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संस्कृति संस्कार और गरबा

संस्कृति संस्कार और गरबा

शारदीय नवरात्रि के साथ ही गरबा का आयोजन शुरू हो चुका है। देशभर के लोगों में विशेषकर, युवाओं, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों तक में इन दिनों गरबा नृत्य की अनोखी छटा और मस्ती का जो सतरंगी रंग चढ़ा हुआ है, वह सभी रंगों से ज्यादा चटख है। गरबा प्रेमियों के पैर इसके बारे में सोचने मात्र से ही थिरकने लगते हैं। गरबा महोत्सव में शामिल होने के लिए लोग महीनों पहले से ही इसकी तैयारियां करना शुरू कर देते हैं। असल में गरबा एक लोकप्रिय नृत्य है, जो ईश्वर की आराधना में किया जाता है, लेकिन वर्तमान समय में गरबा में व्यापक बदलाव हुए हैं और इसके बदले हुए प्रारुप को देखकर, ये कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि ये मस्ती और भक्ति का कॉकटेल बन चुका है। दरअसल अब यह भक्ति के रूप में एक फैशन भी बन चुका है। बदलते समय ने हमारा विकास जरुर किया है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मां दुर्गा के हाथों राक्षस महिषासुर के वध की खुशी का प्रतीक है गरबा। ये प्राचीन काल से ही चला आ रहा गुजरात और अब पूरे देश का लोक नृत्य है, लेकिन विकास के पहिये, पाश्चात्य सभ्यता की धमक, खुद की सभ्यता-संस्कृति को भूलने में माहिर आज के युवा गरबा को भक्ति की बजाय अबाध मस्ती का माध्यम बना चुके हैं। जिसमें एक नहीं बल्कि हजारों ऐसे आधुनिक महिषासुर भी शामिल होते हैं, जो धड़ल्ले से भक्ति की आड़ में महिलाओं और युवतियों की इज्जत से खेलते हैं या बिना कोई मौका गंवाए खेलने की ताक में रहते हैं। ऐसे महिषासुरों से कैसे निबटा जाये? महिलाएं, लड़कियां क्या करें और क्या न करें? अभिभावकों और समाज का क्या फर्ज है? वर्तमान समय में हम सबों को इसके बारे में गंभारता से सोचने की सख्त आवश्यकता है। ये समय की मांग है कि हमारा समाज धर्म की खुशी में अधर्म की साजिश रचने वालों को कड़ा सबक सिखायें। गरबा लोक नृत्य का पौराणिक महत्व है। यह हिंसा और अधर्म पर शक्ति, मर्यादा, शालीनता और सत्य की विजय का प्रतीक है। खुशी और भक्ति का मेल ही इसकी खासियत है, न कि मस्ती में डूबकर मदहोश होने का। युवाओं के लिए गरबा अपने संस्कृति से जुडऩे का सुनहरा अवसर होता है। ऐसे में सब तरफ जब नवरात्रि मेलों और कार्यक्रमों की धूम मची हुई हो, तो मां की भक्ति और गरबा नृत्य के बिना बात अधूरी सी लगती है।

गरबा की शुरुआत और विधि

नवरात्र के नौ दिनों के उत्सव के दौरान गुजरात के कोने-कोने में गरबा और डांडिया डांस की धूम होती है। गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। नवरात्र की पहली रात्रि को कच्चे मिट्टी के सछिद्र घड़े, जिसे दीपगर्भ या ‘गरबो’ कहते हैं, उसमें चार दीपक को प्रज्वलित किया जाता है। इसे ज्ञान रूपी प्रकाश का अज्ञान रूपी अंधेरे के भीतर फैलाने का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं कलश के चारों ओर एक लय व ताल के साथ गोलाकार में घूमते हुए झुकती, मुड़ती, तालियां और चुटकियां बजाते हुए नृत्य करती हैं। इसी के साथ ही दूसरे मिट्टी के घड़े में सात धान्यों का ‘ज्वारा’ उगाया जाता है। इस नृत्य के साथ मां दुर्गा की स्तुति की जाती है और कृष्णलीला संबंधी गीत भी गाए जाते हैं। साथ में ढोलक या तबले पर थाप दी जाती है। आरती से पहले सभी लोग गरबा के रंग में रंग जाते हैं।

