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कहीं दीप जले, कहीं दिल…

कहीं दीप जले, कहीं दिल…

By सुधीर गहलोत

केजरीवाल ने एक बार फिर दिल्ली की जनता का दरवाजा खटखटाया और अपनी पुरानी गलतियों के लिए माफी मांगते रहे।भाषा में संयम,आवाज में नरमी, तिरस्कार की प्रतिस्पर्धा से दूरी और साधारण वेश-भूषा में धैर्य के साथ अंतिम जनता के द्वार तक पहुंचने और अविचलित आकांक्षा के कारण दिल्ली के महानगरीय माहौल में घुट-घुटकर जीने वाली जनता ने पुरानी गलतियों को माफ कर उनका फिर से स्वागत किया।

‘पूत के पांव पालने में नजर आते हैं’ इस लोकोक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की तैयारी कर रहे आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने न सिर्फ अपने विद्यार्थी जीवन में चरितार्थ किया है, बल्कि राजनीति के समुद्र में लहरों की थपेड़ों से निकाल कर विधानसभा चुनावों में दिल्ली की 70 में से 67 सीटें जीतकर अब तक की सबसे शानदार जीत दिलाकर अपने अदभूत कौशल को भी दिखा दिया। व्यक्तित्व का करिश्मा कुछ ऐसा रहा कि कांग्रेस के समर्थन को दरकिनार कर आज से साल भर पहले जिस 14 फरवरी को दिल्ली की गद्दी छोड़ी थी, उसी 14 फरवरी को बहुमत वाली सरकार के मुखिया के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे।

देश से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अण्णा हजारे द्वारा शुरू किए गए आंदोलन में अरविंद केजरीवाल अण्णा की आवाज बन गए। दिल्ली प्रदेश और केन्द्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार की ललकार के बाद राजनीति के जरिए देश में बदलाव लाने के लिए गठित किए गए आम आदमी पार्टी को लेकर उन पर तरह-तरह के आक्षेप लगाए गए। किरण बेदी, अण्णा हजारे जैसे दिग्गजों के किनारा कर लेने के बावजूद केजरीवाल ने राजनीति की ऊंची और गहरी लहरों के बीच गिरते और उठते हुए आम जन की आकांक्षाओं की फीजिक्स की बारीकियों को समझा। देश भर के प्रवासियों से पटे पड़े दिल्ली में लोगों की मुख्य समस्या बिजली-पानी, भ्रष्टाचार और महंगाई को मुद्दा बनाकर आम आदमी पार्टी चुनाव लड़ी और पहली ही बार में 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन गई। लेकिन कुछ ही महीनों में होने वाले लोकसभा चुनावों के सुनहरे सपनों ने उन्हें सिर्फ 49 दिनों में ही दिल्ली को छोड़कर वाराणसी जाने पर विवश कर दिया। हालांकि ताजे परिणाम को देखकर कहा जा सकता है कि उनका यह निर्णय गलत नहीं था। लोकसभा में भी आम आदमी पार्टी ने अपने 4 सांसद भेजकर इतने कम समय में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी।

लोकसभा चुनावों में मनवांछित परिणाम नहीं आने के बाद और 49 दिनों में ही इस्तीफा देने के कारण भगोड़ा कहे जाने के कारण केजरीवाल ने दिल्ली में एक फिर सरकार बनाने की कयावद तेज कर दी। राजनीति के इस बियानबान में घाघ राजनेताओं के तानों से परेशान अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस से दुबारा सहयोग मांगा, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें संक्रमण वाली बीमारी से ग्रस्त किसी बेसहारा गरीब की तरह अपने चौखट से दुत्कार कर भगा दिया। अंतत: केजरीवाल ने एक बार फिर दिल्ली की जनता का दरवाजा खटखटाया और अपनी पुरानी गलतियों के लिए माफी मांगते रहे। भाषा में संयम, आवाज में नरमी, तिरस्कार की प्रतिस्पर्धा से दूरी और साधारण वेश-भूषा में धैर्य के साथ अंतिम जनता के द्वार तक पहुंचने और अविचलित आकांक्षा के कारण दिल्ली के महानगरीय माहौल में घुट-घुटकर जीने वाली जनता ने पुरानी गलतियों को माफ कर उनका फिर से स्वागत किया। परिणाम यह हुआ कि समाज के हर तबके ने अरविंद केजरीवाल में अपना प्रतिबिंब देखा और प्रचंड बहुमत देकर दिल्ली को विपक्षी दल विहीन कर दिया।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस जीत में अरविंद केजरीवाल का सिर्फ व्यक्तित्व ही शामिल रहा। उन्होंने अपनी पुरानी रणनीति भी बदली। रूख में आक्रमकता को त्यागते हुए विनम्रता को स्वीकार किया। मीडिया पर हमला करने के पुराने तरीके को बदला, मोदी पर सीधा हमला करने से बचे और आक्षेप की राजनीति से दूर रहे। लोकसभा चुनावों के बाद दिल्ली में चुनाव की मांग की, लेकिन विलंब होने के कारण मिले पर्याप्त समय का उन्होंने सही उपयोग किया। अक्टूबर में अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर उन्हें जमीनी कार्यों पर लगा दिया। मोदी लहर की अवधारणा को समझते हुए उन्होंने जगदीश मुखी को भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार दिखाकर भाजपा को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने पर विवश कर दिया। लेकिन रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें अराजक घोषित कर दिया, जिसके कारण केजरीवाल को सीधे मोदी के समकक्ष का कद मिल गया। बेहद कम बचे समय मे मैदान में आईं किरण बेदी को आम जनता से जुडऩे का समय नहीं मिला, जिसका सीधा फायदा केजरीवाल को हुआ।

