड़े कामकाज में किसी तरह का भ्रष्टाचार नहीं हो, बेईमानी करने की छूट नहीं मिले। इस तरह के सिस्टम का निर्माण हो। राज्य के आदिवासी क्षेत्र में खनिज सम्पदा के भंडार हैं। खनन गतिविधियों को लेकर उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश के मामले में कोई निर्णय दिया था। इसे ध्यान में रखते हुए मैंने अपने प्रथम शासन काल में जनजाति उपयोजना क्षेत्र में गैर-अनुसूचित जनजाति के लोगों द्वारा खनन अनुमति पर रोक लगा दी थी। भाजपा सरकार ने शासन में आते ही यह रोक हटा दी। मैंने दोबारा रोक लगाई और वर्तमान भाजपा सरकार ने फिर यह रोक हटा ली। इससे सरकार की मंशा का पता चलता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा सरकार अरावली क्षेत्र की इकॉलोजी ‘पारिस्थतिकी तंत्र’ को क्यों तहस-नहस कर पहाड़ों की सुन्दरता नष्ट करने पर उतारू है। यदि सरकार को लगता है कि इस क्षेत्र की खनिज सम्पदा का व्यवस्थित ढंग से दोहन किया जाना चाहिए तो सरकारी उपक्रम आरएसएमएम लिमिटेड को यह जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। सरकार प्राइवेट कंपनियों के बहाने इस क्षेत्र को बर्बाद करने पर क्यों तुली है?



पीएमओ का हाथ?


खान महाघूसकांड किसके इशारे पर खुला, इसे लेकर भी कई कयास लगाये गये हैं। एक अंग्रेजी अखबार ने इसे पीएमओ के निर्देशों पर की गई कार्यवाही का परिणाम बताया। राज्य में पहले भी आईएएस अधिकारियों पर आरोप लगते रहे हैं। खान मामले की भनक लगते ही वरिष्ठ आईएएस डॉ.अशोक सिंघवी की गिरफ्तारी को लेकर सवालिया निशान उठे हैं। प्रकाशित खबरों में बताया गया है कि एसीबी के महानिदेशक नवदीप सिंह और महानिरीक्षक दिनेश एम.एन. ने 16 सितम्बर को दोपहर में विधानसभा जाकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मामले की जानकारी दी और वहां से हरी झंडी मिलने पर सिंघवी की गिरफ्तारी की गई। गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने भी उदयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी आशय की बात बताई। सिंघवी सहित प्रमुख आरोपियों से रिमाण्ड अवधि में उदयपुर पूछताछ करने गये एसीबी महानिरीक्षक दिनेश एम.एन. ने भी पहली बार मुंह खोलते हुए यह दावा किया कि एसीबी ने अपने स्तर पर यह कार्यवाई की है। लेकिन, कांग्रेस का यह मानना है कि केन्द्र सरकार के निर्देशों के बिना यह कतई संभव नहीं था। इसके पक्ष में पार्टी का यह तर्क रहा है कि खान विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के अधीन है और विभाग के राज्यमंत्री राजकुमार रिणवा यह स्वीकार कर चुके हैं कि शासन सचिव उनकी परवाह नहीं करते थे। हालांकि सीमेंट ब्लॉक आवंटन संबंधी फाइलों पर रिणवा के हस्ताक्षर की बात उजागर होने से उनका यह कथन सवालों के घेरे में है कि उनके पास फाइलें नहीं भेजी जाती थीं। भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी ने सीमेंट ब्लॉक आवंटन पर दी गई सफाई में कहा है कि कांग्रेस राज में 2010 से 2013 के दौरान आवंटन प्रक्रिया हुई थी, लेकिन भाजपा सरकार ने आवेदकों को सुनवाई का मौका दिया तथा 31 दिसम्बर 2014 को कंपनियों को खानों के मंशा पत्र बांटे और जनवरी 2015 में एम.एन.डी.आर. एक्ट में संशोधन से पहले वंडर सीमेंट, लफार्ज इंडिया, श्री सीमेंट तथा इमामी सीमेंट ने अपने सीमेंट संयत्रों को लगाने की प्रक्रिया में गारंटी के रूप में कीननेस मनी जमा करवाई थी। वहीं राज्य के लोकायुक्त ने सीमेंट ब्लॉक आवंटन की जांच प्रक्रिया में खान निदेशक को 12 अक्टूबर को तलब किया है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का भी कहना है कि परसेप्शन यही है कि पीएमओ के निर्देश पर यह कार्यवाई की गई। खान राज्यमंत्री रिणवा को ”बेचारे मंत्री’’ की संज्ञा देने वाले गहलोत सवाल करते हैं कि फिर अफसर किसके इशारे पर फैसले किया करते थे। यह समझ से परे है कि मुख्यमंत्री ने अपने पिछले और वर्तमान कार्यकाल में सिघंवी सहित अन्य अफसरों को खान विभाग में लगाया। गौरतलब है कि जून 2014 में शासन सचिव का पदभार संभालने वाले सिंघवी की विभाग में तबादलों को लेकर खान राज्यमंत्री से तकरार हुई थी ताकि, उनके नेटवर्क पर आंच नहीं आए।