पहले देवी के निकट सछिद्र घट में दीप ले जाने के क्रम में गरबा नृत्य होता था। यह घट दीपगर्भ कहलाता था। वर्णलोप से यही शब्द गरबा बन गया। देवी दुर्गा के हाथों राक्षस महिषासुर के वध की खुशी अर्थात बुराई पर अच्छाई की विजय से ऊपजी खुशी का प्रतीक है, गरबा नृत्य। लेकिन, इससे उपजी स्वच्छंदता का कई युवक-युवतियों ने अपने क्षणिक सुखों के लिये गलत इस्तेमाल किया है और कर रहे हैं।

31-10-2015गरबा में मस्ती, देशभर में फैला

दुनिया के किसी हिस्से का आधुनिक नृत्य हो या लोक नृत्य, उसमें पैरों की थिरकन और संगीत का स्वर बेहद अहम होता है। इसलिए जब गरबा और डांडिया ने गुजरात से अपनी छोटी यात्रा शुरू की तो ये थिरकते, बलखाते और मदहोश कर देने वाले कदमों का साथ था। लेकिन, उसे तेज रफ्तार तब मिली जब खासकर युवाओं और महिलाओं ने उसका हाथ थाम लिया। इसी मौके की ताक में बाजार था जिसने गरबा को गुजरात के बाद देश तक फैल चुके इस लोक नृत्य को महादेशों तक में पहुंचा दिया। इसकी बड़ी वजह है, धार्मिक महत्व के अलावा इसके मौज-मस्ती वाले रंग। नवरात्रि के नौ दिनों में गरबा खेलने का जुनून हर किसी पर सिर चढ़कर बोलता है। क्या महिलाएं, और क्या युवा सभी अपनी पीठ, गालों, गले, हाथों और यहां तक कि सिर पर भी गरबा और डांडिया से संबंधित टैटू बनवाकर नृत्य-संगीत की मस्ती में डूब जाते हैं। नवरात्रि के दौरान एक तरफ जहां मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है, वहीं हर जगह गरबा महोत्सव की धूम देखी जा सकती है। कर्णप्रिय और जोशीले संगीत और ढोल-नगाड़ों की थापों पर लोगों के पैर बरबस थिरकने लगते हैं। नतीजा हर कोई गरबा खेलने पर मजबूर हो जाता है। खासकर युवा पीढ़ी में गरबे की मस्ती का रंग ज्यादा गहरा नजर आने लगा है। इस वजह से गुजरात का लोक नृत्य गरबा धीरे-धीरे हर जगह अपने पैर पसारने लगा है। आज से सात-आठ साल पहले तक गरबा और डांडिया का क्रेज गुजरात राज्य में ही देखा जाता था, लेकिन अब हर जगह नवरात्रि में गरबा नृत्य और डांडिया नाइट कार्यक्रम का आयोजन होता है। गुजरात की सीमाओं से निकलकर यह डांस नवरात्रि के अवसर पर छोटे-बड़े शहरों के मॉल्स, मेलों, स्कूलों, कॉलेजों के साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी छा चुका है। यही वजह है कि गरबा और डांडिया सीखने वालों में 16 से लेकर 40 साल तक के लोग ज्यादा हैं।

