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धैर्य मनुष्य का अस्त्र

धैर्य मनुष्य का अस्त्र

By उपाली अपराजिता रथ

ब्रह्माण्ड में हमारी आत्मा एक बिंदु मात्र है। ये बिंदु मात्र आत्मा जब क्रियाशील हो जाती है, तो पूरे ब्रह्माण्ड को हिला कर रख देती है। हम अपनी आत्मा को सही दिशा में न ले जाकर अनेक विपत्तियों में पड़ जाते है। जीवन में ऊंच-नीच, अच्छा-बुरा लगा रहता है। विपत्ति सबके जीवन में आती है, लेकिन यही समय व्यक्ति के जीवन में बहुत मायने रखता है। ये असलियत में उसकी परीक्षा का समय है मुसीबत के समय कौन कैसे वक्त बिताता है, उससे उस व्यक्ति का परिचय सामने आता है। एक सच्चा इंसान कठिन-से-कठिन वक्त में भी खुद को एक विशाल वृक्ष की तरह स्थिर रखता है। उसका धैर्य उसे कठिन समय से भी धीरे-धीरे बाहर निकाल लाता है, जैसे सोना तपाने के बाद उसकी चमक दो गुणी हो जाती है, ठीक वैसे ही धैर्यवान व्यक्ति का कठिन समय बीत जाने के बाद उसका तेज बढ़ जाता है।

अगर धैर्य को मनुष्य का एक अस्त्र कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। मनुष्य जीवन की व्याख्या करते हुए ज्ञानीगण मानते हैं कि पिता-धैर्य, माता-क्षमा, दया-भगीनी, मन-संयम, भाई-भोजन है। उसी तरह ज्ञानामृत देने वाले ज्ञानी मनुष्य को देवतुल्य कहा जाता है। धैर्य को वह सबका पिता मानते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जैसे परिवार को चलाने के लिए पिता का योगदान अन्य सभी से ज्यादा होता है उसी तरह मनुष्य को सगुण बनाने में उसका धैर्य और एकांत महत्व रखता है।

हम सब समय के हाथ की कठपुतली हैं। हम चाह कर भी होनी को टाल नहीं पाते हैं। जब कठिन समय आता है तो धैर्यहीन होकर हालात को और भी गंभीर बना लेते हैं। किसी के साथ द्वेष भाव रहे तो समय ज्यादा कठिन हो जाता है। अपना अपमान कोई करे उसे सहना वास्तव में कठिन कार्य है। जो आध्यात्मिक ज्ञान की उन्नति में लगे रहते हैं, उन्हें तिरस्कार प्रभावित नहीं करता। वह धैर्य के साथ उन क्षणों से निकलकर बाहर आ जाते हैं। सही मायने में देखा जाए तो ज्ञानी मनुष्य ही धैर्यवान बनता है। बालक प्रह्लाद आजन्म ज्ञान के अधिकारी थे। उन्होंने जीवन में आने वाले संकट का धैर्य के साथ सामना किया और अंत में विजय प्राप्त की।

हम सब विषय-वासना में इतने अंधे हो जाते हैं कि परमात्मा के अस्त्वि को समझ नहीं पाते। खुद को सर्वोत्तम मानने वाले व्यक्ति धैर्य के साथ रहकर भी परिस्थिति को सुलझा नहीं पाते हैं।

इच्छा द्वेष: सुखं दु:ख संघातश्चेतना घृति:।
एतत क्षेत्र समासेन सविकारम् उदाहृतम्।।

गीता के 13वें अध्याय में वर्णन हुआ है कि अपना मन पांच इन्द्रयों के द्वारा परिचालित है, लेकिन अपनी चेतना और धैर्य के द्वारा मनुष्य सब कुछ नियंत्रित रख सकता है।

धैर्य के अभाव में अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। छोटी-सी गलतफहमी भी बड़ा रूप ले लेती है। इसलिए कोई भी घटना हो विचलित नहीं होना चाहिए। धैर्य के साथ रहने से कुछ क्षण बाद जब सच्चाई सामने आती है। हमें अनेक हल मिल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति मुश्किल वक्त से गुजर रहा हो और उसके हाथ में कोई उपाय न हो तो उसे धैर्य के साथ रहकर मन को शान्त रखना चाहिए। एक बार अगर मन अशांत हो जाए, तो इंसान अन्दर ही अन्दर अपना अस्तित्व मिटा बैठता है। एक सच्चा इंसान जब धर्म के साथ अटल निश्चय के साथ आगे बढ़ता है, तो उसके सामने धीरे-धीरे पूरी दुनिया झुकती है।

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