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घट गर्भ दीप में झूमे जमाना

घट गर्भ दीप में झूमे जमाना

हे नाम रे सबसे बड़ा तेरा नाम, चुनरी संभाल गोरी, डोली तारो डोल, तमे रोज गरबामां आवजो रे ओ गुजराती, आधा है चंद्रमा रात आधी, के बोल क्या बजते हैं, ढोल की थाप में चनियाचोली में सजी तरूणियां और गुजराती पगड़ी, केडिय़ा पहने युवा हर किसी का मन मोह लेते हैं। तब तो बस यही सूझता है कि बंदे में है दम तो नाच दमादम और जब बोल उठते हैं- घर में पधारो गजानन जी, तो कहने ही क्या। बस आप समझ जाइए कि नवरात्र आरंभ है और जमाना गरबा में थिरक रहा है।

गरभा

लय की समझ हो और ताल से ताल मिलाना आता हो तो बस भक्ति-भाव का समागम महिषासुर मर्दिनी मां से साक्षात्कार करा सकता है। राधा-कृष्ण की लीला सजीव हो सकती है और आपको खुद एहसास नहीं होगा कि कितने घंटे, कितनी रातें घट गर्भ दीप पूजन में निकल गईं। जी हां, घट गर्भ दीप। आधुनिक भाषा में इसे गरभा और भाषा में अपभ्रंश के बाद गरबा भी कहा जाता है। डांडिया रास ने पूरे गरभा को अपने आगोश में समेट लिया है। गुजरात, राजस्थान, मालवा क्षेत्र में होने वाला ये सांस्कृतिक आयोजन अब देश के कोने-कोने में हीं नहीं बल्कि, दुनिया के कोने-कोने में अपनी अलग छटा बिखेरता नजर आने लगा है। अहमदाबाद, सूरत, बड़ोदरा से लेकर वापी होते हुए महाराष्ट्र के हृदय स्थल में उतरते जाइए। लंदन, इंस्तांबुल, वॉशिंगटन, लास वेगास, कैलीफोर्निया से होते हुए जी करे तो जापान के टोक्यो से लेकर सिंगापुर तक घूम आइए, गरभा मिलेगा। सुर, लय ताल से सजी शामें मिलेंगी। देर रात्रि तक देवी उपासना, कृष्ण की लीला, आजादी की दीवानगी से लेकर सामाजिक मुद्दों तक की जटिलता भी इसमें पिरोई जाने लगी है। थिरकते पैरों, लय की संवेदनाओं, डांडिया की ध्वनि हर अंदाज में दीवानगी, प्रेम, रास, देवी के विजय गीत की रश्मियां रंगीन रोशनी में आपको मोह लेंगी। चनियाचोली में सतरंगी से लेकर चटख रंगों में सजी युवतियां, महिलाएं, तरुणियां और हास-परिहास का भाव भंगिमा लिए गुजराती केडिय़ा में सजे युवक। रंगीली, सजीली पगड़ी, छोटा घेर, घुमेर कुर्ता पर मोर, कलश, गरभा खेलते स्त्री पुरुष के चित्र होते हैं। कठपुतली से लेकर कई भाव लिए कुर्ते पर उकेरी गई कारीगरी और इसमें सबसे मोहक नृत्य की अदाएं।