गरबे की धूम और बदलाव

आखिर गरबा इतना लोकप्रिय क्यों होता जा रहा है? इस सवाल का जवाब तो यही है कि ये नई पीढ़ी को दुबारा हमारी पुरानी परम्पराओं और संस्कृतियों से जोड़ रहे हैं, एक मजबूत बंधन के रुप में। लेकिन, समय के साथ ही पारंपरिक गरबा नृत्य में भी कुछ बदलाव देखने को मिले हैं। पारंपरिक गरबा नृत्य-संगीत में नई फिल्मों के कुछ चुनिंदा गानों ने भी पक्की जगह बना ली है। इसके अलावा राजस्थान और पंजाब के लोकगीत पर भी गरबा और डांडिया सिखाया जाता है। गानों का मूलत: प्रेम प्रधान होना है। इसके बाद आती है, पहनावे की बात। महिलाओं के पारंपरिक ड्रेस लहंगे के साथ ही इसमें अब फ्रॉक सूट ड्रेस में शामिल हो चुका है। गरबा ड्रेस में गुजरात के कच्छ पैटर्न, शीशे का काम और रेशमी कढ़ाई ज्यादा प्रचलन में है। बदलते समय के साथ-साथ गरबा नृत्य में भी बहुत बदलाव आया है। पहले जहां ढोल, ढोलक और हारमोनियम की थापों पर गरबा और डांडिया नृत्य होता था, वह स्थान अब इलेक्ट्रॉनिक सिंथेसाइजर ले चुके हैं। गरबा में आधुनिकता के प्रवेश की एक प्रमुख वजह, विदेशों में फैले एनआरआई, गुजरात के निवासियों के बीच इसकी लोकप्रियता और विदेशों में बड़े पैमाने पर अलग-अलग शहरों में इसका खास आयोजन होना है। नवरात्रि का लोक नृत्य गरबा खेल गुजरात में एक परंपरा है, वहीं अन्य देशों में ये फैशन बन चुका है। आधुनिकता के लबादा ओढ़े युवाओं के लिये यह बदलाव समय की मांग भले हों, लेकिन लोक नृत्य के लिए धीमे जहर से कम नहीं है। क्योंकि, यह अनूठे सांस्कृतिक लोक नृत्य गरबा के मूल रुप से छेड़छाड़ का मामला है।

मिलने का बहाना है गरबा

भारत में गरबा और डांडिया गुजरात की सांस्कृतिक पहचान हैं। लेकिन गरबा और डांडिया के बहाने कुकृत्य करने वालों की भी मौज हो गई है। वहीं गरबा हमें अपने जिन मित्रों व रिश्तेदारों से मिलने का समय नहीं मिलता, उनसे मिलाने का एक बेहतर माध्यम भी बनता है। ठंडी हवा के झोंकों के बीच हम अपने-पराए व जात-पात का भेद-भाव भूलकर केवल नृत्य-संगीत में खो जाते हैं।

31-10-2015

रंगीन रातों में फरेब करते युवा

नवरात्रि में नौ दिनों तक गरबा पंडाल में और सड़कें सतरंगी रोशनियों से सजी-धजी रहती हैं। सुहाने समां के बीच युवाओं के पैर प्रेम गीतों पर थिरकते रहते हैं, ऐसे में प्रेम के भाव पैदा नहीं होंगे तो क्या आध्यात्म के भाव पैदा होंगे? आखिर जैसा माहौल इन्हें दिया जा रहा है, उसमें भक्ति की उम्मीद करना ही बेमानी है। बची कसर गरबा पांडालों में कपल इंट्री सिस्टम पूरी कर ही रहा है। गरबे के दौरान प्रेम की बांसुरी बजाने वाले आधुनिक कन्हैया पांडोलों में खूब दिखते हैं। खासकर युवतियों और महिलाओं को इन कन्हैयाओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। क्योंकि, इन नौ रंगीन रातों में कई रंगीन मिजाज साथी भी मिलते हैं, जो कई युवतियों के होश में आने के पहले ही उनकी जिंदगी में काली रात का ग्रहण लगा चुके होते हैं। इन नौ दिनों में अनैतिक संबंध बनाकर बलात्कार व छेड़छाड़ जैसे ऐसे कृत्यों को अंजाम देने वाले कोई और नहीं बल्कि, रईसजादे मनचले युवक-युवतियां होते हैं, जो स्वच्छंदता की आड़ में समाज में एक घटिया सोच को विकसित करने का ही काम कर रहे हैं।

