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मोदी को राजनीति सिखाएगा बिहार?

मोदी को राजनीति सिखाएगा बिहार?

बिहार विधानसभा का यह चुनाव अब ऐसे मुकाम की ओर बढ़ते दिख रहा है, जो तकरीबन डेढ़ साल पहले भारी बहुमत और सपनों के सहारे केंद्र में सत्तारूढ़ हुए भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के लिये किसी आश्चर्य से कम नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव के समय और उसके कुछ समय बाद तक भी देश और बिहार के लिए सकारात्मक सोच वाले उम्मीदों की किरण के रूप में उभरे। बिहार में अथक और सघन चुनाव अभियान में न सिर्फ भाजपा ने बल्कि केंद्र सरकार ने भी पूरी ताकत झोंक दी। फिर भी पहले चरण के मतदान के बाद संकेत यही मिल रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और कभी उनके परम मित्र और फिर कट्टर राजनीतिक दुश्मन रहे पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस का महागठबंधन निर्णायक रूप से भारी पड़ते दिख रहा है। हालांकि क्रिकेट की तरह चुनावी राजनीति में भी नतीजे से पहले किसी भी तरह की भविष्यवाणी बेमानी ही लगती है। किसी भी क्षण कोई मुद्दा मतदाताओं के रुझान को बदल सकता है। इस काम में प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ उनकी पूरी टीम लगी है। केंद्र सरकार के हिंदी भाषी क्षेत्रों के तमाम मंत्री, बड़े नेता, सांसद, दो तीन मुख्यमंत्री लगातार बिहार के किसी न किसी इलाके में लगातार डेरा डाले हुए हैं। इसका कारण यह भी हो सकता है कि यह चुनाव देश के राजनीतिक भविष्य की दिशा और खासतौर से पार्टी और सरकार में भी मोदी और शाह की जोड़ी की राजनीतिक हैसियत तय कर सकता है। शायद इसलिए भी बिहार में एनडीए की ओर से किसी को भावी मुख्यमंत्री नहीं घोषित करने वाली भाजपा ने अपना पूरा चुनाव अभियान मोदी और शाह को ही केंद्र में रखकर चलाया है। सच तो यह भी है कि राज्य विधानसभा का यह चुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बनाम प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक लड़ाई के रूप में बदल चुका है।

चुनावी नतीजे चाहे जो भी हों, लेकिन इस बार भाजपा और इसे संचालित करने वाले संघ की रणनीति ही इसके चुनावी मकसद पर कुछ भारी पड़ती दिख रही है। चुनाव प्रक्रिया शुरु होने से पहले ही बिहार का सवर्ण मतदाता आमतौर पर भाजपा गठबंधन के साथ हो चला था। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकास कार्यों, उनकी ‘सुशासन बाबू’ की छवि के बावजूद लालू प्रसाद यादव के साथ उनके हाथ मिलाने के कारण राज्य में सवर्णों के बीच उनके प्रति नाराजगी और अलगाव में कुछ और वृद्धि हुई, लेकिन चुनाव प्रक्रिया शुरु होने से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए पर सवाल उठा देने वाली टिप्पणी ने उन्हें इसे बिहारी अस्मिता और स्वाभिमान के साथ जोड़कर आक्रामक होने का राजनीतिक हथियार थमा दिया। इसी तरह बिहार के लिए विशेष आर्थिक पैकेज पर प्रधानमंत्री मोदी के बयान को उनके विरोधियों ने जमकर भुनाया। आमतौर पर भाजपा की चुनावी रणनीति और इसकी जीत में भी निर्णायक भूमिका में रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता और प्रचारक इस बार भी भाजपा गठबंधन के पक्ष में जी जान से जुटे लग रहे हैं, लेकिन संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के आरक्षण की व्यवस्था पर पुनर्विचार और उसका आधार बदलने की वकालत वाले बयान ने लालू प्रसाद यादव के तथाकथित ‘जंगलराज’ और चारा घोटाले में उनके सजायाफ्ता होने के कारण थोड़ा सहमे और बैकफुट पर लग रहे नीतीश और लालू की जोड़ी के हाथ में जैसे राजनीतिक ब्रह्मास्त्र थमा दिया। पता नहीं कि भागवत ने चुनाव से पहले इस तरह का विवादित बयान किस सोच और रणनीति के तहत दिया, लेकिन उनके इस एक बयान से उत्साहित लालू और नीतीश पूरी तरह से इस चुनाव को अगड़ा बनाम पिछड़ा बनाने और मंडलराज के दूसरे चरण की ओर घुमाने में जुट गए। मजेदार बात तो यह रही कि इस विवाद का राजनीतिक लाभ भाजपा के विरोधियों को मिलता देखने के बाद भी भागवत इस मामले में चुप नहीं हुए बल्कि दोबारा उन्होंने अपनी पुरानी बात ही दोहराई। बाद में भाजपा और इसके सहयोगी दलों के टिकट वितरण और प्रधानमंत्री समेत इसके नेताओं के भाषण भी कदाचित लालू-नीतीश की इस चुनावी रणनीति में सहायक ही साबित हुए।

