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‘मफलरमैन’ बना एके-67

‘मफलरमैन’ बना एके-67

By श्रीकान्त शर्मा

मफलरमैन’ केजरीवाल अब एके-49 से बन गए हैं – एके-67। पिछले विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के 49 दिन बाद ही वह इस्तीफा देकर मुक्त हो गए थे। उनके उस कदम से उनका नामकरण किया गया था – एके-49। अब उन्होंने दिल्ली की विधानसभा में 70 में से 67 सीटें जीती हैं तो वह एके-49 से बन गए हैं – एके-67

भारतीय राजनीति में दिल्ली का दखल 543 में से बेशक केवल सात लोकसभा सीटों का ही हो, लेकिन दिल्ली विधानसभा के अविश्वसनीय, अनपेक्षित और ऐतिहासिक चुनाव परिणामों से मिलते इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ये परिणाम देश की राजनीति पर गहरा असर डाल सकते हैं। यह कहना जल्दबाजी तो हो सकती है कि केन्द्र में मोदी सरकार के गठन के बाद लोकसभा चुनावों से झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर होते हुए दिल्ली पंहुचा भारतीय जनता पार्टी का अक्षत विजय रथ स्थायी रूप से देश की राजधानी में खड़ा रहेगा, लेकिन दिल्ली चुनावों के परिणामों को दोनों राष्ट्रीय पार्टियों, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के लिए जबर्दस्त खतरे की घंटी ही नहीं, बल्कि तूफानी घंटा बजना कहा जाना बिल्कुल भी जल्दबाजी नहीं है। इन परिणामों के बाद उन्हें दीवार पर लिखी उस इबारत को पढऩा आ जाना चाहिए, जिसे इन राष्ट्रीय पार्टियों के अलावा हर कोई बहुत जोर-जोर से पढ़ रहा है। अण्णा आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी (आप) की रणनीति, देश की राजधानी की जनता से उसका जमीनी संपर्क, इस महानगरीय आम आदमी की अपेक्षाएं और आकांक्षाओं से जुडऩे की कोशिशों, बढ़-चढ़ कर किए गए लोकलुभावन वादों, दिल्ली के आम आदमी को दिखाए हसीन सपनों के अतिरिक्त लगभग सभी विपक्षी दलों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ‘आप’ के समर्थन में आगे आने की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं रही। यदि ऐसा नहीं होता तो ‘आप’ को रिकॉर्ड तोड़ 54 प्रतिशत वोट प्राप्त नहीं होते। हालांकि भारतीय जनता पार्टी के वोट प्रतिशत में अधिक नहीं, केवल 0.80 प्रतिशत की सेंध लगी है और पिछली बार मिले 32.2 प्रतिशत वोटों के प्रतिशत में अधिक नुकसान नहीं हुआ, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को इससे बड़ा धक्का और क्या लगेगा कि पिछले चुनावों में सबसे अधिक सीटें लाने वाली पार्टी, इस बार केवल 3 सीटों पर ही सिमट कर हाशिए पर ही खड़ी हो गई है। भारतीय जनता पार्टी की हार का विश्लेषण किया जाए तो साफ हो जाएगा कि वोटों के ध्रुवीकरण के दौरान वह गरीबों और दलितों के वोट अपने खाते में नहीं डाल सकी। जो वोट कांग्रेस को जाता था, वह वोट कांग्रेस के पूरी तरह हथियार डाल देने की वजह से उसके पास से छिटक गया। कांग्रेस का वह सारा वोट भारतीय जनता पार्टी के खाते में नहीं आया। अपनी रणनीति से ‘आप’ उसे अपने खाते में डलवाने में सफल रही। ‘आप’ की इस आंधी में भी भारतीय जनता पार्टी के जीतने वाले तीन उम्मीदवारों में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता रोहिणी से, विश्वासनगर से ओम प्रकाश शर्मा और मुस्तफाबाद से जगदीश प्रधान रहे। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी में पैराशूट से उतारी गर्इं मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी उस सीट को गंवा बैठी जिसे केन्द्र में मंत्री बनने से पहले डॉ. हर्षवद्र्धन ने 1993 से पार्टी का गढ़ बनाया हुआ था। वैसे डॉ. हर्षवद्र्धन की मंशा इस बार भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बन कर दिल्ली के इन चुनावों में उतरने की थी, लेकिन पार्टी हाईकमान के फैसले पर उस इच्छा को दबाए रखकर भी वह बड़ी विनम्रता के साथ किरण बेदी और पार्टी के चुनाव प्रचार में लगातार लगे रहे। उसके बावजूद कृष्णानगर की जनता ने और देश के मतदाता ने किरण बेदी को पसंद नहीं किया। परिणाम सामने आया कि किरण बेदी ने अपनी प्रतिष्ठा के साथ पार्टी की लुटिया भी डुबो दी।

