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गुलाबी क्रांति कितनी गुलाबी?

गुलाबी क्रांति कितनी गुलाबी?

अपने विवादास्पद सांप्रदायिक बयानों के लिए मशहूर यूपी के कैबिनेट मंत्री आजम खान ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तीखा हमला करते हुए कहा – यदि वे गुलाबी क्रांति के जरिये मुसलमानों का कत्ल कराना चाहते हैं तो हम उनकी निंदा करते हैं। आजम ने पीएम मोदी को नया संत बताते हुए कहा कि मोदीजी आगामी संसदीय सत्र में प्रतिबंधित पशुओं की हत्या को रोकने के लिए कानून बनायें और उन्हें काटने और प्रतिबंधित मांस खाने वालों के लिये सख्त सजा का प्रावधान करें। उन्होंने कहा, भारत सरकार की ओर से इस बात पर भी श्वेत-पत्र आना चाहिए कि देश में गोश्त काटने और निर्यात करने के ज्यादातर कारखाने किसके हैं? आजम ने खुलासा किया कि भारत भर में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा पशु वधशालायें भाजपा, विहिप, आरएसएस और शिवसेना के साथ-साथ जैन बन्धुओं की हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा को महज चुनाव की खातिर गोश्त की राजनीति नहीं करनी चाहिए। मोदी की गुलाबी क्रांति ने देश को बर्बादी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि आज गोवा, पॉडुचेरी, नागालैण्ड में दुकानों पर खुलेआम गोश्त बिकता है, देश की राजधानी के ज्यादातर पांच सितारा होटलों में प्रतिबंधित पशुओं के गोश्त मीनू में शामिल हैं। इन होटलों को बाबरी मस्जिद की तरह तोड़ा जाना चाहिए। आजम खां ने कहा कि गोश्त की राजनीति खत्म होनी चाहिए और इसके खिलाफ प्रभावी और देशव्यापी कानून बनना चाहिए।

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाने पर लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि ‘गुलाबी क्रांति’ के खिलाफ बात करने वालों को गौमांस के निर्यात पर अब प्रतिबंध लगाना चाहिए, क्योंकि अब वे सत्ता में हैं। उन्होंने साथ ही आरोप लगाया कि इस प्रकार के मुद्दे उठाकर वे देश के ‘धर्मनिरपेक्ष’ चरित्र को बाधित करना चाहते हैं।

पिछले दिनों दिल्ली से 33 मील दूर स्थित दादरी में गोमांस खाने के संदेह में अखलाक नामक अल्पसंख्यक समुदाय के एक व्यक्ति की भीड़ के साथ हाथापाई में मृत्यु के बाद मीडिया में इस पर भारी बवाल मचा हुआ है। हालांकि, कानून और व्यवस्था राज्य का मामला होता है, मगर समाजवादी पार्टी के राज में कभी कानून-व्यवस्था नाम की चीज होती ही नहीं है। इसलिए वह अपनी जिम्मेदारी संघ और भाजपा पर मढ़कर बरी हो जाना चाहती है। मीडिया भी राज्य सरकार को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाने की बजाय संघ परिवार या हिन्दुत्व समर्थक ताकतों को जिम्मेदार ठहरा रहा है। उसका कहना है कि इन ताकतों द्वारा गौमांस के मुद्दे पर सांप्रदायिक माहौल बनाने के कारण इस तरह की घटनाएं हो रही हंै। यह एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए किसी की खाने की स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। लेकिन, मोदी ने गुलाबी क्रांति को अपने चुनाव प्रचार के दौरान मुद्दा बनाकर देश में एक विषाक्त वातावरण पैदा किया है। मुसलमानों पर इल्जाम लगाया जा रहा है कि वे गुलाबी क्रांति की आड़ में गोमांस का निर्यात कर रहे हैं। क्या सचमुच ऐसा है, आखिर इस संवेदनशील मुद्दे की सच्चाई क्या है?