निलम्बित खान शासन सचिव की गिरफ्तारी के बाद खान विभाग की कारगुजारियों का खनन की तरह परत-दर-परत खुलासा हो रहा है। शासन सचिव और उनके दलाल संजय सेठी एवं अतिरिक्त निदेशक पंकज गहलोत की तिकड़ी इस मकडज़ाल को बुनती थी। खानों को बंद करने की धमकी या चालू कराने की पेशकश के बहाने सौदेबाजी को अजांम दिया जाता था। यही नहीं खनिज अभियंताओं के तबादले तक इसी तिकड़म से किए जाते थे। एसीबी सिंघवी और सेठी के बीच अक्टूबर से दिसम्बर 2014 तक 32 अभियंताओं के तबादले संबंधी सूची की तकनीकी जांच कर रही है। जनजाति उपयोजना क्षेत्र (टीएसपी) में वर्ष 2000 से खनन की अनुमति पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है। लेकिन, सिंघवी ने आदिवासी उत्थान की आड़ में खनन नीति में फेरबदल करते हुए 5 फरवरी 2008 को खनन पट्टा आवेदकों के लम्बित आवेदन खारिज करने तथा टी.एस.पी. क्षेत्र में रोक हटाने का आदेश जारी कर मनचाही कंपनियों के हवाले बड़ी खदानें कर दीं। डूंगरपुर क्षेत्र की भाजपा नेता ने सरकार को लिखे पत्र में सिंघवी पर अपने एक रिश्तेदार की करोड़ों की पेनाल्टी माफ करने सहित अन्य लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया है।



सरकार ने की तत्परता से कार्यवाही — गुलाबचन्द कटारिया


24-10-2015

गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया का दावा है कि भाजपा सरकार के प्रयासों से प्रदेश में शराब माफिया को नियंत्रित किया गया है, उसी तरह खनन माफिया पर भी काबू पाया जायेगा। श्री कटारिया का यह भी कहना है कि लगभग दो साल में खान खनन से जुड़े ऐसे मामले जो गृह-विभाग या पुलिस के कार्यक्षेत्र में आते हैं, उन पर तत्परता से कार्यवाही की गई है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। खान विभाग के घूंसकांड के सिलसिले में उदय इंडिया के प्रश्नों में सीधे खान विभाग से संबंधित सवालों के अलावा श्री कटारिया ने पूछे गये सवालों के जवाब दिये। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

क्या घूसखोरी प्रकरण की एसीबी जांच से असलियत का पता चलाया जा सकेगा अथवा अन्य स्तर पर किसी जांच की आवश्यकता होगी?

