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वसुधैव कुटुम्बकम्

वसुधैव कुटुम्बकम्

31-10-2015सोशल साइट के जमाने में चिट्ठी, तार जैसी चीजों ने दम तोड़ दिया है, क्योंकि किसी के पास इतना वक्त नहीं कि वो कलम उठाकर किसी के लिये कुछ लिखे और फिर हफ्तों तक जबाव का इंतजार करे। हाईटेक जमाना है सोशल साइट पर लोगों से कैमरे के जरिये बात हो जाती है। फेसबुक पर लोग दूर बैठे लोगों तक पल भर में अपना संदेश पहुंचा देते हैं और उनके जबाव का इंतजार भी नहीं करना पड़ता। लेकिन, सोशल साइट पर जिंदगी और जिंदगी के रिश्तों को एक धागे में पिरोना तो कोई लेखक संजय सिन्हा से सीखे। संजय सिन्हा वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने रिश्तों को खो देने के बाद भी कभी खुद को रिश्तों की कमी नहीं महसूस होने दी। लेखक संजय सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘रिश्ते’ में बताया है कि रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते, बल्कि रिश्ते वो होते हैं, जिन्हें हम दिल से बनाते और निभाते है।

संजय सिन्हा बताते हैं कि उनकी मां के देहांत के बाद जब वह खुद को अकेला सा महसूस करने लगे तो उन्होंने अपने रिश्तों को फेसबुक पर तलाशना शुरू किया। अनकी मां ने उन्हें एक प्यारा सा भाई भी दिया, लेकिन मां कि बीमारी के बाद मौत हो गई और उसके कुछ सालों बाद उनके भाई ने भी उनका साथ छोड़ दिया। जिसके बाद संजय सिन्हा बिल्कुल अकेले पड़ गये, लेकिन उन्होंने अपने खोये हुए रिश्तों की कमी को पूरा करने के लिये फेसबुक पर नये रिश्ते तलाश लिये जो भले खून के नहीं थे, पर उनसे कम भी नहीं थे। इस पुस्तक में खुद लेखक संजय सिन्हा बताते हैं कि रिश्तों को खो देने के बाद उनकी जिंदगी में ठहराव सा आ गया था, लेकिन फेसबुक पर सारे रिश्ते मिलने के बाद उनकी जिंदगी ने एक बार फिर से रफ्तार पकड़ ली। क्योंकि, अब वह अकेले नहीं थे, बल्कि उनके साथ एक पूरा कारवां था रिश्तों का।

लेखक अपनी मां को याद करते हुए पुस्तक में लिखते हैं कि मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरी मां ने ही फेसबुक की कल्पना पहले की थी। मार्क जुकरबर्ग तो बहुत बाद में आए, फेसबुक के इस संसार को लेकर। लेखक बताते हैं कि उनकी मां बहुत कम वक्त तक इस दुनिया में रह पाई, लेकिन जितने भी दिन रही, रिश्ते जोड़ती रही। मैंने मां को कभी किसी से रिश्ते तोड़ते नहीं देखा। वह कहती थीं कि रिश्ते बनाने में चाहे सौ बार सोच लो, लेकिन तोडऩे में हजार बार सोचो, क्योंकि खोये हुए रिश्ते फिर वापस नहीं मिलते। मां कहती थी कि एक दिन वो नहीं रहेगी, लेकिन ‘रिश्ते’ रहेंगे। सब धीरे-धीरे एक-दूसरे से जुदा होते चले जाएंगे, लेकिन रिश्तों का कारवां सबको एक दूसरे से जोड़े रहेगा। व्यक्ति दुनिया में आता है और एक दिन चला भी जायेगा, क्योंकि व्यक्ति जाने के लिए ही आता है, लेकिन रिश्ते यादों में, व्यवहार में और मस्तिष्क में जिंदा रहते हैं। लेखक लिखते हैं कि मां ने जो कहा वह सही है, सचमुच एक दिन मां चली गर्इं, लेकिन फेसबुक पर दूसरी मां मिल गई। एक दिन भाई चला गया मुझे छोड़कर पर फेसबुक पर भाई भी मिल गया। एक दिन मैं चला जाऊंगा और पीछे से बचे मेरे अपने मुझे भी फेसबुक पर ढूंढ़ लेंगे।

लेखक संजय सिन्हा ने अपनी पत्रकारिता की शुरूआत बहुत ही शानदार तरीके से की। जनसत्ता से शुरु उनकी पारी का सिलसिला रूका नहीं, बल्कि ऊंचाईयों को छूता चला गया। लेकिन, उनकी जिंदगी का सबसे आहत करने वाला पल वो था, जब गुजरात में आये तीव्र भूकंप ने लाखों जिंदगियों को निगल लिया। लेखक का वो सफर तो था बतौर रिपोर्टर का, लेकिन वापसी हुई एक खालीपन, एक उदासी के साथ। इस घटना के बाद लेखक की जिंदगी ने नया मोड़ लिया। वो था लेखन का, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं को अपनों के साथ बांटा। न सिर्फ बांटा बल्कि, जिंदगी के हर पड़ाव पर उन्हें साथ लेकर चलना शुरू किया। लेखक ने अपनी पुस्तक के माध्यम से सिखाया है कि कैसे सोशल साइट्स को जीवन में खोये हुए रिश्तों को फिर से पाने का जरिया बनाया जा सकता है। और कैसे इंसान अपने जीवन के खालीपन को दूर कर सकता है। लेखक ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को सच कर दिखाया है।

प्रीति ठाकुर

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