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ड्रैगन के घर में चुनौती

ड्रैगन के घर में चुनौती

ड्रैगन (चीन) को उसके घर में चुनौती मिल गई है। वैश्विक पटल पर ऐसा पहली बार हो रहा है, जब राजनीतिक स्थितियां करवट ले रही हैं। अमेरिका ने अपने जंगी बेड़े से ड्रैगन की मुश्किल बढ़ा दी है। ऐसे में दो महाशक्तियों के बीच टकराव का खतरा पैदा हो गया है। चीन, अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब देने की चेतावनी दे रहा है। इस बदली परिस्थिति में पूरी दुनियी की निगाह दक्षिणी चीन सागर में टिक गई है।

दक्षिणी चीन सागर में चीन मानव निर्मित कृत्रिम द्वीप विकसित कर रहा है। उपग्रह से प्राप्त चित्रों के अनुसार इस द्वीप को विकसित करने के साथ चीन सैन्य तैनाती को भी लगातार मजबूत कर रहा है। उसने आर्टिलरी यूनिट की तैनाती के साथ-साथ सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त किए हैं। तीन हवाई पट्टियों और हैंगर का निर्माण भी कर रहा है। इन हवाई पट्टियों पर दुनिया का कोई भी लड़ाकू विमान उतारा जा सकेगा। ऐसा माना जा रहा है कि यह भविष्य में एक बंदरगाह का रूप ले लेगा। यहां चीन एयर डिफेन्स मिसाइलों के अलावा नौसेना, वायुसेना तथा सेना की तैनाती करके पूरे दक्षिणी चीन सागर पर अपना प्रभुत्व बढ़ाएगा। चीन इस पूरे क्षेत्र को अपनी संप्रभुता से जोड़कर अपना अंग बताता है। इसके चलते वह इस क्षेत्र में किसी दूसरे देश के जहाज आदि को बिना इजाजत लिए नहीं आने देता। कुछ समय पहले चीन ने यहां के हवाई क्षेत्र से उड़ रहे अमेरिकी विमानों को वापस जाने की चेतावनी दे डाली थी। भारतीय नौसेना के साथ भी उसने इसी तरह का सलूक किया था।

चीन के फिलीपींस के निकट स्र्पाटले द्वीप को विकसित करने पर दुनिया के तमाम देशों को सख्त ऐतराज है। भारत, अमेरिका, ब्रुनेई, मलेशिया, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, जापान, कोरिया इसके खिलाफ हैं।

उन्हें चीन का यह प्रयास जबरन अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अतिक्रमण का लग रहा है। यह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का भी सरासर उल्लंघन है। इससे पूर्ण स्वतंत्रता के साथ क्षेत्रीय आवाजाही के प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ेगा। क्योंकि किसी भी देश की तटीय सीमा से अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार कुछ मील समुद्र तक उस क्षेत्र का जल क्षेत्र होता है। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र माना जाता है। इस क्षेत्र से अमेरिका, भारत, जापान, फिलीपींस समेत अन्य देशों के जहाज गुजरते थे, लेकिन अब चीन की अनुमति के बिना पिछले काफी समय से ऐसा संभव नहीं हैं।

अमेरिका ने चीन की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए स्र्पाटले द्वीप से करीब 12 मील की दूरी पर झुबी चट्टान के पास अपना युद्धपोत भेजा है। यूएसएस लासेन नामक यह विध्वंसक गाइडेड मिसाइल युद्धक प्रणाली से युक्त है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लूकांग के अनुसार चीन की नौसेना ने न केवल अमेरिकी विध्वंसक को चेतावनी जारी की बल्कि, उसके जहाजों ने पीछा भी किया। लूकांग के अनुसार अमेरिका का यह प्रयास उसके जल क्षेत्र और चीन की संप्रभुता में दखल है। इसी के साथ चीन ने अमेरिका पर क्षेत्रीय सैन्य तनाव बढ़ाने का आरोप लगाया। चीन ने क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति मजबूत करने के भी संकेत दिये।

हाल में अमेरिकी रक्षा मंत्री एशटन कार्टर ने आस्ट्रेलिया दौरे के दौरान वाशिंगटन की स्थिति स्पष्ट की थी। कार्टर ने कहा था कि कोई गलती न करे। अमेरिका जैसे दुनिया में अपने विमान उड़ाता और जहाजों का संचालन करता आया है वह करता रहेगा। इसके लिए दक्षिण चीन सागर कोई अपवाद नहीं है। मौजूदा घटना पर अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि विध्वंसक सक्षम प्राधिकरण की निगरानी में झुबी चट्टान के पास तक गया है। यह नियमित पेट्रोलिंग का हिस्सा है और आगे भी जारी रहेगी।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने सधी प्रतिक्रिया दी है। विकास स्वरूप ने कहा कि भारत अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय कानून लागू करने और प्रभावी रहने के पक्षधर है। हम चाहते हैं कि फ्रीडम ऑफ नेवीगेशन हो और बेरोकटोक समुद्री क्षेत्र में आवाजाही बनी रहे। इस तरफ से भारत ने भी अपनी मंशा साफ कर दी है।

दक्षिण चीन सागर में अमेरिका के व्यापक हित हैं। दुनिया के तमाम देश भी चीन की विस्तारवादी नीति, क्षेत्रीय धमक और सैन्य असंतुलन को बढ़ावा देने के खिलाफ हैं। ऐसे में मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण होगा और चीन के माथे पर बल पडऩे की संभावना है।

अमेरिकी का दक्षिण चीन सागर में इस पहल के लिए चुना गया समय काफी महत्वपूर्ण है। हाल में ही चीन के अधिकारियों ने स्पार्टले द्वीप को लेकर सफाई दी थी। इसके लिए वह अमेरिका गये और इसे समुद्री सुरक्षा तथा राहत एवं बचाव के लिए अहम बताया। द्वीप को सैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने से साफ इनकार किया था। दिलचस्प यह भी है कि नवंबर के दूसरे सप्ताह में एशिया-पेसिफिक समिट होनी है। इस समिट में राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भाग लेने की संभावना है। ऐसे में अमेरिका की आक्रामक पहल मायने रखती है।


रंजना

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