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चुनाव लाएंगे धरती पर स्वर्ग

चुनाव लाएंगे धरती पर स्वर्ग

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: यहां चुनाव क्या आया है, लगता है यहां तो जनतंत्र ही जनतंत्र है और कुछ नहीं।

पिता: बेटा, चुनाव की तो महिमा ही यही है। जनतंत्र लाने के लिये ही तो चुनाव होते हैं। इसी से तो जनतंत्र मजबूत होता है।

बेटा: पिताजी, आज मतदाता का इतना सम्मान हो रहा है कि हम फूले नहीं समा रहे हैं। ऐसा लगता है कि मतदाता ही इस देश और जनतंत्र का मालिक है। नेता तो बस जनता के सेवक हैं तुच्छ से।

पिता: बेटा, यही तो सच्चा लोकतंत्र है। हमारे राजनेता ही तो इसे जीवित कर रहे हैं। ये सब जनतंत्र की ही तो कमाई खा रहे हैं। उनके पास अपना क्या है? सब जनतंत्र की ही तो देन है।

बेटा: आपकी बात ठीक लग रही है, पिताजी।

पिता: बेटा, तेरे को याद है कि पिछले चुनाव के बाद ईश्वर को मिलना आसान था पर हमारे प्रतिनिधियों का मिलना मुश्किल। उनसे तो फोन पर बात करनी भी टेढ़ी खीर थी। कभी फोन करो तो बताया जाता था कि वह बाथरूम में हैं, नहा रहे हैं, पूजा कर रहे हैं। ऐसा लगता था कि मानों वह सारा दिन बस यही काम करते हैं और कुछ नहीं। मिलने जाओ तो उनके पास समय नहीं होता था। कई वीआईपी उनके घर बैठे होते थे, प्रतीक्षा कर रहे होते थे। पर अब तो लगता है जैसे मौसम ही बदल गया हो। पतझड़ के बाद बहार आ टपकी हो।

बेटा: पर आजकल तो पिताजी, हाथ जोड़कर वह सब हमारे घर बिन बुलाये ही पधार रहे हैं।

पिता: बेटा, पहले तो वह हमारी मांगों की परवाह ही नहीं करते थे। अगर हमारी बात सुनने की कृपा कर भी लें तो उन्हें हमारी मांग अमान्य, अव्यवहारिक लगती थी। पर अब तो लग रहा है कि सूरज पश्चिम से निकल आया है। हमारे नेता हमारी ही कुटिया पर पधार रहे हैं, हमारी समस्याएं सुलझाने, दु:ख-दर्द बांटने। हमारे मंत्री व सांसद-विधायक हमारी पुरानी मांगों और आवेदनों को स्वयं ही अपने दफ्तर में खोज रहे हैं और उन्हें तुरन्त मान भी रहे हैं। साथ ही पूछ रहे हैं कि और कोई सेवा हो तो बताओ।

बेटा: आजकल तो वह इतने दीन-विनीत दिख रहे हैं कि हमें अपने आप पर अफसोस हो रहा है कि हम उन्हें गलत समझ बैठे।

पिता: चलो बेटा, कभी-कभी गलती हो भी जाती है। किसी से भी हो सकती है, इसी कारण तो कहते हैं कि सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं समझना चाहिये।

बेटा: अब समझ आया कि हमारे नेता लोग जनता द्वारा दी गई वोट की भीख पर ही जीते और मौज-मस्ती करते हैं।

पिता: बेटा, करवाते भी तो हम ही हैं न।

बेटा: पिताजी, जैसे हमारे पास अनेक प्रत्याशी होते हैं और हमें उनमें से एक को चुनना है, उसी प्रकार हम कार्यकर्ताओं के पास भी अनेक विकल्प होते हैं कि किस के लिये काम करना है।

पिता: कैसे?

बेटा: पिताजी, मैं पिछले एक सप्ताह से एक प्रत्याशी के लिये काम कर रहा था। सारा दिन घर-घर जाकर उसके लिये वोट मांगता था। मुझे मिलता क्या था? सुबह दही-अचार-परांठा और चाय। दोपहर को दाल-सब्जी और रोटी। दिन को चाय तो कोई न कोई पिला ही देता था। रात को भी वही खाना। तभी मेरे को एक मेरा दोस्त मिला। वह हमारे विरोधी प्रत्याशी के लिये काम कर रहा था। बातों-बातों में उसने मुझ से पूछ लिया कि तुझे मिलता क्या है और क्या मेरी सेवा ठीक हो रही है? जब मैंने बताया तो वह मेरा हाथ पकड़ कर अपने प्रत्याशी के पास ले गया। वहां तो पिताजी, कार्यकर्ताओं की मौज लगी हुई थी। दिन को बढिय़ा खाना, बढिय़ा चाय-नाश्ता, रात को मुर्गा और दिन की थकान दूर करने के लिये दारू भी। मैंने तो पिताजी तुरन्त पुराने उम्मीदवार को त्याग दिया और दूसरे का दामन थाम लिया। हमे किसी से क्या लेना-देना है? पिताजी, जो वर्कर की सेवा करेगा, उसी को जीत का मेवा मिलेगा।

पिता: तू तो दलबदलू निकला। तेरा कोई ईमान-धर्म है क्या?

