ब्रेकिंग न्यूज़ 

वोट के लिये हम कुछ भी करेगा

वोट के लिये  हम कुछ भी करेगा

बिहार में चुनाव का बिगुल बज चुका है। वहीं हमारे राजनीतिज्ञों की भाषा निम्नतम स्तर को छूती जा रही है। न व्यक्ति का लिहाज है, न पद का और न ही उम्र का। लगता है ‘शालीनता’ शब्द राजनीति के शब्दकोष से गायब हो गया है। राजनीति सचमुच में दलदल बनती जा रही है, जो इसमें कूदेगा, इसके छींटों से बच नहीं पायेगा। इसी कारण इज्जतदार व्यक्ति इससे दूर ही रहना पसंद करते हैं। वह अपनी चादर मैली नहीं करना चाहते।

कहने को तो सभी कहते हैं कि वह राजनीति में ईमानदारी, स्वच्छता, पारदर्शिता, देश सेवा व राष्ट्रहित की रक्षा के लिए आये हैं। लेकिन, यह सब दिखावा मात्र है। ज्यादातर लोग राजनीति में सत्ता का जुआ खेलने आते हैं। वह भारतमाता की सेवा में कम, सत्ता की मूर्ति की आराधना में ज्यादा तल्लीन रहते हैं और सत्ता का ही फल प्राप्त करना चाहते हैं। सत्ता और वोट के लिये हमारे नेता कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। वह अपने आदर्शों, नीतियों और परंपराओं की बलि चढ़ा सकते हैं। यही हो रहा है गौमांस के मुद्दे पर।

हैरानी तो यह है कि इसकी धार्मिक व्याख्या कर रहे हैं लालू प्रसाद यादव और अखिलेश यादव सरीखे राजनेता। उनकी भाषा चुनाव से प्रेरित विशुद्ध राजनीतिक भाषा है। उन्हें न धर्म से कुछ लेना-देना है और न समाज से। उन्हें तो वोट रूपी वृक्ष को धर्म का नाम लेकर जोर से झकझोरना है, ताकि वोट नीचे गिर जायें और वह उन्हें समेटकर अपनी झोली भर लें। लालू यादव जिन्हें चारा घोटाले में भ्रष्टाचार के लिये पांच साल की सजा प्राप्त है, इस चुनावी मौसम में नैतिकता व सत्यनिष्ठा का उपदेश जनता को दे रहे हैं। धर्म-अधर्म की व्याख्या कर रहे हैं। लालू ने तो यहां तक कह डाला कि गौमांस पर प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हरण है और हिन्दू भी गौमांस खाते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह भी उन हिन्दुओं में से एक हैं या नहीं। किस साक्ष्य या आधार पर यह फरमान सुनाया, यह भी उन्होंने नहीं बताया। वैसे राजनेताओं को हर तुकी-बेतुकी बातें कह देने का अधिकार होता है। लेकिन, साथ ही लालू ने यह भी कह डाला कि गौमांस स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

लालू यादव की बातों पर तो उतना ही विश्वास किया जा सकता है जितना कि कभी उनके सहयोगी और फिर विरोधी रहे और आज अंतरंग मित्र बन चुके बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में कही गई उनकी बातों पर। उनका कौन सा विचार किसी के बारे में कब ठीक या गलत था यह तो आज वह स्वयं भी बताने के लिये तैयार नहीं हैं। वह अपनी ही बात से कब पलट जायें, यह तो उन्हें स्वयं भी मालूम नहीं होता।

अखिलेश यादव ने दूसरा पासा फेंका। उन्होंने, प्रधानमंत्री मोदी को गौमांस समेत सभी प्रकार के मांस के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की चुनौती दे डाली। वह जानते हैं कि इस व्यवसाय में अधिकतर लोग मुस्लिम समुदाय से ही संबंधित हैं और उनमें भी बहुत ज्यादा लोग गुजरात के हैं। दोनों ही प्रकल्पों में अखिलेश की दोनों अंगुलियां घी में हैं।

यदि मोदी ऐसा कर देते हैं तो उन्हें मोदी को मुस्लिम विरोधी करार देने के लिये मसौदा मिल जायेगा। यदि नहीं करते, तो अखिलेश कहने की स्थिति में होंगे कि उनकी चुनौती के कारण ही मोदी डर गए। इससे उन्हें अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में अपने आपको मुस्लिमों का मसीहा प्रस्तुत करने का मौका मिल जायेगा।