इसके अलावा केजरीवाल और उनकी टीम के अन्य सदस्य संजय सिंह, गोपाल राय, मनीष सिसोदिया, आशुतोष ने उम्मीदवारों के चुनाव में बेहद सावधानी बरती। क्षेत्र में योग्य उम्मीदवारों को ही टिकट दिया। यह रणनीति बेहद कारगर रही। आम आदमी के उम्मीदवारों में दो दर्जन से भी ज्यादा पेशेवर शामिल रहे, जिन्होंने अपने कौशल का इस्तेमाल इन चुनावों में किया। इसमें आईआईटीयन, वकील, डॉक्टर, कमांडो, एमबीए, सामाजिक कार्यकत्र्ता, इंजीनियर शामिल हैं। इसके अलावा केजरीवाल ने जातिगत और धार्मिक मुद्दों से बचते हुए झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों के लिए बिजली-पानी सहित अन्य सुविधाओं का ऐलान, अनियमित कालोनियों को नियमित करने का आश्वासन, महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष तौर 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाने, युवाओं को लुभाने के लिए फ्री वाई-फाई देने और 20 नए कॉलेज खोलने का वादा किया। दिल्ली को महंगाई से मुक्त कराने के वादे के कारण उन्हें हर तबके का वोट मिला, लेकिन खासतौर पर दलितों और मुसलमानों के एकतरफा वोट उन्हें प्राप्त हुए।

आप ने दिल्ली विधानसभा में सबसे अधिक 6 महिलाओं और 4 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया। जिसमें सबको जीत हासिल हुई। 5 मुस्लिम बहुल इलाकों में से 4 पर आप जीती, लेकिन मुस्तफाबाद में त्रिकोणीय मुकाबला होने के कारण यह सीट भाजपा की झोली में चली गई। इसके अलावा दिल्ली में रह रहे पूर्वांचलियों की बड़ी आबादी का ध्यान रखते हुए आप ने 14 पूर्वांचलियों को टिकट दिए। इस कारण इस क्षेत्र के लोग आप के ज्यादा नजदीक आए। इस मामले में भाजपा से बहुत बड़ी गलती हुई। हर वर्ग और आबादी के अनुपात को ध्यान में रखकर आप द्वारा बनाए गई रणनीति के कारण इस बार के विधानसभा चुनावों में 54 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। पिछले विधानसभा की अपेक्षा इस बार के चुनाव में मत प्रतिशत में 24 प्रतिशत का उछाल था, जबकि सीटों में 139 प्रतिशत की वृद्धि हुई।  इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 10 से 25 हजार के बीच के अंतर से जीतने वाले उम्मीदवारों की कुल संख्या 25 में से 24 आप के उम्मीदवार हैं। वहीं 25 हजार से 50 हजार के बीच के अंतर से जीतने वाले सभी  30 उम्मीदवार भी आप के ही हैं। 50 हजार से अधिक अंतर से जीते सभी 6 उम्मीदवार भी आप के ही हैं।

हालांकि प्रतिद्वंद्वी दलों ने अरब देशों से मुलाकात करने और उनसे चंदा के साथ-साथ मुसलिमों से आप के पक्ष में वोट करने की अपील करने का आरोप भी लगाया। लेकिन, चुनाव की पूर्व संध्या पर जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी के उस बयान को नकार कर पूरी रणनीति बदल दी, जिसमें उन्होंने मुसलमानों से आप के पक्ष में मतदान करने का आग्रह किया था। लेकिन चंदे में अनियमिता की खबरें और इंकम टैक्स द्वारा आप को भेजे गए नोटिस के कारण अरविंद केजरीवाल के धवल व्यक्तित्व पर एक गहरा धब्बा जरूर लगा है। इसके साथ ही लोगों की यह अपेक्षा रहेगी कि दिल्ली में अवैध कॉलोनियों और झुग्गी-झोपडिय़ों में बड़े पैमाने पर रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान कर उन्हें सरकार अनुदानों से मुक्त कर दिया जाए। साथ ही ओखला सीट से जीते आप के उम्मीदवार अमनतुल्लाह खान के बाटला एनकाउंटर को फेक बताने जैसे सांप्रदायिक और विभाजनकारी गतिविधियों की तुष्टिकरण से बचेंगे। अगर दिल्ली अपराधमुक्त और अपराधियों एवं विभाजनकारी तत्वों की शरणस्थली बनने से मुक्त हो जाती है तो दिल्ली के लिए यह ‘मफलरमैन’ अनुपम उपहार होगा। वहीं विक्षिप्तता में पहुंची भाजपा के लिए दिल जलाने के बजाय आत्मचिंतन का वक्त है।

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