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आओ मनायें गरबे की धूम

आओ मनायें गरबे की धूम

नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि के पावन पर्व के शुरू होते ही संपूर्ण भारत में संस्कृति और भारतीय परंपरा की लहर चारों तरफ नजर आने लगी है। शक्ति की साधना और आराधना के पर्व शारदीय नवरात्र को गरबा नृत्योत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। गरबा और डांडिया नृत्य दुनिया भर के बड़े नृत्य त्योहारों में से एक हैं। नवरात्रों में शाम को डांडिया और गरबा नृत्य के जरिये मां दुर्गा की पूजा-उपासना की जाती है। नवरात्रों की पहली रात्रि को कच्चे मिट्टी के सछिद्र घड़े, जिसे ‘गरबो’ कहते हैं, की स्थापना की जाती है। फिर उसके अंदर दीप प्रज्वलित किया जाता है, जो ज्ञान रूपी प्रकाश का अज्ञान रूपी अंधेरे को मिटाने का प्रतीक है। आरंभ में देवी के निकट छिद्र घट में दीप ले जाने के क्रम में गरबा नृत्य होता है। यह घट दीपगर्भ कहलाता है और दीपगर्भ ही गरबा कहलाता है। छिद्र घट की स्थापना के बाद महिलाएं कलश के चारों ओर एक लय व ताल के साथ गोलाकार में घूमते हुए झुकती, मुड़ती और तालियां बजाती हुई नृत्य करती हैं। इस नृत्य के साथ देवी की स्तुति की जाती है और कृष्णलीला संबंधी गीत भी गाए जाते हैं। साथ में ढोलक या तबला बजाने वाले संगीत देते हैं। आरती से पहले सभी रसिक-जन गरबा के रंग में रंग जाते हैं। देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, ‘आरती’ से पहले किया जाता है और डांडिया समारोह उसके बाद रात भर चलता रहता है।

डांडिया रास के शुरू होने के संबंध में एक कहावत प्रसिद्ध है। सदियों पहले महिषासुर नामक राक्षस राज किया करता था। उसके आतंक से त्रस्त होकर आखिर सभी लोगों ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सामूहिक आराधना की। देवताओं की शक्ति से तब देवी जगदंबा प्रकट हुईं और उन्होंने उस राक्षस का वध किया। तभी से नवरात्रि के दौरान भक्तगण नौ दिनों तक उपवास करने लगे और देवी के सम्मान में गरबा करने लगे। समय के साथ इसमें डांडिया भी जुड़ा और डांडिया-रास के रूप में इस लोकप्रिय नृत्य का उदय हुआ।

नवरात्रि के आते ही गुजरात में गरबे की तैयारिया जोर-शोर से शुरू हो जाती हैं। क्या लड़के, क्या लड़कियां, क्या बच्चे और क्या बूढ़े हर उम्र के लोग डांडिया के खेल में शामिल होते हैं। बेहद खूबसूरत और पारंपरिक अंदाज में सजे लोग इस नृत्य को बेहद खूबसूरती से अंजाम देते हैं। गरबा का नवरात्रों से खास संबंध है। ऐसा माना जाता है कि यह नृत्य मां दुर्गा को बहुत पसंद हैं, इसलिए नवरात्रि के दिनों में इस नृत्य के जरिये मां को प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है। इसलिए घट स्थापना होने के बाद इस नृत्य का आरंभ होता है। यही वजह है कि नवरात्रि के समय जब डांडिया होता है तो बहुत से सजे हुए घट दिखायी देते हैं। जिस पर दिया जलाकर इस नृत्य का आरंभ किया जाता है।

