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बांग्लादेश इस्लामिक रुढि़वादिता का बढ़ता वायरस

बांग्लादेश इस्लामिक रुढि़वादिता का बढ़ता वायरस

साल 2013 से क्रूर हत्या की एक श्रृंखला ने बांग्लादेश में जगह ले ली है। उन सभी लेखकों की हत्या कर दी गई, जिन्होंने इस्लामी कट्टरवाद की आलोचना की थी। इन हत्याओं की जड़ें पाकिस्तान से बांग्लादेश के लोगों की आजादी की लड़ाई में निहीत है। मुक्ति युद्ध बांग्लादेश के भीतर सबके लिये तनाव लेकर आया। एक तरफ वो मुसलमान थे, जिन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान का समर्थन किया था और बांग्लादेश की स्वतंत्रता की मांग करना इस्लाम का अपमान बताया था। दूसरी ओर वे धर्मनिरपेक्षतावादी लोग थे जो धार्मिक प्रतिबंधों और आर्थिक हाशिये से मुक्त पाकिस्तान से अलग एक राज्य चाहते थे। धर्मनिरपेक्षता समूह के लोगों ने विचारों की लड़ाई जीत ली और देश को एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में संविधान के तहत धर्मनिरपेक्षता की गारंटी मिली। लेकिन, दुर्भाग्य से ये टिकाऊ साबित नहीं हुआ। 1975 में सेना के द्वारा सत्ता जब्त कर ली गई और पाकिस्तान की तरह ही यहां भी इस्लामीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई। 1977 में सैन्य नेताओं ने संविधान से धर्मनिरपेक्षता शब्द हटा दिया और इस्लाम को बांग्लादेश का राज्य धर्म घोषित कर दिया। साल 2010 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से धर्मनिरपेक्षता फिर से बहाल हुई। हालांकि इस्लाम राज्य धर्म बना रहा। बांग्लादेश की असली पहचान क्या है? यह इतिहास का एक अनसुलझा सवाल है। शायद इस हिंसा से पैदा हुई हैरानगी बहस का विषय है, यह एक ध्रुवीकरण का विषय है। इंडियाना विश्वविद्यालय में भारतीय सभ्यता के प्रोफेसर डॉ सुमित गांगुली कहते हैं – ‘एक बुद्धिवादी बौद्धिक परंपरा उन्नीसवीं सदी से चली आ रही है।’ वहां एक आम सहमति सांस्कृतिक, खुलेपन के बारे में पूरी दुनिया के लिए पहले से ही जाने जाते थे। एक निश्चित विश्वबंधुत्व कुछ लेखकों के कार्यों में परीलक्षित होता है। लेकिन, यह धर्मनिरपेक्ष रिवाज अलगाव में जिन्दा नहीं रह सकता। वे बताते हैं कि ‘वहां हिंदू और मुसलमान के रिश्ते एक-दूसरे के प्रति हमेशा से तिरस्कारपूर्ण थे। कट्टरता के कारण वहां हमेशा तनाव रहता था’ पूर्वी पाकिस्तान के दौरान में, राज्य द्वारा कट्टरता के विभिन्न रूपों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहन मिला। उसके बाद के वर्षों में रूढि़वादी लोगों को धार्मिक विचारधारा वाले सैन्य शासन के समय और सशक्त बना दिया गया। वहां की मुख्य पार्टियों में से एक- बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) धार्मिक समूहों के साथ संबंद्धित है। अवामी लीग धर्मनिरपेक्ष है। लेकिन, अब धर्म एक अधिक संवेदनशील विषय बन गया है, ये भी एकदम से धार्मिक लॉबी में परिवर्तित हो गया है। इसी पृष्ठभूमि में धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगर्स का एक छोटा सा समुदाय 2000 के दशक के मध्य में उभरने लगा। पहली बंगाली जनता ब्लॉगिंग प्लेटफार्म इनब्लॉग डॉट नेट 2005 में शुरू किया गया। धीरे-धीरे धार्मिक सामग्री की एक बढ़ती हुई मात्रा को देखा गया। ‘दिन-ब-दिन, मैंने ब्लॉग का इस्लामीकरण देखा’ मोहिउद्दीन कहते हैं-बांग्लादेश के इस्लामी गुट मुख्यधारा की मीडिया, टीवी चैनलों और ब्लॉगों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे। वह और अन्य लेखकों ने अपना-अपना साइट शुरु कर दिया था। सभी एक-दूसरे के ब्लॉगों के लिए योगदान देने लगे और फेसबुक के माध्यम से इतिहास, दर्शन, विज्ञान, कानून और नारीवाद पर चर्चा भी शुरू हो गई। कुछ पोस्ट सरकार के लिए स्पष्ट रूप से महत्वपूर्ण और संकटपूर्ण थे तो कुछ दूसरे धार्मिक ग्रंथों की बातों को लेकर। ‘मैंने कुरान और बाईबल की कई आयतों की आलोचना की, जो आधुनिक समाज के साथ संगत नहीं बिठा पाते।’ मोहिउद्दीन कहते हैं – ‘आभासी ग्रुप के माध्यम से वास्तविक नास्तिकों रॉय और मुस्लिम महिला अहमद का पहले संपर्क हुआ। उन्होंने फोन पर अपने विचारों पर चर्चा और बात करना शुरू किया और वे दोनों नास्तिक कैसे हो गये? जबकि रॉय की पृष्ठभूमि हिन्दू और अहमद मुसलमान थीं। उन्होंने शादी भी की। वे बड़े हुए और उनके विचार बदल गये, लेकिन वे दोनों प्रतिबद्ध थे।’

