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सभी मोर्चे पर फेल हुयी कांग्रेस

सभी मोर्चे पर फेल हुयी कांग्रेस

By डॉ. विजय खैरा

आज नहीं तो कल कांग्रेस में नेतृत्व बदलने की बात जोर पकड़ेगी। सोनिया जी अभी राजाओं-महाराजाओं की सिर्फ संगत और दोस्ती से वाकिफ हैं, पर वे ये न भूलें कि अधिकांश पूर्व राजे-महाराजे ज्यादा दिन बिना सत्ता के रह नहीं पाते। बिरले ही संघर्ष से उपजे नेता होंगे। अभी कांग्रेस के डूबते जहाज से पंछी ही उड़ रहे हैं, पर जल्द ही उसमें से अंदर का भेद जानने वाले, जहाज में छेद करके भागने वाले हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस को जीरो पर पहुंचा दिया। यहां तक कि अजेय कहे जाने नेता हारून युसुफ का किला भी ढह गया। अजय माकन, योगानंद शास्त्री, सुभाष चोपड़ा, जो क्षेत्र में जनता से सम्पर्क बनाये रखने के लिये जाने जाते हैं, भी बुरी तरह धूल चाट गये। कुछ को छोड़कर अधिकांश नेता अपनी जमानत भी न बचा सके। पार्टी की  इतनी बड़ी हार के मात्र एक-दो कारण नहीं हो सकते। पन्द्रह वर्षों से लगातार सत्ता पर काबिज रही है कांग्रेस। उसकी जड़ें गहरी थी। नेहरू परिवार का नेतृत्व और महात्मा गांधी का नाम था उसके पास। फिर ऐसा क्या कर डाला उसके शीर्ष नेतृत्व ने, जिससे हर धर्म, हर जाति का कर्मठ से कर्मठ नेता हारता चला गया। यहां तक कि चौबीसों घंटे लोगों को समर्पित दलित नेता जय किशन पर भी झाड़ू फिर गयी।

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुये भ्रष्टाचार के पिटारे जब खुले तो उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। कांग्रेस की केन्द्र से बुरी तरह पिट कर विदाई हुयी। लोगों की हार का मुद्दा सिर्फ भ्रष्टाचार होता तो मुफ्त की घास खाकर लालू यादव अब तक मिट गये होते और बार-बार कांग्रेस उनसे हाथ न मिलाती रहती। अब तो ईमानदार कहे जाने वाले नीतीश, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री फिर से मुख्यमंत्री बनने की लालसा में उनके साथ हो लिये। नेता भले एक-दूसरे को भ्रष्ट कहते रहें, पर उनसे मिलकर साथ चलने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं होती। यदि भ्रष्टाचार मुद्दा होता तो भ्रष्ट होने के संगीन आरोप इसी चुनाव में आप पार्टी पर लगे और वे किसी हद तक प्रथम दृश्या प्रमाणित भी दिखे। उदाहरण के तौर पर आप पार्टी के नेता द्वारा मंगाई गई अवैध शराब या पार्टी द्वारा लिया गया बेनामी चन्दा इत्यादि के आरोप। जनता ने उस ओर ध्यान नहीं दिया और बेपरवाह आप प्रत्यशियों को अंधाधुध वोट डालती गयी। इससे स्पष्ट है कि मुद्दों को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया।

एक समानता रही 2014 के लोकसभा चुनाव और दिल्ली के 2015 विधानसभा चुनाव में। लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी को ईमानदार नेता मानते हुये लोगों ने भाजपा के भ्रष्ट प्रत्याशी भी जीता दिये। इसी तरह केजरीवाल को नेता मानते हुये लोगों ने आप के प्रत्याशी जीता दिये। इन दोनों चुनाव में कांग्रेस के पास एक ईमानदार नेता की छवि की कमी रही। लोगों ने लोकसभा में मनमोहन की भ्रष्ट सरकार के मुकाबले नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व स्वीकार किया। इसी तरह दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की ईमानदारी पर विश्वास किया।

कांग्रेस की ऐसी पराजय होने का इतिहास तो कुछ वर्ष पहले उसने खुद ही लिखना शुरू कर दिया था, जब संगठन का ढांचा धीरे-धीरे चरमराता जा रहा था। संगठन में कर्मठ और संघर्ष वाले नेताओं को छोड़कर चमचे और पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित नेताओं को भरा जाने लगा था। प्रदेशों का नेतृत्व राजे-महाराजाओं पर छोड़ दिया गया। पंजाब और हिमाचल की कमान रियासतों के महाराजाओं के परिवारों को दी गयी। यहां तक कि हर महत्वपूर्ण फैसले में मध्य प्रदेश के रियासती राजा दिग्विजय सिंह की चलने लगी। पिछले विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में ग्वालियर रियासत के महाराज को मुख्यमंत्री पेश करते समय पंजाब का सबक भूल गयी थी पार्टी, जहां अमरेन्द्र सिंह को आगे कर पार्टी ने मुंह की खायी थी।

