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आरक्षण की बारूद में विस्फोट का इंतजार

आरक्षण की बारूद में विस्फोट का इंतजार

आरक्षण के मुद्दे पर राजस्थान में बारूद की परत दर परत बिछती जा रही है, इसमें विस्फोट कब होगा, समय इसके इंतजार में है। विपक्ष के हंगामें के चलते विधानसभा के पांच दिवसीय मॉनसून सत्र के आखिरी दिन 22 सितम्बर को आनन-फानन में गुर्जरों सहित पांच घुमंतू जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग के दायरे में 5 फीसदी तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को 14 फीसदी आरक्षण दिए जाने संबंधी दो विधेयक पारित करवाकर भाजपा की वसुंधरा सरकार ने एक बार फिर ‘आरक्षण के तालाब’ में कंकड़ नहीं बल्कि, पत्थर फेंक ‘लहरें गिनने’ का माहौल बना दिया है। वहीं गुजरात में पटेलों के लिए आरक्षण के मसले पर आनंदी बेन सरकार को झटका देकर आंदोलन को देशव्यापी बनाने की जुगत में जुटे युवा नेता हार्दिक पटेल ने दक्षिणी राजस्थान में दस्तक देने की ठान ली है। अब इसके अंजाम पर सभी की निगाहे टिकी हैं।

ललित मोदी प्रकरण में प्रतिपक्ष के निशाने पर रही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का पूरा फोकस 19 व 20 नवम्बर 2015 को जयपुर में ‘रिसर्जेन्ट राजस्थान’ के आयोजन पर है। चिडिय़ा की आंख की पुतलियों पर अर्जुन के ध्यान केन्द्रित होने की तर्ज पर समूचे शासन प्रशासन को इसके लिए जुटाया गया है। दूसरी ओर सत्ता एवं संगठन के स्तर पर चले घटनाक्रम ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पुलिस की मौजूदगी में कुख्यात गैंगस्टर आंनदपाल के नाटकीय तरीके से फरार होने और अभी तक उसकी भनक तक नहीं लगने पर कानून-व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाये हैं। नौकरशाहों के वर्चस्व को राजनीतिक संरक्षण अथवा कथित गठजोड़ ने आम जनता के सभी वर्गों को चौंकाया है। खान विभाग में घोटालों तथा घूसखोरी कांड में विभाग के मुखिया और उनकी टीम के सलाखों के पीछे होने तथा जयपुर में वर्तमान में बाजार मूल्य पर करीब 80 करोड़ की जमीन के एकल पट्टे संबंधी प्रकरण में यूडीएच के तत्कालीन वरिष्ठ नौकरशाह एवं मंत्री पर तलवार लटकने से सभी सकते में हैं। मीडिया भी इसकी चीरफाड़ में लगा हुआ है। उधर सत्तारूढ़ भाजपा में भी सब ठीक नहीं है। वसुंधरा राजे के नजदीकी पूर्व मंत्री और पिछले दिनों बीस सूत्री कार्यक्रम के नियुक्त उपाध्यक्ष डॉ. दिगम्बर सिंह के भरतपुर में आयोजित जन्म दिवस समारोह में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ की तारीफ में उनके भावी मुख्यमंत्री बनने की टिप्पणी से राजनीतिक विवाद छिड़ गया। जवाब में वसुध्ंरा राजे के करीबी, कृषि एवं पशुपालन मंत्री प्रभुला सैनी ने कहा, वसुंधरा राजे ही मुख्यमंत्री रहेंगी। यह विवाद अभी थमा ही था कि जयपुर के सांगानेर मण्डल में भाजपा के प्रशिक्षण शिविर में वसुंधरा राजे के मुखर विरोधी पूर्व मंत्री और वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवारी और उनके समर्थकों से सांसद रामचरण बोहरा के कथित समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की के मामले ने तूल पकड़ लिया। इसकी गूंज पार्टी हाईकमान तक पहुंची और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के प्रभारी ओम माथुर राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री वी. सतीश ने तिवारी से इस प्रकरण के बार में जानकारी ली। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कांग्रेस नेताओं ने भी टेलीफोन पर तिवारी का कुशलक्षेम जाना। जयपुर मेट्रो के लिए शहर परकोटे में प्राचीन रोजगारेश्वर मंदिर सहित अन्य मंदिरों को तोड़े जाने और अन्य धार्मिक स्थलों को यथावत रखे जाने की भेदभावपूर्ण नीति के विरोध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण में गठित मंदिर बचाओ संघर्ष समिति का आंदोलन तथा आठ सूत्री मांगों को शासन, प्रशासन द्वारा वार्ताओं के दौर में उलझाये रखने की मंशा को लेकर जनता में छिपा आक्रोश कब फूट पड़े, अभी कहना मुश्किल है। इस हालात में राज्य में आरक्षण की सीमा 68 फीसदी होने तथा विधानसभा में पारित दोनों विधेयकों पर उच्च न्यायालय द्वारा सरकार से जवाब तलब किए जाने से आरक्षण से लाभान्वित होने वाले वर्ग के सपनों को फिलहाल झटका लग गया है। वहीं मीना-मीणा विवाद भी सरकार के लिए गले की फांस बन गया है।