बेटा:  कमाल है पिताजी, आप भी राजनीति में धर्म-ईमान की बातें करते हैं। यदि हम प्रत्याशी बदल ले तो दलबदलू और राजनेता दल बदलें तो देश के हित की बात। यह क्या तमाशा है पिताजी?

पिता: चल इस बात को छोड़। चल मीट-मुर्गा तो ठीक, अब तूने दारू भी शुरू कर दी?

बेटा: पिताजी, आप मुझे दूसरों के सिर पर भी ऐश नहीं करने देते। जब मैं दारू के लिये आपसे पैसे मांगूंगा तब बात करना।

पिता: तब तो पैसे नहीं जूते मारूंगा। बेकार बैठा हुआ है, काम न धाम पीने चला है दारू।

बेटा: पिताजी, मैं आपको एक और खुशखबरी सुना दूं। हमारे नये नेता ने कहा है कि यदि वह जीत गया तो मंत्री भी बन सकता है। कुछ भी हो, उसने हम सब की बेरोजगारी दूर करने का वादा किया है।

पिता: तुझ नालायक को वह क्या कलेक्टर बना देगा? मैट्रिक तो तू पास नहीं कर सका।

बेटा: पिताजी, आप मुझे हर वक्त कोसते ही रहते हैं। नालायक ही सही, हूं तो मैं आपका बेटा ही न। पिताजी, मैं कम पढ़ा-लिखा अवश्य हूं, पर हमारे नेता कौन से मेरे से आगे हैं? मेरा प्रत्याशी तो मिडिल तक पास नहीं है। आपने एक टीवी कार्यक्रम में देखा कि जो महिला तथा अन्य प्रत्याशी पंचायत प्रधान का चुनाव लडऩे जा रहे थे, उनको तो हमारे प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति का नाम तक नहीं पता। मुझे तो सब पता है। मुझे तो अंग्रेजी में ‘माई बेस्ट फ्रेंड’ पर लिखा लेख तो आज तक याद है।

पिता: चल जब तू कुछ बन जायेगा तो बताना।

बेटा: तब देखना पिताजी, जब मुझे नौकरी मिल जायेगी तो अपनी सारी तनख्वाह लाकर आपके चरणों में रख दूंगा। उस पहली कमाई से मैं आपको सूट भी सिलाकर दूंगा।

पिता: इतना तो मुझे तुझ पर भरोसा है। संस्कार तो तुझे मैंने ही दिये हैं न। पर बेटा बूट मत लाकर देना।

बेटा: क्यों पिताजी? सूट के साथ बूट तो मैं अवश्य लाकर दूंगा।

पिता: बेटा, इसलिए कि कहीं राहुलजी को पता चल गया तो वह सब को कहते फिरेंगे कि मैं भी मोदीजी की नकल कर रहा हूं और उन्हीं की तरह सूट-बूट पहनता हूं।

बेटा: पिताजी, कमाल है। आप भी उसकी बातों को इतनी संजीदगी से लेते हैं। सब उसकी बातों का मजाक उड़ाते हैं। एक ने तो मुझे पूछ ही लिया। क्या मोदी लंगोट पहनकर अमेरिका जायें? क्या उसके पिता, उसकी दादी और पड़दादा नेहरू सूट-बूट नहीं पहनते थे? क्यों राहुल गांधी ने स्वयं कभी सूट-बूट नहीं पहना?

पिता: बात में दम तो है।

बेटा: पिताजी, अब तक तो मैं समझता था कि हमारे नेता बस राजनीति ही करते हैं, उन्हे और कुछ नहीं आता। धर्म-कर्म से उनको कुछ लेना-देना नहीं, क्योंकि हमारा राष्ट्र सेक्युलर है। पर अब तो उनके भाषणों व टिप्पणियों से ऐसा लग रहा है कि राजनीति में आने से पूर्व उन्होंने सारे वेद-उपनिषद, रामायण-महाभारत तथा देश-दुनिया के इतिहास का गहन अध्ययन कर रखा है। वह तो इसके बड़े व्यख्याता बन बैठे हैं।

पिता: कैसे?