यह जागरूकता नहीं स्वच्छंदता है

नवरात्रि के दौरान हर साल युवाओं पर किये गए अलग-अलग सर्वे में हर बार चौका देने वाले सच सामने आते हैं। यदि गुजरात, महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य की ही बात करें तो वहां के कई इलाकों में नवरात्रि के बाद गर्भपात कराने वाली युवतियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। कई हिस्सों में कंडोम व गर्भनिरोधक गोलियों की खपत भी अचानक 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ जाना, एक ओर जहां युवाओं की सेक्स संबंधों के प्रति जागरूकता का परिचायक है, वहीं दूसरी ओर यह स्वच्छंदता की आड़ में रिश्तों को सिर्फ मौज-मस्ती के रुप में तब्दील करने का भी है। ऐसा नहीं है कि अकेला गुजरात ही रंगीन युवाओं के ऐसे अवैध संबंधों की काली छाया की गिरफ्त में है, बल्कि अब तो मुंबई, दिल्ली व मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों के गरबा पांडालों में थिरकने के बहाने आने वाले युवा भी इसी रंगीनियत का अंधा अनुसरण कर रहे हैं। नवरात्रि मां दुर्गा की भक्ति का त्योहार है न कि स्वचछंदता का। गरबा खेलने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इस दौरान मर्यादाओं को ताक पर रखने की बजाय होश से काम लेकर रिश्तों की गरिमा को बरकरार रखना चाहिए।

गरबा के फैलाव के पीछे बाजार

31-10-2015इसमें कोई शक नहीं कि गरबा और डांडिया मनमोहक नृत्य हैं। लेकिन, कुछ समाजशास्त्री देश भर में इसके फैलाव के पीछे बाजार और फैशन का अहम योगदान मानते हैं। कारोबारी समूह गरबा के लिये नये-नये ड्रेस और डिजाइनें तैयार करता है, क्योंकि उनके लाखों खरीददार हैं। उन्हें प्रचार के लिये भी पैसा भी नहीं बहाना पड़ता है, क्योंकि गरबा और डांडिया में बड़ा आकर्षण या सम्मोहन पहले से मौजूद है। पिछले एक दशक में दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पंजाब में बढ़ी इसकी लोकप्रियता इस बात का सबूत हैं। राजस्थान में गरबा और डांडिया नृत्य अब वहां के कस्बों तक में ही स्थाई आकर्षण का केन्द्र नहीं हैं, बल्कि ‘घूमर’ जैसे लोकप्रिय लोक नृत्य को भी पीछे छोड़ दिया है। इसकी एक बड़ी बजह खुले बाजार के साथ ही इसमें युवाओं के मन मुताबिक व्यापक स्वच्छंदता भी है। गरबा सिखाने वालों की मांग देश ही नहीं विदेशों तक में है।

दरअसल, गरबा और डांडिया तो आधुनिक फैशन का अभिन्न हिस्सा हो गए हैं। इसमें युवा पीढ़ी के लायक खुलापन भी है। बिना रोक टोक के डांस करना, शरीर पर टैटू बनवाना और गरबा के बहाने देर रात घर से जाना। नवरात्रि के दौरान हर साल युवाओं पर किये गए अलग-अलग सर्वे में हर बार चौका देने वाले सच सामने आते हैं। खुलेपन की वजह से ही देश के अन्य राज्यों के लोक नृत्यों में गरबा ने महज कुछ ही वर्षों में अपनी गहरी जड़ें जमा लीं हैं। तुलनात्मक रुप से देखें तो अन्य राज्यों के लोक नृत्यों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय राजस्थान का ‘घूमर’ और पंजाब का ‘भांगड़ा’ है, लेकिन इनमें भी वो बिंदास स्टाइल और खुलापन हरगिज नहीं है। इन दोनों पारंपरिक नृत्यों के समय घर और समाज के जानने वाले लोग होते हैं, ऐसे में युवाओं को मनमर्जी करने का मौका नहीं मिल पाता है। राजस्थानी लोक नृत्य ‘घूमर’ में भी खुलापन नहीं है। ये प्राचीन नृत्य हैं। एक अविरल प्रवाह के साथ शारीरिक सौष्ठव से भरपूर नृत्यांगना इसमें बेहतर संगीत की धुनों पर नाचती है, लेकिन इसमें न तो अश्लीलता और न ही छेडख़ानी की कोई गुंजाइश ही है। ‘घूमर’ में नृत्यांगना घूंघट में रहकर डांस करती हैं, उसका पूरा शरीर ढंका रहता है। ऐसे में आज की स्वच्छंद मानसिकता वाले युवाओं में इसे लेकर अरुचि होना स्वाभाविक ही है। यह आज महिलाओं और पुरुषों के एक खास वर्ग की ही पसंद बन गया है, जो अपनी सभ्यता और संस्कृति को हर हाल में न सिर्फ जिंदा रखना चाहते हैं, बल्कि उसके बड़े प्रशंक भी हैं। ये दलील कि हमें घूमर में अब परिवर्तन करना होगा, क्योंकि वो गुजरा जमाना था जब घूंघट की प्रथा थी,तब ये सही लगता था। साथ ही सरकार ने भी हमारे लोक नृत्यों को वैसे प्रोत्साहित नहीं किया, जैसे गुजरात सरकार ने गरबा और डांडिया को गुजरात की सीमा से बाहर निकालकर देश भर में फैलाने में मदद की है। आज के समय में संयुक्त परिवारों की जगह एकांकी परिवारों ने ले ली है। उन्हें ऐसे नृत्य आयोजन में भागीदार बनना सामाजिक सामूहिकता के अप्रतिम आनंद की अनुभूति कराता है। और इसी सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव को पूंजीवादियों और आधुनिक बाजार की शक्तियों ने भुनाया है।