‘मफलरमैन’ केजरीवाल अब एके-49 से बन गए हैं – एके-67। पिछले विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के 49 दिन बाद ही वह इस्तीफा देकर मुक्त हो गए थे। उनके उस कदम से उनका नामकरण किया गया था – एके-49। अब उन्होंने दिल्ली की विधानसभा में 70 में से 67 सीटें जीती हैं तो वह एके – 49 से बन गए हैं – एके-67।

28-03-2015

आप ने 70 सीटों वाली विधानसभा में शेष 67 सीटों पर कब्जा जमाकर कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया है। पन्द्रह साल तक दिल्ली पर राज करने वाली कांग्रेस इस बार अपना खाता भी नहीं खोल सकी। कांग्रेस ने सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 63 उम्मीदवार तो इतने वोट भी नहीं ला सके कि उनकी जमानत बच जाती। पिछली बार अपनी आठ सीटों से ‘आप’ के संयोजक अरविन्द केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनवाने वाली कांग्रेस इस बार तो अपना खाता भी नहीं खोल सकी। उसे कुल 9.7 प्रतिशत वोट मिले, जो पिछली बार मिले वोटों की तुलना में 14.85 प्रतिशत कम रहे। इन चुनावों में पार्टी का चेहरा बने अजय माकन को महासचिव पद से और पार्टी का नेतृत्व कर रहे अरविन्दर सिंह लवली को प्रदेशाध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा। अजय माकन के अतिरिक्त शीला दीक्षित की 15 साल की सरकार में मंत्री रहे डॉ. अशोक कुमार वालिया और हारून युसुफ, शोएब इकबाल जैसे महारथी धराशायी हो गए।

कहने को कह दिया जाए कि जीतने वाले की सारी गलतियां भी उसके गुणों में परिवर्तित हो जाती हैं और हारने वाले की अच्छाइयां भी गलतियां दिखने लगती हैं, लेकिन इन चुनावों में लगा जैसे भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व एक नई राजनीतिक पार्टी की अनुभवहीन लीडरशिप की तरह व्यवहार कर रहा है। कांग्रेस पार्टी तो पहले ही हथियार डाले बैठी थी। मैदान में उतरने से पहले ही कांग्रेस के नेताओं ने जैसे अपनी हार स्वीकार कर ली थी। पिछली बार तो कांग्रेस दिल्ली में 15 साल की ऐंटीइनम्बेंसी का शिकार थी और उसके बाद भी उसने हौंसले नहीं छोड़े थे और 25 प्रतिशत वोटों के साथ उसने आठ सीटें भी जीती थीं, लेकिन इस बार कांग्रेस पार्टी के रवैये ने इन चुनावों में मुकाबला ‘आप’ और भारतीय जनता पार्टी के बीच आमने-सामने का बना दिया था। रही-सही कसर भारतीय जनता पार्टी के चुनावी-रणनीतिकारों ने पूरी कर दी थी।

दिल्ली में पिछले विधानसभा चुनावों से लेकर इन चुनावों के मतदान के दिन तक चुनावी दंगल में ताल ठोंकती भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और ‘आप’ के क्रियाकलापों का परिदृश्य केवल एक ही नजर में केजरीवाल की जीत में पर्दे के पीछे की कहानी बयां कर देता है। पिछले चुनावों के बाद दिल्ली में जहां ‘आप’ के कार्यकर्ता घर-घर जाकर जनता से संपर्क बढ़ाकर अपना जनाधार न केवल मजबूत कर रहे थे, बल्कि लगातार उसका विस्तार भी कर रहे थे, तो दूसरी ओर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेता बयानों के वीर बन कर ‘आप’ पर निशाना साध रहे थे। इन चुनावों से पूर्व दिल्ली के मतदाता ने भारतीय जनता पार्टी की हार की पटकथा रामलीला मैदान में ही लिख चुके थे, जहां जननायक का तमगा लगाए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली ने लोकसभा चुनावों में दिल्ली में हुई कांग्रेस के राहुल गांधी की रैली की याद दिला दी थी। रही सही कसर पार्टी की रणनीति से नाराज बूथ लेवल के पार्टी के कार्यकर्ताओं और संघ ने पूरी कर दी।

