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सबको आदर और स्नेह

सबको आदर और स्नेह

जिस भारत देश में हमने जन्म लिया है, उस देश की संस्कृति कितनी महान है, यह हम सब हरपल महसूस कर सकते हैं। पाश्चात्य संस्कृति जो हमें प्रभावित करती है, जिस संस्कृति को हम अपनाने में खुशी अनुभव करते हैं, उससे कई गुणा उच्च हमारी संस्कृति है। इस बात का ज्ञान हमें होना चाहिए। एक चीज पर हम विचार करें तो पाश्चात्य की शालीनतापूर्ण बात जैसे अपने वाक्य में धन्यवाद, क्षमा प्रार्थना, इज्जत देना यह सब चीजें हमें बहुत प्रभावित करती हैं। हम भारतीय संस्कृति की जड़ तक जाएं तो इन समस्त स्नेहपूर्ण व्यवहार को पायेंगे।

हमारे पूर्वजों ने हमारे नित्यकर्म में इस तरह हर बात को संयोजित कर दिया था। हम जाने-अनजाने में यह सब करने लगते हैं। जैसे सुबह उठकर सर्वप्रथम हम अपने हस्त को प्रणाम करते हैं।

कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती।

करमूले तू गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम।।

पूरे दिन में हम जितने भी कार्य करते हैं, वे सभी हस्त की सहायता से ही होते हैं। हस्त के अग्र देश में लक्ष्मी वास करती हैं, मध्य भाग में सरस्वती एवं मूल में स्वयं विष्णु वास करते हैं। इसलिए ही हम हस्त में ईश्वर को उपस्थित मानकर प्रणाम करते हैं। जबकि, हमारा हस्त (हाथ) हमारे अपने शरीर के अंग का एक अंश होता है। हम उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। हमारे वेदों में भी हमें अपने समस्त अंगों के प्रति कृतज्ञ होने की महत्ता बताई गई है।

भद्रम कर्णभी शृणृयाम देवा।

भद्रम पष्यामी क्षवभी जजन्त्रा।।

जड़-निर्जड़ प्रत्येक वस्तु जो हम पर उपकार करती है। यह सभी हमारे पूजनीय हैं। सुबह से लेकर शाम तक जितनी भी चीजों की सहायता हम लेते हैं। हमें इन समस्त चीजों का आदर करना चाहिए। जल, सूर्य, अग्नि, पवन यहां तक की हमें भोजन ग्रहण करने से पहले खाद्य वस्तुओं को प्रणाम करना चाहिए और परमात्मा को स्मरण करके उन्हें कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए। सूर्य देव जो सकल शक्ति का आधार हैं, स्वयंभू और हिरण्यगर्भ है। जो प्रत्येक सुबह उठकर केवल अपने प्रकाश द्वारा समग्र जगत को उज्जवलमय करते हैं, उसके बदले हम अगर कुछ कर सकते हैं, तो प्रत्येक सुबह स्नान के पश्चात सूर्य देव को प्रणाम करके उन्हें जल अर्पित करना चाहिए। इसी तरह हम सूर्य के प्रति अपना कृतज्ञ भाव व्यक्त कर सकते हैं। देखा जाए तो कृतज्ञ होना अथवा धन्यवाद देना हमारी संस्कृति में भिन्न रूप हैं, केवल मुंह से बोलकर एक ही क्षण में बात को खत्म करने से यह अधिक क्रियाशील होता है। समुद्र, नदी, पर्वत, वृक्ष, गाय, पृथ्वी ये प्रत्येक जो हमारे ऊपर उपकार करते हैं, यह सभी हमारे लिये पूजनीय हैं। तुलसी का पौधा औषधीय है, अनेक रोगों को दूर करता है। घर में तुलसी का पौधा रखने से भी उसके आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है। उसी तरह नीम, पीपल, आंवला आदि अनेक वृक्षों की पूजा करना हमारे संस्कृति में शामिल है। साल भर हम पूजा के जरिये प्रत्येक जड़-निर्जड़ चीज जो हमारे ऊपर उपकार करती है, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

हम आधुनिक मनुष्य पूजा-पाठ करने के लिये समय नहीं दे पाते हैं, लेकिन यथासंभव, नित्य जीवन में थोड़ा सा समय इस तरह करना चाहिए कि खुद का नुकसान न हो और हम इन सभी चीजों से जुड़कर रह पाएं। हमें हमारी संस्कृति से अनुप्राणित होकर अपने व्यवहार में भी परिवर्तन लाना चाहिए। हम पर जो भी व्यक्ति उपकार करते हैं, उन्हें विनम्रतापूर्वक धन्यवाद देना चाहिए। ऐसा करने से कुछ क्षण के लिये हमारे अन्दर के अंहकार भाव का विनाश हो जाता है और जिसकी वजह से हम परमेश्वर के प्रिय बन सकते हैं। धन्यवाद कहने से सामने वाले व्यक्ति के मन में हमारे लिए आदर और प्यार दोगुणा हो जाता है। धन्यवाद करने से सामने वाले के मन में हमारे लिए जो अच्छे भाव उत्पन्न होते हैं। वह हमारे ऊपर प्रतिफलित होते हैं। जिस कार्य को वह बिना इच्छा से करते हैं, उसी कार्य को पूरी लगन के साथ करने लगते हैं और लगन से किया हुआ हर कार्य सफल होता है।

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