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जयपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की आरक्षण से जुड़े मुद्दे पर टिप्पणी से बवाल मच गया है। भागवत का यही कहना था कि आरक्षण की राजनीति और उसके दुरूपयोग के मद्देनजर इसकी आवश्यकता को लेकर समीक्षा की जाये और इसके लिए गठित कमेटी में राजनेताओं से अधिक समाजसेवियों का महत्व हो। उनका कहना है कि आज आरक्षण राजनीति का हथियार बन गया है और इसे लेकर प्रत्येक समाज खड़ा हो रहा है। संविधान में सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण नीति की बात है। इसलिए व्यवहार में भी वैसा ही होना चाहिए जैसा संविधानकार चाहते थे। इसी आधार पर प्रयोग होता तो आज समस्या खड़ी नहीं होती। राजस्थान के शेखावाटी अंचल सीकर में आए नामी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भी कहा कि आरक्षण से देश टूट जाएगा। उन्होंने चुनाव आयोग पर भी सवाल उठाया है, जिसने संविधान में राजनीतिक दलों का उल्लेख हुए बिना, दलों को चुनाव लड़ाने की परंपरा डाली। लोकतंत्र को बचाने के लिए उन्होंने सीकर में आंदोलन का आह्वान किया।

31-10-2015

वर्ष 2007 में राज्य के दक्षिणी भाग की करीब 45 फीसदी पंचायत समितियों में ओबीसी आरक्षण शून्य हो चुका है। आरक्षण की इस ज्वाला में आंदोलन की सुगबुगाहट होने लगी है और गुजरात से लगे इस इलाके में पाटीदार आंदोलन के अगुआ हार्दिक पटेल इसे हवा देने की फिराक में हैं। ओबीसी आरक्षण की मांग के समर्थन में इन पंचायत समितियों के क्षेत्र में आंजना डांगी, पटेल पाटीदार, गुर्जर और जाट समाज के लोग सक्रिय होने लगे हैं। भारतीय पटेल नवनिर्माण सेना के गठन के संबंध में पिछले दिनों दिल्ली में लगभग एक दर्जन राज्यों के प्रतिनिधियों की बैठक में हार्दिक पटेल ने राजस्थान की जिम्मेदारी हिम्मत सिंह गुर्जर को सौंपी। पटेल या उनके प्रतिनिधि इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए उदयपुर में बैठक आयोजित करने की तैयारी में हैं।


ओबीसी क्रीमीलेयर पर धर्मसंकट


 