31-10-2015एक तरफ बिहार की आबादी में तकरीबन 13-14 फीसदी सवर्णों को 40 फीसदी से अधिक सीटों पर उम्मीदवार बनाकर भाजपा गठबंधन ने यह संदेश दिया कि यह सवर्णों की पार्टी और गठबंधन है और दूसरी तरफ भ्रष्ट, अपराधी, नेताओं के बेटे, भतीजों, दामाद और रिश्तेदारों को टिकट दिया। इससे लालू प्रसाद यादव के ऊपर लगने वाले परिवारवाद, जंगलराज, और भ्रष्टाचार के विरुद्ध राजनीतिक अभियान को उसने खुद ही भोथरा बना दिया। इस गठबंधन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि लालू प्रसाद यादव को चारा चोर कहने वाले इस गठबंधन के साथ इसी चारा घोटाले में सजा पा चुके राज्य के एक और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.जगन्नाथ मिश्र और पूर्व सांसद जगदीश शर्मा जैसे नेता किस हैसियत से और क्यों खड़े हैं और इनके पुत्रों नीतीश मिश्र और राहुल शर्मा को भाजपा का उम्मीदवार क्यों बनाया गया?

इसी तरह से लालू यादव के ‘जंगलराज’ के खिलाफ बोलने वाले इस गठबंधन ने सिवान जिले के रघुनाथपुर में जेपी आंदोलन से निकले निवर्तमान विधायक विक्रम कुंवर का टिकट काटकर ‘जंगलराज’ के प्रतीकों में से एक, माफिया डॉन मोहम्मद शहाबुद्दीन के शूटर कहे जाने वाले मनोज सिंह को क्यों थमा दिया? इसके साथ ही जंगलराज के एक और प्रतीक पप्पू यादव को केंद्र सरकार ने जेड प्लस सुरक्षा प्रदान की और उनके तथा साधू यादव के राजनीतिक दलों और मोर्चे को भाजपा द्वारा ही प्रायोजित होने की बात पूरे बिहार में फैल गयी। इसी तरह से इस गठबंधन ने एक और माफिया छवि वाले पूर्व सांसद सूरजभान के कई रिश्तेदारों को उम्मीदवार बनाया, जबकि एक और कुख्यात विश्वेश्वर ओझा को शाहपुर से उम्मीदवार बना दिया, जबकि पिछले चुनाव में लोकलाज के कारण भाजपा ने उनकी भावज को टिकट दिया था जो विधायक बनीं। इस तरह के कई और नाम मिल जाएंगे, जो ‘जंगलराज’ के विरुद्ध भाजपा के चुनाव अभियान को भोथरा बनाने में कारगर साबित हो रहे हैं।

