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आखेट पुरस्कार वापसी का

आखेट पुरस्कार वापसी का

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: यह देश के साहित्यकारों को क्या हो गया है? वह अपने सम्मान और पुरस्कार ही लौटाते जा रहे हैं। क्या उन्हें यह पुरस्कार गलत दे दिये गये थे?

पिता: नहीं बेटा। ऐसी बात नहीं है। वह तो बहुत बड़े लेखक-कवि हैं, जिन्हें साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया है।

बेटा: तो फिर पिताजी, रोज एक के बाद एक कोई न कोई लेखक अपना पुरस्कार क्यों लौटाता जा रहा है?

पिता: बेटा, रोष है उनमें।

बेटा: किस चीज का पिताजी?

पिता: बेटा, तेरी तो साहित्य में कोई रूचि है नहीं। इसलिये तुझे तो पता नहीं होगा कि कन्नड़ के बहुत बड़े लेखक हुये हैं एमएम कलबुर्गी। वह कन्नड़ विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके हैं। वह बहुत बड़े रेशनलिस्ट भी थे।

बेटा: उनकी बहुत बड़ी राशन की दुकान थी?

पिता: तू तो मूर्ख का मूर्ख ही रहेगा। मैंने तो अंग्रेजी का शब्द इसलिये बोल दिया कि आज कल हिन्दी में भी अंग्रेजी के शब्द प्रयोग में लाये जाते हैं और हिन्दी वाले समझते हैं कि पाठक हिन्दी से ज्यादा आसानी से अंग्रेजी शब्द ही समझते हैं।

बेटा: माफ करना पिताजी। आपको तो पता है कि मैं मैट्रिक ही तो पास कर न पाया था।

पिता: पर तेरे जैसे ही तो ढोंग करते हैं कि उन्हें हिन्दी की बजाय अंग्रेजी के शब्द आसानी से समझ आ जाते हैं।

बेटा: चलो, छोड़ो पिताजी। अच्छा उनकी किसी और चीज की दुकान थी?

पिता: बड़बड़ ही करता जायेगा या चुप भी रहेगा? अगर तुझे कुछ समझना है तो चुप रहकर मेरी बात सुन। वरना मैं आगे कुछ नहीं बताऊंगा।

बेटा: अच्छा, आगे बताओ।

पिता: बेटा, वह प्रत्यक्षवादी थे। जब तक तर्क से उन्हें कोई बात न समझा दे, वह उसे मानने के लिये तैयार नहीं होते थे।

बेटा: तो फिर हुआ क्या?

पिता: बेटा, वह कई धार्मिक आस्थाओं और अंधविश्वासों को चुनौती दे देते थे।

बेटा: जैसे मैं, आपकी कई बातों पर विश्वास नहीं करता?

पिता: मूर्ख तू अपने से उनकी तुलना मत कर। कहां तू मूर्ख और कहां वह इतने बड़े विद्वान? तू फिजूल में मेरा सिर खा रहा है। तू चुप कर। यह तेरी समझ से बाहर की बातें हैं।

बेटा: पिताजी, माफ करो। मैं आगे कम बोलूंगा, पर मेरी शंकाओं का समाधान तो करो न।

पिता: कुछ धर्मांध लोग इस कारण उनके दुश्मन बन बैठे। अब परिजनों को शक है कि इन्हीं तर्कविहीन तत्वों ने उनकी हत्या कर दी।

बेटा: परिवार को किसी व्यक्ति विशेष या ग्रुप पर शक है?

पिता: नहीं। वह किसी विशेष व्यक्ति या संगठन का नाम तो नहीं लेते।

बेटा: उनकी हत्या कहां हुई?

पिता: धारवाड़ में अपने ही घर पर।

बेटा: तो परिवार के किसी व्यक्ति ने किसी को देखा नहीं?

पिता: ऐसा ही लगता है।

बेटा: कोई पकड़ा गया अभी तक?

पिता: नहीं। लगभग दो मास हो चुके हैं।

बेटा: यह तो बहुत बुरी बात है पिताजी।

पिता: यही तो मैं भी कहता हूं। सरकार को तो अब तक अपराधी को पकड़ कर दोष की सजा दिलवा देनी चाहिये थी।

बेटा: पिताजी, धारवाड़ कहां है?

पिता: कर्नाटक में।

बेटा: मोदीजी वहां के मुख्यमंत्री हैं?