क्या है गरभा

शक्ति स्वरुपा मां दुर्गा ने महिषासुर के आतंक से देव-लोक को मुक्ति दिलाने के लिए महा संग्राम किया था। इसी महासंग्राम को गुजरात, मालवा क्षेत्र की युवतियां अपने अंदाज में याद करती हैं। इसमें छिद्र युक्त कच्चे मिट्टी के घड़े के भीतर एक सुपाड़ी, चांदी का सिक्का, नारियल और उसमें दीप रखकर तथा उसे फूल, पत्ती से सजाकर (इसे कुंभ कहते हैं) तरुणियां उसे सिर पर रखकर मां की वंदना करती हैं। इसी क्रम में यह नृत्य होता है। यह सौभाग्य का प्रतीक होता है। ऐसी मान्यता है कि इससे मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और शुंभ, निशुम्भ का नाश करने वाली मां अपने भक्तों के करीब आती हैं। यह नृत्य सौभाग्य का प्रतीक होता है। चूंकि इस महासंग्राम में सभी देवी-देवताओं ने हिस्सा लिया था। मां दुर्गा को शक्तियां दी थी। इसलिए यह वैभव, यश और कीर्ति प्रदान करने वाला माना जाता है। इसे अश्विन मास के नवरात्र में नृत्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। नवरात्र की पहली रात्रि को गरभा की स्थापना होती है। फिर उसमें चार ज्योतियां प्रज्वलित की जाती हैं। युवतियां उसके चारों तरफ ताली बजाते हुए फेरे लगाती हैं। ताली, चुटकी, डंडा, मंजीरा आदि का ताल देने के साथ नृत्य की शुरुआत होती है। जैसे-जैसे वक्त बीतता है, इसमें उत्साह, उमंग, वातावरण में नृत्य के रंग तेज होते जाते हैं। स्त्रियां दो या चार या आठ के समूह में आवर्तन करती हैं और देवी तथा कृष्णलीला के गीत गाती हैं। शाक्त शैव समाज के ये गीत गरभा और वैष्णव (राधा-कृष्ण) के वर्र्णन वाले गीत गरबा कहलाते हैं।

डांडिया

डांडिया रास एक नृत्य है। इसमें 12 इंच की रंगीन डांडिया लिए स्त्री पुरुष दो, चार, छह, आठ और सोलह ताली के ताल पर नृत्य करते हैं। पैरों के थिरकने में अनुशासन होता है और लय के साथ सजी सुर की शाम मदहोशी भरे वातावरण से सराबोर कर देती है। डांडिया रास गरभा का ही एक अंग है। गरभा में डांडिया, चुटकी, ताली, मंजीरा सब अपने-अपने अंदाज में बजता है। अब इसमें तमाम शैलियां समाहित होनी शुरू हो गई हैं।

क्या है डांडिया

देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच लड़ाई का मंचन। जहां डांडिया दुर्गा मां का तलवार है। तलवार नृत्य इसका उपनाम है। इस डांडिया के भी कई रंग हैं। इसमें कठपुतली डांडिया, मल्टीकलर थीम, लहरिया से लेकर भिन्न रुपों में है। एक और मान्यता है कि इसकी शुरुआत वृंदावन से है। 10-12 इंच की रंग-बिरंगी डंडियां। वहां से कृष्ण-राधा के रास के साथ इसका फैलाव हुआ। कहते हैं कि भगवान शिव भी डांडिया रास देखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने गोपी का रुप धारण कर वृंदावन आने की शर्त भी मान ली थी।

विस्तार

देखते-देखते गरभा न केवल गुजरात, मालवा क्षेत्र से बाहर निकला, बल्कि देश के हर कोने में फैलकर देश के बाहर तक फैल गया। धर्म की सीमाएं भी तोड़ दीं और मुस्लिम समाज ने भी इसमें रंग भरा। गीतों से लेकर कोरियोग्राफी तक को नया मुकाम दिया। बॉलीवुड की भी पूरी छाप पड़ी और ग्लोबल होता डांडिया रास अपने हर रंग को पाता गया। सिनेमा के रुपहले पर्दे से लेकर टीवी के छोटे पर्दे तक इसने अपनी पहचान बनाई। मौजूदा दौर में फाल्गुनी पाठक इसकी मशहूर गायिका हैं। उनके गाने के अंदाज पर पूरा गुजरात थिरकता है। कभी कवि दलपत राम, नाना लाल बाद में उमाशंकर के गीत नई धार डालते थे। अब आधुनिक अंदाज इसे बहुत रोचक बना देता है। गुलाम नबी भी कोरियोग्राफी के लिए व्यस्त रहने लगे। बीसवीं सदी में नूर बाई भी काफी चर्चित थी। गुजरात का मीर लांगा मुस्लिम समुदाय संगीत से जुड़ा रहा है और उसने भी गरभा को समृद्ध बनाने में सहयोग दिया।