28-03-2015

चुनावी विश्लेषणों में किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करना भारतीय जनता पार्टी की सबसे भारी गलती माना जा रहा है। लम्बे अर्से से डॉ. हर्षवद्र्धन को पार्टी दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करती रही है। पिछले चुनावों के बाद हालांकि पार्टी ने सबसे अधिक सीटें जीतकर भी सरकार का गठन करने से परहेज किया था, लेकिन यदि सरकार का गठन होता तब तो डॉ. हर्षवद्र्धन का ही मुख्यमंत्री बनना तय था। पार्टी ने दिल्ली की नब्ज पहचानने वाले नेताओं और दिल्ली की जनता से संपर्क में रहने वाले नेताओं को दिल्ली से दूर कर दिया। डॉ. हर्षवद्र्धन को मंत्री बना कर और विजय गोयल को राज्यसभा में भेजकर केन्द्र में ले गए। केन्द्र में ले जाकर डॉ. हर्षवद्र्धन के साथ जो व्यवहार मोदी सरकार ने किया, उसे भी दिल्ली की जनता ने पसंद नहीं किया। डॉ. हर्षवद्र्धन को स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय से हटाकर कम महत्व का मंत्रालय दे दिया गया। उसके बाद मुख्यमंत्री पद के लिए पैराशूट-उम्मीदवार किरण बेदी ने उन्हें तलब कर रही-सही कसर पूरी कर दी।

रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री मोदी की रैली के लिए भीड़ का न जुटना ही पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को पार्टी में लाने की कवायद थी। किरण बेदी पूरे चुनावी अभियान में पुलिस अधिकारी का अपना चोला नहीं उतार पाईं।

इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी की चुनावी प्रचार शैली ने भी केजरीवाल की इस जीत को ‘ऐतिहासिक और रिकॉर्ड विजय’ बनाने में पूरी भूमिका निभाई है। मतदान से कुछ दिन पूर्व ही अपनी पूरी ताकत झोंक देने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चार रैलियां आयोजित करने, केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सदस्यों और पार्टी के डेढ़ सौ सांसदों को प्रचार अभियान के काम में लगा देने से स्पष्ट हो गया था कि पार्टी हाईकमान ने भी दीवारों पर लिखी इबारत को पढ़ लिया है। वह समझ गया है कि उसके लिए दिल्ली में सत्ता तक पहुंचने की राह आसान नहीं। पार्टी ने विज्ञापनों के जरिए केजरीवाल के साथ ही उनके परिवार, यहां तक कि उनके राजनैतिक गुरू अण्णा हजारे को भी निशाना बनाने में नहीं बख्शा गया। दिल्ली की जनता को गणतंत्र दिवस की परेड में वीवीआईपी वर्ग के लोगों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल का दिखाई न देना और भारतीय जनता पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी का नजर आना भी दिल्ली की जनता को काफी अखरा।

अब यदि दिल्ली में शानदार विजय हांसिल करने वाले ‘आप’ के संयोजक केजरीवाल और उनके सहयोगियों की कार्यशैली पर नजर डाली जाए तो एक बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है कि ‘आम आदमी’ की पार्टी के इन नेताओं की सादगी और ‘आम आदमी’ की छवि बनाए रखने की कोशिशों ने उन्हें दिल्ली की जनता के इतना निकट लाने में काफी मदद की। उन्होंने दिल्ली के आम आदमी के बीच जाते हुए ‘आम आदमी’ का  चोला उतार कर नहीं फेंका, इसीलिए दिल्ली का ये चुनाव ‘फैशन आइकन’ बनाम ‘मफलरमैन’ के बीच बन गए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए ‘चाय बेचने वाले का बेटा’ होने का खूब प्रचार किया गया था, लेकिन गणतन्त्र दिवस के मौके पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान नरेन्द्र मोदी का दिन में छह-छह बार ड्रेस बदलना और बेशकीमती सूट पहनना उनकी ‘चायवाले’ की छवि से मेल नहीं खा रहा था। दिल्ली की जनता के लिए ही नहीं, बल्कि देश और अन्तर्राष्ट्रीय जगत में वह ‘चायवाले’ से ‘फैशन आइकन मैन’ बन गए, लेकिन केजरीवाल और उनके सहयोगी कितने भी बड़े समारोह में गए, वे सादे कपड़े पहने हुए थे। उनके पैरों में सैंडल थीं। उनकी छवि इस प्रकार की बनी जैसे कि दिल्ली के आम आदमी के किसी भी परिवार के सदस्य की हो सकती थी। आम आदमी की तरह सिर गले और कान को ढंके मफलर ने केजरीवाल की छवि ‘मफलरवाले’ की बना दी। केजरीवाल की यह छवि नेटवर्किंग साइट पर इतनी हिट हुई कि वह एक ट्रेंड की तरह नजर आने लगी। इसने केजरीवाल को दिल्ली के आम आदमी के दिमाग से सीधे दिल में उतार कर वोटिंग मशीन में बने झाड़ू के बटन तक पहुंचा दिया। एक मतदान केन्द्र पर अधिकारियों से बात करने पर पता लगा कि मतदाता खुद तो झाड़ू का बटन दबा ही रहे थे, बल्कि वे अपने पीछे आने वाले अन्य मतदाता को भी झाड़ू पर बटन दबाने का संदेश देते हुए बाहर निकल रहे थे।