कांग्रेस और लालू प्रसाद के परिवारवाद पर निशाना साधने वाली भाजपा और इसके सहयोगी इस मामले में भी उन पर इक्कीस ही साबित हुए। लालू प्रसाद ने तो अपने दोनों बेटों को उम्मीदवार बनाया, लेकिन भाई रामचंद्र पासवान और पुत्र चिराग पासवान को सांसद बनवाने वाले केंद्रीय मंत्री रामविलास पासावन ने तो इस चुनाव में भी अपने एक और भाई पशुपति पारस, भतीजे प्रिंस राज और दोनों दामादों के साथ ही कुछ और रिश्तेदारों को भी चुनाव मैदान में उतार दिया। उनकी पार्टी के सांसदों ने भी अपने बेटे रिश्तेदारों को टिकट दिलवाया। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपने पुत्र को टिकट दिया और खुद दो जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं तो उनकी पार्टी के नेता नरेन्द्र सिंह अपने दोनों विधायक पुत्रों को एक बार फिर विधायक बनवाने में जुटे हैं। खुद विधान पार्षद नरेन्द्र सिंह के एक पुत्र एनडीए के उम्मीदवार हैं तो दूसरे निर्दलीय चुनाव लड़ गए। इसी तरह से केंद्र सरकार में मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा में भी जमकर भाई-भतीजावाद चला, लेकिन, भाजपा भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं रही। सबसे मजेदार तो यह रहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने जिस मंच से लालू और कांग्रेस के वंशवाद पर निशाना साधते हुए, जिस उम्मीदवार के लिए वोट मांगा, वह उनकी पार्टी अथवा उनके गठबंधन सहयोगी के बेटे अथवा निकट संबंधी ही थे। भाजपा ने बिहार में जनसंघ और भाजपा के पितामह कहे जाने वाले स्व. कैलाशपति मिश्र की बहू का टिकट काटकर पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर को दे दिया। भागलपुर में बक्सर से सांसद अश्विनी चौबे ने अपने पुत्र अरिजित शाश्वत को टिकट दिलवा दिया। विरोध में भाजपा के ही विजय शाह बागी हो गए। दूसरी तरफ भाजपा के कद्दावर और कई चुनावों में लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार को शिकस्त देने वाले भाजपा सांसद छेदी पासवान ने अपने बेटे रवि पासावन के लिए टिकट मांगा तो मना कर दिया गया। नतीजतन उनके पुत्र निर्दलीय चुनाव लड़ गए। इस तरह के तमाम प्रसंग मिल जाएंगे, जिन्होंने बिहार के मतदाताओं के बीच भाजपा और उसके गठबंधन सहयोगियों के बारे में यह धारणा बनाई कि ये लोग लालू प्रसाद से किसी मायने में कम नहीं हैं। दूसरी तरफ नीतीश कुमार ने अपने करीबी रहे बाहुबली विधायक अनंत सिंह को हत्या के एक मामले में गिरफ्तार करवाया और यह संदेश देने की कोशिश की कि अपराधियों के मामले में वह अपने और पराए का फर्क नहीं करते। अनंत सिंह की गिरफ्तारी के विरोध में रालोसपा के प्रदेश अध्यक्ष सांसद अरुण कुमार द्वारा भाजपा मुख्यालय में बैठकर यह कहना कि ”हम चूडिय़ां पहनकर नहीं बैठे हैं, मुख्यमंत्री का सीना फाड़ देंगे’’। इलाके के दलित और पिछड़ों को भाजपा गठबंधन से कुछ और दूर करने में सहायक ही साबित हुआ।

31-10-2015

इस बार ऐतिहासिक तौर पर प्रखंड मुख्यालयों तक भी जाकर तकरीबन तीन दर्जन बड़ी चुनावी रैलियां करने वाले प्रधानमंत्री की भाषण कला, उनके जुमले और झटके भी इस बार उतने कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। कई जगहों पर तो उनके भाषणों से लगा कि उसके लिए ठीक से होमवर्क नहीं किया गया है। अपनी तमाम सभाओं में वह गांवों में बिजली पहुंचाने के नीतीश कुमार के पिछले चुनावी आश्वासन को सामने रखकर चीख-चीख कर पूछते हैं कि ”भाइयों-बहनों बिजली आई, बिजली आई?’’ जवाब में कुछ परंपरागत समर्थक और प्राय: उनकी सभी रैलियों में ‘मोदी’ के समवेत स्वर गूंजाने वाले तालियां बजाते हैं, लेकिन आम लोग इस पर हंसते हैं। अब प्रधानमंत्रीजी को कौन बताए कि बिहार के अधिकतर ग्रामीण इलाकों में 20-22 घंटों तक बिजली रहती है। उनके द्वारा, ”बिहार के लिए एक लाख करोड़ रुपये का पैकेज इस मुख्यमंत्री को कैसे दे दूं’’ जैसे जुमलों का भी प्रतिकूल असर ही पड़ता दिख रहा है। बिहार में चाहे आप उनसे सहमत हों अथवा असहमत, उन्हें वोट दें अथवा नहीं, लेकिन नब्बे फीसदी लोगों के मन में नीतीश कुमार की छवि खराब नहीं बल्कि बेदाग छवि वाले कुशल प्रशासक की बन गई है। राज्य के ग्रामीण इलाकों को जोडऩे वाली सड़कें और घंटों की अबाधित बिजली की आपूर्ति, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, अति पिछड़ों, और दलितों-महादलितों के बीच सुरक्षा का भाव तथा उन्हें विभिन्न स्तरों पर दिए गए आरक्षण के चलते उनकी एक सकारात्मक छवि बनी है। शायद इसलिए भी प्रधानमंत्री के द्वारा उनके खिलाफ की जाने वाली इस तरह की नकारात्मक टिप्पणियों से अपेक्षित राजनीतिक और चुनावी डिविडेंड मिलते नहीं दिख रहा है। अब 12 अक्टूबर को जिस दिन पहले चरण का मतदान हो रहा था, प्रधानमंत्री ने जहानाबाद की एक बड़ी रैली में पुराने कांग्रेसी और बाद में शोषित दल के नाम से इलाके के भू-सामंतों के खिलाफ दलितों और पिछड़ों को लामबंद कर सामाजिक और राजनीतिक अभियान चलाने वाले स्व.जगदेव प्रसाद की 1974 में हुई हत्या का जिक्र किया। जगदेव बाबू के नाम से पहचाने जाने वाले इस पिछड़े समाज के नेता की हत्या पुलिस ने उस समय की थी, जब वह कुर्था थाने के पास तकरीबन 20 हजार दलित, पिछड़े खेत-मजदूरों के प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे। उनके बेटे पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि इस समय अलग दल बनाकर मुलायम सिंह यादव और पप्पू यादव के मोर्चे में शामिल हैं। यह महज संयोग नहीं है कि जगदेव प्रसाद की हत्या करवाने का आरोप जिन नेताओं और जाति के लोगों पर लगा था, उनके करीबी लोग मोदीजी के साथ मंच पर बिराजमान थे। जब मोदीजी पूछ रहे थे कि जगदेव बाबू की हत्या किसने की और करवाई तो मंच पर बैठे भाजपा गठबंधन के भूमिहार नेता और जगदेव प्रसाद के सजातीय कुशवाहा नेता एक दूसरे की ओर देख रहे थे।