खान विभाग में घूसखोरी से जुड़े मामले का पर्दाफाश करके एसीबी ने अच्छी उपलब्धि अर्जित की है। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार गृह-विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की अनुमति से संबंधित आरोपियों के फोन टेप किये गये और सूचना मिलते ही इस केस को आगे बढ़ाया गया। जिसमें उन्हें सफलता मिली। इसमें मुख्य भूमिका एसीबी के महानिरीक्षक दिनेश एम.एन. की रही। यदि वह समय से पहले सबको बता देते तो इसका भंडाफोड़ भी नहीं हो पाता। हमने पहली बार यह कर दिखाया और एसीबी इस प्रकरण को तार्किक परिणमों तक पहुंचाएगी। हमारे पास अनेक योग्य ऑफिसर हैं।

खनन मामले में केन्द्र सरकार की नई नीति के संदर्भ में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

इससे पारदर्शिता आएगी तथा गड़बड़ी के अवसरों पर भी रोक लगेगी। नई नीति को कानून प्रक्रिया के तहत लागू कराने में गृह और पुलिस विभाग भी तत्पर रहेगा। इससे खनन माफिया पर अंकुश लगाने में भी मदद मिलेगी। खानों की नीलामी प्रक्रिया राज्य हित में लाभकारी सिद्ध होगी।

यह माना जाता है कि प्रदेश में खान माफिया का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। इस पर अंकुश के लिये क्या कदम उठाने होंगे?

केन्द्र की नई नीति घोषित होने के बाद इससे संबंधित अधिकृत जानकारी और दस्तावेज इत्यादि मिलने में कुछ विलम्ब हुआ। निहित स्वार्थी तत्वों ने इस देरी का लाभ उठाया तथा खान आवंटन में गड़बड़ी की गई। इसके अलावा पुरानी खानों को बंद करने और फिर खोलने का खेल भी खेला गया। एसीबी को मिली सूचना तथा पुख्ता सबूतों को जुटाते हुए हमारे अधिकारियों को यह स्कैण्डल खोलने में सफलता मिली। अवैध खनन मामले में खान विभाग कार्यवाही करता है, लेकिन ऐसे मामलों में जहां कानून व्यवस्था के तहत पुलिस कार्यवाही करनी होती है उसमें हम पीछे नहीं रहे हैं। इसका खुलासा गत दो वर्षों में की गई कारवाई से पता चलता है।



वसुंधरा ‘माइनफील्ड’ पर?


सितंबर माह की 17 तारीख को राजस्थान के उदयपुर में एंटी करप्शन ब्यूरो ने 3 करोड़ 80 लाख की रिश्वत के मामले में राज्य के माइनिंग विभाग में तैनात प्रिंसिपल सेक्रेटरी आईएएस अधिकारी अशोक सिंघवी को गिरफ्तार किया था। इसके एक दिन बाद ही उनके विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों सहित पांच लोगों को उदयपुर और भीलवाड़ा में पकड़ा गया। खनन विभाग में अतिरिक्त निदेशक के पद पर तैनात पंकज गहलोत को भी ढाई करोड़ रुपये की रिश्वत लेते हुए हिरासत में लिया गया था। पंकज गहलोत पर आरोप है कि उसने बंद पड़ी 6 खानों को दोबारा खोलने के एवज में ढाई करोड़ की रिश्वत मांगी थी। कहा गया है कि यह रकम कुल 22 करोड़ रुपये तय घूस की किश्त थी, जो पकड़ी गई। यह रेड एसीबी ब्रांच के आईजीपी दिनेश एम.एन ने डाली थी, जो चर्चित सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में आरोपी हैं, इनके बारे में कहा जाता है कि वे कथित रुप से गुजरात के कई नेताओं के करीबी हैं।