24-10-2015

अब यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये गुलाबी क्रांति क्या बला है। इन दिनों कृषि के क्षेत्र में तरह-तरह की क्रांतियों का जिक्र होता है। जैसे- हरित क्रांति यानी खाद्यान्न उत्पादन, श्वेत क्रांति यानी दुग्ध उत्पादन, नीली क्रांति यानी मत्स्य उत्पादन, रजत क्रांति यानी अंडा उत्पादन और पीली क्रांति मानें तिलहन उत्पादन। वैसे ही है गुलाबी क्रांति। दूसरे शब्दों में कहें तो गुलाबी क्रांति यानी मांस का कारोबार। मोदी ने मांस के रंग से इस क्रांति को जोड़ा। 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में तेजी से बढ़ते बीफ कारोबार पर सवाल उठाए थे। मोदी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की बदहाली को कांग्रेस की पिंक रिवोल्यूशन (गुलाबी क्रांति) का नतीजा बताया था। उन्होंने कहा था कि दिल्ली सरकार गुलाबी क्रांति के अंतर्गत मांस का निर्यात बढ़ाना चाहती है। स्लॉटर हाउसेज, मीट प्रोसेसिंग यूनिट्स, मटन एक्सपोर्ट आदि के लिए सब्सिडी दी जा रही है। पशु और कृषि पर ध्यान न देने के कारण ही वेस्ट यूपी में किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। एक्सपोर्ट होने से देश में भी नॉनवेज खाने वालों को मंहगा मटन मिल रहा है। उन्होंने पशुओं के अवैध कटान पर चिंता जताते हुए कहा था कि पशुधन न होने पर किसान और ग्रामीण व्यवस्था चरमरा रही है। पशु का इस्तेमाल कृषि कार्यों में भी होता है। ग्रामीण मजबूरन अपने पशुओं को बेच रहे हैं। यदि एक सीजन भी बारिश न हुई तो गांवों की पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। इसकी चिंता केंद्र सरकार को नहीं है।

पश्चिमी यूपी के सभी जिलों में मीट एक बड़ा कारोबार बन गया है। कुछ लोगों का कहना है कि मांस निर्यात करने वालों में उत्तर प्रदेश सबसे अव्वल है, आधा मांस यहीं के स्लॉटर हाउसेज से निर्यात होता है। गाजियाबाद, डासना, मसूरी, हापुड़, खुर्जा, बुलंदशहर आदि जगहों पर कई मीट प्रोसेसिंग यूनिट्स और स्लाटर हाउस चलाये जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक गाजियाबाद में पशुओं की संख्या 3.25 लाख, बुलंदशहर में 27 लाख, हापुड़ में 10 लाख है। एक दशक में इनकी संख्या में 60 फीसदी की कमी आई है। इसकी बड़ी वजह अवैध रूप से संचालित कट्टीघर यानी बूचडख़ानें हैं।

24-10-2015

भारत में मांस कितना मुनाफे का धंधा है, इसका अनुमान नीचे दी गई इस गणना से लगाया जा सकता है। भारत में बीफ 120/- रुपये प्रति किलो खुलेआम बिक रहा है। एक गाय-भैंस-बैल के कटने पर लगभग 350 किलो मांस निकलता है, चमड़े और हड्डियों की अलग से कीमत मिलती है।

जो पशु औसतन 8,000-9,000/- रुपये में गांव में मिल जा रहे हैं और सूखे वाले प्रदेशों में तो यह 3,000/- रुपये में ही मिल जाते हैं। अगर, हम मान लें कि पशु की कीमत 8,000/ होती है। उसे काटने पर 350 किलो मांस मिलता है। उस मांस के दाम होते हैं, 350& 120= यानी 42,000 रुपये, चमड़े के 1000 रूपये। इस तरह किसान को मिला सिर्फ 9000 रूपये तो कत्लखाना चलाने वालों को मिलें, कुल 43,000-9,000 = 34,000 रुपये। भारत में एक बूचडख़ाने में 10,000 से 15,000 हजार पशु रोज कटते हैं। औसतन 12000 पशु रोज। तो एक कत्लखाना मालिक को 34000&12000 = 40,80,00,000 (40 करोड़ रोज का मुनाफा हो रहा है।) यदि साल में 320 दिन यह काम चले तो 40 करोड़ & 320 = 12,800 करोड़ रुपये सालाना शुद्ध मुनाफा हुआ। जब किसी धंदे में ऐसा भारी मुनाफा हो तो भला कोई बूचडख़ाना चलाने वाला इसे क्यों बंद करेगा!