गरबा के दौरान गुजरात में करोड़ों की लागत से विशेष गरबा पांडाल बनाये जाते हैं। निजी पांडालों को बनाने में भी खूब नोट उड़ाये जाते हैं। इस दौरान अर्थव्यवस्था में भी तगड़ा उछाल आता है। बड़े-बड़े मॉल, छोटी से लेकर बड़ी दुकानदारों तक की खूब कमाई होती है। जमकर वस्त्र, मिठाई, झालड़, रंग-बिरंगी लाइट्स की बिक्री होती है। इस दौरान रेहड़ी वालों के भी अच्छे दिन आ जाते हैं। उन्हें सामान बेचने और नोट गिनने से फुर्सत ही नहीं मिलती है। कारोबारी वर्ग आयोजनों के दौरान पांडांलों में कुछ सुविधाओं का इंतजाम कर एक साथ करोड़ों लोगों के बीच अपने उत्पाद के साथ पहुंच बना लेते हैं। गरबा करना कई बार हर आम व्यक्ति की खास ख्वाहिश भी बनकर रह जाता है, क्योंकि पूंजीपतियों की मौज-मस्ती के इन मंडपों का प्रवेश शुल्क उनकी जेबों पर भारी पड़ता है। क्योंकि, इसकी फीस 1000 रुपए प्रति व्यक्ति से शुरू होकर करीब 7000 रुपए तक होती है।

कुल मिलाकर देखा जाये तो पूरे देश में गरबा के दौरान होने वाले आर्थिक लेन-देन का आंकड़ा अरबों में पहुंच जाता है।

गरबा में अंग-प्रदर्शन

दुष्टों की संहारक माता दुर्गा की आराधना का पर्व है नवरात्र। इसी खुशी को व्यक्त करने के माध्यम के रूप में पुरुष-महिलाएं नौ दिनों तक जमकर गरबा खेलते हैं। लेकिन, भक्ति के नाम पर इसमें बेरोकटोक अश्लीलता की भी सरेआम नुमाइश होती है। लड़के-लड़कियां खूब महंगे कपड़े पहनकर और सजधज कर गरबा मंडपों में जाते हैं। आजकल तो लड़कियां बेहद तंग कपड़ों में भी अपने सौंदर्य का प्रदर्शन करती देखी जा सकती हैं। जैसे कि ये सभी उल्लास का नृत्य गरबा नहीं बल्कि, किसी फैशन परेड की मॉडल हों।