प्रिंसिपल सेक्रेटरी अशोक सिंघवी के घूसखोरी के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। कांग्रेस का आरोप है कि ये राजस्थान के इतिहास में 45,000 करोड़ का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। जो राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की शह पर हुआ। खबर है कि पीएमओ के आदेश पर राजस्थान के प्रधान सचिव खनन अशोक सिंघवी को गिरफ्तार किया गया, जिससे पूरे स्कैम का भंडाफोड़ हुआ। कहा जा रहा है कि पीएमओ को राजस्थान के खनन विभाग में काबू से बाहर हो चुके भ्रष्टाचार की कई शिकायतें मिलीं थीं। इसे लेकर कांग्रेस वसुंधरा राजे सरकार पर हमलावर है। वहीं राजस्थान बीजेपी ने इसे बकवास करार देते हुए इस बात पर जोर दिया कि राजस्थान खनन विभाग में खानों की नीलामी नियमों के तहत बिल्कुल पारदर्शी तरीके से हुईं। राजस्थान बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि अशोक गहलोत की सरकार में दागी अधिकारियों को बचाया गया। इन सबके बीच वसुंधरा राजे विरोधी बीजेपी नेताओं का खेमा भी अंदरखाने खुश है। आइये डालते हैं मामले से जुड़े आरोपों और प्रत्यारोपों पर एक नजर।

कांग्रेस का बीजेपी की वसुंधरा राजे सरकार पर आरोप-

  • कांग्रेस ने राजस्थान में खान आवंटन में जल्दबाजी पर भी सवाल उठाए और कहा कि एक लाख बीघा जमीन बिना नीलामी के ही दे दी गई, जबकि सरकार को 45,000 करोड़ की कमाई हो सकती थी।
  • पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर खानें दी गईं और राज्य सरकार ने लोकायुक्त को भी गलत जवाब दिए। जबकि सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों को नीलामी प्रक्रिया के तहत ही देने को कहा है। राज्य सरकार ने प्रक्रिया में बदलाव संबंधी कोई जानकारी केंद्र सरकार को नहीं दी।
  • सचिन पायलट ने मीडिया से कहा, राजस्थान सरकार ने 653 खानें आवंटित की। राज्य सरकार ने 2 लाख करोड़ की कीमत वाले खान अपने फायदे के लिए नियमों के खिलाफ आवंटित की। ये खानें 30 अक्टूबर से 12 जनवरी 2015 के बीच आवंटित की गर्ईं।
  • 137 मामलों में 12 जनवरी 2015 के पहले खानें आवंटित की गईं। खानों पर बने केंद्र सरकार के कानून, जिसे संसद ने पास किया था, उन पर लागू नहीं किया गया। कारोली जिले में 11 खानों को 48 घंटे के भीतर आवंटित कर दिया गया। एक खान तो अप्लाई करने के 12 घंटे के भीतर ही आवंटित कर दिया गया।
  • सिंघवी ने घोटाले से संबंधित रिपोर्ट और लेनदेन की जांच छोड़ दी उसका निरीक्षण नहीं किया। वे वसुंधरा राजे के प्रिय अधिकारी थे और उनके आदेश पर काम कर रहे थे।
  • कम-से-कम 15 प्रमुख खनिज पदार्थों, लौह अयस्क, माइका, पत्थर, बालू और चूना पत्थर की खानों का गैर कानूनी तरीके से आवंटन किया गया।
  • सुप्रीम कोर्ट की अगुवाई में सीबीआई जांच हो क्योंकि, राज्य का एंटीकरप्शन ब्रांच मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के दबाव में जांच को गलत दिशा देगा।
  • सीमेंट और चूना पत्थर की खानों का गलत तरीके से आवंटन पकड़ में आया। इन खानों को केंद्र की हरी झंडी का इंतजार किये बगैर हरी झंडी दे दी गई।

 