आजादी के युद्ध के निशान ने 1971 में इस्लामवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों के बीच तनाव की सतह को दुबारा खोल दिया। 2010 में, अवामी लीग ने न्याय के लिए सामूहिक हत्याओं की साजिश रचने वालों के लिए एक युद्ध अपराध न्यायाधिकरण शुरू किया। आलोचकों ने इसे अवामी लीग की मुखिया और प्रधानमंत्री शेख हसीना के राजनीतिक फायदे के रुप में देखा। कई ब्लॉगर्स युद्ध अपराध न्यायाधिकरण के मुखर समर्थक थे। इसका ट्रायल 2012 और 2013 में शुरू हुआ और यही वह समय था, जब कट्टरपंथियों ने नास्तिक लेखकों पर ध्यान दिया। जनवरी 2013 में, मोहिउद्दीन को चाकुओं से गोद दिया गया था और फरवरी में, हैदर को मौत के घाट उतार दिया गया। दोनों शाहबाग आंदोलन में सक्रिय थे। हमले के बाद हजारों लोग मोहिउद्दीन और हैदर को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर आए। इससे तनाव एक नए स्तर पर पहुंच गया। ये कहना है पत्रकारों की रक्षा करने के लिए बनी एशिया शोधकर्ता समिति के शोधकर्ता सुमित का। लेकिन, बांग्लादेश तो इस पथ पर पहले से ही था। 1990 के दशक और 2000 की शुरुआत के दौरान लंबे समय तक मौजूदा संकट से पहले लेखकों को देश छोड़कर भागना पड़ा। इस्लामवादी कट्टरपंथियों ने अस्सी ब्लॉगर्स की एक हिट लिस्ट प्रकाशित की। समाचार पत्रों में गैर विश्वासियों के बारे में भड़काऊ लेख छापे गये। कई तो हमलों के डर से छुप गए। हिफाजत-ए-इस्लाम ने जवाबी प्रदर्शन करते हुए तेरह मांगों की एक सूची जारी की। ये मांगें तालिबान से प्रेरित थीं। इसमें शाहबाग आंदोलन के नेताओं के लिए सजा का आह्वान किया गया था। नि:संदेह तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को बचाने में नाकाम प्रधानमंत्री शेख हसीना झुक गईं। ब्लॉगर मोहिउद्दीन जेल में डाल दिये गये, लेकिन जेल उनके लिये एक खतरनाक जगह थी। वे इस्लाम और पैगंबर की आलोचना करने के आरोप में तीन महीने तक जेल में बंद रहे। जब जमानत पर बाहर आये तो जर्मनी चले गये, तब से वो वहीं हैं। वे बताते हैं कि उन्हें वहां भी धमकियां मिलती रहती हैं।