पार्टी के समानांतर संगठन विंग महिला कांग्रेस, सेवादल और यूथ कांग्रेस की न कोई सुनता है न उन्हें टिकटों में कोई महत्व देता है, न ही किसी नोमीनेशन में। सेवादल का पिछले 15 वर्षों में शायद ही कोई राष्ट्रीय जलसा हुआ हो। उसे किसी न किसी नेता के कहने पर छुटभैया नेता चलाता रहता है। कभी इसके अध्यक्ष स्वंय राजीव गांधी, तारिक अनवर और रामेश्वर नीखरा जैसे महान नेता हुआ करते थे। पिछले वर्षों में कौन आया, कौन गया कोई नहीं जानता। यूथ कांग्रेस तो संगठन चुनाव करवाये जाने के कारण बर्बाद हो गयी, फिर भी राहुल गांधी चुनाव कराते रहे। सिर्फ जमीनी स्तर के नाम पर सच यह है कि जिसके पास गाड़ी-घोड़ा, रूपया-खर्चा होता है वो लोगों को चुनाव के दिन भरकर ले आता है और अध्यक्ष बन जाता है। पहले सबसे पूछताछ कर, जाति समीकरण रखकर, व्यक्तिगत छवि देखकर सारे नेता सामंजस्य बैठाकर चुनाव कर लेते थे। इस तरह चारों संगठन को जर्जर कर लड़ा गया दिल्ली चुनाव।

राहुल गांधी का  सेलेब्रेटी वाला क्रेज कम होते हुये भी लागों में अब भी उन्हें देखने की उमंग रहती है और ऐसा हुआ भी दिल्ली के रोड शो में। टूट चुकी कांग्रेस को रोड शो की नहीं, रोड पर संघर्ष की जरूरत है। अंत तक कांग्रेस नहीं समझ पायी कि उसका परंपरागत वोट आप मे जा रहा है। दिल्ली का लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता, जो कभी बीजेपी को वोट नहीं करता है, उसके लिये कांग्रेस ही एकमात्र विकल्प थी। उन्हें बीजेपी को हराने के लिये आप पार्टी का विकल्प मिल चुका था। ईसाई मतदाता सदा कांग्रेस के साथ रहा है। इस बार गिरिजाघरों पर हमले और तोड़-फोड़ होती रही पर कांग्रेस उनकी लड़ाई लडऩे में अक्षम रही। भाजपा लगभग राजनैतिक दृष्टि से वांछित कार्यवाही तेजी से न कर सकी। ईसाई मतदाता को भी आप पार्टी का विकल्प मिल गया। इस तरह कांग्रेस के परंपरागत 20 प्रतिशत से अधिक वोट सीधे आप पार्टी की झोली में जा गिरे। यदि यह वोट कांग्रेस में बना रहता तो कांग्रेस कम से कम 8 से 10 सीटें जीतती। सरकार कोई भी बन रही होती पर कांग्रेस किंगमेकर रहती।

दिल्ली के चुनाव का परिणाम भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिये चिंता का विषय है। नरेन्द्र मोदी का करिश्मा कम नहीं हुआ है, वह दिल्ली के चुनाव तो भाजपा किरण बेदी को मुख्यमंत्री घोषित किये जाने के कारण हारी है। भाजपा ने विजय गोयल, विजेन्द्र गुप्ता, डॉ. हर्षवर्धन और यहां तक कि दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज जैसे दिल्ली के सभी कर्णधार नेताओं को दरकिनार कर दिया। प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय का कद किरण बेदी के आगे इतना बौना हो गया कि पार्टी कार्यकर्ता घुटन महसूस करने लगे। भाजपा के पास कार्यकर्ता, कार्य करने की क्षमता और मोदी जैसा नेता है, इसीलिये वो पलटवार करने की क्षमता रखती है।

कांग्रेस की शक्ति क्षीण हो चुकी है। इस चुनाव में विज्ञापन और प्रचार में आप पार्टी ने भाजपा को पीछे छोड़ा पर कांग्रेस का प्रचार तो एकदम फीका रहा, जैसे मरीज चुनाव लड़ रहा हो। कुल मिलाकर कांग्रेस की हार के लिये राहुल गांधी को सीधे जिम्मेदार माने, न माने पर जिस संगठन ने दिल्ली प्रदेश में कांग्रेस के लगभग 90 प्रतिशत प्रत्याशियों की जमानत जब्त करवा दी वो संगठन बनाया तो राहुल गांधी एंड कम्पनी ने ही था।

आज नहीं तो कल कांग्रेस में नेतृत्व बदलने की बात जोर पकड़ेगी। सोनिया जी अभी राजाओं-महाराजाओं की सिर्फ संगत और दोस्ती से वाकिफ हैं, पर वे ये न भूलें कि अधिकांश पूर्व राजे-महाराजे ज्यादा दिन बिना सत्ता के रह नहीं पाते। बिरले ही संघर्ष से उपजे नेता होंगे। अभी कांग्रेस के डूबते जहाज से पंछी ही उड़ रहे हैं, पर जल्द ही उसमें से अंदर का भेद जानने वाले, जहाज में छेद करके भागने वाले हैं।

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