बीजेपी का कांग्रेस पर पलटवार

  • 12 जनवरी 2015 को संसद के माइन्स एंड मिनिरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन बिल पर कानून बनाने के बाद 18,965 पेंडिंग आवेदनों को अमान्य करार दिया गया। किसी खान को लाइसेंस देने के मामले में तेजी से फैसला नहीं किया गया।
  • दागी आईएएस अधिकारी अशोक सिंघवी से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का कोई संपर्क नहीं है। उसका पक्ष तो अशोक गहलोत लेते रहेे हैं।
  • चार बड़े सीमेंट प्लांट को लेटर ऑफ इन्टेंट और खानें लीज पर तब दी गईं, जब कानून पास हो चुका था।
  • फरवरी, 2012 में राज्य के एंटीकरप्शन ब्रांच के पुलिस इंस्पेक्टर महेन्द्र सिंह हरसाणा को सिंघवी के साथ अलग विभागों के उन दोषी अधिकारियों के साथ देखा गया था, जिन्होंने हिंदुस्तान जिंक के पक्ष में फैसले किये थे और इससे राज्य के खजाने को 600 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।

सिंघवी उनमें था…

माना जाता है कि सिंघवी के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए जाने की योजना है लेकिन इस फैसले को काटकर विभागीय जांच के लिए कहा गया और अंत में इसे भी वापस ले लिया गया। सिंघवी अभी एसीबी की कस्टडी में है लेकिन उसके खिलाफ चार्जशीट तैयार नहीं हो सकी है।



भंडाफोड़ के पीछे कौन?


अपने बेटे को नौकरशाह बनाने में सफल रहे जोधपुर के शास्त्री नगर निवासी डॉ. अजीतमल सिंघवी को टी.वी. न्यूज चैनल्स की खबरों से धक्का तो जरूर लगा, लेकिन उन्होंने पहली प्रतिक्रिया में किसी नेता का नाम लिये बिना यह आशंका जरूर जताई कि उनके बेटे को बड़े स्तर पर किसी साजिश के तहत फंसाया गया है। यह तो जांच से ही पता चलेगा। डॉ. सिंघवी भी मानते हैं कि उनका बेटा अशोक, मुख्यमंत्री की ‘गुडबुक’ में था। तभी तो दूसरी बार शासन सत्ता संभालने वाली वसुंधरा राजे ने केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर गये भरोसेमंद आला अफसरों को राजस्थान में वापस बुलाया। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी वसुंधरा और अशोक सिंघवी की आपसी नजदीकी बताई थी। वसुंधरा राजे के दोनों कार्यकाल में सिंघवी को खान विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस बार तो पेट्रोलियम विभाग भी उनके पास था।

चर्चा ऐसी भी है कि भाजपा हाईकमान के इशारे पर खान विभाग का भांडा फूटा है। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि एसीबी महानिरीक्षक दिनेश एम.एन. ‘सोहराबुद्दीन एनकाउन्टर’ मामले में करीब सात वर्ष गुजरात की जेल में रहे। भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी तब जेल में थे। इसलिए संभवत: उनका आपस में मेल मिलाप रहा होगा और मौका देखकर इस कार्रवाई को अंजाम दिया गया। सिंघवी के पिता को भी इस तर्क में वजन लगता है। वही यह भी कयास है कि खान विभाग में घूसखोरी से परेशान माइनिंग लॉबी ने कुछ माह पूर्व इस बारे में पीएमओ को शिकायत भेजी और बाद में इस गुप्त मिशन पर आगे की कार्यवाई की गई। राज्य के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया बताते है कि एक डेढ़ माह पहले मिली शिकायतों के आधार पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत फोन टेपिंग से घूसखोरी के खुलासे में मदद मिली। खान राज्यमंत्री राजकुमार रिणवा के इस कथन के मायने लगाए जा रहे हैं कि उन्होंने सक्षम स्तर पर अपनी बात रखी थी, जिसका नतीजा आज सामने है। उन्होंने कहा कि मेरे अलावा भी बहुत सारे लोग लगातार शिकायत कर रहे थे। वैसे भी हर चीज का समय निश्चित है। जो हो रहा था सबकी नजर में था। कुछ भी किसी से छुपा हुआ नहीं था।