31-10-2015

गरबा में लव जिहाद, मुस्लिमों के आने पर रोक

गरबा के दौरान महिलाओं-पुरुषों के इस खुलेपन से उपजे अंतरंगता ने कई बार समाज और सामाजिक संगठनों को सोचने पर मजबूर कर दिया। आखिर, सवाल युवाओं के होते चारित्रिक पतन को रोकने और भावी पीढ़ी को बचाने का भी है। विश्व हिंदू परिषद ने नवरात्र महोत्सव में गैर हिंदुओं खासकर मुस्लिमों के आने पर रोक लगा रखी है। विहिप की गुजरात ईकाई के महामंत्री रणछोड़ भाई भारवाड़ ने कहा कि नवरात्र उत्सव में गरबा के दौरान गैर हिंदू विशेषकर मुस्लिम युवकों के प्रवेश को रोकेंगे। उनका कहना है कि नवरात्र हिंदू समाज के लिए शक्ति एवं भक्ति का पर्व है जिसमें दूसरे किसी भी धर्म के लोगों को आने की जरूरत नहीं है। यदि कोई नवरात्र समारोह में आना चाहता है तो उसे हिंदू धर्म स्वीकारने के बाद ही प्रवेश दिया जाएगा। उन्होंने कहा, हम राज्यभर में सभी गैर हिंदुओं चाहे, वे मुसलमान हों या ईसाई, को गरबा स्थलों पर प्रवेश करने से परहेज करने की चेतावनी देते हैं। ऐसे हिंदू त्योहारों का मुस्लिम युवक हमारी लड़कियों को फंसाने के लिए औजार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। ऐसी पाबंदी लव जिहाद की घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी है। इसके लिए विहिप कार्यकर्ता पार्टी, सोसाइटी व अन्य स्थलों पर नजर रखेंगे तथा अन्य धर्म के युवकों को इसमें आने से रोकेंगे। इसे स्पष्ट करते हुए गुजरात विहिप के महासचिव रणछोड़ भारवाड़ ने कहा कि गैर हिंदुओं पर पाबंदी केवल रिहायशी सोसायटियों में आयोजित छोटे गरबा कार्यक्रमों में लागू होगी न कि क्लबों एवं अन्य वाणिज्यिक कार्यक्रमों में। वहीं, हिंदू रक्षा वाहिनी ने नवरात्र पर्व के दौरान गुजरात में कत्लखाने बंद रखने की मांग की है। प्रशासन व पुलिस को एक ज्ञापन सौंपकर रक्षावाहिनी ने कहा है कि हिंदुओं की आस्था के पर्व नवरात्र के दौरान गौहत्या तथा किसी भी मूक प्राणी का कत्ल नहीं होना चाहिए।

गुजरात के कच्छ जिले के मांडवी शहर में एक दक्षिणपंथी समूह ने ‘लव जिहाद’ की घटनाओं को रोकने के लिये नवरात्रि त्योहार के दौरान गरबा में मुस्लिमों का प्रवेश प्रतिबंधित करने की खातिर उसने ‘फरमान’ जारी कर रखा है। मांडवी तहसील के विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख और हिंदू युवा संगठन के अध्यक्ष रघुवीर सिंह जडेजा ने कहा, ‘मांडवी में हमने फरमान जारी कर गरबा के आयोजन में मुस्लिमों को प्रवेश नहीं देने को कहा है।’ जडेजा ने कहा, ‘गरबा में लव जिहाद होता है, जहां मुस्लिम लड़के हमारी हिंदू लड़कियों को लुभाकर शादी कर लेते हैं। हमारा एकमात्र उद्देश्य अपनी लड़कियों को बचाना है।’ उन्होंने कहा, ‘हमें लोगों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है और अगर दूसरे इलाके के लोगों ने भी अच्छी प्रतिक्रिया दी तो हम इस प्रतिबंध का विस्तार करेंगे।’ उन्होंने कहा कि उनका संगठन सुनिश्चित करेगा कि गरबा पंडाल में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति के माथे पर तिलक लगा हो और उन पर ‘गौमूत्र’ का छिड़काव किया जाए। उन्होंने कहा, ‘अगर कोई व्यक्ति तिलक नहीं लगाता है और गौमूत्र छिड़के जाने पर झिझक दिखाता है तो उसे अंदर नहीं जाने दिया जाएगा। संगठन के लोग गरबा समारोह के अंदर और बाहर गश्त करेंगे और अगर किसी गैर हिंदू को पाया तो उसे बाहर निकाल देंगे।’ यह पूछने पर कि वे गैर हिंदुओं को कैसे पहचानेंगे तो उन्होंने कहा, ‘हम इस तरह के तत्वों को पहचान सकते हैं।’