31-10-2015

व्यवसायिक हुआ डांडिया

डांडिया कहें या गरभा समय के साथ व्यवसायिक होता गया। 1960 के दशक से ही जमाने ने इसे हाथों-हाथ लेना शुरू कर दिया। कॉरपोरेट घरानों ने भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। बड़ोदरा के हरेश मलानी कहते हैं, कि वह तीन-चार साल के थे, तब से गरभा करते आ रहे हैं। मलानी के मुताबिक काफी पहले गरभा में वैभव ने अपनी जगह बना ली थी। सत्तर के दशक से ही डांडिया और गरभा के आयोजनों में टिकट के जरिए प्रवेश की शुरुआत हो गई थी। इसका आयोजन भी पार्टी, फॉर्म हाऊसेज और क्लबों में होने लगा था। डांडिया रास का चलन विवाह, उत्सव, मांगलिक कार्य तथा बसंत पंचमी, होली, दीपावली तक पर होने लगा था। व्यवसायिकता ने यहां तक कदम बढ़ाएं कि पुरस्करों का दौर शुरू हो गया। बेस्ट को अवॉर्ड दिए जाने लगे।

कट्टरपंथ की भी छाप

कहते हैं जमाने को बुरी नजर लग जाए तो सब कुछ विकृत हो जाता है। लोगों के दिलों पर राज करने वाला गरभा और डांडिया रास इससे अछूता नहीं रहा। धर्म और भेदभाव की दीवारें तोडऩे वाले इस सांस्कृतिक आयोजन को लव जिहाद से लेकर न जाने किस-किस की नजर लग गई। समाज को तोडऩे वाली ताकतों ने प्रेम, भाव और मेल-जोल के रस से भरे इस आयोजन पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया। एक समुदाय विशेष के युवकों ने विकृत मानसिकता के साथ इसमें प्रवेश किया और तमाम लोगों की जिन्दगी को नरक में डुबो दिया। समूचे गुजरात, महाराष्ट्र में इसे शिद्दत से महसूस किया गया। कहते हैं कि व्यवसायिकता की अंधी दौड़ ने भी इसे जमकर निशाना बनाया।

अब यह भी

अब गरभा के आयोजन में सबसे बड़ी सावधानी उसमें आने वाले लोगों पर टिकी होती हैं। कौन है, कैसा है, किस तरह का है। अभिभावक से लेकर आयोजक तक इसे लेकर, जहां परेशान रहते हैं, वहीं तमाम आयोजन स्थलों पर तिलक लगाने, गोमूत्र छिड़कने की भी प्रथा चलन में आ रही है, ताकि गरबा की पवित्रता बनी रहे। यह गरभा पर पडऩे वाला सबसे विपरीत असर है। फिर भी आयोजकों को विश्वास है कि वह इससे निबट लेंगे।

मोबाइल फोन स्विच ऑफ

कहते हैं जमाने में जो भी होता है, उसका असर हर आयोजन पर पड़ता है। गरभा, डांडिया रास एक ऐसा आयोजन है जिसे रात में खेला जाता है। इस खेल में जितनी निपुणता पैर की लय, ताल की समझ, सुर के समायोजन और ताल से ताल मिलाने की होती हैं, उतनी ही आंखे, चेहरे के भाव, नर्तकों की लोच, मुद्रा इसमें रंग लाती है। ऐसे में युवक-युवतयों के एक दूसरे की तरफ आकर्षित रहने का खतरा अधिक रहता है। मुंबई में तो प्रचलति था कि नवरात्र के कुछ समय बाद गर्भपात कराने वालों की संख्या बढ़ जाती है। एड्स नियंत्रण सोसाइटी ने गरभा आयोजन स्थलों के बाहर कंडोम वेंडिंग मशीनें तक लाना शुरू कर दिया है। यहां तक कि अभिभावकों को भी बच्चों की चिंता सताने लगी तो उन्होंने जासूसों की मदद लेने से लेकर मोबाइल फोन में लोकेशन बताने वाले अप्लीकेशन डाऊनलोड करा दिए, लेकिन यह भी चर्चा आम है कि बच्चों ने घर से निकलते ही फोन को स्विच ऑफ करना शुरू कर दिया। कह सकते हैं कि भक्ति भाव के आयोजन को मनुष्य की इच्छाओं ने अपने आगोश में समेटना शुरु कर दिया है।

इस बार रहेगी सेल्फी डांडिया की धूम

सेल्फी का क्रेज है। स्मार्ट फोन ने इसमें और रंग भर दिया है। ऐसे में सजे-धजे युवकों-युवतियों में डांडिया करने के साथ सेल्फी लेने का क्रेज बढ़ रहा है। इस बार भी इसकी पूरी धूम रहेगी।

रंजना

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