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वक्त की जरूरत है बदलाव

वक्त की जरूरत है बदलाव

हर व्यक्ति की जिंदगी में बहुत से खट्टे-मीठे पल आते हैं। जिनसे वह बहुत कुछ सीखता है। इन्हीं अच्छे-बुरे पलों को संजोता हुआ व्यक्ति कुछ नये अनुभवों को संचित करता है और अपने अनुभवों की बुनियाद से अपनी जिंदगी को रफ्तार देता है। लेखक चन्द्रकिशोर जायसवाल ने अपने ऐसे ही कुछ खास अनुभवों को कहानी के रूप में संजोया है। लेखक ने अपनी पुस्तक ‘खट्टे नहीं अंगूर’ में अपने जीवन से जुड़े कुछ खास पलों को कहानी का रूप देकर लोगों के सामने पेश किया है। लेखक ने अपनी पुस्तक ‘खट्टे नहीं अंगूर’ में 14 कहानियों का संग्रह किया है, जो उनके जीवन में उनके इर्द-गिर्द की घटनाओं पर आधारित हैं।

14-11-2015इस पुस्तक में हर कहानी का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व है, लेकिन हर कहानी की पृष्ठभूमि लेखक का अपना घर और गांव ही है, जहां से उनका गहरा रागात्मक लगाव है। लेखक ने अपनी कहानियों की भाषा-शैली में कुछ नया प्रयोग नहीं किया है, बल्कि आंचलिक भाषा को ही प्राथमिकता दी है। लेखक ने अपनी प्रत्येक कहानी का विषय वस्तु ज्यादातर उन इलाकों से लिया है, जहां पर भारतीय समाज की वर्गीय चेतना बेहद जटिल संरचना के साथ मौजूद दिखाई देती है। उनकी हर कहानी में प्रेम, घृणा, करूणा, संवेदना, सामाजिक जीवन के स्थायी भाव दिखाई देते हैं।

इतना ही नहीं उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से गांव-घर के अन्तर्विरोधों और वहां की विडम्बनाओं को उजागर किया है। लेखक चन्द्रकिशोर जायसवाल नि:संदेह अंचलिक इलाकों की ऐसी परेशानियों को अपनी कहानियों में बहुत ही सरल तरीके से उजागर करते हैं। उनकी लिखी कहानी ‘खट्टे नहीं अंगूर’ और ‘मैट्रिमोनियल तस्वीर’ ऐसी ही कहानियां है। जिसमें उन्होंने बदलते वक्त की जरूरत के हिसाब से कैसे खुद को ढाला जाये ये दर्शाया है।

खट्टे नहीं अंगूर

लेखक : चन्द्रकिशोर जायसवाल

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ

मूल्य: 280 रु.

पृष्ठ: 215

कहानी ‘मात’ में भी लेखक ने इसी बात को मूलरूप से दर्शाया है कि वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता है, लेकिन बुजुर्गों के लिये इसे स्वीकारना इतना आसान नहीं होता। कहानी का एक किसान पात्र रघुबीर, किसानी को बाप-दादा का काम बताकर अजीवन उसी में लगा रहता है और अपने बेटों को भी खेती-बाड़ी की ही सीख देता है। जबकि, उसके बेटों को खेती-बाड़ी का काम नहीं भाता। वह बाहर जा कर अधिक पैसा कमाना चाहते हैं। लेकिन, रघुबीर को अपने बेटों का बाहर जाकर कमाना कतई नहीं भाता। पर एक वक्त ऐसा भी आता है, जब जरूरत को ध्यान में रखते हुए आखिर में रघुबीर अपने बेटों को ऐसा करने से रोक भी नहीं पाता, क्योंकि उसे एहसास हो जाता है कि वक्त के साथ बदलाव जरूरी है।

लेखक चन्द्रकिशोर जायसवाल की सभी कहानियां आंचलिक इलाकों की परेशानियों, खूबियों और घटनाओं को दर्शाती हैं। कुछ ऐसी परेशानियों का भी जिक्र किया गया है, जो बदलते परिवेश को स्वीकारने से ही समाप्त होंगी। अन्यथा उनकी जटिलता जस-की-तस ही रहेगी। पुस्तक ‘खट्टे नहीं अंगूर’ की सभी कहानियां काफी प्रेरणादायी हैं। लेखक ने इन कहानियों के जरिये आंचलिक लोगों के साथ-साथ शहरी लोगों को भी ये समझाने की कोशिश की है कि बदलते वक्त की मांग है बदलाव। उसे सहजता के साथ स्वीकारने से ही व्यक्ति अपने आगे के जीवन को सुरक्षित और सुखमय बना सकता है। अन्यथा जटिलताएं उसके आगे बाहें फैलाये खड़ी ही रहती हैं। इसलिए जैसे-जैसे समय का पहिया घूमता है वैसे-वैसे लोगों को भी इस बदलाव को स्वीकारना चाहिए। क्योंकि, बदलाव प्रकृति का नियम और जीवन जीने की प्रवृति का भी एक अभिन्न हिस्सा है। एक तरफ लेखक चन्द्रकिशोर जायसवाल ने अपने कहानी संग्रह में भावनात्मक पक्ष का खास ध्यान रखा है, जिसके सहारे जीवन की डोर बंधी रहती है, चाहे इनसान खुश हो या दुखी। वहीं दूसरी तरफ आंचलिक इलाकों की परेशानियों से भी उन्होंने शहरी पाठकों को बखूबी रुबरु कराया है।

प्रीति ठाकुर

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