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देवि त्वं भक्तसुलभे

देवि त्वं भक्तसुलभे

मां दुर्गा को उनके अन्य कई नामों के साथ भी जाना जाता है। काली, भवानी, अम्बा, जगदम्बा, शोरांवाली, पार्वती और भी सैकड़ों नामों से जाना जाता है। दुर्गा का शाब्दिक अर्थ होता है- अत्यंत विशाल या अगम्य। काली के रूप में वे क्रोध एंव भय का प्रतिनिधित्व करतीं हैं। वे केवल उनको भयभीत करती हैं, जो दुष्कर्मों एवं आसुरी कार्यों मे लगे हुए हैं। अम्बा अथवा पार्वती के रूप में वे अच्छे लोगों एवं भक्तों के लिए प्यारी मां हैं। दुर्गा के रूप में वे हम सब में निहति वह आध्यात्मिक ऊर्जा हैं, जिसको सही प्रकार से जागृत एवं उपयोग करने से सभी नकारात्मक वृत्तियां खत्म हो जाती हैं। यह ऊर्जा निश्चित रूप से काम करती है।

दुर्गाजी को कभी शोर पर तो कभी सिंह पर बैठे हुए दिखाया जाता है। प्राय: उनके आठ, किन्तु कभी-कभी दस और अठारह हाथ होते हैं। हाथों में अस्त्र-शस्त्र भी होते हैं। त्रिशूल, तलवार, धुनष-बाण, गदा, चक्र आदि सभी अस्त्रों का उपयोग परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है। ये सभी हमारे अंदर छिपी अनेक शक्तियों एवं क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनसे हम अपने अंदर की नकारात्मकता को समाप्त करके सकारात्मकता को आगे बढ़ा सकते हैं।

शोर और सिंह हमारे अंदर की अनियंत्रित पशुवृत्तियों का अर्थ देते हैं जैसे कि क्रोध, अहंकार, लोभ, ईष्र्या, पूर्वाग्रह तथा दूसरों को हानि करने की वृत्ति आदि। यदि इन वृत्तियों को संयमित न किया जाये, तो ये हमारी आत्मा को नष्ट करके हमें नुकसान पहुंचाती हैं। इन वृत्तियों को पूर्ण दृढ़ता तथा ठोस प्रयासों के द्वारा पहले तो नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है, फिर इन्हें सकारात्मक गुणों में परिवर्तित किया जाता है। दुर्गा के हाथों के अस्त्र-शस्त्र हमारी इन हानिकारक वृत्तियों को नियंत्रित करने की तीव्र रणनीति एवं कार्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बाद में ये पशुवत्तियां आनंददायी और लाभकारी वृत्तियों में परिवर्तित हो जाती हैं। मस्तिष्क का एक शांत शोर अथवा सिंह के रूप में होना, अद्भुत बात है।

शंख का बजाया जाना श्रद्धालुओं को यह आश्वासन देना है कि दुर्गा के इस भयंकारी स्वरूप से डरने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही इससे दुष्टों के मन में भय भी उत्पन्न किया जाता है। हमारे जीवन में यह आश्वासन किसी गुरू, किसी ग्रन्थ तथा किसी गहरी श्रद्घा की भावना से आता है। दुर्गा का उठा हुआ हाथ दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध युद्ध में हमारी जीत का आश्वासन है। दूसरे शब्दों में इस मुद्रा के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रति हमारे अपने विश्वास को व्यक्त किया जाता है।

हाथ में धारण कमल पवित्रता एवं पूर्णता का प्रतीक है। हालांकि बाह्य रूप में दुर्गा भले ही भयंकारी जान पड़तीं हैं, लेकिन उनमें शत्रुता बिल्कुल नहीं है। वे अपने बच्चों को शुद्घ करने मे वैसे ही लगातार लगी रहतीं हैं, जैसे कि कोई मां लगी रहती है। इसी प्रकार यदि हम अपने कार्यों में लगातार पूर्ण समर्पण के साथ लगे रहें, तो हम भी अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सकते हैं।

दुर्गा का एक अन्य रूप सर्वोच्च सत्ता की शक्ति के रूप में है, जो शिव से जुड़ी हुई है। वह शिव से अलग नहीं हैं। इसी प्रकार हमारी शक्तियां हमारे अंदर ही हैं, हमसे अलग नहीं। भगवान की कुछ अन्य शक्तियां भी हैं, जैसे- लक्ष्मी, सरस्वती, महेश्वरी तथा अन्य कई। क्योंकि आत्मतत्व सभी में एक ही है, इसलिए ये शक्तियां भी आत्मन की ही हैं। योग तथा अन्य विकसित पद्धतियों द्वारा स्वयं पर समुचित नियंत्रण एवं प्रशिक्षण के द्वारा हम इन शक्तियों को जागृत करके एक उत्तम स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं।

                उदय इंडिया ब्यूरो

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