गौ-रक्षा हमारा एक सामाजिक कर्तव्य व उत्तरदायित्व भी है। इसके सामाजिक व आर्थिक लाभ अनगिनत हैं। गौ और पृथ्वी दोनों को हम माता मानते हैं, उसी स्वाभाविक तौर पर जैसे जन्म देने वाली महिला उस बच्चे की मां होती है। पहले महिलायें प्रसूता घर में ही होती थी और यह सारा काम एक निपुण दाई करती थी। जब तक मां अपने बच्चे की पूरी तरह देखभाल करने के लिये स्वस्थ्य नहीं हो जाती थी, तब तक मां का सारा काम दाई ही करती थी। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि जब किन्हीं स्वास्थ्य कारणों से यदि मां नवजात को अपना दूध न पिला पाई हो तो दाई ने अपना दूध भी दिया है। यही कारण है कि दाई को भी बच्चा मां के रूप में ही देखता था और कई स्थानों पर अब भी ऐसा देखने को मिलता है।

गौ माता और पृथ्वी माता का हर अंग व अंश मानव कल्याण व पालन-पोषण ही करते हैं। गौ व पृथ्वी दोनों माताओं की ही देन है कृषि। ये दोनों न होतीं तो आज यह सारी मानव जाति न होती। उनके बिना आदमी भूखा मर जाता। जिन देशों में धरती मां और गौ माता का आदर नहीं हुआ वह बिछड़ गये हैं। उनकी अर्थव्यवस्था व संस्कृति गड़बड़ा गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने भी गौ माता और पृथ्वी मां की उपेक्षा की और यही हमारी कई समस्याओं और दु:खों का कारण हैं। जिस घर में मां का सम्मान नहीं होता, उनकी देखभाल नहीं होती, वह घर कभी सुखी नहीं होता है। भारत में तो सदा इन दोनों माताओं की पूजा ही की गई है।

सब मानते हैं और जानते हैं कि हिन्दू धर्म कोई पंथ नहीं। यह तो एक जीवन पद्धति है। इस तथ्य को तो हमारे उच्चतम न्यायालय ने भी स्वीकारा है और इस विश्वास पर अपनी मुहर भी लगा दी है। हमारी संस्कृति ने गौ और धरती दोनों को मां के रूप में देखा और पूजा है। हमारे धर्म ग्रंथों व धर्माचार्यों ने इसका प्रचार किया तो अवश्य पर वह किसी पंथ का प्रचार न होकर मानवता की भलाई के लिये ही ज्ञानोपार्जन व एक शुभ संदेश है।

भारत में गौ पूजा व रक्षा का धार्मिक महत्व अवश्य माना गया है। पर गौ के गुणों व मानवता के लिये उसके योगदान को किसी भी धर्म ने नकारा नहीं है। अनेक मुस्लिम व ईसाई धर्मगुरू गौ-रक्षा के हक में उठ खड़े हुए हैं। वह कहते हैं कि गौमांस सेवन उनके धर्म का अभिन्न अंग नहीं है। वह स्वयं मानते हैं कि इसके खाने से कई प्रकार से हानि होती है। यह तो कुछ धर्मांध स्वार्थी व वोट के लालची राजनेता ही हैं जो गौमांस सेवन को मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार बनाकर चुनावी लाभ के लिये विवाद को खड़ा करने के बाद इसे हवा दे रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि मुगल सम्राट बाबर ने धार्मिक रिवाज के तौर पर गौ बलि पर प्रतिबंध लगाने की बुद्धिमता को स्वीकार किया था और अपने बेटे हुमायूं को इसे लागू करने के आदेश दिये थे। इससे आगे अकबर, जहांगीर और अहमदशाह ने भी इसे जारी रखा। मैसूर के नवाब हैदर अली ने तो गौ वध को एक घृणित जुर्म करार दिया और दोषियों के हाथ ही काट देने के आदेश दिये। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं। जब मुस्लिम बादशाहों ने गौमांस सेवन को मुस्लिमों का निजी अधिकार नहीं माना और न ही कई मुस्लिम धार्मिक नेता इसकी वकालत करते हैं तो आज सेक्युलर-स्वतंत्र भारत में यह मौलिक अधिकार कहां से बन गया?