31-10-2015

इन सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का डर कोई अजूबा नहीं है। आजकल गरबों में खुले तौर पर बलात्कार, छेडख़ानी और मारपीट की वारदातें सामने आती हैं। अय्याश और आजाद दिल युवा गरबा करने के बहाने अपनी मौज-मस्ती के लिये नये साथी तलाशने आते हैं, क्योंकि कोई भी किसी के भी साथ गरबा खेल सकता है, यहां रोक-टोक और बंदिश नाम का कोई नियम नहीं है। गरबा और डांडिया खेलने के बहाने युवा पूरे नौ दिनों तक शाम के बाद घरों से निकलते हैं और सुबह में घर लौटते हैं। इन नौ दिनों में नौ साल की दोस्ती टूटकर बिखर जाती है तो वहीं इन नौ दिनों में नौ महीने पुराने दिखने वाले लोगों से दोस्ती हो जाती है। भीड़ में परिजनों के लिये अपनी संतानों लड़के-लड़कियों को तलाशना बहुत मुश्किल होता है और इसी का फायदा कई युवा लड़के-लड़कियां उठाते हैं। वो रात में किसके साथ होते हैं, क्या करते हैं? ये कोई पूछने वाला नहीं होता है। ये नशा कर के भी आते हैं। इसकी वजह से ज्यादातर महिलाएं घरों के आसपास छोटे मंदिरों के प्रांगण और सोसायटियों में ही गरबा करने को मजबूर होती हैं। अकेले गुजरात के कई इलाकों में नवरात्रि के दिनों में अचानक कंडोम और गर्भनिरोधक दवाओं की खपत बढ़ जाती है, जो इस धार्मिक त्योहार की आड़ में होने वाली अय्याशियों की भलीभांति उजागर करती हैं।

गरबा जितने बड़े पैमाने पर होता है, उसकी सुरक्षा-व्यवस्था भी उतनी महत्वपूर्ण है। जितनी की जवानी के दहलीज पर खड़े लड़के-लड़कियों को शारीरिक भूख की अंधेरी गलियों में भटकने से बचाना। गरबा में महिलाओं की सुरक्षा और उनके आने-जाने के लिए विशेष व्यवस्था के भी निर्देश जारी किए हैं। पुलिस-प्रशासन ने आयोजकों को गरबा स्थल के प्रवेश द्वारों पर हैंड मेटल और डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर लगाने के साथ ही महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग से प्रवेश द्वार की व्यवस्था करने के साथ ही अन्य कई तरह के दिशा-निर्देश दिए हैं।

नवरात्रि उल्लास और उत्साह का त्योहार है। इसमें होने वाले गरबा नृत्य हमारी पुरानी परंपरा का प्रतीक है। जिसका आयोजन बेहद खुशी की बात है, लेकिन आजकल गरबा और डांडिया के नाम पर कुछ युवा अय्याशी, प्रतिस्पर्धा और फिजूलखर्ची का जो खेल चला रहे हैं, वह तत्काल बंद होना चाहिए। गरबा होना चाहिए, लेकिन निश्चित समय और नियमों के मुताबिक। जिससे कि समाज के निचले दर्जे पर खड़ा अंतिम व्यक्ति भी इस आनंदपर्व में बराबर का भागीदार बन सके। क्योंकि, इसका व्यवसायीकरण करना और इसे पूंजीपतियों का त्योहार बनाना आम व्यक्ति को इस त्योहार का आनंद लेने की बजाय माता-पर्व के उल्लास से दूर फेंकता है। इसके साथ ही ये बात भी युवाओं और अभिभावकों को हमेशा याद रखनी चाहिए कि नृत्य चाहे कैसा भी हो, पैरों की थिरकन और संगीत के लय में मदमस्त होकर अपने भविष्य की स्वरलहरी को बे-राग और असमय बर्बाद न होने दें।

कुमार मयंक

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