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खान आवंटन के जिन्न की छाया

खान आवंटन के जिन्न की छाया

14-11-2015राजस्थान सरकार द्वारा खान विभाग के बहुचर्चित महाघूस कांड के खुलासे के एक माह बाद खानों का आवंटन निरस्त कर लोकायुक्त से जांच कराने के फैसले के बावजूद निलम्बित प्रमुख खान सचिव डॉ. अशोक सिंघवी और उनके पूरे गिरोह के जेल के सीखचों के भीतर होने पर भी बोतल से बाहर निकल चुके खान आवंटन के जिन्न की छाया और इस पर सियासी रस्साकसी बरकरार है। हालात यह है कि मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे का टॉप मॉडल ”रिसर्जेन्ट राजस्थान’’ भी इससे अछूता नहीं रह पाया है। यह प्रकरण खान और खनन उद्योग पर महाअभिशाप बन गया है, जिससे रोजगार के अवसरों तथा संभावित राजस्व आय को तगड़ा झटका लगा है, जिसे संभालने में वक्त लगेगा।

इधर ”उदय इण्डिया’’ के ताजा अंक की आवरण कथा ‘लुट ग्यो रे-राजस्थान’ बाजार में आयी और उधर राज्य सरकार ने 17 अक्टूबर की रात को ही खान आवंटन प्रक्रिया को निरस्त करते हुए लोकायुक्त से इस मामले की जांच संबंधी आदेश राज्यपाल से जारी करवाया। गौरतलब है कि उदयपुर भीलवाड़ा में खान आवंटन तथा खानों को बंद करवाने और खुलवाने की आड़ में दलाल गिरोह के माध्यम से घूसखोरी प्रकरण में जयपुर में 16-17 सितम्बर की रात में डॉ. सिंघवी और उदयपुर में अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। राज्य सरकार द्वारा कथित तौर पर 653 में से फिलहाल 601 खानों का आवंटन निरस्त किए जाने पर भी पेंच फंस गया है। जैसे-जैसे सरकार का मर्ज बढ़ता गया, वैसे-वैसे दवा देने की कहावत चरितार्थ हो रही है। बचाव की मुद्रा में आई सरकार को कई मंचों पर जूझना पड़ रहा है। प्रतिपक्षी दल कांग्रेस वसुंधरा सरकार की घेराबंदी के लिये रोज नये मोर्चे खोल रहा है। जयपुर के बाद दिल्ली में इस मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करने वाली कांग्रेस ने अब राष्ट्रपति से गुहार करने का ऐलान किया है। कांग्रेस सूबे के मुख्यमंत्री के त्यागपत्र की मांग पर अड़ी हुई है। कांग्रेस ने लोकायुक्त जांच को नाकाफी माना है और न्यायिक निगरानी में सी.बी.आई. जांच की मांग दोहराई है।

खान आवंटन मामलों की समीक्षा के लिये राज्य सरकार ने गत पांच अक्टूबर को आर.एस.एम.एम. के प्रबन्ध निदेशक भानू प्रकाश एट्रू की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति गठित की थी। समिति ने अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में यह माना है कि खानों के लिये विभाग में प्राप्त लगभग 19 हजार आवेदनों में से करीब चार प्रतिशत पत्रावलियों को भारत सरकार की खान आवंटन संबंधी प्रस्तावित गाइड लाइन की अनदेखी कर ‘पहले आओ पहले पाओ’ की आड़ में आनन-फानन में मंजूरी दी गई, जो गलत है। नई दिल्ली में 14 अक्टूबर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट एवं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अगुवाई में कांग्रेस विधायकों व राज्यसभा सदस्यों ने पैदल मार्च कर केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त तथा महालेखा नियंत्रक को दिये ज्ञापन में खान आवंटन घोटाले की जांच की मांग की थी। इसे ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ने खानों के आवंटन निरस्त किए जाने की कार्यवाही की। इसमें 548 मंशा पत्र यानि आई.एल.ओ तथा 53 अनुज्ञा-पत्र शामिल हैं। इनकी स्वीकृतियां तत्कालीन प्रमुख खान सचिव सिंघवी के निर्देश पर एक नवम्बर 2014 से 12 जनवरी 2015 के दौरान जारी की गई। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी अवधि में 51 कार्यदिवसों में भाजपा शासित मध्य प्रदेश में तीन जबकि बिहार में मात्र एक खान आवंटन की स्वीकृति दी गई। लेकिन, राजस्थान में आवंटन की गति ने सभी को मात दे दिया। यही नहीं नवम्बर 2014 में ही आर. एस. एम. एम. के एकाधिकार वाले मिनरल, निजी कम्पनियों को सौंपने की साजिश की खबर मीडिया में आने के बावजूद वसुंधरा सरकार आंखे मूंदकर ही बैठी रही और खान विभाग में घूसखोरी का बारूद जमा होता गया। जिसमें 16 सितम्बर को विस्फोट हुआ।