नवरात्रि में लगातार नौ दिनों तक माता का पंडाल सजा रहता है। सभी माता की भक्ति में भावविभोर हो कर उनकी पूजा-अर्चना के साथ-साथ गरबा और डांडिया का भी खूब आनंद लेते हुए नौ दिनों तक माता की भक्ति करते हैं। युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में लोक गीतों पर थिरकते हैं और डांडिया व गरबा खेलते हैं। लेकिन, बदलते समय के साथ-साथ गरबे में भी बहुत बदलाव आया है। आज इन नृत्यों के व्यावसायीकरण हो जाने के कारण इस नृत्य की वास्तविकता, पारंपरिकता और नाजुक लय, वैकल्पिक रूपों में गुम होती जा रही है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की जगह अब आधुनिक वाद्य यंत्रों, जैसे ड्रम और कांगों ने ले ली है। पहले लोग हारमोनियम, शहनाई और बांसुरी की मधुर धुनों पर थिरकते थे, वहीं अब उनके पैर इलेक्ट्रॉनिक सिंथेसाइजर पर थिरकते हैं। यही नहीं वक्त के साथ-साथ इसमें और भी कई बदलाव आये हैं। बदलते वक्त के साथ ही गरबा और डांडिया ने अपनी रंगीली और आकर्षक छवि के कारण गुजरात से बाहर दूसरे राज्यों में भी स्थान बना लिया है।

गुजरात के बाद राजस्थान में भी गरबा और डांडिया की धूम

भारत में गरबा और डांडिया गुजरात की सांस्कृतिक पहचान हैं। लेकिन, अब ये नृत्य विधाएं तेजी से गुजरात के बाहर भी जगह बनाती जा रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन नृत्यों ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में अपनी चाहत पैदा कर दी है। गुजरात के बाहर दूसरे राज्यों के लिए भी गरबा और डांडिया बहुत मनभावन नृत्य हैं। वे इनका पूरा लुत्फ उठाते हैं, क्योंकि पारंपरिक होने के साथ-साथ ये काफी आकर्षक भी हैं। राजस्थान में कम समय में ही इन दोनों नृत्यों ने चिरमी और घूमर जैसे नृत्य की ही तरह अपना स्थान भी बना लिया है। कोई एक दशक पहले गरबा और डांडिया राजस्थान में मेहमान की भांति दाखिल हुए और अब राजस्थान के कई शहरों और कस्बों में नवरात्रि और दीवाली के मौके पर ये नृत्य लोगों के लिए स्थाई आकर्षण का केंद्र बन गए हैं। इन नृत्यों ने नई पीढ़ी का मन मोह लिया है, इसलिए रंग-मंडपों में देर रात तक लोग डांडिया की धुनों पर थिरकते रहते हैं। जयपुर में कई स्थानों पर गरबा का रंगा-रंग आयोजन होने लगा है। ये अब धीरे-धीरे राजस्थान की सभ्यता का हिस्सा बनता जा रहा है। राजस्थान के लोगों का मानना है कि राजस्थान के चिर-परिचित लोकनृत्य चिरमी और घूमर महिलाओं के लिए ज्यादा हैं, लेकिन गरबा में स्त्री और पुरूष दोनों का योगदान होता है। एक वजह ये भी है कि ये नृत्य लोगों में अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है। राजस्थान के साथ ही गरबा और डंाडिया देश के दूसरे कई राज्यों की शोभा भी बनते जा रहे हैं। इस लोक नृत्य का प्रदर्शन मध्य प्रदेश और मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में खास देखा जाता है। इसके साथ ही पंजाब, दिल्ली में भी कुछ खास जगहों पर इसकी धूम और मस्ती देखी जाती है। भारत में ही नहीं विदेशों में भी इसका प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