दिल्ली ने तो केजरीवाल को दिल खोलकर संपूर्ण जनादेश का भारी समर्थन दे दिया। दिल्ली ने उन्हें ऐसा जनादेश दिया है जिससे विधानसभा में उन्हें कुछ भी करने से रोकने-टोकने वाला नहीं होगा। विपक्ष में केवल भारतीय जनता पार्टी के तीन विधायक – विजेन्द्र गुप्ता, ओमप्रकाश शर्मा और जगदीश प्रधान होंगे। इतना विशाल बहुमत लेकर केजरीवाल के पास न तो विधानसभा से भागने का रास्ता होगा और न ही अपने वादे पूरे न कर पाने के लिए कोई बहाना होगा। भारी मतों और जबर्दस्त बहुमत का अर्थ है कि दिल्ली के सभी वर्गों और क्षेत्रों के मतदाताओं ने भारी आकांक्षाओं और उम्मीदों के साथ ‘आप’ को वोट दिए हैं। अलग-अलग वर्गों की अलग उम्मीदें हैं। सब की आकांक्षाएं अलग हैं। ‘आप’ के घोषणा पत्र के वादे भी काफी बड़े हैं। केजरीवाल को अब दिल्ली की जनता को मुफ्त पानी, अविश्वसनीय दरों पर सस्ती बिजली और गड्ढों से रहित शानदार सड़कें उपलब्ध करानी हैं। भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना है। कुल मिलाकर दिल्ली की जनता पर बोझ डाले बगैर इस महानगर को दुनिया का शानदार महानगर बना देना है। केजरीवाल का कहना है कि गरीबों के लिए झुग्गियों की जगह मकान देने हों या फिर सीवर-पानी की समस्या हो अथवा शानदार सड़कें बनवानी हों, नि:शुल्क वाई-फाई देना हो, उसके लिए पैसों की नहीं बल्कि नीयत की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी पूर्ण आश्वासन है कि दिल्ली को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने में दिल्ली सरकार को केन्द्र की पूरी मदद मिलेगी। केजरीवाल के समक्ष चुनौतियां अब शुरू होती हैं जो उनके चुनाव जीतने से भी बड़ी हैं। जनता काम चाहती है, वह भी तुरन्त। यदि उसकी आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई और उम्मीदें बुझ गर्इं, तो वह केजरीवाल के सपनों को भी पूरा नहीं होने देगी। जनता जिसे पलकों पर बैठाना जानती है, उसे पलकों से गिराने में जनता को वक्त नहीं लगता। उम्मीद की जानी चाहिए कि चुनावों से पूर्व के केजरीवाल और उनके सहयोगियों की विनम्रता और उनका उत्साह दिल्ली के विकास और महानगर की जनता की समस्याओं को दूर करने के वक्त भी ऐसे ही कायम रहेगा।

इन चुनावों के परिणामों का असर देश की राजनीति पर पडऩा भी निश्चित है। आने वाले समय में कई राज्यों में चुनाव होने हैं। ये चुनाव परिणाम ‘मोदी लहर’ के खत्म होने का संकेत भी दे रहे हैं और भाषणों की बजाय काम करने का आह्वान भी कर रहे हैं।

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