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आप का असर या नए नजरिए का जनादेश?

आप का असर या नए नजरिए का जनादेश?

By दीपक कुमार रथ

दिल्ली में अब धूल बैठ चुकी है और सर्वशक्तिमान मतदाता ने आखिरकार ऐसा स्पष्ट जनादेश सुनाया कि सभी राजनैतिक पार्टियां, राजनैतिक पंडित, मीडिया और एक मायने में खुद मतदाता भी हैरान रह गए। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस, भाजपा और ‘आप’ सभी अब इससे उबरकर आगामी चुनावों की रणनीति बनाने में जुट गए हैं। सभी दलों को मतदाताओं, अपने कार्यकर्ताओं, मीडिया और उद्योग जगत से पर्याप्त सबक मिले हैं। इससे खुश होकर कई कुंठित सेकुलर बुद्धिजीवी टीवी न्यूज चैनलों में प्रधानमंत्री मोदी की तीखी आलोचना करने लगे हैं।

अरविंद केजरीवाल बधाई के पात्र हैं कि वे राष्ट्रीय राजधानी के नौजवानों, उगा तबकों और सेकुलरवादियों को एकजुट करने में कामयाब हुए हैं। ‘आप’ ने दिल्ली में भाजपा की ही तरह बूथ स्तर तक सांगठनिक आधार बनाने में भी कामयाबी पाई है। थोड़े समय में ही ‘आप’ ने हर तबके और वर्ग में अपना काडर आधार व्यापक कर लिया है। लेकिन दिल्ली के नए मुख्यमंत्री को भारी उम्मीदों और आकांक्षाओं की सवारी करनी होगी। दिल्ली का आम आदमी सस्ती दर में बिजली-पानी, मुफ्त वाई-फाई, महिला सुरक्षा और ऐसे ही कई वादों को पूरा किए जाने का इंतजार कर रहा है। फिर, समूचे देश की नजरें भी इस ओर लगी रहेंगी कि ‘आप’ आम आदमी से जुड़े भावनात्मक और विकास के मुद्दों के साथ ‘स्वच्छ राजनीति’ के अपने एजेंडे पर कायम रहती है।

इस बार ‘मफलर मैन’ के नाम से चर्चित केजरीवाल अधिक परिपक्व दिखाई दे रहे हैं। उनसे हर कोई यही उम्मीद करेगा कि वे केंद्र सरकार के खिलाफ धरने देने से बाज आकर अपने वादों को पूरा करने में ध्यान लगाएं। आखिर उन्हें दिल्ली जैसे आधे-अधूरे राज्य में लंबे-चौड़े वादे पूरे करने हैं, जहां केंद्र सरकार की मदद के बिना वे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए केजरीवाल अगर वाकई आम आदमी के लिए कुछ करने की इच्छा रखते हैं तो उन्हें मोदी सरकार से मदद के लिए पहले तो मेलजोल का रवैया अख्तियार करना चाहिए, जिसकी उम्मीद कम दिखती है क्योंकि वह उनकी भावी राजनैतिक योजनाओं के अनुरूप नहीं लगता है। दूसरे, जैसा कि उनके एक पार्टी नेता ने कहा है कि ‘आप’ की राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की फिलहाल पांच राज्यों राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडीशा में योजना है और उस हालत में उसके मुख्य निशाने पर भाजपा होगी। इन सभी राज्यों में विपक्ष लगभग बेमानी हो चुका है और उन्हें भाजपा को खत्म करने के लिए सेकुलर पार्टियों से अच्छी मदद मिल सकती है। वास्तव में इन पांच राज्यों में ‘आप’ के विस्तार की अच्छी संभावनाएं हैं। लेकिन यह तो वक्त ही बताएगा कि ‘आप’ के नेताओं में नरेंद्र मोदी की राजनैतिक चतुराई का जवाब देने की काबिलियत है या नहीं?

यह समझ पाना वाकई मुश्किल है कि भाजपा इतने परिपक्व नेताओं होने के बावजूद दिल्ली में आम आदमी की धड़कन को क्यों नहीं भांप पाई? भाजपा ने इस छोटे-से रा’य के चुनाव प्रचार में करीब-करीब हर केंद्रीय मंत्री और 120 सांसदों के अलावा हिंदी क्षेत्र के मुख्यमंत्रियों तथा वरिष्ठ नेताओं को उतर कर इसे केंद्र के कामकाज पर रायशुमारी में बदल दिया था। भाजपा की ‘3एम रणनीति’ (मोदी, मनी और मडस्लिंगिंग यानी मोदी की लोकप्रियता, धनबल और कीचड़ उछाल) दिल् ली के वोटरों को प्रभावित करने में नाकाम रही। मतदान के एक दिन पहले पार्टी ने बहुसंख्यक धु्रवीकरण का पत्ता भी खेला, जब ‘आप’ को जामा मस्जिद के शाही इमाम ने बिनमांगे समर्थन का ऐलान कर दिया। यह चाल भी उलटी पड़ी।