भाजपा सरकार द्वारा पांच वर्ष में 5 लाख लोगों को नौकरी देने के सवाल पर बहस मुबाहिसा जारी है। भर्ती को लेकर आये दिन विरोध प्रदर्शन हो रहे है, लेकिन ओबीसी क्रीमीलेयर के मसले पर राजस्थान सरकार का आदेश केन्द्रीय नौकरियों में युवाओं के आड़े आ रहा है। पूर्ववर्ती गहलोत सरकार ने 22 दिसम्बर 2010 को क्रीमीलेयर की सीमा ढाई लाख रूपये से बढ़ाकर साढ़े चार लाख रूपये करने के आदेश जारी किए, लेकिन 17 सितम्बर 2012 को नये आदेश से यह वित्तीय सीमा पूर्ववत ढाई लाख रूपये कर दी गई और अब इसी आधार पर क्रीमीलेयर या ओबीसी के प्रमाण-पत्र जारी किये जा रहे हैं। केन्द्र सरकार के 27 मई 2013 के आदेश से क्रीमीलेयर की वित्तीय सीमा साढ़े चार लाख से बढ़ाकर छ: लाख रूपये करके इसके पालन संबंधी आदेश भी जारी कर दिये। यही नहीं नेशनल ओबीसी कमीशन ने पिछले दिनों क्रीमीलेयर की सीमा बढ़ाकर साढ़े दस लाख रूपये किये जाने की सिफारिश भी कर दी है। राजस्थान में ढाई लाख से अधिक वार्षिक आमदनी वाला ओबीसी श्रेणी का युवा सामान्य वर्ग का माना जाता है, जबकि अन्य प्रदेशों में छ: लाख रूपये वार्षिक आय पर ओबीसी श्रेणी के अभ्यार्थी को सामान्य वर्ग में माना जाता है। नतीजतन केन्द्रीय नौकरियों में राज्य के ओबीसी श्रेणी के युवा क्रीमीलेयर की न्यूनतम वित्तीय सीमा में बदलाव न होने के कारण आरक्षण का लाभ लेने से वंचित रह जाते हैं।

ओबीसी आयोग के पूर्व अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश इन्द्रसेन इसरानी का कहना है, कि उच्चतम न्यायालय का भी आदेश है कि दस वर्ष की अवधि में क्रीमीलेयर सीमा की समीक्षा की जाये और जिसने एक बार आरक्षण का लाभ ले लिया उसके परिवार की अपेक्षा दूसरे परिवार को इसका फायदा मिले। इन निर्देषों की अवहेलना पर अदालत के दरवाजे खटखटाने चाहिए। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डा.अरूण चतुर्वेदी ने इस मुद्दे पर रिव्यू करवाने का भरोसा दिलाया है।


राज्य की शैक्षिक संस्थाओं में सीटों और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों और पदों के आरक्षण के लिए विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की वेल में नारेबाजी तथा हंगामें के बीच विशेष पिछड़ा वर्ग तथा आर्थिक पिछड़ा वर्ग हेतु अलग-अलग विधेयक पारित किए गए। प्रभारी मंत्री सह गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया द्वारा शासकीय संकल्प भी प्रस्तुत किया गया। इसमें इन विधेयकों को संविधान के अनुच्छेद 31 ख के अन्तर्गत संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भारत सरकार से अनुरोध करने का आग्रह है। इन विधेयकों के पारित किए जाने से पहले पारित अधिनियम 2008 (2009 की अधिनियम संख्या 12) निरस्त हो गई। यह उल्लेखनीय है कि वसुंधरा राजे की पिछली भाजपा सरकार ने विशेष पिछड़ा वर्ग तथा आर्थिक पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लिए एक ही कानून बनाया था। विधानसभा में पारित शासकीय संकल्प के अनुसार संविधान की नौवीं अनुसूची में विशेष पिछड़ा वर्ग तथा आर्थिक पिछड़े वर्ग को आरक्षण सुविधा उपलब्ध कराना भी टेढ़ी खीर लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2007 में यह स्पष्ट कर दिया था कि 1972 के बाद से जितने भी कानून नौवींं अनुसूची में लाए गए हैं, न्यायालय उनकी समीक्षा कर सकता है।