विडम्बना यह है कि आरोपों से घिरी सरकार ने खान आवंटन मामलों की गड़बडियों की जांच का दायित्व अब लोकायुक्त को सौंपा है, लेकिन लोकायुक्त एस.एस. कोठारी ने तो मार्च 2015 में मीडिया की खबरों पर ही खान विभाग से रिपोर्ट तलब की थी। बताया जाता है कि विभाग ने लोकायुक्त को भेजी रिपोर्ट में तथ्यों को छिपाने की पूरी कोशिश की। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने जल्दबाजी में खानों का आवंटन निरस्त किये जाने को वसुंधरा सरकार का अपराध बोध बताया है। उन्होंने वसुंधरा सरकार से पूछा है कि किस आधार पर यह कार्यवाही की गई और 653 में से 601 खानों को तो निरस्त कर दिया गया, जबकि 52 खानों को किस विशिष्टता के चलते छोड़ा गया? वहीं सूत्रों का कहना है कि कुल 739 खानों का आवंटन किया गया था, जिसमें से 137 खानें 12 जनवरी 2015 को स्वीकृत की गई थी। जिन्हें केन्द्र सरकार के निर्देश पर निरस्त कर दिया गया। पायलट का यह भी कहना है कि निरस्त की गई फाइलों की सूची सरकारी वेबसाइट पर नहीं डाली गई है, जिससे यह साफ नहीं हो पाया है कि 653 में से कौन सी 601 खानों का आवंटन निरस्त हुआ है और किन कारणों से 52 खानों को इससे मुक्त रखा गया है। जबकि, सभी खानों के आवंटन की प्रक्रिया समान थी। खनन घूसकांड को राजनैतिक एवं प्रशासनिक गठजोड़ का शर्मसार करने वाला काला अध्याय बताते हुए पायलट ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के दवाब बनाने से चोरी तो पकड़ी गई, लेकिन लूट के वास्तविक साजिशकर्ता आज भी कानून की पकड़ से दूर है। अपनी बात का खुलासा करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि सम्पूर्ण खनन घोटाले में प्रशासनिक अनियमितता बताकर खुद को पाक साफ दिखाने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि इस प्रकरण में भ्रष्टाचार के राजनैतिक चेहरे सामने आने पर ही पूरी सच्चाई उजागर होगी। अपने तर्र्क को मजबूत बनाने के लिये पायलट ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है की इतनी बड़ी तादाद में किसके कहने पर खानों का आवंटन किया गया और अब आनन-फानन में किसके कहने पर ये आवंटन निरस्त हुआ? मुख्यमंत्री ने जब गलती स्वीकार करते हुए खानों का आवंटन रद्द ही कर दिया है तो अब इस मामले में आपराधिक षडयंत्र को देखते हुए सी.बी.आई. जांच जरूरी है। कांग्रेस यह जांच उच्चतम न्यायालय की निगरानी में करने की मांग कर चुकी है। पायलट ने कहा कि आजादी के बाद प्रदेश में यह सबसे बड़ा घोटाला है और लोकायुक्त इतनी तेजी से इसकी जांच नहीं कर सकते। कांग्रेस राष्ट्रपति से मिलकर खान घोटाले से अवगत कराएगी। इस प्रकरण में कांग्रेस संवैधानिक संस्था कैग तथा केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त से मिल चुकी है। पायलट के अनुसार कैग ने जांच टीम गठित की है।

