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बीफ, बस करो मूर्ख राजनेता!

बीफ, बस करो मूर्ख राजनेता!

बिहार के नवादा में ही 2014 के लोकसभा चुनाव-प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने गर्जना की थी, ”देश हरित क्रांति चाहता है, लेकिन केंद्र गुलाबी क्रांति चाहता है। आप जानते हैं, इसका मतलब क्या होता है? पशुओं का कसाईखाने में कत्ल होता है तो उनके मांस का रंग गुलाबी होता है। दिल्ली की सरकार ऐसे कसाईखाने चलाने वालों को सब्सिडी दे रही है।’’ भाजपा ने देश में मांस निर्यात को यूपीए के खिलाफ एजेंडा बनाया और कसाईखानों को कर रियायतें देने के लिए यूपीए सरकार की निंदा की थी।

सोशल मीडिया और एसएमएस से दो नारे उस समय काफी प्रचलित हुए थे। एक, ‘मोदी को मतदान, गाय को जीवनदान।’ और दूसरा, ‘बीजेपी का संदेश, बचेगी गाय, बचेगा देश।’ मोदी ने शहरों में ‘गौशाला’ बनाने और किसानों को बुढ़ाती गायों को कसाईखानों को न बेचने के लिए ‘गाय पेंशन’ देने का भी वादा किया था। साथ ही, गायों को बचाने के लिए ‘गाय संरक्षा दल’ के गठन और यहां तक कि देसी गायों की उपयोगिता की सीख देने के लिये ‘गाय विश्वविद्यालय बनाने का वादा किया गया था।

अब इस पर गौर कीजिए, जिसे जानकर कुछ धक्का लग सकता है। पिछले एक साल में भारत की स्थिति दुनिया में सबसे बड़े मांस निर्यातक देश की बनी हुई है। वित्त वर्ष 2014-15 में 24 लाख टन बीफ का निर्यात किया गया। यह दुनिया में कुल बीफ उत्पादन का 23.3 फीसदी है। 2014 में भारत को बीफ उद्योग से करीब 4.8 अरब डॉलर का मुनाफा हुआ और पहली बार बासमती चावल के निर्यात से भी ज्यादा मुनाफा हुआ। भारतीय वाणिज्य और उद्योग परिसंघ और उद्योग के आंकड़ों से पता चलता है कि गुजरात में मांस उत्पादन, मोदी के नेतृत्व में दोगुना हो गया। उसके मुताबिक राज्य में 2001-02 के 10,600 टन के मुकाबले 2010-11 में 22,000 टन मांस उत्पादन हुआ।

अखबार ‘द हिंदू’ के मुताबिक गुजरात सबसे अधिक संक्चया में कसाईखानों वाले 10 राज्यों में से है। इसके मुताबिक हर रोज औसतन 1,000 पशुओं को काटा जाता है। ‘बिजनेस टुडे’ के अप्रैल 2015 के अंक की एक रिपोर्ट बताती है, कि गुजरात में भाजपा सरकार के तहत नए कसाईखानों के निर्माण और पुराने कसाईखानों के आधुनिकीकरण के लिए 15 करोड़ रु. का अनुदान दिया जाता रहा है।

उîार प्रदेश की राजनीति की जमीनी हकीकतों की जानकारी रखने वालों के लिए दादरी में मोहक्वमद अखलाक की हत्या की वारदात हैरान करने वाली नहीं है। पिछले कुछ महीनों से भाजपा शासित राज्यों में गौवध पर पाबंदी लगाने या उस पर नए सिरे से जोर देने से लगातार एक माहौल बन रहा था। जक्वमू-कश्मीर में हाईकोर्ट ने मौजूदा कानून, 1932 के रणवीर दंड संहिता की एक धारा, पर जोर देते हुए बीफ की बिक्री पर अंग्रेजों के जमाने की पाबंदी पर अमल करने का आदेश जारी कर दिया।

असल में गायों के मामले में संवेदनशीलता पूरे देश में एक समान न रहने से यह संवेदनशील राजनैतिक मुद्दा बन गया है। दरअसल सिर्फ मुसलमान और ईसाई अल्पसंक्चयक ही बीफ का सेवन नहीं करते, बल्कि देश की आबादी में करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग भी बीफ का सेवन करते हैं। केरल, पश्चिम बंगाल और ज्यादातर पूर्वोîार राज्यों में पशुओं को काटने पर कोई पाबंदी नहीं है और वहां बीफ का सेवन बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसलिए गौमांस पर पाबंदी या अंकुश लगाने का मामला आस्था या अर्थव्यवस्था का उतना नहीं, जितना दलगत राजनीति का है।

पहले स्वतंत्रता संग्राम, या जिसे 1857 का सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है, में भड़काऊ मामला बंदूक की गोलियों में लगे मांस की परत को दांत से काटने पर सिपाहियों को मजबूर करना ही बना था। मौजूदा ‘मेक इन इंडिया’ अभियान में शेर के प्रतीक चिन्ह की तरह आजादी के बाद से ही कई राजनैतिक दल गाय को भी प्रतीक चिन्ह बनाते रहे हैं। जो लोग आज पाबंदी लगाने को लेकर काफी हाय-तौबा मचा रहे हैं, उन्हें देश भर में शहरों और गांवों में सड़क पर मंडराती हजारों आवारा गायों की सुध लेनी चाहिए। आज हालत यह है कि छोटी जोत के सीमांत किसानों के लिए दूध न देने वाले पशुओं का भरण-पोषण मुश्किल होता जा रहा है और उनके पास उन्हें कसाइयों के हाथों बेचने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचा है। वे उन्हें भूखे मरने को तो नहीं छोड़ सकते।

गौशालाओं के भारी अकाल, गौचर भूमि के अतिक्रमण, खेती के लिए मशीनी उपकरणों के इस्तेमाल, पशुओं की मिश्रित नस्ल पर जोर, दुग्ध क्षेत्र के कॉरपोरेटिकरण, वे वजहें हैं जिनसे भारत में गायों का भविष्य अंधकारमय है।

मांस पर पाबंदी का विवाद नया लग सकता है, लेकिन हकीकत में यह मामला काफी पुराना है। मोदी को उन कानूनों के लिए दोषी क्यों ठहराया जाना चाहिए, जो कई साल पहले ज्यादातर कांग्रेस सरकारों ने बनाए हैं। दुर्भाग्य से, विपक्ष और शिवसेना जैसे एनडीए के सहयोगी भी संकीर्ण फायदों के लिए इस मसले का राजनीतिकरण कर रहे हैं। गौवध बंद करने की आवाजें अब अधिक गर्मी पैदा कर रही हैं और धुआं भी उठेगा ही। असलियत यह है कि बीफ पर पूरी तरह पाबंदी देश भर में स्वीकार्य नहीं हो सकती। हालांकि, जिन राज्यों में पाबंदी लगी हुई है, वहां उस कानून पर पूरी तरह अमल के लिए मदद की जानी चाहिए।

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