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51 शक्तिपीठों में से 42 भारत में

51 शक्तिपीठों में से 42 भारत में

श्राद्ध पक्ष समाप्त होते ही मानो वातावरण में खुशियां छा जाती हैं। नवारत्रि की शुरुआत होने से पहले मंदिर सजने लगते हैं, बाजारों में चहल-पहल बढ़ जाती है, लोग खरीदारी करने में जुट जाते हैं। पांडाल सजने लगते हैं और चारों ओर रामायण के मंचन के लिए लोग चंदा इकट्ठा करने भी निकल पड़ते हैं। त्योहार आते ही चारों ओर उत्साह का माहौल और वातावरण में एक नई उमंग दिखने लगती है। दैनिक जीवन में एक ही प्रकार के रुटिन काम से आदमी बोर होने लगता हैं, इसलिए उस रुटिन में बदलाव लाने के लिए भी त्योहारों की बहुत जरूरत होती है। नवरात्रि एक ऐसा त्योहार है, जिसे सभी बहुत ही आस्था के साथ मनाते हैं।

गुजरात में मां अम्बा की पूजा के साथ नौ दिनों तक चलने वाला सबसे लंबा डांस फेस्टिवल गरबा खेला जाता है तो बंगाल में मां दुर्गा की पूजा की जाती है।

नवरात्रि में जितना महत्व मां की पूजा को दिया जाता है, उतना ही महत्व शक्तिपीठों को भी दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि कुल 51 शक्तिपीठ हैं, लेकिन कौन सा शक्तिपीठ कहां है इस बारे में बहुत सी भ्रामक कथाएं और दंत कथाएं हैं। कभी भारत में पूरे 51 शक्तिपीठ थे, परंतु कई देशों, श्रीलंका, बर्मा, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान बनने के बाद आज उसके कई खंड हो गये हैं। अत: 51 में से 42 शक्तिपीठ ही आज भारत में उपलब्ध हैं। इन पीठों में भी जहां भगवती के नितम्ब गिरे थे, उस स्थानीय शक्तिपीठ ‘कालमाधव’ के स्थान का कोई निश्चत पता नहीं है। कुछ पीठ एक ही नाम से भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थित हैं। लेकिन, फिर भी लोग सबसे अधिक जिन शक्तिपीठों के बारे में जानते हैं, उनके बारे में जानना बहुत ही रुचिकर है।

ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष प्रजापति की 27 बेटियां थी। सती (पार्वती) देवी भी उनमें से एक थीं। राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया था, लेकिन उन्होंने यज्ञ में शिव को आमंत्रण नहीं दिया था, तब पार्वती ने यह प्रण लिया कि वह स्वयं की यज्ञ में आहुति देंगी और फिर से हिमालय की पुत्री बनकर आएंगी और शिव के साथ विवाह करेंगी। इसके बाद उन्होंने ऐसा ही किया। जब शिव को यह बात पता चली तो उन्होंने क्रोधित होकर दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और वे सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव नृत्य करने लगे। शिव भगवान के इस तांडव नृत्य को शांत करने के लिए साधुओं ने सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये और उन्हें चारों ओर फेंक दिया। ऐसा कहा जाता है कि सती के शरीर के टुकड़े जहां-जहां गिरे थे, वहां से बाराखड़ी के एक अक्षर की उत्पत्ति होती है। सती के शरीर के विभिन्न 51 टुकड़े जहां-जहां भी गिरे, उन्हें शक्तिपीठ कहा जाता है। यह शक्तिपीठ कहां-कहां हैं और उन्हें किस नाम से जाना जाता है तथा कहां सती का कौन सा अंग है इस बारे में बहुत सी भ्रामक दंत कथाएं हंै, लेकिन कुल 51 शक्ति पीठों में से 12 मुख्य शक्ति पीठ हैं। जो इस प्रकार हैं –