31-10-2015

पारंपरिक गरबा परिधान और उसमें आये बदलाव

गरबा परिधान बहुत खास हैं ये भीड़ में भी एक अलग पहचान देती है। नवरात्रि के मौके पर गरबा के खास पारंपरिक वेशभूषा में स्त्री और पुरूष दोनों ही सजे-धजे नजर आते हैं। स्त्रियां खासतौर पर घाघराचोली, चनियाचोली, पहनकर डंाडिया और गरबा करती हैं। गरबा के लिए इन पोशाकों से बेहतरीन कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। इस विशेष परिधान का वजन करीब पांच किलो होता है और यह पोशाक कई सजावटी चीजों से बनती हैं। ये पारंपरिक होने के साथ-साथ आरामदायक भी होती हैं। इनमें हैवी वर्क होता है इसके बावजूद इन्हें पहनने में किसी तरह कि कोई दिक्कत नहीं होती। इसमें मिररवर्क किया जाता है, जो कि गुजरातियों का एक प्रचलित क्लॉथ वर्क है। मिररवर्क की खासियत यह होती है कि इसमें कांच के छोड़े-छोड़े टुकड़ों को चिपकाया नहीं जाता, बल्कि रंग-बिरंगे धागों से टांका जाता है। वहीं दूसरी तरफ पुरूष भी गरबा परिधान में नजर आते हैं। पुरूषों की गरबा परिधान को गुजराती भाषा में केडिय़ा कहते हैं। केडिय़ा में छोटे घेर का घुमावदार कुरता, धोती और रंग-बिरंगी पगड़ी होती है, जिस पर कशीदाकारी की गई होती है। कशीदाकारी में रंग-बिरंगे ऊन से कपड़ों पर सुंदर डिजाइनें बनाई जाती हैं। इस वर्क में मोर, कलश और गरबा खेलते स्त्री-पुरुषों के चित्र होते हैं। केडिया के साथ पहने जाने वाले आभूषणों को हसदी कहा जाता है।

वक्त के साथ-साथ गरबा परिधान में बहुत बदलाव आया है- चनियाचोली में ट्रेडिशनल और इंडोवेस्टर्न कट्स का प्रचलन बढ़ गया है। लेकिन बाजार में प्लेन ब्लाउज पर फ्रंट में छोटे-छोटे हल्की बूटी और हलका वर्क नैक लाइन में काफी डिमांड में रहता है इसके साथ ही हाफ की बजाय इस बार फुलस्लीव्स ब्लाउज फैशन में हैं। चनियाचोली का स्मार्ट और ऐलिगैंट लुक सिल्क, जॉर्जेट, शिफौन, चंदेरी, प्योर कॉटन, कॉटन जर्काट फैब्रिक बहुत प्रचलन में आते जा रहे हैं। युवतियों की पसंद और रेंज को ध्यान में रखते हुए ट्रेडिशनल और इंडो-वेस्टर्न कट की चनियाचोली की अनेक वैराइटी बाजार में मौजूद हैं, जो एक से बढ़कर एक हैं और कम से लेकर हाई रेंज तक मौजूद हंै। आजकल बैकलेस, क्रॉसलेस या हॉल्टर लुक वाली चोली का काफी चलन है। इस में पीठ, गर्दन आदि का हिस्सा एक्सपोज होता है। कुछ अलग दिखने की चाह में युवतियां अपनी बैक के खुले भाग पर फैंटेसी मेकअप के लिए टैटू या स्टिकर लगवाती हैं या इसमें मेहंदी स्पार्कल्स और कई रंगों के प्रयोग से तरह-तरह की कलाकृतियां बनवाती हैं। युवतियां चनियाचोली की जगह जींस के साथ शार्ट कुर्ती, डिजाइनर साडिय़ां और लड़के जींस के साथ शॉर्ट कुर्ता, लॉग कुर्ते के साथ चूड़ीदार या पाजामा-कुर्ता ज्यादा पसंद करते हैं।

31-10-2015

कुछ ट्रेडिशनल गरबा परिधान जो हमेशा रहते हैं ट्रेंड में

गरबा में ट्रेडिशनल परिधान का फैशन कभी नहीं जाता, बल्कि उसमें और नवीनता आती जाती है। पारंपरिक लहंगे के साथ पारंपरिक गहने हमेशा गरबा पांडाल की शोभा बढ़ाते हैं।

डबल घेर लहंगा- डबल घेर वाला लहंगा हमेशा चलन में रहता है, जो महिलाओं और युवतियों को काफी आकर्षित करता है। आखिर करे भी क्यों नहीं, घूमने पर बनने वाला इसका रंगीन घेर मन को इतना भाता है कि युवितयां इसे एक बार तो पहनना पसंद करती ही हैं।

मल्टी लेयर- मल्टी लेयर लहंगा तो गरबा पांडाल की शान होता है। शिफॉन के घेरे में लाल, सफेद रंग और बांधनी दुपट्टा इसके साथ खूब फबता है, जो नया और पारंपरिक दोनों लुक देते हैं।