युद्ध अपराध न्यायाधिकरण अब बेअसर सा हो गया है। नास्तिक लेखकों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है। इन सभी कारणों में से एक कारण है बांग्लादेश में वर्षों में पनपने वाले दण्ड से मुक्ति की एक संस्कृति की अनुमति। इस साल चार हत्याएं होने के बाद गिरफ्तारी की गई। लेकिन, 2013 में हैदर की जिन कारणों से हत्या की गई, उसका अब तक ट्रायल भी शुरु नहीं किया गया है। उनके रिश्तेदारों को अब कोई आशा भी नहीं है। बांग्लादेश के ब्लॉगर्स पर इसका कठोर प्रभाव पड़ा है। कईयों ने तो लेखन तक बंद कर दिया है। मोहिउद्दीन के विचारों की लड़ाई का परिणाम उसके शरीर पर दिये घाव रहे। अहमद वर्तमान समय में भी अपने पति के बारे में शोक मनातीं और रोते हुए कहतीं हैं कि बांग्लादेश के नास्तिक लेखकों और कार्यकर्ताओं के लिए सार्वजनिक स्थान हर घड़ी बंद ही हो रहा है।

अवामी लीग पार्टी जब पहली बार चुनकर सत्ता में आई तो यह जानने का फैसला किया कि 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के समय किन-किन लोगों ने पाकिस्तानी सेना के पक्ष में काम किया और उन निर्दोष हिंदुओं और मुसलमानों के खिलाफ जाघन्य, हत्या और बलात्कार जैसे आपराधिक वारदातों को अंजाम देकर उनमें दहशत फैलाई थी, जिन्होंने मुक्ति वाहिनी का साथ दिया था। मुक्ति वाहिनी ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा था। अवामी लीग सरकार ने इसके लिये इंटरनेशनल क्राइम ट्रिव्यूनल (आईसीटी) का गठन किया, इसने काम करना शुरु किया और हत्या और बलात्कार जैसे घृणित अपराध करने वालों को चिन्हित किया गया।

दिलचस्प बात तो यह है कि मुक्ति युद्ध के दौरान ज्ञात सहयोगियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के बारे में यह कार्रवाई अवामी लीग के द्वारा मुक्ति युद्ध के तीस से अधिक वर्षों के बाद किया जा रहा था। बीच की अवधि के दौरान, वे केवल एक कार्यकाल के लिए सत्ता में थे और शायद दोषियों के खिलाफ ट्रायल चलाने का उनमें आत्मविश्वास नहीं था। अफसोस तो इस बात का है कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (आईसीटी) आलोचना में इस बात को लेकर लग गया कि 30 सालों बाद संदिग्ध अपराधों के आरोपियों पर मुकदमा चलाने की कोशिश की जा रही है।

14-11-2015

अवामी लीग सरकार अंतर्राष्ट्रीय आलोचनाओं के बावजूद आरोपियों के कोर्ट ट्रायल पर कायम रही। जब पहले अभियुक्त खादर मुल्ला को बारीकी से अदालती परीक्षण के बाद दोषी ठहराया गया और उसे उम्रकैद की सजा दी गई तो जनता के द्वारा एक स्वाभाविक तात्कालिक प्रतिक्रिया व्यक्त की गई थी, जो पूरी अदालती सुनवाई पर करीब से नजर रखे हुए थी। तब कोर्ट के फैसले के खिलाफ अचानक एक लाख लोगों की भीड़, ढाका का दिल कहे जाने वाले में शाहबाग मैदान में इकट्ठी हो गई और कोर्ट द्वारा दोषी खादर मुल्ला को सुनाये गये आजीवन कारावास के फैसले का एक स्वर में विरोध करते हुए उसे मौत की सजा देने की मांग की थी। दरअसल खादर मुल्ला ने 1971 के युद्ध के दौरान मीरपुर के कसाई की उपाधि अर्जित की थी, क्योंकि उसने दर्जनों निर्दोष हिंदुओं का कत्ल करने के साथ ही कई हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार करने के बाद बेदर्दी से उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। लोगों के भारी विरोध के बाद अवामी लीग सरकार ने आईसीटी अधिनियम में संशोधन कर एक नये प्रावधान की शुरुआत की जिसमें न्यायाधीश किसी दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाता है तो उसके खिलाफ मौत की सजा देने के लिये अपील की जा सकती है। सरकार द्वारा अधिनियम में संशोधन के बाद मीरपुर के कसाई, खादर मुल्ला के लिये उन्होंने मौत की सजा की मांग की, इसके बाद उसे फांसी पर लटका दिया गया था।