  1. गुजरात में अंबाजी 2. उज्जैन में भगवती महाकाली-महा शक्ति 3. कांचीपुरम में माता कामाक्षी 4. मलयगिरी में ब्रमराम्बा 5. कन्याकुमारी में कुमारीका 6. कोल्हापुर में महालक्ष्मी 7. प्रयाग में ललिता देवी
  2. विंध्याचल में विंध्यवासिनी धाम 9. वाराणसी में विशालाक्षी 10. गया में मंगलावती 11. बंगाल में सुंदरी भवानी और 12. नेपाल में गुह्याकेसरी।
  • कामरुप पीठ : यह स्थान आसाम में है, जहां सती का योनिमुख गिरा था, इसे ‘कामरुप पीठ’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थान बाराखड़ी का प्रथम अक्षर ‘अ’ का भी मूल स्थान है। कौशलशास्त्र के अनुसार यहां श्री विद्या की दैविक शक्ति है। इस पीठ के साथ संलग्न दो अन्य उप-पीठ भी हैं, जिसे ‘वंश’ कहा जाता है।
  • कशिका पीठ : यह वह स्थान है, जहां सती के स्तन गिरे थे, इसे ‘कशिका पीठ’ से जाना जाता है। यहां ‘आ’ अक्षर की उत्पत्ति हुई थी। ऐसी मान्यता है कि यहां मरने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है कि मृत्यु के पश्चात सती के स्तन में से धुंआ निकला था और वह धुंआ दो नदियों ‘असी’ और ‘वर्ण’ में परिवर्तित हो गया था। यहां दो अन्य उप-पीठ भी हैं, जिसमें से एक का नाम ‘दक्षिण सारनाथ’ जो असी नदी के साथ है व दूसरे का नाम ‘उत्तर सारनाथ’ है जो वर्ण नदी के उत्तर में है।
  • उत्पत्ति निर्माण के अवयव : यह वह स्थान है, जहां सती के ‘उत्पत्ति निर्माण के अवयव’ गिरे थे, इसे ‘नईपाल पीठ’ से जाना जाता है यहां ‘आई’ शब्द का निर्माण होता है। यहां ‘वाम-वेद’ की उत्पत्ति हुई थी। यहां 56 लाख भैरव-भैरवी, 2 हजार शक्तियां, तीन हजार पीठ व 14 कब्रिस्तान हैं। यहां ‘दक्षिण मेरी’ के भी चार पीठ हैं। वैदिक मंत्र भी यहां पूरे किये जाते है। यहां 30 हजार ‘देव योनि’ का बसेरा भी है।
  • रौद्र पर्वत : यहां सती की बायीं आंख गिरी थी। जिससे बड़ी ‘ई’ की मात्रा का निर्माण होता है। यहां मंत्रोच्चार करने से देवताओं के दर्शन होते हैं।
  • कश्मीर पीठ : यह स्थान जम्मू-कश्मीर में स्थित है। यहां सती का बायां कान गिरा था। जिससे ‘उ’ मात्रा का निर्माण होता है। यहां बहुत से तीर्थ होने के कारण कोई भी मंत्रोच्चार करने से सिद्धि मिल सकती है।
  • कन्या कुम्बज पीठ : यह स्थान तमिलनाडु में स्थित है। यहां सती का दायां कान गिरा था। इसे कन्याकुंबज या कन्याकुमारी भी कहते हैं। जिससे ‘ऊ’ की मात्रा का निर्माण होता है। कहा जाता है कि इस पवित्र स्थान पर ब्रह्मा वगैरह भगवानों ने अपना तीर्थस्थान गंगा व यमुना नदी के बीच बनाया था। यहां वैदिक मंत्रोच्चार किया जाता है। यमुना नदी के किनारे एक उप-पीठ इन्द्रप्रस्थ के नाम से है। यहां की जादुई शक्ति के कारण ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान फिर से हो गया था, जिसे वे भूल गये थे।
  • सुगंधा, पूर्णागिरी पीठ : यह स्थान बांग्लादेश में है। यहां सती की नाक गिरी थी। जिससे ‘रू’ का निर्माण होता है। यहां योगसिद्ध होता है।
  • अर्बुडाचल पीठ : यहां सती का बायां गाल गिरा था, जिससे छोटी ‘रु’ की उत्पत्ति होती है। यहां सती का नाम ‘अंबिका’ लिया जाता है।
  • अमृत केश्वर पीठ : यहां सती का दायां गाल गिरा था।
  • एकामरा पीठ : यहां सती के नाखून गिरे थे। कहा जाता है कि इसके दर्शन करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
  • त्रीशोट पीठ : यह स्थान पश्चिम बंगाल में स्थित है, यहां सती की नाभि के ऊपर के तीन भागों की चमड़ी गिरी थी, जिससे ‘ई’ मात्रा का निर्माण होता है। उनके कपड़ों के भी तीन भाग पूर्व, पश्चिम व दक्षिण में गिरे थे, जहां उनके उप-पीठों का निर्माण हुआ है।
  • कामकोटि पीठ : यहां सती की नाभि गिरी थी। यहां सभी मंत्र सिद्ध होते हंै। इसके चारों दिशा में उप-पीठ भी बने हैं।
  • कैलाश पीठ : यहां सती की उंगलियां गिरी थीं, यहां ‘ओ’ मात्रा का निर्माण होता है। कहा जाता है कि यहां माला फेरने से तुरंत फल की प्राप्ति होती है।
  • भंगु पीठ : यहां सती के दांत गिरे थे। इस स्थान पर वेद मंत्र सिद्ध होते हंै।
  • केदार पीठ : यह स्थान केदाननाथ में स्थित है। यहां सती की दाहिनी हथेली गिरी थी। इसके दक्षिण में सती की चूडियां गिरी थीं, वहां ‘अगस्तयाशम’ नाम के उप-पीठ की उत्पत्ति और दूसरी जहां उनकी अंगूठी गिरी वहां ‘इंद्राक्षी’ नाम के उप-पीठ की स्थापना हुई।
  • चंद्रापुर पीठ : यहां सती का बायां गाल गिरा था। इस स्थान पर भी सभी मंत्र सिद्ध होते हैं।