31-10-2015

पिछले दशकों में आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक दृष्टिकोण से उठाये गये कदमों ने इसे पेचीदा बना दिया है। आज हालात यह है कि ओबीसी बनाम जाट समुदाय तथा ओबीसी बनाम अन्य का परिदृश्य बन गया है। मीना-मीणा विवाद के चलते अनुसूचित जनजाति में शामिल अन्य जातियां इस समुदाय की सम्पन्नता और लगातार अपनी घोर अपेक्षा पर मुखर हुई है। राज्य सरकार द्वारा मीना-मीणा के एक मानने पर भी इन जातियों को सख्त आपत्ति है। विडम्बना यह है कि राजनीतिक लाभ के मकसद से आरक्षण संबंधी विधेयक तो पारित करा लिए जाते है, लेकिन उन्हें लागू करवाने का रास्ता इतना आसान नहीं है। सबसे पहले तो इन विधेयकों को हर स्तर पर अदालतों में चुनौती देने की पहल की जाती है। इसलिए आरक्षण से जुड़े विभिन्न मुद्दे राज्यों में उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय के स्तर पर विचाराधीन हैं, जिनका फैसला आने में वर्षों लग जाते है। उदाहरण के तौर पर राज्य सरकार ने विशेष पिछड़ा वर्ग के लिए 5 फीसदी आरक्षण का विधेयक पारित करवाया है। पिछले गुर्जर आंदोलन के तहत इस वर्ग को 1 फीसदी का आरक्षण देने से राज्य में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी हो गई। नये दो विधेयकों के पारित किए जाने से यह सीमा बढ़कर 68 फीसदी हो गई है। अभी तमिलनाडु में 69 फीसदी तो झारखण्ड में 60, छत्तीसगढ़ में 57 और महाराष्ट्र में 52 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है। गुर्जर आरक्षण आंदोलन से जुड़े अधिवक्ता शैलेन्द्र सिंह के अनुसार संविधान में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण पर रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का भी कहना है कि विशेष परिस्थितियों में यह दिया जा सकता है। यदि सरकार आरक्षण विधेयकों के साथ पारित शासकीय संकल्प के अनुसार इसे नौवीं अनुसूची में शामिल कराने में सफल हो जाती है तो इस विधेयक को लागू कराने में कोई खास परेशानी नहीं आएगी। अलबत्ता आर्थिक आधार पर आरक्षण के मामले में संविधान में संशोधन करना होगा।


घुमंतू जातियों के हक पर सियासत


 

31-10-2015

पिछड़े वर्ग में राजस्थान की कुछ ऐसी घुमंतू जातियां भी शामिल हैं, जो समाज की मुख्यधारा से पूरी तरह कटी हुई हैं और जिनका जीवन निर्वाह पूर्णत: पशुपालन पर निर्भर है और ये अत्यंत पिछड़ी हुर्इं हैं। यह जातियां अपने निवास की अस्थाई प्रकृति और घुमंतू जीवन के कारण राजकीय योजना और आरक्षण के प्रावधान का लाभ उठाने की स्थिति में नहीं आ सकीं हैं। इन जातियों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे और राजकीय योजना का लाभ पंहुचाने के प्रयोजन से राज्य सरकार ने 7 जून 2007 को न्यायमूर्ति चोपड़ा कमेटी का गठन किया। कमेटी ने 15 दिसम्बर 2007 को दी गई अपनी रिपोर्ट में गुर्जर आदि विभिन्न घुमंतू जातियों को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने का सुझाव दिया। इन जातियों से जुड़े इलाकों में लोक कल्याण और विकास के लिए विशेष प्रयास करने की आवश्यकता पर बल दिया।