14-11-2015

सत्ता में बैठी भाजपा की अंदरूनी राजनीति और उथल-पुथल की बात करें तो दिलचस्प तथ्य यह है कि जब भी मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे आरोपों से घिरती हैं, तब-तब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी उनके बचाव में मीडिया के सामने आते हैं। कांग्रेस को इस पर ऐतराज है कि जब वह सरकार पर आरोप लगा रही है तो पार्टी के तौर पर भाजपा को जवाब देने की कहां जरूरत है? इसके उलट परनामी का कहना है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा एवं सरकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाजपा में कांग्रेस का कल्चर नहीं है, जहां संगठन और सरकार दोनों विपरीत दिशा में चलते हैं। गौरतलब यह है कि इस बार परनामी के साथ प्रेस कॉफ्रेंस में सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री डॉ. अरूण चतुर्वेदी भी मौजूद थे। जबकि, ऐसे अवसरों पर वसुंधरा राजे के खास सलाहकार चिकित्सा मंत्री राजेन्द्र राठौड़ उपस्थित रहा करते थे।

अलबत्ता परनामी ने लोकायुक्त जांच पर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि सी.बी.आई जांच की रट लगाकर कांग्रेस लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्था पर सवाल उठा रही है, जबकि वर्तमान लोकायुक्त सज्जन सिंह कोठारी की नियुक्ति तो पिछले कांग्रेस शासन में हुई थी। भाजपा का यह भी कहना है कि पहली बार किसी सरकार ने अपने विभाग के आदेशों को निरस्त कर लोकायुक्त से जांच कराने का ऐतिहासिक फैसला किया है, जिसका कांग्रेस को स्वागत करना चाहिए। परनामी ने याद दिलाया कि पिछली कांग्रेस सरकार के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा कथित तौर पर जोधपुर में अपने रिश्तेदारों एवं निकटवर्तियों को खान आवंटन का मामला उजागर होने पर उन खानों को निरस्त कर दिया था, तब कांग्रेस या पायलट ने सी.बी.आई. जांच की मांग क्यों नहीं की? परनामी ने यह भी खुलासा किया कि भाजपा सरकार ने जिन खानों का आवंटन निरस्त किया है, उनके लिए आवेदन कांग्रेस शासन में आमंत्रित किए गए थे और आवंटन की लगभग 80 फीसदी प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी। भाजपा सरकार ने तो इसका फॉलोअप ही किया है। लेकिन, भाजपा अध्यक्ष और सरकार के पास इसका जवाब नहीं है कि अब इन खानों का आवंटन क्यों निरस्त किया गया? यह अलग बात है कि आवंटित खानों पर पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिलने तथा अन्य कागजी औपचारिकताएं पूरी नहीं होने से कोई काम शुरू नहीं हो पाया। अब लोकायुक्त जांच में कई खुलासे होने की संभावना है। अलबत्ता खान प्रकरण से खनन उद्योग को गहरा झटका लगा है और यह माना जाता है कि वह दस साल पीछे चला गया। गौरतलब है कि खनन तथा इससे जुड़े उद्योगों को राजस्थान की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी माना जाता है, लेकिन खनन नीति की घोषणा के बावजूद समय पर नियम नहीं बनने से काम आगे नहीं बढ़ सका। रही सही कसर अदालती विवाद ने उलझा दी है। इसलिए हजारों खानों की नीलामी भी फिलहाल संभव नहीं है।