यही नहीं विभाग के निदेशक डीएस मारू ने भी एक माह पहले खान विभाग में रिश्वतखोरी में लिप्त कार्मिकों के खिलाफ एसीबी मुख्यालय में शिकायत की थी। इस संबंध में उदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा, चित्तौडग़ढ़ क्षेत्र में दो खदानों के बीच आने जाने की सुविधा के तहत तीस फीट पट्टी छोडऩे की साजिश में अवैध वसूली के उदाहरण भी दिए गए। गौरतलब है कि मारू के अवकाश पर जाने की सूरत में अतिरिक्त निदेशक पंकज गहलोत ने कई खानों का आवंटन किया था।


पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हरिद्वार से उदय इंडिया से बातचीत में कहा कि खान आवंटन के मामले में मुझ पर तथा वसुंधरा राजे सरकार पर लगे आरोपों की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच से सारी सच्चाई सामने आ जाएगी। खान घोटाले को खुद उजागर करने का दावा करने वाली भाजपा सरकार को इस मामले में क्यों डरना चाहिए? यह जांच ”वन्स फॉर ऑल’’ हो जाएगी। एसीबी पर तो दबाव भी बनाया जा सकता है। गहलोत का कहना था कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे खुद क्यों छिप रहीं हैं? वह सामने आकर अपनी बात कहें तो अच्छा होगा। हर मामले में भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी को आगे करने का क्या औचित्य है।

अपने रिश्तेदारों को खान आवंटन के पिछले आरोपों के संबंध में गहलोत ने कहा कि मैंने विधानसभा पटल पर तत्कालीन प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चन्द्र कटारिया को मामले की जांच कराने की पेशकश की थी। गहलोत ने याद दिलाया कि आंध्र प्रदेश को लेकर उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार जनजाति उपयोजना क्षेत्र (टी.एस.पी.) में गैर अनुसूचित जनजाति के लोगों को खनन की अनुमति पर लगी रोक के तहत राज्य सरकार ने वर्ष 2000 में तीन अलग-अलग आदेश जारी किए थे। अपने प्रथम शासनकाल (1998-2003) में उन्होनें आदिवासी क्षेत्र में खनन पर रोक लगाई थी भाजपा सरकार ने यह रोक हटा ली। इसी तरह उनके दूसरे कार्यकाल में लगाई रोक पर भी भाजपा सरकार ने इस बार भी वहीं रवैया अपनाया। उन्होंने कहा कि इस सरकार की नीयत ही ऐसी है। केन्द्र सरकार के निर्देशों की अवहेलना कर आनन-फानन में खानों का किया गया आवंटन इसका प्रमाण है। अपने दूसरे कार्यकाल में आईएएस अशोक सिंघवी को बचाने संबंधी मामले में अशोक गहलोत ने अनभिज्ञता जरुर जताई।24-10-2015

गृहमंत्री गुलाबचन्द्र कटारिया ने उदय इंडिया से बातचीत में कहा कि दुख इस बात का है कि राजस्थान में कांग्रेस अनाप-शनाप आरोप तो लगाती है, लेकिन उन्हें प्रमाणित करने की जहमत नहीं उठाती है। आरोप लगाना उनका शौक हो गया है। बस आरोप लगाकर हट जाओ। राजनीति में जब तक आरोप लगाकर उसे साबित करने के अंतिम छोर तक नहीं पहुंचोगे तब तक उसमें जनता की न तो रूचि होगी और न ही उसमें विश्वास होगा। उन्होनें कहा कि भाजपा ने जब कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाये और उन्हें प्रमाणित कराने की दिशा में कदम उठाये तभी पिछली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। गृहमंत्री ने आजादी के बाद से हुए खान आवंटियों की सूची सार्वजनिक करने की बात कही, जिससे साफ हो जाएगा कि कांग्रेस तथा भाजपा सहित अन्य लोगों को कितनी खानें मिली है और जनता के सामने वस्तुस्थिति आ जाएगी। मीडिया में कांग्रेस भाजपा के नेताओं तथा अफसरों के परिवारजनों के नाम से आवंटित खानों के ब्योरे का खुलासा भी हो चुका है। विपक्ष ने विधानसभा में इसकी सीबीआई जांच की मांग की थी।