24-10-2015

गुलाबी क्रांति में यूपीए ही नहीं सपा का भी हाथ है। उत्तर प्रदेश मे 8 अत्याधुनिक बूचडख़ानें के लिए जो टेंडर मंगवाएं हैं, उनमें ऐसी मशीनों का प्रयोग होगा, जो 1 दिन में हजारों मवेशियों की ‘हत्या’ करेंगी। एक ऐसी मशीन है, जिसमें पशु को एक संकरी गली में घुसेड़ा जाता है और आखिरी सिरे पर एक दर्पण होता है। मवेशी उसे छूने के लिए जैसे ही अपना सिर अंदर करता है। मशीन उसकी गर्दन को जकड़ लेती है और तुरंत उसका सिर धड़ से अलग हो जाता है।

क्या आपको पता है कि उत्तर प्रदेश में 15 बूचडख़ाने खोलने की अनुमति मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दी है, जहां एक कत्लखाने में एक दिन में 10,000 (दस हजार) जानवरों को काटा जायेगा, तो एक दिन में 15 कत्लखानों में 1,50,000 जीवों की ‘हत्या’ होगी। जिस सपा सरकार ने बूचडख़ाने को चलाने की अनुमति दी है, वह उसकी वकालत करे यह तो स्वाभाविक ही है।

लेकिन, गौहत्या और गौमांस खाने को लेकर विवाद और वारदात का देश में ये पहला मामला नहीं है। गौहत्या को लेकर सदियों से विवाद चलता रहा है। मुसलमान जब भारत आये तो उनके और हिन्दुओं के बीच विवाद का एक मुद्दा गाय भी था। अक्सर गौहत्या को लेकर दोनों को बीच दंगे होते रहे हैं। कुछ लोग ऐसा मानते हैं गौहत्या को राजनीतिक मुद्दा बनने की शुरूआत देश में अंग्रेजों के आने के बाद हुई। भारत में ब्रिटिश हुकूमत की शुरूआत करने वाले रॉबर्ट क्लाइव ने 1760 में कोलकाता में पहला बूचडख़ाना बनवाया। इसी के साथ शुरूआत हुई उस कारोबार की, जिससे आज भी लाखों लोगों की रोजी – रोटी चलती है। इन बूचडख़ानों में काम करने के लिए गरीब मुसलमानों को रखा गया। इस तरह से गौहत्या के मुद्दे ने सांप्रदायिक रंग ले लिया।

24-10-2015

जब देश आजाद हुआ तो संविधान में भी राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत गाय की रक्षा की बात कही गयी है। जिसके बाद देश के कई राज्यों ने गौहत्या पर रोक लगाने के लिये कानून बनाये। लेकिन, हिंदू संगठन पूरे देश में गौहत्या पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं।

हिंदू संगठन आज भी यही मांग कर रहे हैं कि देश में गौवंश हत्या पर पूरी तरह से रोक लगाई जाये। लेकिन, इस मांग को किसी सरकार ने पूरा नहीं किया। इसकी सबसे बड़ी वजह इससे जुड़ा कारोबार है। मांस और चमड़े के इस कारोबार से न सिर्फ लाखों लोगों का रोजगार जुड़ा है, बल्कि इसके निर्यात से सरकार को भी विदेशी मुद्रा मिलती है। भारत आज दुनिया में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। अंग्रेजी के शब्द बीफ का मतलब आमतौर पर गाय के मांस से लगा लिया जाता है, जबकि ये सही नहीं है। गाय, बैल, सांड, भैंस, भैंसा के मांस को मिले-जुले तौर पर बीफ कहा जाता है। यानी अगर कोई बीफ खाने की बात कह रहा है तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो गाय का ही मांस खा रहा है।

24-10-2015

भारत दुनिया में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक जरूर है, लेकिन भारत में इसकी खपत सिर्फ 3.8 फीसदी ही है। लेकिन, जिस गौमांस को लेकर सारा विवाद है, क्या उसका इस कारोबार से कोई लेना देना है?

