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भारतीयों के खान-पान के प्रति संवेदनशीलता दिखाएं

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दादरी में हाल में जो हुआ, वह देश में स्थानीय स्तर पर समय-समय पर घटने वाली घटनाओं का ही एक रूप है। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसी घटनाएं हमारे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में एक दु:खद आयाम जोड़ देती हैं। ये घटनाएं सांप्रदायिक भावनाओं से उपजी अनिवार्य तौर पर कानून-व्यवस्था की समस्याएं हैं। इन्हीं भावनाओं की वजह से देश का बंटवारा हुआ, जो भयावह मानवीय त्रासदी की तरह था। इन भावनाओं की आग में घी डालने का काम करने वाली वजहें भी जानी-पहचानी हैं। मसलन, ‘किसी हिंदू लड़के-मुस्लिम लड़की’ या ‘मुस्लिम लड़के-हिंदू लड़की’ का मामला हो या फिर धार्मिक जुलूस, बीफ या पोर्क जैसी खान-पान की आदतें वगैरह।

सांप्रदायिक भावनाओं में तेजी आने से कानून-व्यवस्था काबू में रखने की समस्या पैदा होती है। इससे सामाजिक और सुरक्षा व्यवस्था, दोनों ही स्तरों पर निपटा जाना चाहिए। यह हमारी मौजूदा संघीय संस्कृति की एक दु:खद असलियत है कि राज्य ‘विकास’ की अपनी उपलब्धियों का बखान तो बढ़-चढ़कर करते हैं, लेकिन हिंसक घटनाओं या दंगों की कभी जिम्मेदारी नहीं लेते, जबकि कानून-व्यवस्था राज्य का मामला है। हकीकत यह भी है कि लगभग सभी दलों की राज्य सरकारें सीधे थानेदार के स्तर तक पुलिस तंत्र का प्रबंधन करती रही हैं। कमोबेेश पूरे पुलिस तंत्र का राजनीतिकरण होता रहा है। कानून-व्यवस्था के तंत्र को ऐसा गैर-पेशेवर बना दिया गया है कि समूची पुलिस व्यवस्था वीआईपी रक्षा तंत्र में तब्दील हो गई है।

दादरी में पुलिस की प्रतिक्रिया धीमी रही, जिससे जानबूझकर उदासीनता बरतने का संदेह होता है। संदेह यह भी है कि ‘सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील’ इलाकों के लिये दंगों से निपटने की कोई मानक व्यवस्था ही कायम नहीं की गई है।

सांप्रदायिक बहस को सकारात्मक दिशा में मोडऩे की जिम्मेदारी राजनीतिज्ञों और सिविल सोसायटी की है। नेता भीड़ जुटाने में तो माहिर होते हैं, लेकिन उसकी भावनाओं पर काबू करने का साहस नहीं दिखा पाते। भीड़ की भावनाओं पर काबू पाने के लिये चरित्र और शख्सियत की ताकत की दरकार होती है। यह लेखक ‘मोदीभक्त’ होने की तोहमत उठाने की कीमत पर भी यह कहना चाहता है कि वह पटना में 2013 की रैली में प्रधानमंत्री (तब गुजरात के मुख्यमंत्री) की समझदारी और ‘शख्सियत की ताकत’ का गवाह बना। हर पांच मिनट में जब बम फटने लगे तो भारी भीड़ बेकाबू हो सकती थी और भगदड़ मच सकती थी, जिससे बड़ा हादसा हो सकता था। लेकिन, प्रधानमंत्री के शब्दों का जादू ऐसा था कि उन्होंने इसे सकरात्मक मोड़ दे दिया। हालांकि दादरी की हाल ही की घटना के दौरान राजनैतिक वर्ग उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाया।

कई सुर्खियों की ख्वाहिश रखने वाले, स्वयंभू सेलेब्रिटी और सनकी बुद्धिजीवियों ने खलनायक की भूमिका ही अदा की। एक रिटायर जज, एक तथाकथित लेखक और एक पत्रकार ने इस मौके पर यह कहकर सांप्रदायिक माहौल को गरम कर दिया कि वे ‘बीफ खाते’ हैं। भले बीफ खाना किसी की व्यक्तिगत पसंद का मामला हो, मगर इन तथाकथित सेलेब्रिटी और बुद्धिजीवियों के आचरण और नैतिकता से तो तौबा ही किया जाना चाहिए।

31-10-2015

एक और तथाकथित बुद्धिजीवी, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डी.एन. झा ने 7 अक्टूबर 2015 को इंडियन एक्सप्रेस में लिखा, ”वैदिक काल में पशुओं की बलि प्रथा काफी प्रचलित थी और उनका मांस खाया जाता था। ऋगवेद में देवताओं खासकर इंद्र को खुश करने के लिए बैल सहित पशुओं के मांस चढ़ाने का जिक्र है। अधिकांश वैदिक यज्ञों में पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी और उनके मांस का सेवन किया जाता था।’’ इस तरह झा ने भी दादरी की सांप्रदायिक हिंसा से उभरी ‘बीफ बहस’ में अपना योगदान करने                                                                                                                                                                   की कोशिश की। इससे एक खास पैटर्न का संदेह होता है। किसी को भी यह लग सकता है कि पूरे घटनाक्रम के पीछे किसी अदृश्य ताकत का हाथ है। यहां यह जिक्र किया जा सकता है कि भारत से गैर-कानूनी बीफ निर्यात कई देशों के भोजन के लिए बेहद जरूरी है।