कांच वर्क- कांच वर्क गरबा परिधानों की खासियत है। इसके साथ मल्टी कलर्स का प्रयोग इसे और भी आकर्षक लुक देता है। जो कभी भी लोगों के लिए पुराना नहीं होता है, बल्कि हमेशा लोगों के लिए खास रहता है।

काठियावाड़ी- गरबे में ट्रेडिशनल ड्रेस की बात की जाये और काठियावाड़ी डिजाइन न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। गुजराती गरबों की शान काठियावाड़ी लहंगा चोली से ही है। इसके साथ सिंगल कलर या रंगीन दुपट्टे हमेशा प्रचलन में रहते हैं।

साड़ी लहंगा- सादे तरीके से सजकर भी आगर खास दिखना हो तो साड़ी लहंगा पहन बेहतर विकल्प है। यह सादगीपूर्ण भी होती है और काफी आकर्षक भी।

मल्टी कलर लहंगा- फैशन के दौर में जिन गरबा परिधानों का चलन है अगर उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं तो सिंपल लहंगे में भी मल्टी कलर्स का इस्तेमाल कर आप गरबा पांडालों में छा सकते हैं। किसी भी पैटर्न पर यह तरीका अपनाया जा सकता है।

बांधनी- अगर आप ज्यादा पैसे खर्च नहीं करना चाहते और खूबसूरत भी दिखना चाहते हैं तो सबसे बेस्ट है, बांधनी प्रिंट। यह कभी आउट ऑफ फैशन भी नहीं होता और हर रंग व डिजाइन में आकर्षक लगता है।

टैटू का बढ़ता चलन

गरबा पंडालों में युवाओं का लिबास देखते ही बनता है पिछले कुछ वक्त से गरबे में बदलते लिबास के साथ-साथ टैटू का चलन भी काफी बढ़ गया है। नवरात्रि के अवसर पर युवाओं द्वारा अपने शरीर पर विभिन्न डिजाइनों के रंग-बिरंगे टैटू बनवाये जाते हैं। गरबा में टैटू बनवाना फैशन का पर्याय बन गया है। नवरात्रि के शुरू होते ही टैैटू बनाने वाले भी अपनी तैयारी कर लेते हैं। इस बार ट्रेडिशनल डिजाइन के साथ ही गरबा के स्पेशल आइकॉन टैटू के रूप में बनाये जाने का काम शुरू हो गया है। एक्सपट्र्स ने इसके स्टेनसिल्स भी तैयार कर लिये है। गरबा के लिए यंगस्टर्स के बीच टेम्प्रेरी टैटू की डिमांड ज्यादा है। टेम्प्रेरी टैटू एक महीने तक चलते हैं और ब्लैक नहीं पड़ते। टैटू की कीमत उसके डिजाइन और साइज पर निर्भर करती है। ट्रेडिशनल ड्रेसेज में रंग-बिरंगे टैटू उभरकर दिखाई देते हैं, इसलिए युवाइसे ही ज्यादा पसंद करते हैं। टैटू में पीकॉक, पीकॉक फैदर, बांसुरी, राधा-कृष्ण, डांडिया खेलते कपल के डिजाइन की ज्यादा मांग है।

गरबा के दौरान कैसे रखें सेहत का ध्यान

नवरात्रि के अवसर पर बहुत से लोग उपवास रखते हैं। नवरात्रि में बिना लहसुन-प्याज का केवल शुद्ध शाकाहारी और सात्विक भोजन ही ग्रहण किया जाता है। हमारे देश के हर क्षेत्र में नवरात्रि के उपवास में अलग-अलग प्रकार का खान-पान होता है। कुछ जगह सामान्य नमक खाया जाता है, इस भोजन में अधिक मसाले की जगह केवल काली मिर्च, जीरा, हल्दी और नमक का ही उपयोग होता है। कुछ जगह सामान्य नमक की जगह लाहौरी नमक का प्रयोग होता है। खाने में प्रमुख रूप से दूध, दही, सूखे मेवे, फल, कुट्टू का आटा, सामा चावल, आलू आदि से निर्मित खाने का ही इस्तेमाल होता है।