14-11-2015खेद जनक तरीके से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार की आलोचना कर रहा है। मैंने इस मामले पर तुलनात्मक रुप से एडोल्फ ईचमैन केस का एक तथ्य प्रस्तुत किया है, जिसने सैकड़ों यहूदियों को हिटलर के जर्मनी स्थित एकाग्रता कैम्प में भेजा था और बाद में अर्जेंटीना फरार हो गया। यहूदियों की बर्बादी के तीस साल बाद, जब यहूदियों का अपना देश इजरायल बना तो उसके खुफिया संगठन मोसाद ने फरार एडोल्फ ईचमैन का अर्जेंटीना में होने का पता लगाया और एक कमांडो ऑपरेशन चलाकर उसे अर्जेंटीना से अगवा कर इजरायल ले आये। यहां अभियुक्त एडोल्फ ईचमैन पर जर्मनी में किये गये उसके अपराध के खिलाफ कानूनी मुकदमा चलाया गया और कोर्ट ने एडोल्फ ईचमैन को मौत की सजा सुनाई। इसके बाद उसे फांसी दे दी गई। अगर इजरायल जर्मनी में किये गये अपराध के लिये एडोल्फ ईचमैन को मौत की सजा दे सकता है, वो भी तब के अपराध के लिये जब दुनिया के नक्शे पर इजरायल का कोई अस्तित्व ही नहीं था तो बांग्लादेश अपने उन नागरिकों के खिलाफ मुकदमा चलाकर उन्हें सजा देकर क्या गलत कर रहा है, जिन लोगों ने 1971 के बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था और बांग्लादेश की मुक्ति के समर्थक सैकड़ों निर्दोष हिंदुओं और मुसलमानों की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी थी।

दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में दूसरे मुख्य राजनीतिक दल – बांग्लादेश नेशनल पार्टी ने आमतौर पर बांग्लादेश के कट्टरवादी समूहों का समर्थन किया है। जब अवामी लीग ने बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध में पाकिस्तानी सेना के साथ सहयोग करने वाले लोगों के खिलाफ अदालती प्रक्रिया चलाना शुरू किया, जिसने आमतौर पर पाकिस्तानी सेना के खिलाफ मुक्ति वाहिनी का समर्थन कर रहे बंगाली हिंदुओं और बंगाली मुसलमानों पर अत्याचार किये थे, उन सभी विरोधी लोगों का बांग्लादेश नेशनल पार्टी ने हमेशा समर्थन किया है। इस वजह से ही बांग्लादेश नेशनल पार्टी ने 1971 के अपराधियों को आईसीटी के शिकंजे से बचाने और उनके खिलाफ तमाम सबूतों और कोर्ट ट्रायल को तबाह करने के लिये पूरी ताकत लगा दी थी।

इस पृष्ठभूमि में बांग्लादेश की जनता के तत्व कट्टरपंथी तत्वों का समर्थन कर रहे हैं, जिसके विरोध में आधुनिक विचारधारा वाले सभी लोग हैं। और इन कट्टरपंथी समूहों ने हमला कर उन लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी जो आधुनिक व्यक्तव्यों और विचारों को समाज के सामने रख रहे थे। अवामी लीग की सरकार बांग्लादेश में मौजूद सभी उदारवादी तत्वों का समर्थन करती है। हालांकि, इन सभी उदार व्यक्तियों पर वहां के कट्टरपंथी समूह कड़ी नजर रखते हैं, जिससे कि वे उन्हें मौका मिलते ही मार डालें।

ऐसा क्यों है कि आज की तारीख तक जनता के बीच आधुनिक और उदारवादी विचारों को फैलाने वाले जिन चार ब्लॉगरों की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई? अवामी लीग की सरकार ने ब्लॉगरों के हत्यारों को पकडऩे के लिये तेजी से कार्रवाई कर संदिग्ध हमलावरों को पकड़ा है। यह एक कठिन काम है, लेकिन अवामी लीग अपनी पूरी कोशिशें कर रहा है।