31-10-2015


 

9 दिन मां की आराधना करने से शांत हो जाते हैं नवग्रहों के प्रकोप


 

आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ स्वरुपों की आराधना का पर्व शारदीय नवरात्र हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। आश्विन शुक्लपक्ष प्रथमा को कलश की स्थापना के साथ ही भक्तों की आस्था का प्रमुख त्योहार शारदीय नवरात्र आरंभ हो जाता हैं। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में मां भगवती के नौ रुपों क्रमश: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा की जाती है। यह महापर्व संपूर्ण भारत में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इन दिनों भक्तों को प्रात:काल स्नानादि क्रियाओं से निवृत्त होकर निष्कामपरक संकल्प कर पूजा स्थान को गोबर से लीपकर पवित्र कर लेना चाहिए। फिर षोडशोपचार विधि से माता के स्वरुपों की पूजा करनी चाहिए। पूजा करने के उपरांत इस मंत्र द्वारा माता का प्रार्थना करनी चाहिए:

विधेहि देवी कल्याणं विधेहि परमांयिम रुपंदेहि जयंदेहि यशोदेहिं व्दिषोजहि।’’

पौराणिक कथानुसार महाराक्षस रावण का वध करने के लिए भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने शारदीय नवरात्र का व्रत किया था। तभी जाकर उन्हें विजय की प्राप्ति हुई थी। आस्थावान भक्तों में मान्यता है कि नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरुपों की आराधना करने वालों पर से नवग्रहों का प्रकोप शांत हो जाता है और जीवन में उसे सुख, शांति, यश और समृद्धि की प्राप्ति होती है।


 