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के अंदर ही महाराष्ट्र और हरियाणा की बीजेपी सरकार ने गौवंश हत्या पर रोक का कानून भी बना दिया। महाराष्ट्र में तो 1976 से ही गौमांस पर रोक है, लेकिन अब नये कानून के तहत बैल और सांड़ के मांस पर भी रोक लगा दी गई है। यहां समझने वाली बात यह है कि हिंदू संगठन जिस गौहत्या पर रोक की मांग करते रहे हैं वो रोक देश के ज्यादातर राज्यों में पहले से ही लागू है। भारत में बीफ के निर्यात का सालाना कारोबार 25 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का है। बीफ के इस कारोबार में मुनाफा कमाने वालों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही शामिल हैं यानी यह किसी एक धर्म का मामला नहीं है।

भारत में केरल, बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों को छोड़कर लगभग सभी जगह गौहत्या पर रोक का कोई न कोई कानून मौजूद है, लेकिन ये भी सच है कि पिछले कुछ सालों में गायों की संख्या में भारी कमी आई है। 1951 में हुई पशुओं की गणना के मुताबिक भारत में गायों की तादाद कुल मवेशियों की 53.04 फीसदी थी जो 2012 में घटकर 37.28 फीसदी रह गयी। इसलिए बीफ और गोमांस के बीच फर्क और बीफ के कारोबार की तमाम चुनौतियों के बीच ये सवाल भी जिंदा है कि आखिर गायों की संख्या में यह कमी कैसे और क्यों आई? योजना आयोग के ताजा आंकड़े के अनुसार भारत में गायों की संख्या 1947 में 01 अरब 21 करोड़ थी, जो घट कर आज केवल 10 करोड़ रह गई है। यहीं एक गंभीर सवाल खड़ा होता है। मानवीय जनसंख्या के अनुपात में गौवंश की जनसंख्या क्यों नहीं बढ़ी? घटी भी तो इतनी तेजी से क्यों घटी? अगर मांस के नाम पर गौमांस का व्यापार नहीं हो रहा है तो क्या भारत में गौमांस की इतनी ज्यादा खपत है? क्यों मांस की आड़ में गौमांस के निर्यात की अनदेखी की गई है और क्यों की जा रही है?

मुंबई उत्तर-पूर्व के भाजपा सांसद किरीट सोमैया ने 25 जून को केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण को एक पत्र लिखा। इसके जवाब में सीतारमण लिखा कि सच यह है कि भारत से गौमांस के निर्यात की अनुमति कभी थी ही नहीं। शुरू से ही यह अवैध तरीके से निर्यात किया जाता है। आजादी के बाद से ही गौमांस के निर्यात को नकारात्मक सूची में रखा गया है। भले देश के कुछ राज्यों में गौवध पर प्रतिबंध न हो, पर उन्हें भी गौमांस के निर्यात की अनुमति नहीं है।

24-10-2015

किरीट सोमैया को लिखे पत्र में निर्मला सीतारमण ने इस बात का उल्लेख नहीं किया कि कानूनी तौर पर गौमांस का निर्यात हमेशा से प्रतिबंधित रहा है। बड़ी सफाई से लिखे गए इस पत्र में कहा गया है कि आप द्वारा उठाये गए विषय को जांचा-परखा गया। आपको यह सूचित किया जाता है कि विदेश निर्यात नीति के तहत, गौमांस (गाय, बैल, बछड़े और सांड का मांस) प्रतिबंधित है और इसके निर्यात की अनुमति नहीं है। आगे यह लिखा गया है कि जहां तक गौवंश के संरक्षण की बात है तो इस संबंध में केंद्रीय सरकार और राज्यों की शक्तियों का निर्धारण किया गया है। पशुधन के संरक्षण का विषय पूरी तरह से राज्यों की विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। अत: यह राज्य सरकारों पर है कि वे इस प्रकार के कानून बनायें। गौवध बंदी के लिये कानून बनाना केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। इसके अगले पैरा में वाणिज्य मंत्री ने यह भी जोड़ा कि मांस निर्यातकों को परिवहन में दी जाने वाली छूट 1 जनवरी, 2014 से समाप्त कर दी गयी है। यह छूट निर्यात की ग्यारहवीं योजना में दी गयी थी, पर बारहवीं योजना में इसे जारी नहीं रखा गया है।