24-10-2015खान महाघोटालों के तिलिस्म का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि खान विभाग के जिस मुखिया के पास इस खजाने की चाबी थी वह अपने विभाग के मंत्री तक की परवाह नहीं करता था। खान वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री राजकुमार रिणवा सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके है कि प्रमुख खान सचिव उनके पास फाइलें तक नहीं भेजते थे। यही नहीं इस मुखिया की हिमाकत की बानगी खान मंत्रालय को भेजे गये पत्र से देखी जा सकती है। दस्तावेजों की जांच-पड़ताल से यह तथ्य उजागर हुआ है कि खानों के आवंटन की अपेक्षा नीलामी किए जाने संबंधी मकसद से भारत सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देशानुसार एमडीआर एक्ट में संशोधन किया, जिसकी अधिसूचना जनवरी 2015 में जारी की गई। लेकिन इससे पहले भारत सरकार ने खानों के मामलों में राज्यों को नई गाइड लाइन भेजी। भारत सरकार की मंशा को भांपते हुए खान विभाग के अतिरिक्त निदेशक पंकज गहलोत ने विभागीय स्तर पर खान आवंटन में ”पहले आओ, पहले पाओ’’ नीति की आड़ में विभाग में अपनी मनमर्जी चलाने की गरज से तत्परता बरतते हुए 5 नवम्बर को ही अपने आका तथा विभाग के मुखिया को चार पेज की चिठ्ठी लिख दी। इस चिठ्ठी में सरकार की नीति को लेकर सवाल खड़े किए गए थे और कहा गया कि इस नई गाइड लाइन से नई खानों की स्वीकृति पर ही पाबंदी लग जाएगी। चिठ्ठी में यह सुझाव दिया गया कि सीमेंट सयंत्र के लिए आवश्यक खनिजों को छोड़कर शेष खनिजों में ”पहले आओ, पहले पाओ’’ के आधार पर ही आवंटन नीति को जारी रखा जाना चाहिए। खान विभाग के तत्कलीन प्रमुख शासन सचिव अशोक सिंघवी ने भी उसी तेजी से गहलोत की चिठ्ठी पर कार्यवाही करते हुए उनके सुझाव के अनुसार 17 नवम्बर को केन्द्रीय खान मंत्रालय के सचिव को लिखी चिठ्ठी में कहा कि नई नीति के मुताबिक खान मंजूरी से पहले नो-नोटिफाइड इलाकों को नोटिफाइड करने की नीति न तो डिजायरेबल है और न ही फिजिबल है। इस तरह सिंघवी ने भारत सरकार की नीति को ही अवांछनीय बता दिया।

24-10-2015वित्त मंत्री भी होने के नाते मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 9 मार्च 2015 को विधानसभा में अपने बजट भाषण में कहा था कि भारत सरकार की अधिसूचना द्वारा 31 प्रधान खनिजों को अप्रधान खनिज घोषित किया गया है। अब राज्य के 98 प्रतिशत खनन पट्टे एवं क्वारी लाईसेंस अप्रधान खनिजों की श्रेणी में आ गये है जिनका विनियमन राजस्थान अप्रधान खनिज रियायत नियम 1986 के तहत होगा। इससे आने वाले समय में रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे तथा राजस्व में वृद्धि होगी। मुख्यमंत्री ने खनिज क्षेत्रों तक आवागमन के साधनों को बढ़ावा देने, खनन श्रमिकों तथा उस क्षेत्र में बसे ग्रामीणों की सुविधा के लिए खानों को जोडऩे वाली सड़कों के विकास कार्यों के लिए 50 करोड़ रूपये के प्रावधान की घोषणा की थी।