शिव पीठ : यहां सती का माथा गिरा था, जिससे ‘क’ शब्द की उत्पत्ति होती है। कहा जाता है कि यहां पापी पलभर भी टिक नहीं सकता। इसके पूर्व में सती की बालियां गिरी थी, वहां उप-पीठ बनाया गया है। यहां ब्रह्म शक्ति का वास माना जाता है। उनके कान की अर्ध बाली दक्षिण-पूर्व में गिरी थी, वहां भी एक उप-पीठ बनाया गया है। यहां महेश्वरी शक्ति का वास माना जाता है। इसके दक्षिण में एक अन्य उप-पीठ भी है, जहां सती के माथे का टीका गिरा था। चौथा उप-पीठ इसके दक्षिण-पश्चिम में है, जहां सती के गले का हार गिरा था, यहां वैष्णवी शक्ति की इंद्रजाल विद्या सुरक्षित रहती है। पांचवा उप-पीठ पश्चिम में वाराही शक्ति बना है, जहां सती के नाक का मोती गिरा था। छठा उप-पीठ इसके उत्तर-पश्चिम में बना है, जहां सती के माथे का एक अन्य अलंकार गिरा था। यहां चामुंडा शक्ति का वास माना जाता है। इसके उत्तर-पूर्व में सातवां उप-पीठ है, जहां सती के बालों के अलंकार गिरे थे, यहां महालक्ष्मी का वास माना जाता है।

  • एक अन्य पीठ है, जहां सती का ब्लाउज गिरा था। यहां देवी ज्योतिषमती का वास माना जाता है और ‘ख’ शब्द की उत्पत्ति का स्थान माना जाता है। यह पीठ नर्मदा से पवित्र होता है। यहां ऋषि-मुनि तप करते हैं।
  • ज्वालामुखी : यह स्थान हिमाचल प्रदेश में स्थित है। यहां सती की छाती का भाग गिरा था। जिससे ‘ग’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां अग्नि का वास है, इसलिए इसे ज्वालामुखी नाम के उप-पीठ से भी जाना जाता है।
  • मालव पीठ : यहां से ‘घ’ शब्द की उत्पत्ति होती है और संगीत के राग, गंध, रस की उत्पत्ति यहीं से हुई है ऐसी मान्यता है।
  • कुलनटॉक पीठ : यहां सती के दाहिने हाथ का एक भाग गिरा था। यहां से ‘छ’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • कोटक पीठ : यहां सती के बायां हाथ का एक भाग गिरा था। यहां से ‘च’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां लोगों को सफलता मिलती है।
  • गोरख पीठ : यहां सती का पेट गिरा था और ‘छ’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • मातृरेश्वर पीठ : यहां सती की नाभि के ऊपरी तीन भागों में से एक भाग गिरा था। यहां शिव मंत्र की सिद्धि तुरंत होती है। यहां से ‘ज’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • अट्टहास पीठ : यह स्थान पश्चिम बंगाल में है। यहां सती की नाभि के ऊपरी तीन भाग में से दूसरा भाग गिरा था। यहां गंगेश मंत्र सिद्ध होता है। यहां से ‘झ’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • वीराट पीठ : यह स्थान राजस्थान में है। यहां सती की नाभि के ऊपरी तीन भागों में से तीसरा भाग गिरा था। यहां विष्णु मंत्र सिद्ध होता है।
  • राजगृह पीठ : यहां सती के पांव का निचला भाग गिरा था। यहां से ‘ट’ शब्द की उत्पत्ति होती है। राजगृह में वेदों का ज्ञान जानने को मिलता है।
  • महापथ पीठ : यहां से ‘थ’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • कौलगिरी पीठ : यहां सती का नितम्ब गिरा था, यहां से ‘ड’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां जंगली देवता का मंत्र तुरंत सिद्ध हो जाता है।
  • इलापुर पीठ : यहां सती की जांघ का भाग गिरा था। यहां से ‘ध’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • महाकालेश्वर पीठ : यहां सती की बायीं जांघ का भाग गिरा था। यहां से ‘न’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां महामृत्युंजय मंत्र जपने से लाभ होता है।
  • जयंति पीठ : यहां सती के दाहिने जांघ का हिस्सा गिरा था। यहां से ‘प’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां से धनुर्वेद का ज्ञान मिलता है।
  • उज्जैयनी पीठ : यह स्थान मध्य प्रदेश में है। यहां भी सती की बायीं जांघ का कुछ भाग गिरा था। यहां अपनी सलामति के लिए भी कुछ लोग मंत्र सिद्ध करते है।
  • योगिनी पीठ : यहां भी सती के दाहिने जांघ का कुछ भाग गिरा था।
  • ऋषिका पीठ : यहां भी सती की बायीं जांघ का कुछ भाग गिरा था।
  • हस्तिनापुर पीठ : यहां सती का दाहिना घुटिका गिरा था। इसका उप-पीठ नुपुरारानव के नाम से बना है, जहां सती की पायल गिरी थी। यहां सूर्य मंत्र की सिद्धि होती है।
  • उद्दीश पीठ : यहां सती की बायां घुटिका गिरा था। यहां उद्दीशास्त्र महातंत्र सिद्ध होता है।