इस चुनाव में मतदाताओं को लैपटॉप, स्कूटी, टीवी सेट, और धोती-साड़ी देने जैसे चुनावी प्रलोभन भी भाजपा गठबंधन के लिए खास कारगर साबित नहीं हो रहे। क्योंकि, लोकसभा चुनाव के समय मोदीजी और भाजपा के नेताओं के अच्छे दिन लाने और विदेश में जमा अकूत काला धन स्वदेश लाकर प्रत्येक भारतीय के खाते में जमा कराने जैसे वादों को और किसी के द्वारा नहीं, बल्कि भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के द्वारा चुनावी जुमला करार देने जैसे बयानों के कारण लोग भाजपा के नए आश्वासनों पर सहज एतबार करने की स्थिति में नजर नहीं आ रहे। प्याज और दाल के आसमान छूते दाम और उस पर घाव पर नमक रगडऩे जैसे बयान भी राजग पर भारी पड़ रहे हैं। पता नहीं इसके पीछे भाजपा का हाथ अथवा इसकी चुनावी रणनीति है कि नहीं, लेकिन मुलायम सिंह यादव, पप्पू यादव और तारिक अनवार के तीसरे मोर्चे के सदल बल, पूरी ताकत से चुनाव लडऩे और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के बिहार में आकर चुनाव लडऩे और उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी के जहरीले भाषणों को भी भाजपा द्वारा प्रायोजित ‘वोट कटवा’ रणनीति का ही अंग मानकर देखा जा रहा है। चुनाव से पहले बिहार में भाजपा की लहर देखने वाले मुलायम सिंह यादव के बयान भी इस राजनीति अथवा रणनीति को ‘एक्सपोज’ करने में सहायक सिद्ध हो रही है।

इन सबके बावजूद बिहार में भाजपा और इसके गठबंधन सहयोगियों का एक मजबूत और ठोस जनाधार है। कुछेक क्षेत्रों में अपवादों को छोड़कर सवर्ण तकरीबन पूरी तरह से उनके साथ हैं। इसके साथ ही पिछड़े हों अथवा अगड़े वैश्य समाज का बड़े पैमाने पर भाजपा गठबंधन को ही समर्थन दिख रहा है। कोइरी, कुशवाहा समाज का बड़ा हिस्सा इसी गठबंधन के पक्ष में जा सकता है। अति पिछड़ों का भी एक हिस्सा और दलितों में पासवान, और महा-दलितों में मुसहर बड़े पैमाने पर राजग के साथ जा सकते हैं। लालू नीतीश की जोड़ी राजग के साथ गए पिछड़े, अति पिछड़े, दलितों और महादलितों के बीच आरक्षण की कसौटी पर फिर से लामबंद करने की कवायद में जुटे हैं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि प्रधानमंत्री और उनके सिपहसालार अमित शाह किसी भी सूरत में बिहार को हारना नहीं चाहेंगे। इसके लिए वह कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेंगे। हालांकि, उन्होंने दिल्ली विधानसभा के चुनाव जीतने में भी कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी थी, लेकिन इसके बावजूद उनकी पार्टी वहां 70 सदस्यों की विधानसभा में महज तीन विधायकों की संख्या पर सिमट गई। इसलिए भी यह जोड़ी बिहार की राजनीतिक सत्ता को किसी भी कीमत पर गंवाने का जोखिम मोल लेना कतई नहीं चाहेगी। लेकिन, अगर बिहार में भी दिल्ली की ही पुनरावृति होती है तो इसके लिए उनके विरोधियों से अधिक अपने, उनकी रणनीति और मौके-बेमौके उनके आत्मघाती साबित होने वाले बयान ही ज्यादा जिम्मेदार कहे जाएंगे।

पटना से जयशंकर

 

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