दिल्ली के भाजपा कार्यकर्ताओं में कई स्थानीय दिग्गज नेताओं का काफी आदर है, जिन्हें यह कतई रास नहीं आया कि पूरी पार्टी मशीनरी पर बाहरी लोग प्रभावी हो जाएं और चुनाव प्रबंधन कॉरपोरेट शैली में चलाया जाए। यह सब दिल्ली में कभी नहीं हुआ था। सबसे आश्चर्यजनक तो यह था कि भाजपा चुनाव प्रचार का जिम्मा संभाल रहे कई नेता राज्यसभा के सदस्य हैं। उनमें अधिकांश अपने पूरे राजनैतिक कॅरियर में कभी चुनाव नहीं जीत पाए या कोई रैली आयोजित नहीं कर पाए। नतीजों के बाद दिल्ली के एक वरिष्ठ आरएसएस नेता ने मुझसे भरे गले से कहा कि, ”मैं और मेरी पत्नी ने तो भाजपा को वोट दिया लेकिन मैं अपने बेटे और परिवार के दूसरे सदस्यों को राजी नहीं कर पाया। उन सभी ने ‘आप’ को वोट दिया।’’ मतगणना खत्म होने के बाद अशोक रोड पर भाजपा मुख्यालय में पूर्वांचल, दिल्ली और दूसरे राज्यों के कार्यकर्ताओं ने नेतृत्व के सौतेले रवैए के प्रति अपनी नाराजगी की। एक वरिष्ठ पार्टी कार्यकर्ता, जो बिहार में मुंगेर के डॉक्टर भी हैं, ने कहा, ”भाजपा कार्यालय पार्टी काडरों के बजाए सुरक्षाकर्मियों का किला बन गया है। पार्टी कार्यकर्ताओं को नेताओं से मिलने की इजाजत नहीं है।’’ दिल्ली के काडर किरण बेदी को बाहर से लाकर अचानक मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश करने से भी नाराज था। इससे यह साफ है कि पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव में काम ही नहीं किया।

फिर मीडिया चीख-चीख कर दिल्ली चुनाव प्रचार में भाजपा की गफलतों और ‘आप’ के नए उभार की गवाही दे रहा था। ”सत्ता का अहंकार, नकारात्मक प्रचार, किरण बेदी प्रकरण, कीमती नाम खुदा सूट, पार्टी में भितरघात’’ ये सभी बातें अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक में उभरीं। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर ‘आप’ की जीत और भाजपा की हार दिल्ली और शायद पूरे देश की राजनीति में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है।

आखिर, क्यों दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा को छोड़कर ‘आप’ की झाड़ू को उठा लिया? इसकी एक बड़ी वजह तो यह है कि केंद्र सरकार ने आठ महीनों में वोटरों को साफ संदेश दिया कि भाजपा गरीबों के लिए तो खोखली घोषणाएं करती है, ठोस काम तो वह सिर्फ कॉरपोरेट सेक्टर के लिए करती है। मसलन, उसने किसानों और आदिवासियों से जमीन उद्योगों को दिलाने की राह अध्यादेश के जरिए आसान की या श्रम कानूनों तथा पर्यावरण नियमों में हेरफेर करके उद्योगों को सहूलियत देने की कवायद चली। दिल्ली के लोगों को भले यह एहसास न हो कि इन बदलावों का क्या फर्क पड़ेगा लेकिन उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि विकास का यह रास्ता समावेशी या सबको साथ लेकर चलने वाला नहीं है।

मोदी आधुनिक दौर की आक्रामक शैली के नेता हैं, जो अपने मन की भावनाओं के अनुसार काम करते हैं। अब वे देश की सर्वोगा कुर्सी पी बैठे हैं और उनके पास बहुमत है तो उन्हें अपने विकास और गरीब समर्थक एजेंडे पर उसी तरह काम करना चाहिए जैसे अटल बिहारी वाजपेयी किया करते थे। पार्टी के पुराने लोगों को ऐसे में वाजपेयी और आडवाणी का पुराना दौर याद आता है जब वे दोनों एक तरह की निम्रता के साथ टीम के रूप में काम किया करते थे।

दिल्ली के चुनावों पर दिल्ली भाजपा या आरएसएस में काफी अफसोस नहीं मनाया गया। असल में भाजपा में लोकतंत्र या सामूहिक नेतृत्व का ही बोलबाला रहा है। लेकिन पार्टी में अब ऊपर से थोपे गए फैसलों और चुनाव रणनीति से घुटन महसूस हो रही है। पार्टी के महत्वपूर्ण फैसलों में दिल्ली के भाजपा या आरएसएस कार्यकर्ताओं को भरोसे में नहीं लिया गया। पुराने नेताओं को बार-बार अपमानित किया गया। पार्टी ने कांग्रेस की दो बार की सांसद कृष्णा तीरथ को टिकट दिया तो भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया।

दिल्ली के चुनाव देश के सियासी बदलाव के इतिहास में अहम घटना की तरह याद किए जाएंगे। हमको हाल में ही प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण के रूप में एक आम आदमी अलविदा कह गया लेकिन एक और आम आदमी मानो राख से उठकर खड़ा हो गया है।

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