डी.एन. झा अपनी दलील के पक्ष में वेदों या उपनिषदों से कोई उदाहरण नहीं देते। इतिहास के तथाकथित जानकारों का यह तरीका बेहद आम है।

अरुण शौरी अपनी किताब ‘एमिनेंट हिस्टोरियंस’ में बीफ विवाद पर लिखते हैं :

31-10-2015”1988 में जून के आखिर और जुलाई के शुरू में यह विवाद ‘तार्किक’ बनाम ‘राष्ट्रीय’ के रूप में शुरू हुआ, लेकिन इन प्रमुख इतिहासकारों के फरेब से चरम पर पहुंच गया। हर अखबार इसी विवाद से रंग उठा। जी न्यूज पर ‘आपकी अदालत, आप का फैसला’ जैसे कार्यक्रम चलाने वाले मनोज रघुवंशी ने इनमें एक प्रमुख (तथाकथित इतिहासकार) के.एम. श्रीमाली और मुझे इस विषय पर चर्चा के लिए बुलाया। श्रीमाली ने कहा कि प्राचीन भारत में बीफ खाया जाता था और ये लोग तथ्य छुपा रहे हैं। मैं इस आरोप को कभी समझ नहीं पाया।

”मान लीजिए कि 5,000 साल पहले बीफ खाया जाता था तो कोई इस तथ्य को क्यों छुपाना चाहेगा? और इससे यह कैसे झुठलाया जा सकता है कि आज हिंदू लोग गाय की पूजा करते हैं? दुनिया भर में कई कबायली समूह नरभक्षी रहे हैं, लेकिन आज वे ऐसे नहीं हैं। क्या इसका यह मतलब है कि नरभक्षण से उनकी विरक्ति कोई कम महत्वपूर्ण तथ्य है?’’

”कुरान में कुर्बानी के लिये यह नहीं कहा गया है कि गाय की कुर्बानी करें। भारत के उलेमाओं ने कोई हदीस निकालने की काफी कोशिश की कि पैगंबर ने कहीं तो गाय की कुर्बानी का जिक्र किया हो, लेकिन उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला।’’ इसलिए दोनों समुदायों की मान्यताओं को एक सह-अस्तित्व के मुकाम पर ले जाने में थोड़ी-सी भी मुश्किल नहीं है।

”फिर, रघुवंशी ने पूछा कि इसका (बीफ सेवन का) सबूत क्या है? किस वेद में, किस श्लोक में ऐसा कहा गया है? श्रीमाली ने कहा कि मैं किताब लेकर नहीं आया हूं, लेकिन अनेक सबूत मिल जाते हैं। रघुवंशी ने कहा कि कोई एक भी उदहारण तो दे दीजिए। श्रीमाली एक भी ऐसा कोई उदाहरण नहीं बता सके। श्रोताओं में से एक व्यक्ति उठा और कहा कि ये हैं चारों वेद, इनमें से एक में सेभी उदाहरण बता दीजिए, जो आपके कहे को सही साबित करता हो। रघुवंशी ने उस व्यक्ति से चारों वेद लिए और श्रीमाली के सामने ले गए। श्रीमाली ने उन्हें देखने से भी इनकार कर दिया।’’

”रघुवंशी तब अपनी मेज पर गए और वेद से ऐसे उदाहरण पढऩे लगे जिनमें गौमांस खाने का निषेध किया गया था।’’

”मेरे कहने पर उन्होंने श्रीमाली से खुद उन श्लोकों को पढऩे को कहा। श्रीमाली ने इनकार कर दिया और नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि मुझे कोई श्लोक याद नहीं आ रहा है तो उससे क्या? रघुवंशी ने कहा कि आप प्राचीन भारत पर कोई विशेषज्ञ भी तो नहीं हैं?’’

08-11_Page_2धार्मिक भावनाओं के अलावा भी दूध देने वाली और कृषि उपज में मददगार पशुओं को हमेशा कीमती माना जाता रहा है और उनका सम्मान किया जाता रहा है। इसी भावना के साथ 1950 में पश्चिम बंगाल में पशुवध केंद्रीय कानून पास किया गया। इसका मकसद ”दूध की आपूर्ति बढ़ाने के लिये कुछ खास पशुओं के वध पर अंकुश लगाना और कृषि के विकास के लिए जरूरी पशु ताकत की बर्बादी को रोकना है। इस कानून के तहत बैल, गाय, बछड़ा, बछिया, भैंस वगैरह सूचीबद्ध हैं।’’ इस कानून पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”मुगल बादशाह बाबर ने धार्मिक भावनाओं का ख्याल करके गायों के वध पर पाबंदी लगाने की समझदारी दिखाई और अपने बेटे हुमायूं से उसका पालन करने को कहा। इसी तरह कहा जाता है कि अकबर, जहांगीर और अहमद शाह ने गौवध पर पाबंदी जारी रखी।’’