बेटा: हमारे सेक्युलर नेता हमें बता रहे हैं कि हमारे ऋषि-मुनि तथा हिन्दू भी बीफ खाते थे।

पिता: बेटा, तू किनकी बातों पर जा रहा है? राजनेताओं का तो धर्म ही है कि वह आज कुछ बोलते हैं और कल फिर पुराने बयान से मुकर जाते हैं। झूठ बोलना तो बेटा राजनीति में अपराध या पाप नहीं, अपितु एक अनिवार्य योग्यता है।

बेटा: पिताजी, मैं कुछ समझा नहीं।

पिता: बेटा, मैं एक ही उदाहरण देता हूं। तुझे याद है जब 2जी स्पैक्ट्रम स्कैम हुआ था? तब पहले तो सरकार ने कहा कि सारे आरोप बेहूदा, बकवास हैं और तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। जब सीएजी ने इसका खुलासा किया कि इससे देश को 1 लाख 70 हजार करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है तो हमारे विख्यात कानूनविद व तत्कालीन मंत्री कपिल सिब्बल ने इसे झूठ का पिटारा बताया था और आंकड़े देकर साबित किया था कि इसमें तो एक पैसे का भी नुकसान नहीं हुआ है। पर बाद में उच्चतम न्यायालय ने सीएजी के आंकलन को सही माना और तत्कालीन संचार मंत्री पर मुकदमा चल रहा है।

बेटा: पिताजी, बताइये कि क्या आपके अन्दर भी कोई शैतान है?

पिता: तू बकवास मत किया कर। तभी तो मुझे तुझ नालायक पर गुस्सा आ जाता है।

बेटा: पिताजी, आप व्यर्थ में मुझ पर नाराज हो जाते हैं। मैं तो इसलिये पूछ रहा था कि लालूजी ने पहले हिन्दुओं द्वारा बीफ खाने की बात कही और बाद में कहा कि यह बात उनके मुंह से शैतान ने कहलवा दी। मैं इसलिये पूछ रहा था कि व्यक्ति तो अपनी अन्तरात्मा की बात सुनता है और वही अपने मुंह पर लाता है। यह शैतान उनके अन्दर कैसे घुस गया?

पिता: बेटा, लालूजी तो अद्भुत व्यक्ति हैं। उनके साथ तो सब कुछ हो सकता है।

बेटा: पिताजी, अब चुनाव के बाद तो लगता है कि हमारे गांव, हमारे क्षेत्र व देश का तो भाग्य ही खुल जायेगा। जिस प्रकार सभी प्रत्याशी, हमारे नेता व दल हमें विश्वास दिला रहे हैं, उससे तो लगता है कि वह आसमान से चांद-तारे भी लाकर हमारे कदमों में रख देंगे।

पिता: बेटा, वादे तो वादे ही होते हैं, सच्चाई नहीं। वादों के चक्कर में फंसकर ही तो आदमी धोखा खा जाता है।

बेटा: नहीं पिताजी, आश्वासनों पर ही तो यह विश्व चलता है। अविष्कार व खोज का आधार भी वादे ही हैं। वादों पर ही तो सरकार चलती है। पहले सरकार वादा करती है और फिर निभाती है।

पिता: बेटा, यदि हम आश्वासनों पर ही जीयें तो भूखे रह जायेंगे। वादों से ही सब कुछ हो जाता तो 1971 में ही गरीबी हट गई होती। तब इन्दिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा व वादा किया था। अब तक तो बेरोजगारी भी दूर हो गई होती और तू दर-दर की ठोकरें न खाता।

बेटा: पिताजी, मेरा आपके साथ यही तो मतभेद है। आप निराशावादी हैं और मैं आशावादी।

पिता: तू बड़ा आशावादी है तो चुनाव के बाद बात करना। तब मैं पूछूंगा तुम्हें।

बेटा: पिताजी, तब अवश्य पूछिएगा। मुझे तो पूरा विश्वास है कि कोई भी जीते, कोई भी पार्टी सरकार बनाये, देश-प्रदेश में स्वर्ग ही स्वर्ग होगा, क्योंकि पार्टी कोई भी हो पर सभी हमारे प्रदेश को स्वर्ग बनायेंगे। क्योंकि, किसी ने भी स्वर्ग नहीं बनाने की बात नहीं की है। हम सभी शीघ्र ही स्वर्गवासी बनने वाले हैं।

पिता: बेटा तू भी यहीं है, मैं भी यहीं।

चुनाव परिणाम निकलने तक स्वर्ग के वासी होने का सपना देखने में कोई बुराई नहीं है। दुनिया आशा और आश्वसनों के स्वर्ग पर ही तो जीती है।

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