राज्य सरकार ने 2008 में राजस्थान अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, विशेष पिछड़ा वर्ग और आर्थिक पिछड़ा वर्ग अधिनियम पारित किया, लेकिन राजस्थान उच्च न्यायालय के स्थगन के कारण विशेष पिछड़े वर्ग में से 5 प्रतिशत आरक्षण अभी तक लागू नहीं हो पाया। इस कारण 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर ही 1 प्रतिशत आरक्षण वर्तमान में प्रदान किया गया। बाद में उच्च न्यायालय द्वारा 22 दिसम्बर 2010 के आदेश की पालना में मोडीफाइड डाटा उपलब्ध कराने के लिए जून 2012 में न्यायमूर्ति इसरानी आयोग का गठन किया गया। आयोग ने नवम्बर 2012 में दी सिफारिशों में पांच जातियों अर्थात बंजारा/बालदिया/लबाना, गाडिया लोहार/गोडालिया, गुर्जर, राईका/ रेबारी/ देबासी, गारडी/ गायकी, को विशेष पिछड़ा वर्ग के रूप में मान्यता देने और इस रूप में पृथक से 5 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की। इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना पर माननीय उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी। अतएव विशेष पिछड़ा वर्ग हेतु पृथक आरक्षण विधेयक लाया गया।


31-10-2015विडम्बना यह भी है कि राज्य सरकार ने आरक्षण के मुद्दे पर दोहरी नीति का रूख अपनाया है। भाजपा सरकार के पिछले 2008 के आरक्षण कानून के तहत आरक्षण सीमा 68 फीसदी होने की सूरत में पहले तो अदालत में इस कानून को वापस लेने हेतु आवेदन किया और कुछ अर्से बाद विधानसभा में दो अलग विधेयक पारित करवाकर आरक्षण सीमा पुन: 68 फीसदी करके इधर का कान उधर से पकडऩे की कहावत चरितार्थ कर दी। वहीं ओबीसी आरक्षण के मामले में उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई में अति पिछड़ों की आवाज को मुखरित नहीं हो पाने का दर्द बयां हुआ। यह पता चला कि ओबीसी की अति-पिछड़ी जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की किसी को परवाह तक नहीं है। सांसदों और विधायकों में अत्यंत पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं है, तो इस वर्ग की 76 जातियां तो जिला परिषद स्तर पर भी प्रतिनिधित्व से महरूम हैं। इसलिए खण्डपीठ ने अपने फैसले में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के स्थायी गठन के साथ जातियों के आरक्षण की समीक्षा किए जाने के आदेश पारित किए। आयोग वर्ष 1993 में जारी अधिसूचना के अनुसार इस वर्ग में जातियों को शामिल करने तथा हटाने संबंधी प्रतिवेदनों पर अध्ययन कर सरकार को सुझाव देगा। आयोग के पूर्व सदस्य सचिव सेवानिवृत्त आईएएस सत्यनारायण सिंह का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का मकसद ही पिछड़ा वर्ग की सूची में नई जातियां जोडऩे तथा सम्पन्न जातियों को हटाने के लिए सुझाव देना है। समीक्षा करना तो आयोग का कर्तव्य है। समता आंदोलन समिति के प्रदेश अध्यक्ष पाराशर नारायण शर्मा के अनुसार ओबीसी की अलग सूची की मांग को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की हुई है। राजनीति में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं होने से उनकी आवाज दबी रहती है, इसलिए सरकार को कमजोर वर्गों की प्राथमिकता से सुनवाई की पहल करनी चाहिए, लेकिन हकीकत कुछ और है। दस अगस्त को उच्च न्यायालय के दिये आदेश के पालन के लिये भी समीक्षा प्रक्रिया अब तक आगे नहीं बढ़ी है और न ही अब तक उच्चतम न्यायालय में इस आदेश को चुनौती देने की मंशा जताई गई है। यह भी गौरतलब है कि तीन साल पहले भी आयोग ने 25 पिछड़ी जातियों के बारे में विशेष अध्ययन की आवश्यकता बताई थी। अक्टूबर 2012 की रिपोर्ट के अनुसार उच्च शिक्षा में इन जातियों के विधार्थियों की संख्या 50 से भी कम पायी गई। इसी प्रकार अन्य 50 जातियों में न तो कोई अधिकारी बन सका है और इनमें भी उच्च शिक्षा पाने वालों का आंकड़ा 50 से कम रहा है। ये रिपोर्ट धक्के ही खा रही है।