इसी प्रकार, 1953 में उत्तर प्रदेश सरकार ने गौ संवर्धन कमेटी का गठन किया था, जिसके तीन सदस्य मुस्लिम थे। गौवध पर प्रतिबंध लगाने की इस कमेटी की एकमत राय से इन तीन मुस्लिम सदस्यों ने भी अपनी पूरी सहमति प्रकट की थी। ये सभी साक्ष्य उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में वर्णित किये हैं, जिसमें उसने गौ हत्या प्रतिबंध को संविधान के अनुसार जायज ठहराया था।

एक प्रश्न और भी उठता है कि जो राजनेता व मुस्लिम नेता गौमांस को अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक अधिकार की दुहाई दे रहे हैं, क्या वह ऐसे ही अधिकार अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भी पाकिस्तान व बांग्लादेश में दिलायेंगे जो भारत के मुस्लिम भाइयों की तरह ही पाकिस्तान व बांग्लादेश में ही रह गये थे?

कुछ राजनेता गौमांस पर प्रतिबंध और गौ-रक्षा कानून को जानबूझकर वोटों को बटोरने के लिये राजनीतिक रंग दे रहे हैं और धार्मिक उन्माद पैदा कर रहे हैं। संविधान के जिन प्रावधानों के अंतर्गत गौ-रक्षा कानून बनाये गये हैं उन्हीं के अंतर्गत अनेक पशु-पक्षियों के शिकार पर भी रोक लगाई गई है। इस कानून से भी तो कुछ लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों पर कुठाराघात हुआ है। कुछ लोग तीतर, हिरण आदि का मांस खाने से वंचित कर दिये गये हैं। उनकी कोई बात क्यों नहीं करता? केवल इसलिये कि इन अति अल्पसंख्यक लोगों के वोटों का महत्व कम है।

जिस प्रकार गौवध रोक देने के कारण कई लोग बेरोजगार हो जायेंगे, उसी प्रकार लाखों लोग अपनी रोजी-रोटी से वंचित हो गये हैं, क्योंकि सर्कस में जानवरों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। सिगरेट, तम्बाकू, बीड़ी, गुटके, कुछ पटाखों आदि पर भी प्रतिबंध है। क्या वेश्यावृत्ति, जुए, सट्टे पर प्रतिबंध से लोगों के पेट पर पत्थर नहीं मारा गया है? क्या उससे किसी के व्यक्तिगत व मानवीय अधिकारों पर चोट नहीं पड़ी है? फिर, गौमांस पर सांप्रदायिक भावनाओं को क्यों भड़काने दिया जा रहा है?

वह तर्क देते हैं कि उनका पंथ व देश अपने लोगों अपनी इच्छानुसार जीने व उनके अधिकारों का सम्मान करता है। व्यक्ति तो आदमी का मांस खाने की इच्छा भी कर सकता है और उस पर अपना अधिकार जमा सकता है। तो क्या कल की तारीख में इसका भी सम्मान किया जायेगा?

जब संविधान में गौवध पर प्रतिबंध के बारे में प्रावधान दिया गया था तो संविधान सभा के सभी सदस्यों ने एकमत से इसकी पैरवी की थी, जिसमें अनेक मुस्लिम भाई भी थे।

ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि गौवध या गौमांस पर प्रतिबंध न कोई नया है और न यह आज ही लगा है। भारत के कुल 29 राज्यों व 9 संघीय प्रदेशों में से केवल 7 ही राज्य व संघीय प्रदेश हैं, जिनमें किसी न किसी रूप में गौवध पर कोई प्रतिबंधक कानून नहीं है। वह हैं, अरूणाचल प्रदेश, केरल, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा व लक्षद्वीप।

इस बार कुछ ज्यादा ही शोर मचाया जा रहा है, सेक्युलर दलों कुछ धार्मिक व सामाजिक संगठनों द्वारा। इसके पीछे भी एक कारण है। इन दिनों बिहार में चुनाव चल रहे हैं। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, केरल आदि में चुनावी मौसम पैदा हो जायेगा। यहां सब जगह अल्पसंख्यकों की संख्या इतनी है जो किसी का भी चुनावी गणित बना या बिगाड़ सकती है। गौवध पर प्रतिबंध के औचित्य या अनौचित्य से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें इस कारण हो रहे अहित से कतई कोई सरोकार नहीं है। ये तो वोट के लिये कुछ भी करेगा।         (अन्त:करण)

детектор правдыru wikipedia

Leave a Reply

Your email address will not be published.