31-10-2015

  • प्रयाग पीठ : यहां सती का देह रास गिरा था। यहां से ‘फ’ शब्द की उत्पत्ति होती है। इसके कई उप-पीठ भी हैं। जैसे- गंगा के पूर्व में बंगला उप-पीठ, उत्तर में चामुंडा उप-पीठ, गंगा-यमुना के बीच में राज-राजेश्वरी, यमुना के दक्षिण छोर पर भुवनेशी और प्रयाग को तीर्थराज या पीठ राज के नाम से जाना जाता है।
  • बष्तिश पीठ : यहां सती का दाहिना चरण गिरा था। यहां से ‘ब’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां पादुका मंत्र सिद्ध होता है।
  • मायापुर पीठ : यहां सती का बायां चरण गिरा था। यहां से ‘भ’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां मायावी सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
  • मलय पीठ : यहां सती का खून गिरा था। यहां से ‘म’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां बुद्ध मंत्र सिद्ध होता है।
  • श्री शैल पीठ : यहां से ‘य’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • मेरु पीठ : हिमालय में जहां सती की अस्थियां गिरी थीं। यहां से ‘र’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां से स्वर्णाकर्षण भैरव सिद्ध होता है।
  • गिरी पीठ : यहां सती की जीभ का आगे का भाग गिरा था। यहां से ‘ल’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां जाप करने से बोलने की सिद्धि हासिल होती है।
  • महेन्द्र पीठ : यहां सती की तंत्रिकाएं गिरी थीं। यहां से ‘व’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां शक्ति मंत्र का जाप करने से सिद्धि हासिल होती है।
  • यमन पीठ : यहां सती का दाहिना अंगूठा गिरा था। यहां से ‘श्र’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • हिरण्यपुर पीठ : यहां सती का बायां अंगूठा गिरा था। यहां से ‘श’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां वाम मार्ग पर चलने से सिद्धि लाभ मिल सकती है।
  • महालक्ष्मी पीठ : यहां सती के साज-श्रृंगार गिरे थे। यहां से ‘स’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां हर तरह की सिद्धि मिलती है।
  • अत्री पीठ : यहां सती की रक्तवाहिनीयां गिरी थीं। यहां से ‘ह’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • छाया पीठ : यहां सती की परछाईं पड़ी थी। यहां से ‘ल’ शब्द की उत्पत्ति होती है।
  • क्षत्र पीठ : यहां सती के बाल गिरे थे। यहां से ‘क्ष’ शब्द की उत्पत्ति होती है। यहां सभी प्रकार की सिद्धियां तुरंत ही प्राप्त होती हैं।

विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न पुराणों के अनुसार कहीं 70, कहीं 108 शक्तिपीठों का उल्लेख किया है। सभी का मत अपने-अपने स्थान पर सत्य है।

संगीता शुक्ला

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