गुजरात अपने शाकाहारी भोजन के लिए विख्यात है। नवरात्रि के दौरान दूध और विभिन्न प्रकार की दालों से बनीं वस्तुओं को गुजरात में बड़े चाव से खाया जाता है। नवरात्रि रायता, गुजरात का खास रायता है, यह दही और बंद गोभी से तैयार होता है। स्वाद के लिए इसमें काली मिर्च का जायका डाला जाता है। गुजरात का साबूदाना से बना हुआ बड़ा अपने अनूठे स्वाद के लिए सभी लोगों को आकर्षित करता है। साबूदाना बड़ा उपवास में खाने के लिए बहुत अच्छी चीज है। इसे आसानी से बनाया जा सकता है। गुजरात के लोगों के भोजन में दाल, सब्जियां और दूध प्रमुख हिस्सा होते हैं। इसलिए नवरात्रों के दौरान यहां खाने के लिए आपको ढ़ेरों विकल्प मिल जाएंगे। जो न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि आपकी सेहत के लिए भी फायदेमंद होते हैं।

नवरात्रि में गरबा खेलना गुजरात की परंपरा है, लेकिन कई घंटों तक नृत्य करने से एनर्जी लेवल पर काफी असर पड़ता है। ऐसे में जरूरी है कि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए, जिससे स्टैमिना बरकरार रहे। गरबा का कार्यक्रम देर रात तक चलता है, इसलिए इस दौरान आठ घंटे की नींद लेना बहुत जरूरी है। अगर रात में देर से सो रहे हैं, तो दिन में नींद पूरी करें। कुछ जरूरी टिप्स को फॉलो कर, व्रत के दौरान भी स्वस्थ्य और चुस्त-दुरूस्त रहा जा सकता है। इसके लिए अपनायें नीचे दिये खास टिप्स।

पानी- कई घंटों तक खेले जाने वाले गरबा के दौरान बहुत पसीना आता है। इसलिए दिन में 12-15 गिलास पानी जरूर पीएं। ये न केवल आपकी प्यास बुझाएगा, बल्कि आपके शरीर में पानी की कमी को भी दूर करेगा।

कैलोरी- गरबा डांस कम से कम 8-9 दिनों तक चलता है। जिसके लिए काफी एनर्जी की जरूरत पड़ती है इसलिए अगर आप रोज गरबा खेल रहे हैं तो अपने नॉर्मल डाइट में 300-400 कैलोरी ज्यादा लें।

शहद और नींबू- सुबह गुनगुने पानी में एक नींबू के रस में एक-चौथाई टी-स्पून शहद मिलाकर पीना फायदेमंद रहेगा।

फल- सुबह के समय ऐसे फलों का सेवन करें, जिनमें कैलोरी ज्यादा हो। जूसी फ्रूट खाने से एनर्जी के साथ ही स्किन को भी भरपूर न्यूट्रिशन मिलता है।

एनर्जी ड्रिंक- दोपहर के समय मिल्क शेक, जूस या नारियल पानी में से कोई एक ड्रिंक अवश्य लें।

गर्म पानी- गरबा खेलने के बाद गुनगुने पानी से पैर जरूर धोएं। इससे शरीर और पैरों को काफी आराम मिलेगा।

ग्लूकोज- गरबा खेलने के दौरान हर आधे घंटे के अंतराल में ग्लूकोज लेते रहना चाहिए। इससे कमजोरी नहीं होगी।

कुट्टू या सिंघाड़ा का हलवा और रोटी- दोपहर के भोजन में 2 चपाती कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की, सिंघारे का हलवा, सब्जी, दही, सलाद और कुछ मीठा अवश्य लें।

जंक फूड से रहें दूर- गरबा के दौरान तले हुए भोज, जंक फूड या बाजार के खाने से बचना चाहिए। ये न तो सात्विक होते हैं और न ही सेहत के लिहाज से सुरक्षित।

दूध- रात को सोने से पहले एक गिलास दूध का सेवन अवश्य करें।

अगर गरबा के दौरान थोड़ी सी सावधानी बरती जाये तो मस्ती के साथ-साथ आपकी सेहत भी ठीक रहेगी और नौ दिनों तक चलने वाले इस रंगारंग कार्यक्रम का लुत्फ भी आप भरपूर तरीके से उठा पाएंगे।

प्रीति ठाकुर

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