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सर्वकार्यविधायिनी

सर्वकार्यविधायिनी

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोअखिलस्य।

प्रसीद विश्वेतरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।।

दारूण ग्रीष्म ऋतु तथा वर्षा ऋतु के बाद पृथ्वी पर शरद ऋतु अवतरित होता है। इस समय समस्त धरा उल्लासित हो उठती है। वातावरण में मधुरता आ जाती है। हिन्दू धर्म की मान्यता है कि इस सुहानी ऋतु में जगतजननी का पृथ्वी पर अवतरण होता है। माता के आगमन से प्रत्येक हृदय आनन्द से खिल उठता है। हिन्दू धर्म में शक्ति उपासना का बहुत महत्व होता है। यह मान्यता भी है कि ‘शक्ति के बिना सत्ता संभव नहीं।’ पारब्रह्म परमेश्वर की सत्ता शक्ति के बिना संभव नहीं है। शक्ति के उपासक अर्थात मां भवानी की पूजा करने वाले व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक दृढ़ होते हैं। उनके ऊपर नि:संदेह माता की कृपा बरसती है।

स्वयं भगवान रामचन्द्र ने भी महाप्रतापी रावण से विजय प्राप्त करने के लिये मां दुर्गा की उपासना की थी। जब हम अपने निर्मल ह्दय में मां अम्बे को विराजित कर लेते हैं तो हमारी विजय सुनिश्चित हो जाती है। हम अलग-अलग देवी-देवताओं को पूजते हैं, जिनके महत्व भी अलग-अलग होते हैं, लेकिन मां भवानी को हम हर रूप में देख सकते हैं। मां अपने भक्तों की आवश्यकता के हिसाब से रूप धारण करती हैं। कभी शक्ति रूप में आकर दुष्टों का विनाश करती हैं, तो कभी क्षमा रूप में सभी को अपना लेती हैं। कभी भक्ति भाव में बंधकर भक्तों पर खुशियां बरसाती हैं, तो कभी मां के स्वरूप में आकर अपनी संतानों को प्रेम में बांध लेती हैं। अनेक रूपों में प्रकट होने वाली मां अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं हैं। मां की उपासना करने से न केवल हम सफल हो सकते हैं, बल्कि जटिल से जटिल परिस्थितियों का सामना निडरता के साथ कर पाते हैं।

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति:॥

हे देवी, विश्व की सम्पूर्ण विद्याएं तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत में जितनी स्त्रियां हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियां हैं। तुम नारी के अंदर हर रूप में प्रकट हो सकती हो।

माता की उपासना के लिए माता की स्तुति एकान्त में आवश्यक है। ‘दुर्गा सप्तशती’ हिन्दू धर्म का सर्वमान्य ग्रन्थ है। इसमें भगवती की कृपा के सुन्दर इतिहास के साथ-साथ बड़े गूढ़ साधना के रहस्य भरे हैं। कर्म, शक्ति और ज्ञान इन तीनों को हम इस ग्रन्थ में समाहित देख सकते हैं। सकाम भक्त इसे पाकर अपनी मनोकामना पूरी कर सकते हैं और निष्काम भक्त परम दुर्लभ मोक्ष को पाकर कृतार्थ होते हैं। मां ने महर्षि मेधा महाराज सूरथ और समाधी वैश्य को जो ज्ञान प्रदान किया था, उससे न केवल उनके जीवन पर प्रभाव पड़ा, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारकर हर व्यक्ति अपने जीवन को उज्जवल बना सकता है। भगवती परमेश्वरी की शरण में आने और उनकी आराधना से भोग, स्वर्ग और मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। वहीं दिव्य ज्ञान प्राप्त कर राजा सूरथ ने अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया। वर-वैराग्यवान समाधि वैश्य ने दुर्लभ ज्ञान के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति की थी।

सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने मार्कण्ड ऋषि से वर्णन करते हुए उन्हें नवदुर्गा का ज्ञान दिया था। उन्हें मां दुर्गा के नौ नामों और नौ रूपों से अवगत कराया था। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्विदात्री। ये सभी नाम महात्मा वेद भगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं। नाना रूपधारी माता की पूजा-पद्धति भी भिन्न होती है। माता के अनेक रूपों की पूजा में बलि की प्रथा भी है। माता को खुश करने के लिये जो बलि दी जाती है, वास्तविक रूप से मनुष्य को उसका अर्थ नहीं पता है। दरअसल, हर व्यक्ति के भीतर पशुविक प्रवृति मौजूद होती है, बलि का अर्थ इस पशुविक प्रवृति की बलि चढ़ाने से हैं। लेकिन, लोग अपनी इस प्रवृति की जगह लाचार पशु की बलि चढ़ा देते हैं। कुछ मनुष्य जागृत हो चुके हैं तो वह बलि प्रथा को महत्व नहीं देते, लेकिन उसके स्थान पर अपने भीतर छिपे हिंसक पशु रूपी दुर्गुणों की जब तक बलि नहीं चढ़ाएंगे तब तक माता की पूजा व्यर्थ मानी जाएगी।

उपाली अपराजिता रथ

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