नियमानुसार एक व्यक्ति मेजर मिनरल की दो से अधिक खान लेने का हकदार नहीं है, लेकिन कंपनी के नाम पर ज्यादा खान लेने पर कोई पाबंदी नहीं है। इसकी आड़ में हाथों-हाथ कंपनियों का गठन करके खानों के आवंटन का खेल खेला गया। स्वाभाविक था कि खान विभाग के अधिकारियों तथा उनके दलालों की सेवा करने वालों को ‘मेवा’ रूपी खानें मिलनी थीं। खान आवंटन की गति का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अप्रैल 2014 से 12 जनवरी 2015 तक की अवधि में 1449 खानों का आवंटन कर दिया गया, जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के 68 सालों में आवंटित खानों की संख्या 3106 आंकी गई है। मरूस्थलीय जिले जैसलमेर में मेजर मिनरल की कुल जमा 17 खानें हुआ करती थीं, लेकिन इस बहती गंगा में 250 खानें आवंटित कर दी गईं। जिनमें अधिकतर सिलिका सैण्ड की खानें हैं। अकेले एक कम्पनी के हिस्से में चौदह खानें आईं। खनन माफिया के लिए प्रसिद्ध भीलवाड़ा क्षेत्र में 115 खानें आवंटित की गईं।

भाजपा के पिछले शासनकाल में सिंघवी ने खान विभाग में आम माफी (एमनेस्टी) योजना के बहाने चहेतों तथा खनन माफिया को ब्याज में छूट देकर राजस्व को चूना लगाया और अवैध खनन को भी बढ़ावा दिया। इस बार उन्होंने विभाग में मनचाही फाइलों की सरपट दौड़ लगवाई और अवैध खनन पर ब्याज में छूट देकर पेनल्टी जमा करवाई, लेकिन बाद में यह योजना बंद कर दी गई। अपनी मंशा पूरी करने वाले अफसरों की फर्जी रिपोर्ट पर भी मुखिया ने आंख मंूदी तो कहे अनुसार नहीं चलने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों को प्रताडि़त करने का कोई मौका नहीं गंवाया। अपने स्तर पर खान राज्यमंत्री ने टोंक, बूंदी, अलवर में गड़बडिय़ों की जांच हेतु कमेटी गठित की, इस रिपोर्ट में मुखिया के चहेते दो अफसर दोषी पाए गए तो अशोक सिंघवी ने कमेटी प्रमुख आर.के.नलवाया को निलंबित करने के साथ पदावनत करने की कार्यवाही तक शुरू कर दी।

ललित मोदी प्रकरण में कांग्रेस ने विधानसभा में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के त्यागपत्र की मांग को राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता दी। खान विभाग में घूसखोरी, प्रमुख सचिव की गिरफ्तारी, खान राज्यमंत्री की अपने विभाग के शासन सचिव के समक्ष ‘लाचारी’ की स्वीकारोक्ति के बावजूद कांग्रेस विधायक दल संसदीय प्रक्रिया के तहत सरकार को घेरने की अपेक्षा महज ‘वेल’ में नारेबाजी तक सिमट गया। आपसी गुटबाजी में विधायक दल पूरी ताकत भी नहीं दिखा सका और इसी हंगामें के चलते वसुंधरा सरकार 15 विधेयकों को पारित कराने में सफल रहीं। अकाल एवं सूखे तथा बिजली की स्थिति पर भी एक पक्षीय चर्चा की औपचारिकता पूरी की गई। राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि कांग्रेस ललित मोदी प्रकरण में मुख्यमंत्री को सदन में बयान देने की रणनीति अपना सकती थी और खान घूसखोरी मामले में भी चर्चा करवा सकती थी। इसी तरह अकाल के हालात पर कांग्रेस के एक या दो विधायक अपनी बात कहकर जनता में अपना संदेश दे सकते थे। लेकिन, इस तरह की सोच पर कोई अमल नहीं हुआ।

बहरहाल खान विभाग की घूसखोरी तथा अन्य गड़बडिय़ों के मामले में एसीबी निलम्बित शासन सचिव सहित अन्य आरोपियों से आमने-सामने बिठाकर पूछताछ कर तथ्यों की पुष्टि में लगी हुई है। उसके आधार पर ही अब आगे की कार्यवाही की जाएगी।

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