पिता: मूर्ख, मोदीजी देश के प्रधानमंत्री हैं, कर्नाटक के मुख्यमंत्री नहीं।

बेटा: पिताजी, यह तो मैं जानता था, परंतु इन लेखकों की बातों से मैं भी चकरा गया। मुझे शक हो गया कि मोदीजी कर्नाटक के मुख्यमंत्री तो नहीं, क्योंकि वह सभी तो मोदीजी को ही गाली दे रहे हैं और इस घृणित अपराध का दोषी मान रहे हैं।

पिता: यही तो मेरी समझ में भी नहीं आ रहा। ये इतने विद्वान लोग कैसे ऐसी गलती कर रहे हैं?

बेटा: पिताजी, कर्नाटक में एनडीए या भाजपा की सरकार है?

पिता: नहीं बेटा, वहां तो कांग्रेस की सरकार है।

बेटा: तो फिर मोदीजी कहां से टपक पड़े उनके तर्क में? पिताजी, यह बताओ कि विद्वान लोग तार्किक नहीं होते?

पिता: बेटा, उनके पास तर्क न हो तो उनकी लेखनी का वजन ही नहीं बनता।

बेटा: तो फिर पिताजी, मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे की कुतर्क ही उनकी शक्ति है।

पिता: यही मुझे उनकी कमजोरी भी लगती है। यही नहीं, जिस कर्नाटक सरकार को कलबर्गी को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये थी और हत्या के बाद हत्यारे को पकडऩा चाहिये था, उसकी असफलता की तो वह बात ही अपनी जुबान या लेखनी पर नहीं लाते।

बेटा: पिताजी, आपको पता है कि मेरी धर्मपत्नि न तो मेरा नाम लेती है और न आपका। तो क्या इन लेखकों का भी कर्नाटक सरकार से कोई ऐसा ही रिश्ता है?

पिता: तू बकवास करने से बाज नहीं आ सकता। कभी साहित्याकारों और सरकार में भी कोई ऐसा रिश्ता होता है?

बेटा: पिताजी आप भी मुझ पर व्यर्थ में ही गुस्सा हो बैठते हैं। आपको पता है आजकल की पत्नियां और बहुएं भी इतनी एडवांस हो गई हैं कि वह अपने-अपने पति और ससुर को नाम से पुकारती हैं। जैसे कि वह उनसे बड़े न होकर उनके बराबर के दोस्त हों। तो फिर यह लेखक कर्नाटक सरकार का नाम लेने से क्यों शर्मा रहे हैं?

पिता: तेरे तर्क में तो दम है। पर तू कहां से इतना तार्किक हो गया?

बेटा: यह सब मैं आप बड़ों से ही सीखता हूं पिताजी, क्या कुलबर्गी जैसी हत्या देश में पहली बार हुई? वह यह भी तो कह रहे हैं कि ऐसी घटिया हरकतों से लेखकों के विचार व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को छीना जा रहा है।

पिता: बेटा, पूर्व में तो इस प्रकार की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं।

बेटा: तब भी इन लोगों ने पुरस्कार इसी प्रकार लौटा दिये थे?

पिता: नहीं बेटा। ऐसी निर्मम व निर्दोष हत्याएं तो अनगिनत हो चुकी हैं, पर फर्क इतना है की तब इन्हीं महानुभावों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी थी।

बेटा: हां पिताजी, इतना तो मुझे भी याद है कि एक बार यूपी के एक नेता ने स्वीडन के उस कार्टूनिस्ट के हाथ काट कर लाने के लिये कहा था, जिसने हजरत मुहम्मद साहिब का कार्टून बनाया था। उसने उस व्यक्ति को दस करोड़ रुपये इनाम देने की बात भी की थी।

पिता: हमारी ही सरकार ने साप्ताहिक पत्रिका के एक सम्पादक को जेल भेज दिया था, जिसने स्वीडन वाले कार्टून अपनी पत्रिका में छाप दिये थे।

बेटा: पिताजी आपको याद है, हैदराबाद में कुछ मुस्लिम नेताओं ने बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा पर हमला कर दिया था, जो ऐसा लिखती हैं, जिसे वह पचा नहीं पाते?

पिता: वैसे तो बेटा, पहले की सरकार ने सलमान रश्दी की पुस्तक पर भी पाबंदी लगा दी थी। इसी प्रकार दा विंसी नाम की एक फिल्म पर भी भारत में प्रतिबन्ध लगा दिया था। क्योंकि, उस फिल्म से एक गैर-हिन्दू समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचती थी।

बेटा: तो पिताजी, क्या इस प्रकार की घटनाएं तब लेखको के विचार व अभिव्यक्ति की आजादी पर कुल्हाड़ी नहीं मारते थे?

पिता: अवश्य, बेटा अवश्य।

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