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मैत्रेयी

मैत्रेयी

By उषा मौर्य

बृहदारण्यक उपनिषद् में एक रोचक प्रसंग आता है। याज्ञवल्क्य ऋषि की दो पत्नियां थीं। एक का नाम मैत्रेयी तथा दूसरी का नाम कात्यायनी था। मैत्रेयी एक विदुषी महिला और ब्रह्मवादिनी थीं। कात्यायनी सामान्य स्त्रियों के समान बुद्धिवाली थी। मैत्रेयी के अन्दर ज्ञान की पिपासा थी। वे आध्यात्मिक स्वभाव की थीं। उन्हें भौतिक जगत के ताम-झाम प्रभावित नहीं कर सकते थे।

गृहस्थ आश्रम में रहते हुए कई वर्ष गुजर जाने पर एक दिन याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहा – ”मैं अब गृहस्थाश्रम से संन्यास आश्रम में जाना चाहता हूं, अत: तुम्हारी अनुमति चाहता हूं। साथ ही जाने से पूर्व में अपनी सम्पत्ति का तुम दोनों पत्नियों में बंटवारा करना चाहता हूं।’’

यह सुनकर मैत्रेयी ने कहा – ”भगवन, यदि धन से संपन्न सारी पृथ्वी मेरी हो जाए तो क्या मैं उससे किसी प्रकार भी अमर हो सकती हूं? अर्थात क्या इससे मुझे अमर जीवन प्राप्त हो सकता है?’’ यह सुनकर याज्ञवल्क्य ने कहा – ”नहीं। भोग सामग्रियों से संपन्न मनुष्य का जैसा जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा जीवन हो जाएगा, क्योंकि धन-संपत्ति से अमर जीवन की आशा नहीं की जा सकती।’’

यह सुनकर मैत्रेयी ने कहा -”ये नाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहति।’’ अर्थात जिससे मैं अमर नहीं हो सकती उसे लेकर मैं क्या करूंगी। श्रीमान जो कुछ अमृतत्व (अमर जीवन) का साधन जानते हों वही मुझे बतलावें।

यह सुनकर याज्ञवल्क्य ऋषि ने कहा – ”मैत्रेयी तू धन्य है। तू पहले भी मेरी प्रिया थी और अभी भी तू प्रिय लगने वाली बात कर रही है।’’ फिर उन्होंने मैत्रेयी से कहा – ”अ’छा आ, बैठ जा। मैं तेरे लिये उस अमरत्व की व्याख्या करूंगा। तू उसे ध्यान से सुनना और उसका मनन चिंतन करना।’’

मैत्रेयी बैठ गईं और ध्यान से पति का उपदेश सुनने लगी। यज्ञावल्क्य ने मैत्रेयी को जीवन, जगत, आत्मा, परमात्मा का गूढ़ रहस्य समझाया। उन्होंने  कहा – ”सुन मैत्रेयी, इस जगत में केवल प्रियतम (आत्मा) ही है और इस आत्मा के लिये संसार की सभी वस्तुएं तथा सभी रिश्ते-नाते प्रिय होते हैं।’’ उन्होंने मैत्रेयी को जगत का स”ाा रहस्य समझाया तथा अन्त में कहा कि सबके प्रयोजन के लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन के लिए सब प्रिय होते हैं। अर्थात सब-कुछ अपनी आत्मा के लिये, अपने स्वर्थ के लिए प्रिय होते हैं। यह आत्मा ही दर्शनीय,श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये जाने योग्य है, क्योंकि इस आत्मा के दर्शन, श्रवण और मनन से सबका ज्ञान हो जाता है।

आगे उन्होंने आत्मा का महत्व बताते हुए कहा – ”हे मैत्रेयी, इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, तथा अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, उपनिषद, सूत्र, मंत्र आदि हैं वे सभी इस महाद्भूत के ही नि:श्वास हैं तथा आत्मा ही सबका आश्रय है।’’

इस प्रकार याज्ञवल्क्य ऋषि ने अपनी भार्या (पत्नी) मैत्रेयी के लिए परमार्थ दृष्टि का निरूपण किया। मनुष्य को मानवीय चेतना से भागवत चेतना की ओर आरोहण करना चाहिये। अर्थात, आत्मतत्व की खोज करनी चाहिये जो जगत का मूल है और जगत का कारण है, क्योंकि केवल धन-संपति से मनुष्य संतुष्ट नहीं हो सकता जैसा कि कठोपनिषद में कहा गया है कि- ”वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य:’’।

मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है भगवान से परित्यक्त होकर पूरी दुनिया का सम्राट बन जाना।

साभार:श्री अरविन्द कर्मधारा

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