इस वर्ष की शुरुआत में चार लोगों की हत्याएं बहुत जल्दी-जल्दी और बेहद ही निर्दयता से की गईं। रॉय और विजय दास की हत्या के आरोप में तीन लोगों सहित एक ब्रिटिश नागरिक तौहीदूर रहमान को भी गिरफ्तार किया गया। लेकिन, हिंसा जारी ही रही। इसकी शुरुआत 15 जनवरी 2013 को हुई, जब नास्तिक ब्लॉगर और राजनीतिक रुप से सक्रिय आसिफ मोहिउद्दीन पर काम के लिये जाते समय रास्ते में छुरे से लैस कुछ लोगों द्वारा पीछे से जानलेवा हमला किया गया। सौभाग्य से वह बच गये। इसके एक महीने बाद ही इस्लामी रुढि़वाद की आलोचना करने वाले एक अन्य ब्लॉगर अहमद रजाब हैदर पर उनके घर के बाहर ही छुरे से लैस लोगों ने हमला कर उनकी हत्या कर दी।

14-11-2015अगस्त 2014 में किसी ने नामी टीवी पर्सनेलिटी नुरुल इस्लाम फारुकी के ढाका स्थित घर को तोडऩे के बाद उनकी गर्दन काटकर हत्या कर दी। नुरुल इस्लाम फारुकी ने खुलेआम कट्टरपंथी समूहों की आलोचना की थी। एक मानवतावादी अध्यापक, प्रोफेसर शफीउल इस्लाम की राजशाही विश्वविद्यालय के पास हत्या कर दी गई थी। उन्होंने छात्राओं के पूरे चेहरे को ढंकने वाले नकाब पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। इन क्रूर अपराधों के अपराधियों का अब तक पता नहीं चल सका है। गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन मुकदमों का नेतृत्व करने को कोई तैयार नहीं है। सरकार नास्तिकों के साथ खड़ी रहने में असमर्थ और अनिच्छुक दिखाई देती है, वह इस की बजाय इस्लामवादियों को खुश करने की कोशिश में है। इस तिरस्कार से ब्लॉगर्स खुद के कार्यों को लेकर पिछले पैरों पर खड़े हैं। धर्मनिरपेक्षवादी आतंकित हैं। कईयों ने लिखना बंद कर दिया है तो कुछ ने देश तक छोड़ दिया है। इन हमलों के पीछे कौन है? और क्या बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष परंपराएं इस तरह के हिंसा का सामना करने के लिए जीवित रह सकती है?

निष्कर्ष

दुर्भाग्य से, बांग्लादेश राजनीतिक रूप से विभाजित है। इसके दो प्रमुख राजनीतिक दल एक-दूसरे के बिल्कुल विरोधी हैं। शेख हसीना, मुजीबुर रहमान की बेटी की अध्यक्षता वाली अवामी लीग अपने राजनीतिक विचारों में उदार हैं, वहीं बांग्लादेश नेशनल पार्टी को इस्लामिक उग्रवादी समूहों का खुले तौर पर समर्थन हासिल है। बीएनपी कई बार बांग्लादेश की सत्ता में रही है और इन अवधियों के दौरान बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों को बीएनपी नेतृत्व का संरक्षण लगातार हासिल था। चार ब्लॉगर्स की क्रूर हत्याओं के पीछे यही कट्टरपंथी संगठन हैं जिसमें इस्लामी कट्टरपंथियों जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश और हिफाजत-ए-इस्लाम है, जिन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ बोलने और लिखने वालों की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी और 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान क्रूरतापूर्वक हत्या करने वालों की सुनवाई का विरोध किया।

अवामी लीग सरकार ने आश्वासन दिया है कि चारों ब्लॉगरों के छुपे हुए कातिलों को गिरफ्तार कर लिया गया है और सरकार सभी संदिग्ध हमलावरों के खिलाफ क्रूर हत्याओं के मामले में ईमानदारी से मुकदमा चलाना सुनिश्चित करेगी। इस के बाद जरुरी यह है कि सरकार को उन सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए जो धार्मिक कट्टरवाद की आलोचना करने के साथ ही खुलेआम जनता में अपनी राय रखते हैं और उनकी धमकियों के आगे अपना सिर नहीं झुकाते हैं। यह केवल तभी संभव है, जब सरकार स्पष्ट रूप से कट्टरपंथियों के हमले के खिलाफ एक स्टैंड ले, तभी कट्टरपंथी समूह उदारवादी लोगों पर हमले और ब्लॉगर्स को मारने से डरेंगे।

ई एन राममोहन

   (लेखक बीएसएफ के पूर्व डीजी हैं)

 

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