उधर राज्य सरकार ने केवल विशेष पिछड़ा वर्ग के 5 फीसदी आरक्षण का विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर हेतु भिजवाया है। वहीं उच्च न्यायालय में इस मामले में दायर याचिका पर सरकार से जवाब तलब किया गया है।


मीना-मीणा पर विवाद


31-10-2015अनुसूचित जनजाति में आरक्षण के मामले में मीना- मीणा विवाद के चलते राज्य सरकार चक्रव्यूह में फंस गई है। सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री डॉ.अरूण चतुर्वेदी ने उदय इंडिया को बताया कि 1976 में केन्द्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में ‘मीना’ शब्द का उल्लेख था, लेकिन राज्य सरकार के स्तर पर तब इस मुद्दे को अनदेखा किया गया। आरटीआई के तहत इस तथ्य की पुष्टि होने पर सुरजाराम भील ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जिस पर ‘मीना’ शब्द को यथावत रखते हुए नाम परिवर्तन नहीं करने का निर्देश दिया। वहीं मीणा व मीना समाज के छात्रों के अनुसूचित जनजाति के प्रमाण-पत्र जारी करने पर अनावश्यक भ्रम उत्पन्न किया गया। चतुर्वेदी का कहना है, कि मीना व मीणा शब्द में केवल वर्तनी का अंतर है और इस बारे में मुख्य सचिव की ओर से उच्च न्यायालय जोधपुर में शपथ-पत्र पेश किया गया है। स्पष्टीकरण के लिए नौ सितम्बर को जिला कलेक्टरों को जारी दिशा निर्देशों में राजस्व रिकॉर्ड अथवा पैतृक दस्तावेजों में मीणा शब्द होने पर संबंधित प्रमाण पत्र जारी करने को कहा गया है। राज्य सरकार ने पिछले साल सितम्बर-दिसम्बर 2014 में आदेश जारी किए थे, जिन्हें मीणा समाज वापस लेने की मांग कर रहा है। इस मुद्दे पर मीणा समाज के दो धड़ों ने जयपुर में रैली करके अपनी ताकत दिखाई है। उधर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा सितम्बर-दिसम्बर 2014 के आदेश वापस लेने की प्रार्थना पत्र पर पक्षकार समता आंदोलन समिति से जवाब मांगा है। इस समिति का आरोप है, कि इस विवाद को केवल वर्तनी का मामला बताकर मीणा समुदाय को अनुसूचित जनजाति में घुसाने का प्रयास किया जा रहा है।


सामाजिक न्याय मंच ने अनारक्षित वर्ग को आरक्षण सुविधा का लाभ देने की मांग उठाई थी। इस मंच ने राजपूत, ब्राह्मणों सहित अन्य वंचित वर्गों को एक मंच पर लाने की मुहिम छेड़ी थी। कतिपय कारणों से यह जन आंदोलन ठंडे बस्ते में चला गया। राज्य में आर्थिक पिछड़ों को आरक्षण देने का विधेयक पारित होने पर इस वर्ग में आरक्षण सुविधा लेने की मांग जोर पकडऩे लगी है। विशेषकर ब्राह्मण समाज से जुड़े लोग इस दिशा में सक्रिय हो गये है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल विशेष पिछड़ा वर्ग के 5 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था लागू करने पर है। यह कब मूर्तरूप लेगा और विशेषकर गुर्जर समुदाय कितना धैर्य रख पाएगा? यही होगी अग्निपरीक्षा।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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