घूसकांड के दुष्प्रभाव का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि रिसर्जेन्ट राजस्थान के लिये खान विभाग की पहल पर निवेश संबंधी जो एम.ओ.यू. किए जाने थे, उनकी संख्या तथा संभावित निवेश राशि पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। गत 16 अक्टूबर को ऊर्जा क्षेत्र के लिये एक तथा खनन के लिये 12 कम्पनियों से लगभग 50 हजार करोड़ के निवेश संबंधी एम.ओ.यू. हुए। लेकिन, इसमें खान विभाग की ओर से विवादित सीमेंट ब्लॉक आवंटन से जुड़ी कम्पनियों सहित दस कंपनियों को बाहर रखा गया। तत्कालीन प्रमुख खान सचिव अशोक सिंघवी के समय सितम्बर माह के आरम्भ में दस कंपनियों से 48 हजार करोड़ से अधिक का निवेश प्रस्तावित था। इस अवसर पर केन्द्रीय ऊर्जा राज्यमंत्री पीयूष गोयल ने कंपनियों से होने वाले एम.ओ.यू. का नाम बदल कर कमिटमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट (सी.ओ.आई) करने का सुझाव दिया और कहा कि जो कंपनी अपना कमिटमेंट पूरा नही करे, उन पर पेनल्टी का प्रावधान भी होना चाहिए।

प्रदेश भाजपा कार्यालय में नियमित जनसुनवाई कार्यक्रम में शामिल हुए खान राज्यमंत्री राजकुमार रिणवा ने कहा कि हमने सभी खानों को निरस्त करने का ऐतिहासिक फैसला किया है और लोकायुक्त को जांच सौंप दी है। कैग टीम के स्पेशल आडिट संबंधी सवाल पर उनका सहज जवाब था कि कोई भी टीम आई हो हमारी जांच चल रही है। टीम आई होगी तो वह भी जांच कर लेगी। खान विभाग का काम देख रहे प्रमुख शासन सचिव दीपक उप्रेती का कहना है कि अप्रधान मिनरल की खनन नीति में खान नीलामी की प्रक्रिया को अत्यंत पारदर्शी बनाया जा रहा है।

14-11-2015

पहले बोली से आरक्षित दरों को तय करने के बाद फिर खानों की नीलामी की जाएगी। विभाग यह भी तय करेगा कि अमुक खान में कितना उत्पाद संभावित है और इसे कंपनियों के समक्ष रखा जाएगा। नये नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है।

खनन प्रक्रिया की तरह खान विभाग में महाघूसकांड के खुलासे के बाद परत दर परत रोज नये तथ्य उजागर हो रहे हैं। तत्कालीन प्रमुख खान सचिव डॉ. अशोक सिंघवी ने खान नीलामी के 17 प्रोजेक्ट बनाये थे, जिनमें आयरन कोर सहित 6 प्रोजेक्ट अरावली पर्वत श्रृखंला के अन्तर्गत आते थे, इनकी नीलामी पर सरकार ने रोक लगा दी थी। अलबत्ता इनमें से एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक कम्पनी से एम.ओ.यू. किया गया है।

उधर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो अपनी जांच पड़ताल को पूरा करने में तेजी से जुटा हुआ है। डॉ. सिंघवी के खान तंत्र से जुड़े खान विभाग के लगभग 50 अधिकारियों एवं कर्मचारियों से पूछताछ की गई है। खान विभाग के विशेषाधिकारी तथा खान सचिव के पी.ए. और दो चालकों से भी पूछताछ की गई है। इसमें यह जानकारी मिली है कि खान विभाग के दलाल संजय सेठी से डॉ. अशोक सिंघवी की पुरानी जान पहचान थी। प्रारंभिक पूछताछ में डॉ. सिंघवी ने सेठी से कोई जान पहचान नहीं होने की बात कही थी। वहीं ए.सी.बी. गहनता से पूछताछ कर महाघूसखोर कांड की कड़ी से कड़ी जोडऩे और मामले में पुख्ता सबूत इक्कट्ठे करने में जुटी हुई है। यह संभावना है कि अशोक सिंघवी के इस मामले में शीघ्र ही चार्जशीट दाखिल कर दी जाएगी।

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