करीब एक दशक में व्यापारिक दृष्टि से गौधन की दशा का विश्लेषण करें तो सत्तारूढ़ लोगों की मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति उजागर होती है। मनमोहन सिंह सरकार के योजना आयोग ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना में बूचडख़ाने की संख्या में बड़ी तादाद में बढ़ोत्तरी का लक्ष्य तय किया था। मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने पशु कत्लगाहों के आधुनिकीकरण के लिये अरबों रुपए की राशि आवंटित किये थे। जिससे ज्यादा मात्र में मांस का उत्पादन हो और उसका निर्यात हो। इसे ही ‘पिंक रिवोल्यूशन’ नाम दिया गया। इसके चलते पिछले 5 साल में भारत से मांस के निर्यात में 40 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है।

गौवंश संरक्षण से जुड़े मुंबई निवासी राजेंद्र जोशी कहते हैं कि पिछले 15 महीनों में ही गोमांस के निर्यात में 15 से 27 फीसदी तक बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। उनका यह भी कहना है कि मांस के निर्यात के नाम पर बड़ी मात्रा में गौमांस का ही निर्यात होता है। गौमांस का व्यापार करने वाले विशेष तरह की पैकिंग कर गौमांस को चिन्हित करते हैं। सबकी जानकारी में, सरकार की नाक के नीचे धड़ल्ले से उसका अवैध कारोबार होता है।

भारत के 29 में से 26 राज्यों में गौवध बंदी कानून लागू है। कुछ राज्यों में तो हर प्रकार और किसी भी आयु के गौवंश के वध पर न केवल पूर्ण प्रतिवंध है बल्कि उसे गंभीर और गैरजमानती अपराध की श्रेणी में भी रखा गया है। बड़ी बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में आजादी के पहले से ही गौवध बंदी लागू है। आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में कहीं सभी प्रकार के पशुओं के वध की अनुमति है तो कहीं आयु के आधार पर कुछ शर्तों के साथ गौवध की भी अनुमति है। परंतु, बड़ी बात यह है कि पूरे देश में मांस के उत्पादन पर रोक नहीं है। यहां तक कि मांस के उत्पादकों को आयकर में छूट प्राप्त है। इस समय देश में 3,616 बूचडख़ाने हैं। इनमें से 38 अत्याधुनिक या कहें कि यांत्रिक कत्लखाने हैं। इसके अलावा 40 हजार से ज्यादा अवैध बूचडख़ाने हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में बोवाइन के बढ़ते महत्व का अंदाजा अंतरराष्ट्रीय खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसंधान पत्र से लगाया जा सकता है। इसके मुताबिक भैंस का मांस स्वादिष्ट और चर्बी रहित है। इसमें सूअर की तुलना में सैचुरेटेड फैट कम होता है, लिहाजा स्वास्थ्य की दृष्टि से यह मांस ज्यादा अच्छा है। यही कारण है कि निर्यातक अधिक कीमत पर दुधारु और अच्छी सेहत के जानवरों को खरीदकर उनके मांस का निर्यात कर रहे हैं। अधिकतर मांस निर्यात कर दिए जाने के कारण देश में भैंस के मांस की कीमत 30 रुपए से बढ़कर 100 रुपए प्रति किलो हो गई है और वह गरीब मांसाहारियों की पहुंच से भी दूर होता जा रहा है। बोवाइन के निर्यात से दूध उत्पादन में जो कमी आई है उसकी भरपाई नकली दूध से होने लगी है। इसी का नतीजा है कि आज गांवों में सिंथेटिक दूध बनाने का कारोबार दिन-दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रहा है। इस दूध के साथ बीमारियां मुफ्त में मिल रही हैं। विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन की चेतावनी पर भारत को गौर करना होगा, जिसने कहा गया है कि अगर गौधन का संवर्धन नहीं हुआ, तो 5 वर्ष बाद भारत में दूध का संकट विकराल हो जाएगा।

सतीश पेडणेकर

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