ये तथाकथित बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट भी यकीनन फैशन में आकर ही अपने पालतू पशुओं और पर्यावरण से प्यार का इजहार करते हैं। पर्यावरण पर संजीदा नजर रखने वाले ब्रिटेन के प्रिंस चाल्र्स के मुताबिक, ”औद्योगिक तरीके से उत्पादित बीफ के एक पाउंड में करीब 2000 गैलन पानी लगता है। इतने पानी के खपत को हमारी धरती नहीं झेल सकती, इसके पर्याप्त प्रमाण हैं।’’ यहां यह जिक्र किया जा सकता हैं कि पोर्क के प्रति पाउंड में 576 गैलन और चिकन में 486 गैलन, सोयाबीन में 286 गैलन, गेहूं में 138 गैलन और मक्के में 108 गैलन पानी की खपत होती है।

महात्मा गांधी की गौवध बंदी की कठोर प्रतिबद्धता को संविधान में जगह मिली। अनुच्छेद 48 के चौथे हिस्से में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में कहा गया है कि ”दूध देने वाली और बिसुकी गायों, बछड़ों के वध पर प्रतिबंध और उनकी प्रजातियों की रक्षा करने के लिए राज्य को कदम उठाने होंगे।’’ 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को गौवध बंदी के लिए चिट्ठी लिखी थी।

ऐतिहासिक रूप से गाय भारतीय राष्ट्रवाद के केंद्र में रही है, इसलिए इसे लेकर धार्मिक और भावनात्मक भावनाएं प्रबल रही हैं। अगर इस पर संवेदनशीलता नहीं बरती गई तो कानून-व्यवस्था या सांप्रदायिक दंगों की समस्या खड़ी हो सकती है।

सुरक्षा तंत्र और हमारे सैन्यबल में गाय पर संवेदनशीलता का गहरा असर रहा है। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की आखिरी चिंगारी धर्म की रक्षा ही साबित हुई थी, क्योंकि अंग्रेजों ने जो कारतूस मुहैया कराए थे, उनमें कथित तौर पर गाय की चर्बी लगी हुई थी। मुसलमानों ने भी विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें भी यकीन हो गया कि कारतूस में सूअर की चर्बी लगी है।

भारतीय सेना के ज्यादातर रेजिमेंटों में भोजन की धार्मिक पवित्रता बहुत महत्वपूर्ण मसला रही है। कई बटालियनों में कुछ खास मौकों और हफ्ते में खास दिन मांस का सेवन नहीं होता। फौजी अधिकारी भी बाकी जवानों की भावनाओं का कद्र करते हैं।

31-10-2015

यहां यह भी जिक्र किया जा सकता है कि भारत में बीफ का सेवन ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज फौजियों की जरूरतों का ख्याल रखकर शुरू किया गया था। उसके पहले हिंदू या मुसलमान कोई भी भारतीय गौवध नहीं करता था। अंग्रेजों ने अपने फौजी ठिकानों के पास कसाईखानों का निर्माण कराया, इसलिए इन तथाकथित बौद्धिकों को यह बात समझनी चाहिए। वे जिस अंग्रेजी भाषा में अपनी बौद्धिकता झाड़ते हैं, उसमें भी कई लेखकों ने इस संवेदनशीलता का ध्यान रखा है। एडमंड कैंडलियर अपनी किताब ‘सिपॉय’ में लिखते हैं, ”मैं एक राजपूत रेजिमेंट को जानता हूं जिसमें मेस व्यवस्था शुरू करने में दस साल लग गए। पहले कंपनी के बर्तन स्वीकार किए गए, लेकिन उन बर्तनों में हरेक बार-बारी से अपना भोजन बनाया करता था। ब्राह्मण और भी पवित्रता रखते थे। मुझे एसिन के मोर्चे पर एक रेजिमेंट के किस्से याद हैं, उनकी भोजन बनाने की प्रथा के कारण वह बड़े इलाके में फैले हुए थे। हर आदमी अपना भोजन बनाया करता था और कोई तुर्क उस बटालियन का ब्रिगेड कमान संभाला करता था।’’

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक जाट कंपनी ने भोजन करने से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि एक अंग्रेज ऑफिसर ने उसे छू दिया था। भारतीय सेना में भोजन को लेकर धार्मिक संवेदनशीलता का भी ख्याल रखा जाता था। ज्यादातर राज्यों के पुलिस बल में भी इसका ख्याल रखा जाता है।

इसलिए ऐसे तथाकथित बौद्धिकों को असंवेदनशील बयानों से बाज आना चाहिए और अपने समाज के प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। वरना सांप्रदायिक विद्वेष हमारे सुरक्षा तंत्र में भी प्रवेश कर जाएगा।

आरएसएन सिंह

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